किसी सामाजिक संस्था के लिए फंड जुटाना सिर्फ प्रपोज़ल लिखने तक सीमित नहीं होता। फंड मिलने से पहले संस्था को कई तरह के दस्तावेज़ साझा करने होते हैं, फंडर के सवालों के जवाब देने होते हैं और यह भी बताना होता है कि मिले हुए पैसे का इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा। इसके बाद रिपोर्टिंग की प्रक्रिया भी चलती रहती है।
इस पूरी प्रक्रिया में कई ऐसे अंग्रेज़ी शब्द इस्तेमाल होते हैं, जिन्हें समझना विकास क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए हमेशा आसान नहीं होता। फंडर द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली शब्दावली कई बार ऐसी होती है, जिसे समझने के लिए सिर्फ अंग्रेज़ी जानना ही काफी नहीं होता। इन शब्दों का सही अर्थ और अलग-अलग संदर्भों में इनका इस्तेमाल समझना भी ज़रूरी होता है।
इन शब्दों का सिर्फ हिंदी अनुवाद जानना भी काफी नहीं है। यह समझना भी ज़रूरी है कि फंडर इन शब्दों के जरिए संस्था से किस तरह की जानकारी मांग रहा है। यहां हम ऐसी ही 10 शब्दावलियों को आसान भाषा में समझने की कोशिश करेंगे।
1. ड्यू डिलिजेंस
सरल भाषा में: फंड देने से पहले संस्था की जांच-पड़ताल।
जब कोई फंडर किसी संस्था को आर्थिक मदद देने का फैसला करता है, तो वह सीधे पैसे नहीं दे देता। पहले वह संस्था से उसके पंजीकरण, वित्तीय रिकॉर्ड, ऑडिट रिपोर्ट, बोर्ड और दूसरी ज़रूरी नीतियों से जुड़े दस्तावेज़ मांग सकता है। इस प्रक्रिया को ड्यू डिलिजेंस कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, कोई फंडर ड्यू डिलिजेंस के तहत आपकी संस्था से पिछले दो वर्षों की ऑडिट रिपोर्ट, पंजीकरण प्रमाणपत्र और बोर्ड सदस्यों से जुड़ी जानकारी मांग सकता है। ऐसा करके वह यह सुनिश्चित करना चाहता है कि संस्था वास्तव में मौजूद है, नियमों का पालन करती है और मिले हुए फंड का ज़िम्मेदारी से इस्तेमाल कर पाएगी।
इसलिए ड्यू डिलिजेंस को केवल फंडर द्वारा संस्था की ‘जांच-पड़ताल’ समझने के बजाय संस्था और फंडर के बीच भरोसा बनाने की एक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।
2. ग्रांट एग्रीमेंट
सरल भाषा में: फंडर और संस्था के बीच हुआ समझौता।
जब फंडर किसी संस्था को फंड देने के लिए तैयार हो जाता है, तो दोनों के बीच एक समझौता होता है। इसमें आमतौर पर यह तय किया जाता है कि कितनी राशि दी जाएगी, कितने समय के लिए दी जाएगी, उसका इस्तेमाल किन कामों के लिए किया जाएगा और संस्था को कब-कब और किस तरह की रिपोर्ट देनी होगी।
मसलन, किसी संस्था को दो साल के लिए 50 लाख रुपए का ग्रांट मिला। ग्रांट एग्रीमेंट में यह लिखा हो सकता है कि इस राशि का इस्तेमाल केवल ग्रामीण किशोरियों के शिक्षा कार्यक्रम के लिए किया जाएगा और संस्था को हर छह महीने में प्रगति रिपोर्ट देनी होगी।
इसलिए किसी भी ग्रांट एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने से पहले संस्था के लिए उसकी शर्तों को ध्यान से पढ़ना ज़रूरी है।
3. रिस्ट्रिक्टेड फंडिंग
सरल भाषा में: ऐसा फंड जिसे केवल तय किए गए काम पर खर्च किया जा सकता है।
अगर फंडर किसी संस्था को किसी खास कार्यक्रम के लिए पैसा देता है और संस्था उस पैसे का इस्तेमाल किसी दूसरे काम में नहीं कर सकती, तो इसे रिस्ट्रिक्टेड फंडिंग कहा जाता है।
मान लीजिए, किसी संस्था को केवल बाढ़ प्रभावित परिवारों के लिए राहत सामग्री उपलब्ध कराने के लिए 10 लाख रुपए मिले हैं। तो ऐसे में संस्था इस पैसे का इस्तेमाल अपने ऑफिस का किराया देने या किसी दूसरे कार्यक्रम के लिए नहीं कर सकती।
इसलिए ऐसे फंड के मामले में संस्था के लिए यह समझना ज़रूरी है कि पैसा किन गतिविधियों पर खर्च किया जा सकता है और किन पर नहीं।
4. अनरिस्ट्रिक्टेड फंडिंग
सरल भाषा में: ऐसा फंड जिसे संस्था अपनी ज़रूरत के अनुसार इस्तेमाल कर सकती है।
रिस्ट्रिक्टेड फंडिंग के उलट अनरिस्ट्रिक्टेड फंडिंग किसी एक कार्यक्रम या गतिविधि तक सीमित नहीं होती। संस्था इसे अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार इस्तेमाल कर सकती है।
उदाहरण के लिए, किसी फंडर ने संस्था को 10 लाख रुपए दिए और यह तय नहीं किया कि यह पैसा किसी खास प्रोजेक्ट पर ही खर्च होना चाहिए। ऐसे में संस्था अपनी ज़रूरत के अनुसार इसका इस्तेमाल स्टाफ की लागत, तकनीकी व्यवस्था या किसी अन्य कार्यक्रम में कर सकती है।
छोटे संगठनों के लिए इस तरह की फंडिंग खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि इससे वे उन ज़रूरी खर्चों पर भी पैसा लगा पाते हैं जिनके लिए अलग से फंड मिलना मुश्किल होता है।
5. कोरफंडिंग
सरल भाषा में: संस्था को चलाने के ज़रूरी खर्चों के लिए मिलने वाला फंड।
किसी संस्था का काम सिर्फ उसके कार्यक्रमों से नहीं चलता। उसे स्टाफ, ऑफिस, अकाउंटिंग, तकनीकी व्यवस्था और दूसरी संस्थागत ज़रूरतों पर भी खर्च करना होता है। इन बुनियादी ज़रूरतों के लिए मिलने वाली आर्थिक मदद को कोर फंडिंग कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, किसी संस्था का पूरा काम ग्रामीण महिलाओं के साथ हो सकता है, लेकिन उसके पास एक अकाउंटेंट, ऑफिस और कंप्यूटर सिस्टम भी होना ज़रूरी है। इन खर्चों के लिए मिलने वाला फंड कोर फंडिंग का हिस्सा हो सकता है।
यह फंड इसलिए महत्वपूर्ण होता है क्योंकि कई छोटे संगठनों के पास कार्यक्रम चलाने के लिए तो फंड होता है, लेकिन संस्था को मज़बूत और व्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं होता।


6. इनडायरेक्ट कॉस्ट/ओवरहेड
सरल भाषा में: किसी खास कार्यक्रम को चलाने के लिए होने वाले ऐसे खर्च, जो उस कार्यक्रम की गतिविधि से सीधे नहीं जुड़े नहीं होते।
मान लीजिए, आपकी संस्था ने 100 महिलाओं के प्रशिक्षण का कार्यक्रम शुरू किया है। प्रशिक्षण स्थल, प्रशिक्षक और प्रशिक्षण सामग्री का खर्च सीधे कार्यक्रम की गतिविधियों से जुड़ा है। लेकिन इस कार्यक्रम के लिए अकाउंटिंग, प्रशासन, इंटरनेट या ऑफिस की कुछ सुविधाओं का इस्तेमाल भी करना पड़ सकता है। ऐसे खर्चों को इनडायरेक्ट कॉस्ट या ओवरहेड कहा जा सकता है।
यहां ओवरहेड और कोर फंडिंग के बीच अंतर समझना ज़रूरी है। कोर फंडिंग संस्था की व्यापक और बुनियादी ज़रूरतों के लिए मिलने वाली राशि होती है, जबकि ओवरहेड यानी किसी खास कार्यक्रम को लागू करने में होने वाले अप्रत्यक्ष खर्च। मसलन, संस्था के अकाउंटेंट की पूरी सैलरी कोर फंडिंग से दी जा सकती है, लेकिन अगर वह किसी खास कार्यक्रम के लिए हिसाब-किताब संभालने में अपना कुछ समय दे रहा है, तो उस कार्यक्रम के बजट में उसके समय का एक हिस्सा अप्रत्यक्ष लागत के रूप में शामिल किया जा सकता है।
इसलिए प्रपोज़ल बनाते समय यह समझना ज़रूरी है कि किसी कार्यक्रम को चलाने के लिए सिर्फ सीधे होने वाले खर्च ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े अप्रत्यक्ष खर्च भी होते हैं। इन्हें बजट में सही तरीके से शामिल करना संस्था के वास्तविक खर्च को सामने रखने में मदद करता है।
7. को-फंडिंग
सरल भाषा में: किसी कार्यक्रम के लिए एक से अधिक स्रोतों से पैसा मिलना।
कई बार किसी एक कार्यक्रम का पूरा खर्च एक ही फंडर नहीं उठाता। ऐसे में संस्था को दूसरे फंडर, सरकार या अपने दूसरे संसाधनों से भी पैसा जुटाना पड़ सकता है। इसे को-फंडिंग कहा जाता है।मसलन, किसी कार्यक्रम की कुल लागत 20 लाख रुपए है। एक फंडर 12 लाख रुपए देता है और बाकी 8 लाख रुपए संस्था किसी दूसरे स्रोत से जुटाती है। यह को-फंडिंग का उदाहरण है।
कुछ फंडर खुद भी यह शर्त रखते हैं कि संस्था को किसी कार्यक्रम की लागत का एक हिस्सा किसी दूसरे स्रोत से जुटाना होगा।
8. डिलिवरेबल्स
सरल भाषा में: प्रोजेक्ट के दौरान संस्था को जो तय काम या परिणाम फंडर को पूरे करके दिखाने होते हैं।
फंडर और संस्था के बीच हुए समझौते में अक्सर कुछ खास काम तय किए जाते हैं। जैसे, एक अध्ययन तैयार करना, प्रशिक्षण आयोजित करना, कोई रिपोर्ट जमा करना या किसी निश्चित संख्या में लोगों तक कार्यक्रम पहुंचाना। इन तय कामों या नतीजों को डिलिवरेबल्स कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, अगर किसी प्रोजेक्ट में संस्था को छह महीने में 20 प्रशिक्षण आयोजित करने और एक प्रशिक्षण रिपोर्ट तैयार करने की ज़िम्मेदारी दी गई है, तो ये उसके डिलिवरेबल्स हो सकते हैं।
इस शब्द को समझना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि डिलिवरेबल का मतलब सिर्फ ‘काम करना’ नहीं है, बल्कि इसका सरोकार उन नतीजों से होता है, जिन्हें संस्था को तय समय-सीमा के भीतर पूरा करके दिखाना होता है।
9. माइलस्टोन
सरल भाषा में: किसी प्रोजेक्ट के दौरान हासिल किया जाने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव।
किसी बड़े प्रोजेक्ट का अंतिम लक्ष्य एक साथ हासिल नहीं होता। उसके बीच में कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव तय किए जाते हैं। इन्हें माइलस्टोन कहा जाता है।
मसलन, किसी संस्था का तीन साल का लक्ष्य 50 गांवों तक पहुंचना है। ऐसे में पहले छह महीने में 10 गांवों में काम शुरू करना और पहले साल के अंत तक 20 गांवों तक पहुंचना उसके माइलस्टोन हो सकते हैं।
माइलस्टोन फंडर और संस्था दोनों को यह समझने में मदद करते हैं कि प्रोजेक्ट तय दिशा में आगे बढ़ रहा है या नहीं।
10. सेफगार्डिंग
सरल भाषा में: संस्था से जुड़े लोगों को नुकसान, शोषण और दुर्व्यवहार से सुरक्षित रखने की व्यवस्था।
जब कोई संस्था बच्चों, महिलाओं, दिव्यांग लोगों या किसी अन्य संवेदनशील समूह के साथ काम करती है, तो उसकी ज़िम्मेदारी केवल कार्यक्रम चलाने तक सीमित नहीं होती। उसे यह भी सुनिश्चित करना होता है कि कार्यक्रम में शामिल किसी भी व्यक्ति के साथ किसी भी तरह का शोषण, हिंसा, दुर्व्यवहार या उसे किसी अन्य तरह का नुकसान न हो।
इसी के लिए संस्थाएं सेफगार्डिंग से जुड़ी नीतियां और प्रक्रियाएं बनाती हैं। उदाहरण के लिए, बच्चों के साथ काम करने वाली संस्था यह तय कर सकती है कि उसके कर्मचारी बच्चों के साथ किस तरह बातचीत करेंगे, किसी शिकायत को कैसे दर्ज किया जाएगा और शिकायत मिलने पर क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
कई फंडर अब संस्था की सेफगार्डिंग व्यवस्था के बारे में भी जानकारी मांगते हैं। इसलिए छोटे संगठनों के लिए इस शब्द और इससे जुड़ी जिम्मेदारियों को समझना ज़रूरी है।
सिर्फ शब्दों के मायने समझना ही काफी नहीं
फंडर द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ये शब्द पहली नज़र में मुश्किल लग सकते हैं। लेकिन इनके पीछे छिपी बात को समझना उतना मुश्किल नहीं है। ज़रूरत इस बात की है कि संस्था यह समझे कि फंडर किस शब्द के ज़रिए उससे कौन-सी जानकारी मांग रहा है।
खासकर छोटे और स्थानीय संगठनों के लिए इन शब्दों के मायने समझना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि फंडिंग की प्रक्रिया में भाषा खुद एक बाधा नहीं बननी चाहिए। अगर संस्था फंडर की शब्दावली को समझती है, तो वह अपने काम, ज़रूरतों और चुनौतियों को अधिक स्पष्ट तरीके से सामने रख सकती है। इससे फंडर के साथ बातचीत भी केवल फंड मांगने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि दोनों के बीच बेहतर समझ और साझेदारी बनाने का ज़रिया भी बनती है।
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लेखक के बारे में
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