नेतृत्व और हुनर

गांव का युवा आज भी स्किल ट्रेनिंग से दूर क्यों है? 

डीडीयू-जीकेवाई योजना का उद्देश्य ग्रामीण युवाओं को कौशल प्रशिक्षण और रोजगार से जोड़ना था। लेकिन वर्तमान में यह जागरूकता की कमी, सामाजिक रुकावटों और पाठ्यक्रम की कमियों से जूझती नजर आती है।
सिलाई मशीन पर कपड़े सिलती हुई महिला कामगार_कौशल विकास
11 मार्च 2026 को प्रकाशित

पिछले एक दशक में भारत का कौशल विकास पारिस्थितिकी तंत्र (स्किलिंग ईकोसिस्टम) कई प्रमुख राज्य और केंद्रीय योजनाओं, जैसे दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना (डीडीयू-जीकेवाई) और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) के माध्यम से विस्तृत हुआ है। इसके बावजूद, औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं का अनुपात बहुत कम बना हुआ है, और वर्ष 2023–24 में यह केवल 4.9 प्रतिशत था। इसका अर्थ है कि 15–29 वर्ष के लगभग 35.3 करोड़ युवाओं ने कोई औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया है।

इस आंकड़े की भौगोलिक असमानता भी ग़ौरतलब है: जहां शहरी युवाओं में 7.1 प्रतिशत को औपचारिक प्रशिक्षण मिला है, वहीं ग्रामीण युवाओं में यह घटकर 3.9 प्रतिशत रह जाता है। इसके विपरीत, एक बड़ी संख्या में युवा अनौपचारिक तरीकों से कौशल सीखते हैं—जैसे काम करते हुए, अपने आप या पारंपरिक पेशे के माध्यम से। 13.9 प्रतिशत युवा महिलाओं और 28.2 प्रतिशत युवा पुरुषों ने इस तरह के अनौपचारिक प्रशिक्षण की बात स्वीकार की। जब ग्रामीण भारत में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए बेरोजगारी दर 2.5 प्रतिशत थी, उस समय 15–29 वर्ष के युवाओं में इसे 8.5 प्रतिशत दर्ज किया गया था, जो ग्रामीण श्रम बाजार में युवाओं की कमजोर स्थिति को दर्शाती है।

ये आंकड़े वर्ष 2014 में डीडीयू-जीकेवाई के शुरू होने के लगभग एक दशक बाद सामने आए हैं। यह योजना भारत के अनुमानित 18 करोड़ ग्रामीण युवाओं में से लगभग 5.5 करोड़ सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित युवाओं को लक्षित करती है, जो या तो बेरोजगार हैं या जिनके पास अस्थायी रोजगार है। इसके बावजूद, औपचारिक प्रशिक्षण में लगातार पिछड़ापन, डीडीयू-जीकेवाई में मौजूद कुछ खामियों की ओर संकेत करता है, जिन्हें दूर करना आवश्यक है।

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 कागज पर मजबूत, जमीन पर कमजोर

डीडीयू-जीकेवाई को एक समग्र, मांग-आधारित कौशल विकास पहल के रूप में डिज़ाइन किया गया है, जिसका उद्देश्य प्रशिक्षण और रोजगार के बीच की खाई को पाटना है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) के माध्यम से लागू की जानी वाली यह योजना, मान्यता प्राप्त परियोजना कार्यान्वयन एजेंसियों (पीआईए) द्वारा उद्योग-सम्बद्ध, अल्पकालिक और आवासीय प्रशिक्षण प्रदान करती है। इसमें सॉफ्ट स्किल्स और डिजिटल साक्षरता जैसे मॉड्यूल भी शामिल हैं, और उम्मीदवारों की पहचान, नामांकन, प्रशिक्षण से लेकर प्लेसमेंट के बाद ट्रैकिंग तक संपूर्ण सहयोग दिया जाता है।

योजना के तहत प्रत्येक पीआईए के लिए कम से कम 70 प्रतिशत प्लेसमेंट सुनिश्चित करना अनिवार्य है, और प्रशिक्षुओं के लिए न्यूनतम 6,000 रुपये मासिक वेतन निर्धारित किया गया है। एक ऐसे देश में, जहां 90 प्रतिशत से अधिक कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्र में है, यह योजना युवाओं को औपचारिक रोजगार की ओर ले जाने और नौकरी में बने रहने तथा करियर प्रगति को प्रोत्साहित करने का प्रयास करती है, विशेष रूप से वंचित ग्रामीण युवाओं के लिए।

जो गांव पीआईए कार्यालय के पास हैं या जिनके स्थानीय अधिकारियों से अच्छे संबंध है, उन्हें प्राथमिकता मिलती है, और दूरस्थ या वंचित गांव अक्सर छूट जाते हैं।

लेकिन जमीनी स्तर पर यह योजना कार्यान्वयन चुनौतियों और संरचनात्मक बाधाओं से जूझ रही है।

वर्ष 2016 से वर्ष 2024 के बीच 13.95 लाख लोगों को प्रशिक्षित किया गया, जिनमें से 68 प्रतिशत को रोजगार मिला, जो 70 प्रतिशत के न्यूनतम लक्ष्य से कम है। इससे भी अधिक चिंताजनक बुनियादी ढांचे की स्थिति है। जुलाई 2024 तक 2,369 प्रशिक्षण केंद्रों में से केवल 629 ही चालू थे, जो स्थापित संसाधनों के बड़े पैमाने पर कम उपयोग को दर्शाता है।

इन समस्याओं को बेहतर समझने के लिए, और विशेषकर महिलाओं की भागीदारी पर इनके प्रभाव को देखते हुए, जस्टजॉब्स नेटवर्क ने अगस्त 2025 में ओडिशा के रायगड़ा जिले में एक अध्ययन किया। रायगड़ा एक आदिवासी बहुल और आर्थिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र है, जहां आजीविका मुख्य रूप से निर्वाह कृषि, वन-आधारित गतिविधियों, दिहाड़ी मजदूरी और दक्षिणी राज्यों की ओर मौसमी पलायन पर निर्भर करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं आमतौर पर शिक्षण, खेती, मनरेगा कार्य, आशा कार्यकर्ता की भूमिकाओं या सिलाई जैसे कामों में लगी होती हैं, जिनसे उनकी मासिक आय सामान्यतः 6000-7000 रुपये के बीच होती है।

हमारे अध्ययन के दौरान हमने 15–29 वर्ष की युवतियों, उनके अभिभावकों, प्रशिक्षकों और स्थानीय अधिकारियों से बातचीत की। यद्यपि ग्रामीण महिलाओं के लिए सामाजिक और संरचनात्मक बाधाओं का अक्सर उल्लेख किया जाता है, लेकिन हमारी बातचीत ने दिखाया कि ये चुनौतियां रोजमर्रा के जीवन में किस तरह काम करती हैं। ये तय करती हैं कि महिलाएं प्रशिक्षण में नामांकन कर पाएंगी, उसे पूरा कर पाएंगी या रोजगार में टिक पाएंगी।

भागीदारी कम क्यों है?

1. कम जागरूकता और कमजोर लामबंदी

रायगड़ा में डीडीयू-जीकेवाई और राज्य-स्तरीय कौशल कार्यक्रम मौजूद हैं, जो अधिकांश परियोजना कार्यान्वयन एजेंसियों (पीआईए) के माध्यम से संचालित होते हैं। लेकिन एक स्थानीय सरकारी अधिकारी ने हमें बताया कि उनके लिए उम्मीदवारों की कमी एक बड़ी समस्या रही है, क्योंकि कई ग्रामीण युवा, विशेषकर महिलाएं, इन प्रशिक्षण अवसरों से अनभिज्ञ हैं। डीडीयू-जीकेवाई के तहत उम्मीदवारों को जुटाने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से पीआईए की होती है। संभावित उम्मीदवारों तक पहुंचने के लिए वे ग्राम पंचायतों और ब्लॉक-स्तरीय अधिकारियों के साथ समन्वय करते हैं, और कभी-कभी सीधे गांवों में भी अभियान चलाते हैं। लेकिन यह तरीका समावेशी न होने के साथ-साथ पक्षपात भी पैदा करता है।

मिल में काम करते हुए कामगार_ कौशल विकास
वर्ष 2016 से 2024 के बीच 13.95 लाख लोगों को प्रशिक्षण दिया गया और 68 प्रतिशत को रोजगार मिला, जो 70 प्रतिशत के न्यूनतम लक्ष्य से कम है। | चित्र साभार: फिल्कर /सीसी बीवाए

उदाहरण के लिए, जो गांव पीआईए कार्यालय के पास हैं या जिनके स्थानीय अधिकारियों से अच्छे संबंध है, उन्हें प्राथमिकता मिलती है, और दूरस्थ या वंचित गांव अक्सर छूट जाते हैं। इसी प्रकार, जिन परिवारों को ‘प्रशिक्षण पूरा करने में कम सक्षम’ माना जाता है, या जिन युवतियों के परिवार उन्हें बाहर भेजने में हिचकते हैं, उन्हें कम प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे में जागरूकता और सुलभता (एक्सेस) काफी हद तक पीआईए की क्षमता और प्रोत्साहन पर निर्भर करती है। यह सीटों की उपलब्धता, भर्ती लक्ष्य, स्थानीय नेटवर्क और पीआईए की तत्काल नामांकन की आवश्यकता पर निर्भर करता है। नतीजतन, यह प्रक्रिया व्यवस्थित होने के बजाय बिखरी हुई और परिस्थितियों पर अति-निर्भर हो कर रह जाती है।

2. आवासीय प्रशिक्षण को लेकर परिवारों की हिचकिचाहट और स्थानीय रोजगार की ओर झुकाव

कई क्षेत्रों में लोग अपने घर की युवा महिलाओं को कस्बों या जिला मुख्यालयों में स्थित आवासीय प्रशिक्षण केंद्रों में भेजने के लिए तैयार नहीं होते। इसके पीछे सुरक्षा चिंताएं, सांस्कृतिक मान्यताएं और घरेलू जिम्मेदारियां प्रमुख कारण हैं। कुछ मामलों में, रायगड़ा के गांवों से निकटतम बस स्टॉप तक पहुंचने के लिए 5 किलोमीटर से अधिक पैदल चलना पड़ता है, जिससे महिलाओं की आवाजाही और सुरक्षा को लेकर चिंताएं और बढ़ जाती हैं। इससे योजना की आवासीय प्रशिक्षण की व्यवस्था, जो अनुशासित और व्यवस्थित सीख के लिए बनायी गयी थी, के बावजूद, महिलाओं की भागीदारी कम ही रही है।

इसके अलावा, यदि कुछ स्थानों पर प्रशिक्षण की सुविधा हो, तो भी स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों और करियर परामर्श की कमी एक बड़ी चुनौती बन जाती है। रायगड़ा में युवा महिलाएं आमतौर पर सिलाई, ब्यूटी और वेलनेस, या हस्तशिल्प जैसे कोर्स में नामांकन करती हैं। टेक्सटाइल और सिलाई जैसे क्षेत्रों में रोजगार या अप्रेंटिसशिप के लिए अक्सर जिले या राज्य से बाहर जाना पड़ता है।

एक 21 वर्षीय युवती, जिसने 12वीं कक्षा पूरी की है और डीडीयू-जीकेवाई कार्यक्रम में नामांकित है, ने हमें बताया, “मेरे माता-पिता मुझे ओडिशा के बाहर नहीं भेजेंगे। प्रशिक्षण के बाद जो अधिकतर नौकरियां मिलती हैं, वे दूसरे राज्यों में होती हैं। इसलिए भले ही मैं कोर्स पूरा कर लूं, लेकिन शायद नौकरी नहीं कर पाऊंगी।” जिन महिलाओं से हमने बातचीत की, उन्होंने बताया कि उन्हें 10,000–12,000 रुपये मासिक वेतन वाली नौकरियों के प्रस्ताव मिले थे, जो स्थानीय आय (6,000–7,000 रुपये) से कहीं अधिक है। लेकिन इनमें से अधिकांश प्लेसमेंट आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे दूरस्थ राज्यों में थे। कुछ महिलाओं ने, जिन्होंने इन राज्यों में काम शुरू किया, बताया कि उन्हें वहां की सांस्कृतिक और खान-पान की परिस्थितियों में ढलने में कठिनाई हुई।

निजी क्षेत्र की दूरस्थ नौकरियों तक पहुंचने की कठिनाई, और साथ ही सरकारी या स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता देना, महिलाओं के बीच कौशल प्रशिक्षण की कम भागीदारी का एक बड़ा कारण है। इसी वजह से कई महिलाएं प्रशिक्षण के बाद जिले से बाहर जाकर नौकरी करने के बजाय स्व-रोजगार को प्राथमिकता देती हैं।

3. पाठ्यक्रम संरचना में असमान शिक्षा स्तर (लर्निंग गैप) के लिए उपायों की कमी

हालांकि विभिन्न कोर्सों के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता अलग-अलग होती है, लेकिन प्रशिक्षकों ने बताया कि कई प्रतिभागी प्रशिक्षण केंद्रों पर कम साक्षरता, गणितीय क्षमता और संचार कौशल के साथ पहुंचते हैं। इससे छात्रों और पाठ्यक्रम की अपेक्षाओं के बीच एक बड़ा अंतर पैदा हो जाता है। एक प्रशिक्षक ने बताया, “अगर छात्रों को निर्देश पढ़ने या सरल गणनाएं करने में कठिनाई होती है, तो इतने कम समय के कोर्स में उन्हें सीधे सेक्टर-विशेष कौशल सिखाना बहुत मुश्किल हो जाता है।” कई प्रशिक्षकों ने बताया कि उन्हें अक्सर पढ़ाई की गति धीमी करनी पड़ती है, बुनियादी अवधारणाओं को दोहराना पड़ता है और अतिरिक्त सहायता करनी पड़ती है, जबकि कोर्स की अवधि (3 से 12 महीने) में यह सम्मिलित नहीं होता है। प्रशिक्षकों ने बताया कि इसका असर केवल सीखने के परिणामों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि इससे प्रशिक्षुओं का आत्मविश्वास भी घटता है और ड्रॉपआउट की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा, कई महिलाओं की पढ़ाई घरेलू जिम्मेदारियों या जल्दी शादी के कारण अधूरी रह गयी होती है, जिससे कक्षा में उनकी भागीदारी और बोलने की हिचक, खासकर मिश्रित समूहों में, और बढ़ जाती है।

4. अवसंरचना और पाठ्यक्रम में कमियां

न्यूनतम गुणवत्ता मानकों का पालन होने के बावजूद, कई प्रशिक्षण केंद्रों को पुराने उपकरण, सीमित डिजिटल संसाधन और जर्जर प्रैक्टिकल लैब्स जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही, अपर्याप्त हॉस्टल सुविधाएं, सीमित इंटरनेट सुविधा और सहायक स्टाफ की कमी जैसे कारक मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं, जो कई युवाओं के लिए कौशल प्रशिक्षण को कठिन और कम सुलभ बना देता है।

कौशल प्रशिक्षण को सुलभ कैसे बनाया जा सकता है?

1. स्थानीय और संदर्भ-आधारित प्रशिक्षण विकल्प

एक प्रशिक्षक के अनुसार, यदि प्रशिक्षण कार्यक्रम गांवों के पास स्थित हों, तो महिलाओं का नामांकन बढ़ सकता है। कई महिलाएं आवासीय कोर्स के दूर-दराज होने के कारण उनमें हिस्सा नहीं ले पाती हैं। ऐसे में स्थानीय, गैर-आवासीय और लचीले प्रशिक्षण मॉडल भागीदारी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। डीडीयू-जीकेवाई के लिए हब-एंड-स्पोक मॉडल एक संभावित समाधान हो सकता है। इसमें जिला या ब्लॉक स्तर पर अच्छी सुविधाओं वाले प्रशिक्षण केंद्र “हब” के रूप में कार्य करें, और आसपास के गांवों में छोटे प्रशिक्षण केंद्र “स्पोक” के रूप में स्थापित हों। इन स्थानीय केंद्रों में बुनियादी कौशल, सॉफ्ट स्किल और मॉड्यूलर प्रशिक्षण दिए जा सकते हैं। फिर छात्रों को केवल उन्नत व्यावहारिक प्रशिक्षण या मूल्यांकन के लिए ही हब पर जाना होगा। ऐसे ही हब-एंड-स्पोक मॉडल की सिफारिश समग्र शिक्षा कार्यक्रम के तहत भी की गयी है, जहां हब स्कूल की सुविधाओं का उपयोग आसपास के स्पोक स्कूलों में व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ाने के लिए किया जाता है। इससे नियमित यात्रा का बोझ कम होगा, सुरक्षा संबंधी चिंताएं घटेंगी, और प्रशिक्षण में लचीलापन बढ़ेगा। साथ ही गुणवत्ता और प्लेसमेंट परिणाम भी बरकरार रखे जा सकेंगे।

कई प्रशिक्षण केंद्रों को पुराने उपकरण, सीमित डिजिटल संसाधन और जर्जर प्रैक्टिकल लैब्स जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

इसके अलावा, दूरस्थ गांवों से आने वाली महिलाओं के लिए गैर-आवासीय प्रशिक्षण मॉडल में परिवहन व्यवस्था, यात्रा भत्ता या सुरक्षित सामूहिक आवागमन जैसे प्रावधान शामिल किए जाने चाहिए। साथ ही, मोबाइल प्रशिक्षण, सप्ताहांत कार्यक्रम और मॉड्यूलर कोर्स संरचना जैसे विकल्प ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रशिक्षण को और अधिक सुलभ बना सकते हैं। हालांकि इन उपायों के लिए डिज़ाइन में महत्वपूर्ण बदलाव की आवश्यकता होगी, लेकिन इनमें योजना की पहुंच और प्रभावशीलता को व्यापक रूप से बढ़ाने की क्षमता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि डीडीयू-जीकेवाई की कार्यान्वयन संरचना ऐसे अनुकूलनों की अनुमति देती है। जहां ग्रामीण विकास मंत्रालय समग्र दिशानिर्देश और वित्तीय मानदंड तय करता है, वहीं राज्य कौशल विकास मिशन (एसएसडीएम) और जिला प्रशासन क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और पीआईए के साथ मिलकर काम करते हैं। इससे राज्य और जिला स्तर पर स्थानीय संदर्भ के अनुरूप प्रशिक्षण मॉडल अपनाने की गुंजाइश बनती है।

2. मजबूत सामुदायिक सहभागिता

वर्तमान में योजना की पहुंच पंचायत और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों के साथ समन्वय तक सीमित है, जो अधिकतर सीट भरने और उम्मीदवार पहचानने तक ही केंद्रित रहता है। इसमें विश्वास-निर्माण या सामाजिक बाधाओं को दूर करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। इसलिए जरूरी है कि नामांकन-आधारित प्रयासों से आगे बढ़कर परिवार और समुदाय स्तर पर निरंतर और संरचित जुड़ाव विकसित किया जाए। इसमें पंचायत प्रतिनिधि, स्वयं सहायता समूह (एसएचजी), धार्मिक और सामुदायिक नेता, तथा महिला समूहों को सक्रिय रूप से शामिल किया जा सकता है। यह अहम है कि ये स्थानीय नेटवर्क केवल संदर्भ बिंदु न बनें, बल्कि विश्वास-निर्माण में मदद करें, सुरक्षा और पलायन से जुड़ी चिंताओं को संबोधित करें, और परिवार के स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहयोग दें।

साथ ही, प्रशिक्षण और लामबंदी में जेंडर-संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना ज़रूरी है। इसमें महिलाओं के लिए अलग प्रशिक्षण वातावरण, महिला प्रशिक्षकों और स्टाफ की नियुक्ति, और परिवार की सुरक्षा के प्रति चिंता को कम करने के लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रोटोकॉल शामिल हैं।

3. स्थानीय रोजगार सृजन और उद्यमिता को समर्थन

हालांकि डीडीयू-जीकेवाई का मुख्य फोकस औपचारिक क्षेत्र में वेतन आधारित रोजगार है, लेकिन प्रशिक्षण अवधि के दौरान इसमें स्थानीय आर्थिक अवसरों से संपर्क को भी जोड़ा जा सकता है। इसके तहत उनमें उद्यमिता की बुनियादी समझ, सूक्ष्म और लघु उद्यमों से जुड़ाव, और सहकारी मॉडल को शामिल किया जा सकता है। ऐसे प्रयास स्थानीय आजीविका कार्यक्रमों, जैसे राष्ट्रीय और राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन, के साथ मिलकर ऋण, बाजार और तकनीकी सहायता तक पहुंच भी प्रदान कर सकते हैं।

4. सामयिक पाठ्यक्रम और बेहतर अवसंरचना

पाठ्यक्रम सुधार केवल तकनीकी सामग्री तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें बुनियादी कौशल, डिजिटल साक्षरता और सॉफ्ट स्किल्स पर भी विशेष जोर होना चाहिए, जिसे प्रशिक्षकों ने अक्सर एक बड़ी कमी के रूप में चिन्हित किया। साथ ही, पाठ्यक्रम को उद्योग में हो रहे बदलावों के अनुरूप बनाया जाना चाहिए, ताकि प्रशिक्षण के बाद रोजगार के अवसर वास्तविक और प्रासंगिक हों। साथ ही, अवसंरचना विकास में तकनीकी संसाधनों का समुचित एकीकरण, व्यावहारिक प्रशिक्षण सुविधाएं और जरूरी सहायक सेवाएं प्राथमिकता होनी चाहिए।

5. प्रशिक्षण के बाद स्पष्ट रोजगार मार्ग

करियर मार्गदर्शन को योजना के हर चरण में शामिल किया जाना चाहिए। प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षण शुरू करने से पहले ही यह स्पष्ट होना चाहिए कि संभावित नौकरी क्या होगी, वेतन कितना होगा, जगह क्या होगी, और आगे बढ़ने के अवसर क्या हैं। यह विश्वास पैदा करने और दीर्घकालिक जुड़ाव बनाने के लिए भी आवश्यक है।

इसके अलावा, वर्तमान प्रोत्साहन प्रणाली, जहां प्रशिक्षण भागीदारों को मुख्यतः छह महीने तक नौकरी बनाए रखने के आधार पर भुगतान मिलता है, अक्सर पीआइए और प्रशिक्षुओं में अल्पकालिक प्लेसमेंट सोच को बढ़ावा देती है। काउंसलिंग के दौरान उनका ध्यान ‘छह महीने टिके रहने’ पर केंद्रित रहता है, न कि दीर्घकालिक रोजगार, कौशल या करियर निर्माण पर। छह महीने पूरे होने के बाद काम की परिस्थितियों, स्थान, वेतन या पारिवारिक दबाव के कारण कई लोग काम छोड़ देते हैं । इससे ड्रॉपआउट दर बढ़ती है, जो अल्पकालिक आंकड़ों में पूरी तरह दिखाई भी नहीं देती।

इस समस्या को हल करने के लिए प्रोत्साहन संरचना को लंबी अवधि तक नौकरी, नौकरी की गुणवत्ता और प्रगति को प्राथमिकता देते हुए भुगतान को लंबी अवधि तक नौकरी बनाए रखने (जैसे 12 महीने), वेतन वृद्धि, और श्रम बाजार में निरंतर भागीदारी से जोड़ना चाहिए।

जहां इससे निरंतर रोजगार को बढ़ावा मिलेगा, वहीं इससे यह जोखिम भी हो सकता है कि प्रशिक्षण एजेंसियां केवल उन उम्मीदवारों को प्राथमिकता दें जिनमे नौकरी में टिके रहने की संभावना अधिक हो। इससे स्पष्ट होता है कि केवल प्रोत्साहन बदलना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूरे कौशल पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना होगा।

रायगड़ा जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षुओं के अनुभव यह दिखाते हैं कि कौशल कार्यक्रमों में भागीदारी केवल प्रशिक्षण की उपलब्धता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि गतिशीलता की चुनौतियों, सामाजिक और पारिवारिक मान्यताओं, और प्रशिक्षण के बाद उपलब्ध नौकरियों की स्वीकार्यता पर भी निर्भर करती है। इसलिए, कौशल विकास कार्यक्रमों की सफलता के लिए केवल नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि आपस में जुड़े सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारकों को समझकर और संबोधित करके ही वास्तविक बदलाव संभव है।

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