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बिना बड़े बजट के, बड़े संवाद की शुरुआत कैसे करें?

बड़े बजट और तय एजेंडे के बिना भी ऐसा संवाद संभव है, जिसमें हर आवाज़ को बराबर जगह मिले। जानिए, ज़मीनी संगठन कैसे अनकॉन्फ़्रेंस के ज़रिए ऐसा मंच बना सकते हैं।
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हर साल सोशल सेक्टर के अलग-अलग मुद्दों पर काम करने वाले संगठन कॉन्फ्रेंस के आयोजन में काफी समय और संसाधन लगाते हैं। इसके लिए सभागार बुक किए जाते हैं, वक्ताओं को आमंत्रित किया जाता है, चर्चा के लिए पैनल बनते हैं और हफ्तों पहले से विस्तृत एजेंडा तैयार होते हैं। ऐसे आयोजन निश्चित रूप से सभी को सीखने और नेटवर्क बनाने के मौके देते हैं। लेकिन इनमें शामिल होने वाले कई प्रतिभागियों को अपनी बात रखने का बहुत कम मौका मिलता है। उनके कमरे में कदम रखने से पहले ही एजेंडा, वक्ता और अक्सर सवाल तक तय हो चुके होते हैं।

ऐसे में सेक्टर के अंदर और बाहर भी ऐसे अनकॉन्फ़्रेंस सम्मेलन आयोजित करने की चर्चा होती रही है, जो पारंपरिक कॉन्फ्रेंस के इस ढर्रे से बाहर निकलकर एक असमान व्यवस्था को बदलने की कोशिश करते हैं। इसका एक तरीका यह हो सकता है कि ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले संगठनों को इन सम्मेलनों की कमान संभालने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, ताकि वे तय कर सकें कि भागीदारी का मतलब क्या होना चाहिए। लेकिन ज़्यादातर ज़मीनी संगठन बेहद सीमित बजट में काम करते हैं। उनके पास ऐसे सम्मेलनों की योजना बनाने के लिए न तो पर्याप्त समय होता है, न ही वित्तीय या मानव संसाधन। ऐसे में सवाल यह है: क्या उनके लिए एक वैकल्पिक मंच तैयार करना वास्तव में संभव है?

इन सवालों से हम भी लगातार जूझते रहे हैं। हम महाराष्ट्र स्थित गैर-लाभकारी संस्था पाई जैम फाउंडेशन में काम करते हैं। हमारा उद्देश्य है कि देश में संसाधनों की कमी वाले स्कूलों के बच्चों और शिक्षकों के लिए किफायती तकनीक उपलब्ध होनी चाहिए। हाल ही में हमने सीमित संसाधनों के साथ एक अनकॉन्फ़्रेंस सम्मेलन का आयोजन किया। इस अनुभव से हमें कुछ महत्वपूर्ण सीख मिली, जिन्हें हम साझा करना चाहते हैं।

लोगों की भीड़ में से ऊपर उठता एक स्त्री का हाथ_कॉन्फ्रेंस
क्या सीमित बजट में काम करने वाले संगठन पारंपरिक सम्मेलनों से अलग, अधिक सहभागी संवाद के मंच बना सकते हैं? | चित्र साभार: वर्ल्ड बैंक फ़ोटो कलेक्शन / सीसी बीवाय

अनकॉन्फ़्रेंस का विषय : शिक्षा में एआई

अप्रैल 2026 में, शिक्षा के क्षेत्र में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) की बदलती भूमिका को देखते हुए हमने K-12 शिक्षा में एआई पर एक सार्वजनिक संवाद आयोजित करने के बारे में सोचना शुरू किया।

करीब 45,000 रुपये के बजट में हमने 35 से अधिक प्रतिभागियों का एक समूह बनाया। इनमें विद्यार्थी, शिक्षक, शोधकर्ता, गैर-लाभकारी संस्थाओं के कार्यकर्ता, स्वतंत्र पेशेवर और एक अभिभावक शामिल थे। हमने इस आयोजन के बारे में मुख्य रूप से लिंक्डइन और कुछ हद तक इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप पर जानकारी साझा की। हमारे पास अपने काम से जुड़े हितधारकों तक पहुंचने के लिए पर्याप्त समय नहीं था, जिसका असर प्रतिभागियों की संरचना पर पड़ा, खासकर अभिभावकों की भागीदारी पर।

होटल या किसी कॉन्फ़्रेंस सेंटर के बजाय, हमने इस संवाद का आयोजन मुंबई के एक बीएमसी मराठी स्कूल में किया। यानी एक ऐसी जगह, जो सभी हितधारकों के लिए परिचित और सुलभ थी।

इस सम्मेलन में भागीदारी निशुल्क थी और शिक्षा में एआई में रुचि रखने वाला कोई भी व्यक्ति इसमें शामिल हो सकता था। आमतौर पर विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को एक ही कमरे में साथ बैठने का मौका कम ही मिलता है। एआई और शिक्षा पर होने वाली चर्चाओं में अभिभावकों को भी शायद ही कभी शामिल किया जाता है। शिक्षकों को अक्सर सुझाव की प्रक्रिया में भागीदार बनाने के बजाय, सिर्फ़ उन सुझावों को लागू करने के लिए कहा जाता है। संसाधनों की कमी वाले स्कूलों में ये अंतर और भी गहरे हैं, जहां तकनीक तक सभी की पहुंच समान नहीं होती।

इन सब बातों को मद्देनज़र रखते हुए, हम ऐसा सम्मेलन करना चाहते थे जहां सभी नज़रिए एक-दूसरे से जुड़ सकें। हमने सोचा—अगर हर दिन किसी समस्या का सामना करने वाले लोग ही उस पर होने वाली बातचीत की दिशा तय करें, तो कैसा होगा? क्या एक छोटा संगठन सीमित संसाधनों में भी सीखने का समृद्ध अनुभव तैयार कर सकता है? क्या किसी सरकारी स्कूल में भी कॉन्फ़्रेंस हो सकती है? क्या पहले से तय एजेंडे की जगह मौके पर ही सामने आने वाले आईडिया बेहतर काम कर सकते हैं? क्या छात्र शोधकर्ताओं से सवाल पूछ सकते हैं? क्या शिक्षक बच्चों से सीख सकते हैं? क्या प्रतिभागी एआई के बारे में नए विचारों के साथ-साथ अपने समुदायों में भी ऐसी बातचीत आयोजित करने का आत्मविश्वास लेकर लौट सकते हैं?

हमने उन तमाम बाधाओं को दूर करने की कोशिश की, जो अक्सर लोगों को कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने से रोकती हैं। जैसे रजिस्ट्रेशन फ़ीस, किसी संस्था से जुड़ा होना या यह धारणा कि अपनी बात रखने के लिए किसी का ‘एक्सपर्ट’ होना ज़रूरी है।

इस पूरी प्रक्रिया में हमने पहली बार करीब से जाना कि बेहद सीमित संसाधनों में भी ऐसे सार्थक संवाद आयोजित किए जा सकते हैं, जहां अलग-अलग हितधारक एक साथ बैठकर बात करें।

1. एजेंडा के क्या मायने हैं?

पारंपरिक कॉन्फ़्रेंस के उलट, एक अनकॉन्फ़्रेंस किसी तय एजेंडे के साथ शुरू नहीं होती। इसके बजाय, प्रतिभागी अपने सवालों, अनुभवों और विचारों के आधार पर मिलकर एजेंडा तय करते हैं। यह तरीका दुनिया के कई हिस्सों में लंबे समय से अपनाया जा रहा है, लेकिन भारत में, खासकर शिक्षा और विकास के क्षेत्र में, यह अभी भी बहुत आम नहीं है।

हमारे लिए भी यह दिन किसी पारंपरिक कॉन्फ़्रेंस से बिल्कुल अलग तरीके से शुरू हुआ। यहां न कोई उद्घाटन भाषण था, न मुख्य वक्ता और न ही प्रतिभागियों का औपचारिक परिचय। इसके बजाय, सभी लोग एक बड़े घेरे में बैठे और कुछ आसान गतिविधियों में हिस्सा लिया, जिनका मकसद हंसी-मज़ाक, आपसी बातचीत और सहजता का माहौल बनाना था। एआई पर चर्चा शुरू करने से पहले, हमने एक-दूसरे के साथ सहज होने की कोशिश की।

चर्चा का एजेंडा तय करने के लिए प्रतिभागियों से कहा गया कि वे एआई को लेकर अपने सवाल, जिज्ञासाएं, चिंताएं और अपेक्षाएं स्टिकी नोट्स पर लिखें और उन्हें एक दीवार पर चिपकाएं। सभी के नोट्स से भरी इस दीवार को ‘उम्मीद की दीवार’ नाम दिया गया। इसके बाद फ़ैसिलिटेटर्स ने इन नोट्स को मिलते-जुलते विषयों के आधार पर समूहों में बांटा।

बेहद सीमित संसाधनों में भी ऐसे सार्थक संवाद आयोजित किए जा सकते हैं, जहां अलग-अलग हितधारक एक साथ बैठकर बात करें।

इस प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से पांच विषय सामने आए, जिन्होंने आगे पूरे दिन की चर्चा का एजेंडा तय किया: एआई को समझना, काम को बेहतर और कुशल बनाने में एआई का इस्तेमाल, एआई के हमारे सोचने के तरीके पर असर को समझना, इसके अवसरों और जोखिमों को देखना और एआई के दौर में शिक्षण को नए सिरे से सोचना।

इसके बाद प्रतिभागियों ने इन विषयों पर सत्रों को फ़ैसिलिटेट करने के लिए स्वेच्छा से आगे आना शुरू किया। एजेंडा तय करने की इस प्रक्रिया के अंत तक, तीन समानांतर कक्षाओं में 12 सत्र तय हो चुके थे। इनमें से तीन सत्र ख़ुद छात्रों ने फ़ैसिलिटेट किए।

2. पैनल के क्या मायने हैं?

एजेंडा और सत्र तय हो जाने के बाद भी हमारे सामने कुछ सवाल थे: ऐसे लोगों के बीच सहज बातचीत कैसे शुरू की जाए, जो एक-दूसरे को जानते तक नहीं हैं? पद और हैसियत के फर्क को कैसे कम किया जाए? यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि छात्र भी उतने ही आत्मविश्वास से सवाल पूछ सकें, जितने शोधकर्ता? और ऐसा माहौल कैसे बनाया जाए, जहां लोग सिर्फ़ प्रेज़ेंटेशन देखने के बजाय एक-दूसरे से संवाद करें?

प्रतिभागियों ने केवल उन विषयों का प्रस्ताव दिया था, जिन पर वे सत्र फ़ैसिलिटेट करना चाहते थे। लेकिन हर सत्र का स्वरूप अपने आप अलग-अलग तरह से विकसित हुआ। कुछ सत्रों में रचनात्मक बहस हुई, तो कुछ गोलमेज़ चर्चाओं (राउंडटेबल डिस्कशन) में बदल गए, जहां हर किसी को अपनी बात रखने का बराबर मौका मिला। कुछ फ़ैसिलिटेटर्स ने ऐसे सवाल पूछकर चर्चा को आगे बढ़ाया, जिनका मकसद किसी एक जवाब तक पहुंचना नहीं, बल्कि प्रतिभागियों को साथ मिलकर सोचने के लिए प्रेरित करना था। वहीं, कुछ ने गतिविधियों पर आधारित सत्र तैयार किए, जहां प्रतिभागियों ने अपने अनुभव के ज़रिए कुछ सीखा।

हमने जानबूझकर फ़ैसिलिटेटर्स का परिचय नहीं कराया। इसलिए छात्रों को यह पता नहीं था कि कमरे में मौजूद वयस्क शिक्षक हैं, शोधकर्ता हैं या प्रिंसिपल। इससे वे बिना किसी झिझक के अपनी बात रख सके, क्योंकि पूरे आयोजन के दौरान पद या अधिकार से जुड़ा कोई औपचारिक ढांचा बना ही नहीं। इसका नतीजा यह हुआ कि एक छात्र के नेतृत्व वाले सत्र में शोधकर्ता, शिक्षक और सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले लोग बच्चों के सवालों का जवाब दे रहे थे। छात्रों ने कई मान्यताओं पर सवाल उठाए, बड़ों ने ध्यान से उनकी बातें सुनी और बातचीत बराबरी के स्तर पर आगे बढ़ी।

एक कमरे में घेरा बनाकर बैठे कुछ लोगों के सामने खड़े होकर कुछ पढ़ता हुआ एक लड़का_कॉन्फ्रेन्स
अगर किसी समस्या का सामना करने वाले लोग ही उस पर होने वाली बातचीत की दिशा तय करें, तो क्या होगा? | चित्र साभार: पाई जैम फाउंडेशन

एआई को लेकर कही गई कुछ बातों ने भी दिलचस्प बहस को जन्म दिया। मसलन, एक सत्र में कहा गया, “एआई शिक्षक की जगह कभी नहीं ले सकता, क्योंकि शिक्षक बच्चों को वह भावनात्मक सहारा देते हैं, जो एआई कभी नहीं दे सकता।” छात्रों ने सिर्फ़ इससे सहमति नहीं जताई, बल्कि अपनी आलोचनात्मक सोच भी सामने रखी। कुछ ने कहा, “लेकिन हम अपनी निजी परेशानियों या करियर से जुड़े फैसलों के बारे में भी एआई से पूछते हैं। इससे हमें उपयोगी जानकारी मिलती है और यह हम पर निर्भर करता है कि हम उसका इस्तेमाल कैसे करते हैं।”

इस बात पर भी चर्चा हुई कि कक्षा में एआई का इस्तेमाल किया जाना चाहिए या नहीं। जहां कई वयस्क इस बात पर ध्यान दे रहे थे कि इसका शिक्षकों पर क्या असर पड़ेगा, वहीं एक छात्र ने सवाल उठाया, “अगर इसका इस्तेमाल बच्चों पर होने वाला है, तो इस सवाल का जवाब भी बच्चों को ही देना चाहिए।”

पूरे दिन मराठी, हिंदी और अंग्रेज़ी के बीच सहज रूप से बातचीत चलती रही। प्रतिभागियों को जिस भाषा में सबसे अधिक सहजता महसूस होती थी, वे उसी में अपनी बात रखते रहे। किसी एक साझा भाषा पर ज़ोर न होने के कारण लोग अपने जीवन के अनुभवों को खुलकर साझा कर पा रहे थे।

सार्थक संवाद के लिए ज़रूरी है कि पद और हैसियत की दीवारें टूटें, ताकि हर कोई बिना झिझक अपनी बात रख सके। मसलन, छात्र अपनी बारी आने का इंतज़ार नहीं कर रहे थे; वे चर्चाओं को फ़ैसिलिटेट कर रहे थे, बड़ों से सवाल पूछ रहे थे और पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने विचार रख रहे थे। शिक्षक, शोधकर्ता, सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले लोग और गैर-लाभकारी संस्थाओं के पेशेवर भी किसी ‘एक्सपर्ट’ की भूमिका में नहीं थे, जिनसे जवाब देने की उम्मीद की जाती है। वे भी बाकी सभी लोगों के साथ सीखने वाले प्रतिभागी बन गए थे।

छात्रों ने बताया कि वे अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में एआई का इस्तेमाल कैसे करते हैं और यह सवाल भी उठाया कि इसका असर उनकी सोचने की क्षमता पर किस तरह पड़ सकता है। शिक्षक यह जानने के लिए उत्सुक थे कि एआई को कक्षा में पढ़ाने के तरीके का हिस्सा कैसे बनाया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने इसके व्यापक नैतिक पहलुओं पर चर्चा की, जबकि सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों ने इसे व्यवहार में लागू करने की चुनौतियों पर मंथन किया। अभिभावक यह समझना चाहते थे कि एआई उनके बच्चों के भविष्य के लिए क्या मायने रखता है। सभी एक ही तकनीक के बारे में बात कर रहे थे, लेकिन हर कोई उसे अपने अलग नज़रिए से देख रहा था।

समापन सत्र में दिन भर की इन चर्चाओं और अनुभवों को एक साथ समेटा गया। कई प्रतिभागियों ने कहा कि वे यह सोचकर आए थे कि वे पूरे दिन दूसरों की बातें सुनेंगे, लेकिन उन्होंने खुद को लगातार बातचीत का हिस्सा पाया। कुछ ने यह भी कहा कि वे इस विश्वास के साथ आए थे कि वे एक्सपर्ट हैं और उनके पास साझा करने के लिए ज्ञान है। लेकिन वे यहां से इस समझ के साथ लौटे कि किसी एक व्यक्ति के पास सारे जवाब नहीं हो सकते।

कमरे की दीवार चिपके हुए चार्ट पेपर पर पर्चियों पर कुछ लिखते हुए बच्चे_कॉन्फ्रेन्स
हमारे पास 45,000 रुपये का बजट था, जिसका इस्तेमाल भोजन, फ़ोटोग्राफ़ी, प्रिंटिंग सामग्री और आयोजन स्थल के खर्च के लिए किया गया। | चित्र: पाई जैम फाउंडेशन

3. बजट के क्या मायने हैं?

हमारे पास कुल 45,000 रुपये का बजट था। हमने इसका इस्तेमाल भोजन, फ़ोटोग्राफ़ी, प्रिंटिंग सामग्री और आयोजन स्थल के खर्च के लिए किया। हमने उन विक्रेताओं (वेंडर) के साथ भी काम किया, जिन्हें हम पहले से जानते थे। इससे हमें आयोजन की लागत कम रखने में मदद मिली।

आयोजन स्थल के आकार और प्रतिभागियों की संख्या के आधार पर इस खर्च को और भी कम किया जा सकता है। पंचायतों और स्कूलों से पहले ही बातचीत कर ली जाए, तो उनके दफ़्तरों या कक्षाओं को निशुल्क इस्तेमाल करने की अनुमति भी मिल सकती है। पुराने अख़बारों और गत्ते के डिब्बों का दोबारा इस्तेमाल करके स्टेशनरी का खर्च कम किया जा सकता है। इसके अलावा, अभिभावकों और अन्य डोनरों से भोजन की व्यवस्था में सहयोग लिया जा सकता है, जिससे खर्च में काफ़ी कमी आएगी।

अगर ऐसा आयोजन दोबारा करना हो तो

हमारा यह प्रयोग भले सफल रहा, लेकिन हमारा मानना है कि अगर हमारे पास थोड़ा और समय और ऐसे कार्यक्रम का अनुभव होता, तो भागीदारी, पहुंच और समावेशिता—तीनों के लिहाज़ से इसे और बेहतर किया जा सकता था। अगर हम दोबारा कोई अनकॉन्फ़्रेंस आयोजित करें, तो कुछ चीज़ें अलग तरीके से करना चाहेंगे:

  • आउटरीच पर नए सिरे से सोचना: अलग-अलग हितधारक समूहों तक पहुंचने के लिए अलग-अलग रणनीतियों की ज़रूरत होती है। लिंक्डइन के ज़रिए शोधकर्ताओं, सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों और गैर-लाभकारी संगठनों तक पहुंचना प्रभावी रहा, लेकिन शिक्षकों, अभिभावकों और छात्रों तक पहुंचने में यह उतना कारगर नहीं था। इन समूहों तक स्कूलों, सामुदायिक नेटवर्क और स्थानीय संगठनों के ज़रिए सीधे पहुंचना अधिक प्रभावी हो सकता है। इसलिए पहले यह तय करना बेहतर है कि आयोजन में किन-किन हितधारक समूहों की भागीदारी ज़रूरी है और फिर उन तक सीधे पहुंचने की विशेष रणनीति बनानी चाहिए।
  • सीख और चर्चाओं का डॉक्यूमेंटेशन करना: हमें महसूस हुआ कि कार्यक्रम को ठीक से डॉक्यूमेंट करने के लिए ऐसे प्रशिक्षित ऑब्ज़र्वरों की ज़रूरत होती है, जो केवल घटनाओं को जस-का-तस न लिखें। वे यह भी दर्ज करें कि बातचीत किस तरह आगे बढ़ी, कहां असहमति हुई, लोगों की सोच में क्या बदलाव आया और कौन-सी नई बातें उभरकर आई। इसी तरह, अलग-अलग भाषाओं में हुई चर्चाओं ने भागीदारी को समृद्ध तो किया, लेकिन इससे यह भी सामने आया कि मराठी, हिंदी और अंग्रेज़ी के बीच बातचीत को जोड़ने के लिए भाषाई फ़ैसिलिटेटर्स की जरूरत होती है। स्थानीय भाषाएं बोलने वाले वॉलंटियरों को शामिल करना भी संवाद को आसान बनाने की एक उपयोगी रणनीति हो सकती है।
  • शुरुआत से ही सुलभता का ध्यान रखना: हियरिंग-डिसेबिलिटी (सुनने की क्षमता न होना) से ग्रसित एक अभिभावक ने भी इस आयोजन में पूरे दिन हिस्सा लिया। चर्चाओं को समझने के लिए उन्होंने वॉलंटियरों की मदद ली। उनकी मौजूदगी ने हमें एहसास कराया कि समावेशी संवाद तभी संभव है, जब आयोजन की शुरुआत से ही सभी के लिए सुलभता सुनिश्चित करने के बारे में सोचा जाए। इसके लिए ज़रूरत के अनुसार इंटरप्रेटर, वॉलंटियर और प्रतिभागियों समेत पहले से योजना बनानी चाहिए।
  • ‘दो कदम का नियम’ अपनाना: आमतौर पर सम्मेलनों में प्रतिभागी किसी पैनल को बीच में छोड़ने में सहज महसूस नहीं करते, भले ही वहां की बातचीत, भाषा या विषय उन्हें प्रासंगिक न लग रहा हो। जब कोई प्रतिभागी यह तय करता है कि किसी सत्र में उसका समय सार्थक तरीके से इस्तेमाल नहीं हो रहा और वह उसे छोड़कर दूसरे सत्र में जाना चाहता है, तो इसे ही ‘दो कदम का नियम’ (अंग्रेज़ी में ‘लॉ ऑफ टू फीट’) कहा जाता है। उनका यह निर्णय किसी भी अनकॉन्फ़्रेंस की भावना का एक अहम हिस्सा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि ऐसे आयोजन में आज्ञापालन के बजाय अपनी पसंद और निर्णय लेने की स्वतंत्रता को महत्व दिया जाता है। इसलिए हमने प्रतिभागियों से कहा था कि वे अपनी रुचि के अनुसार सत्रों के बीच स्वतंत्र रूप से आ-जा सकते हैं। लेकिन बहुत कम लोगों ने ऐसा किया। हमें लगता है कि इसका एक कारण पारंपरिक कॉन्फ्रेंस और क्लासरूम की वह पुरानी आदत हो सकती है, जहां एक जगह बैठे रहना सम्मानजनक व्यवहार माना जाता है। शायद जब लोगों को बार-बार अनकॉन्फ़्रेंस जैसे अनुभव होंगे, तब वे इस आज़ादी का असल में इस्तेमाल कर पायेंगे।

हमारे लिए सबसे उत्साहजनक सीख यह रही कि हमने जो कुछ किया, उसके लिए न तो महंगे बुनियादी ढांचे की ज़रूरत थी, न बड़े और सजे-धजे कॉन्फ़्रेंस हॉल की और न ही किसी सेलेब्रिटी वक्ता की। एक सरकारी स्कूल, आसानी से इधर-उधर की जा सकने वाली कुर्सियां और मेज़ें, चार्ट पेपर, स्टिकी नोट्स, सोच-समझकर की गई फ़ैसिलिटेशन और प्रतिभागियों पर भरोसा—एक सार्थक अनुभव के लिए बस इतना ही काफी था।

ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले संगठनों के लिए शायद यही सबसे बड़ी सीख है। सार्थक संवाद किसी बड़े बजट से शुरू नहीं होता। इसकी शुरुआत ऐसे माहौल को तैयार करने से होती है, जहां लोगों को लगे कि उनके अनुभव मायने रखते हैं, उनके सवालों को महत्व दिया जाता है और बातचीत की दिशा तय करने में उनकी आवाज़ की भी उतनी ही अहमियत है।

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लेखक के बारे में

  • उल्फ़ा हनीफ़ ख़्वाजा पाई जैम फाउंडेशन में एविडेंस एंड इनसाइट्स की लीड हैं, जहां वह भारत के सरकारी स्कूलों में कम्प्यूटेशनल थिंकिंग, एआई साक्षरता और समस्या-समाधान से जुड़े कार्यक्रमों के लिए शोध, निगरानी, मूल्यांकन और लर्निंग का नेतृत्व करती हैं। उन्होंने आईआईटी बॉम्बे के सेंटर फ़ॉर एजुकेशनल टेक्नोलॉजी से पीएचडी की है। उनका काम साक्ष्यों पर आधारित सीखने के अनुभव तैयार करने, शैक्षणिक आकलन विकसित करने और यह समझने पर केंद्रित है कि तकनीक बच्चों और शिक्षकों के लिए सार्थक और समान अवसर वाली शिक्षा को कैसे बेहतर बना सकती है।
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