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महिलाएं तो नेतृत्व के लिए तैयार हैं, पर क्या संस्थान तैयार हैं?

करियर में आगे बढ़ते हुए महिलाएं धीरे-धीरे पीछे छूट जाती हैं या करियर के कुछ रास्तों पर आगे बढ़ने का फैसला नहीं करतीं। लेकिन यह रूपक समस्या को स्पष्ट करने के बजाय उसे छिपाता अधिक है।
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भारत के विकास क्षेत्र में महिलाओं के नेतृत्व की स्थिति एक विरोधाभास पेश करती है। यहां महिलाओं को नेतृत्व के लिए तैयार करने के लिए मेंटरशिप समूह बनाने, नेतृत्व से जुड़े प्रशिक्षण व कार्यशालाएं आयोजित करने और नेटवर्किंग के लिए लोगों को रात के खाने पे आमंत्रित करने जैसी कई व्यवस्थाएं हैं। इन सभी पहलों के पीछे इरादे नेक हैं, इन्हें तैयार भी गंभीरता से किया गया है और महिलाएं इन अवसरों का लाभ भी उठाती हैं। वे आगे बढ़ती हैं, लोगों से संपर्क बनाती हैं, अपनी योग्यता और अनुभव बढ़ाती हैं और यह साबित करने की लगातार कोशिश करती हैं कि वे नेतृत्व की भूमिकाओं के योग्य हैं। बावजूद इसके, आंकड़ों और इस विषय पर होने वाली चर्चाओं से जो तस्वीर सामने आती है, वह उतनी उत्साहजनक नहीं है, जितनी होनी चाहिए।

उदाहरण के लिए, साल 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, छोटे सामाजिक क्षेत्र के संगठनों में नेतृत्व की 67 प्रतिशत भूमिकाओं पर महिलाएं हैं। मध्यम आकार के संगठनों में यह आंकड़ा 58 प्रतिशत है। लेकिन जब कोई संगठन इतना बड़ा हो जाता है कि पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर सके, तो वहां नेतृत्व की भूमिकाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी घटकर सिर्फ 29 प्रतिशत रह जाती है।

महिलाओं के नेतृत्व पर काम करने वाले कई शोधकर्ता इस स्थिति को ‘लीकी पाइपलाइन’ कहते हैं। इस अवधारणा के मुताबिक, करियर में आगे बढ़ते हुए महिलाएं धीरे-धीरे पीछे छूट जाती हैं या करियर के कुछ रास्तों पर आगे बढ़ने का फैसला नहीं करतीं। लेकिन यह रूपक समस्या को स्पष्ट करने के बजाय उसे छिपाता अधिक है। पाइप में रिसाव होने पर पानी कहां जमा होगा, इसकी ज़िम्मेदारी किसी एक व्यक्ति पर नहीं डाली जा सकती। लेकिन यहां मामला ऐसा नहीं है। महिलाओं के नेतृत्व में आने वाली यह रुकावट किसी खास जगह पर ही दिखाई देती है। 

यह रुकावट महिलाओं के करियर के बीच के दौर में आती है, यानी काम शुरू करने के 10 से 20 साल बाद। यही वह समय होता है, जब महिलाएं अपने अनुभव और योग्यता को नेतृत्व और निर्णय लेने के अधिकार में बदलने के लिए तैयार होती हैं।

आदर्श कर्मचारी होने का मिथक

कोई कर्मचारी कैसा होना चाहिए इसे लेकर हर संस्थान की अपनी कुछ धारणाएं होती हैं। 1990 में समाजशास्त्री जोन एकर ने इस छवि को ‘आदर्श कर्मचारी’ का नाम दिया था। इस छवि के मुताबिक आदर्श कर्मचारी वह होता है जो काम के लिए हर समय उपलब्ध हो और जिसकी नौकरी के बाहर कोई ज़िम्मेदारी न हो। यह छवि एक मिथक है, लेकिन संस्थानों की कार्यप्रणाली पर इसका गहरा असर पड़ता है। इसी के आधार पर बैठकें तय की जाती हैं, नेतृत्व की क्षमता का आकलन किया जाता है और यह तय किया जाता है कि किस तरह के ज्ञान और अनुभव को विशेषज्ञता माना जाएगा।

संस्थानों का संदेश साफ होता है: जो लोग किसी वजह से आदर्श कर्मचारी की इस छवि में फिट नहीं बैठते, उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। इसकी वजह गर्भावस्था हो सकती है, परिवार के सदस्यों की देखभाल की ज़िम्मेदारी हो सकती है या फिर इंसान होने के नाते उनकी कुछ ऐसी ज़रूरतें हो सकती हैं, जिन्हें यह व्यवस्था जगह नहीं देती। इसका असर संगठनों में कई तरह से दिखाई देता है। अक्सर बैठकें बहुत देर से, बहुत जल्दी या बहुत कम समय पहले तय की जाती हैं। ऐसी बैठकों के समय का परिवार की देखभाल से जुड़ी ज़िम्मेदारियां निभाने के समय से टकराव हो जाता है। बहुत कम ही संगठन अपने पूरे दिन की योजना इस तरह बनाते हैं कि कामकाज एक तय ढांचे के तहत चले। इसलिए बैठकें अचानक तय हो जाती हैं और ऐसा न हो हर बार इससे बच पाना भी संभव नहीं होता। लेकिन इसका नतीजा यह होता है कि कर्मचारियों से उम्मीद की जाती है कि वे घर की ज़िम्मेदारियों के बावजूद हर समय काम के लिए उपलब्ध रहें। पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर घर और परिवार की देखभाल की ज़िम्मेदारी होने की आशंका अधिक होती है।

अक्सर नेतृत्व की क्षमता का आकलन इस आधार पर किया जाता है कि किसी व्यक्ति ने कितना फंड जुटाया, उसके काम से ज़मीनी स्तर पर कितना असर आया और उसने कितने साझेदारों को अपने साथ जोड़ा। ये महत्वपूर्ण पैमाने हैं। लेकिन एक और तरह का काम है, जो अक्सर महिलाएं करती हैं और जो किसी संगठन और उसकी कार्य संस्कृति को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। इसमें संगठन के अलग-अलग स्तरों पर लगातार संवाद बनाए रखना, लोगों की अपेक्षाओं और उनके अहं को संभालना, मिल-जुलकर काम करने वाली टीम बनाने में समय और ऊर्जा लगाना और ऐसी व्यवस्थाओं में पारदर्शिता लाना शामिल है, जहां कामकाज के तौर-तरीके स्पष्ट नहीं होते। संगठन को सुचारु रूप से चलाने में इस काम की अहम भूमिका होती है, लेकिन इसे शायद ही कभी कामकाज के मुख्य पैमानों में शामिल किया जाता है। अधिक से अधिक, इसे अतिरिक्त काम मान लिया जाता है।

एक साइकिल पर चलती हुई महिला का रेखाचित्र_महिला नेतृत्व
किसी महिला को नेतृत्वकर्ता मान लेना और नेतृत्व करने के लिए उसे वास्तव में ज़रूरी अधिकार और जगह देना, दोनों अलग बातें हैं। | चित्र साभार: वेक्टीज़ी

विकास क्षेत्र में वित्तीय साक्षरता, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वास्थ्य प्रणालियों, जलवायु परिवर्तन और कृषि जैसे विषयों की तकनीकी जानकारी को तो व्यापक रूप से पहचाना और महत्व दिया जाता है, लेकिन करियर में टिके रहने और कामयाब होने के लिए और भी कुछ क्षमताएं ज़रूरी होती हैं, जिन्हें अब भी काफी हद तक नज़रअंदाज़ किया जाता है। इनमें मिल-जुलकर काम करने, अलग-अलग प्रयासों में तालमेल बनाने, सबको साथ लेकर चलने, रिश्ते बनाने, दूसरों को मार्गदर्शन देने, बदलते हालात के अनुसार खुद को ढालने और मुश्किल परिस्थितियों का सामना कर पाने जैसी क्षमताएं शामिल हैं। 

यह व्यवस्था इस बात को नजरअंदाज़ करती है कि करियर के बीच के दौर में महिलाओं की ज़िदगी में अक्सर एक साथ कई बदलाव हो रहे होते हैं। वे एक ही समय में अलग-अलग किस्म के बदलावों से जूझ रही होती हैं। अक्सर ये सभी बदलाव पांच से छह वर्ष की अवधि में सामने आते हैं। लेकिन उन पर बढ़ते ज़िम्मेदारियों के बोझ को संभालने के लिए संस्थानों की ओर से उन्हें बहुत कम या कोई सहायता नहीं मिलती।

अक्सर इसकी शुरुआत शादी से होती है। शादी के बाद कई महिलाओं को दूसरे शहर में जाना पड़ता है। नए शहर में उन्हें नए पेशेवर संपर्क बनाने होते हैं और अपने करियर को लगभग नए सिरे से खड़ा करना पड़ता है। अक्सर इसके तुरंत बाद उन पर बच्चे पैदा करने और उनकी परवरिश की ज़िम्मेदारियां भी आ जाती हैं। इस वजह से महिलाएं ठीक उसी समय नौकरी से दूर हो जाती हैं, जब करियर में आगे बढ़ने के लिए लगातार काम करते रहना सबसे ज़्यादा ज़रूरी होता है। नौकरी छोड़ने के बाद दोबारा काम पर लौटना भी आसान नहीं होता। इस चुनौती पर कई अध्ययन भी हो चुके हैं।

जब तक बच्चे कुछ हद तक आत्मनिर्भर होते हैं, तब तक अक्सर बुज़ुर्गों की देखभाल की ज़िम्मेदारी उन पर आ जाती है। ये ज़िम्मेदारियां एक के बाद एक नहीं, बल्कि कई बार एक साथ सामने आती हैं।

एक तरफ उनका व्यक्तिगत जीवन इन बदलावों से गुज़र रहा होता है और दूसरी तरफ काम की प्रकृति भी बदलने लगती है। जिन क्षमताओं के दम पर अब तक कोई महिला अपने काम में अच्छा प्रदर्शन करती आ रही थी, वे नाकाफ़ी हो जाती हैं। उससे अब न सिर्फ अपना काम पूरा करने की , बल्कि दूसरों को साथ लेकर चलने और टीम का नेतृत्व करने की भी उम्मीद की जाती है। इसके लिए उसे नए कौशल सीखने पड़ते हैं, जिनमें लोगों को प्रभावित करना, उनके साथ मिलकर काम करना और टीम का नेतृत्व करना शामिल होता है। यानी अब सिर्फ अपने काम की तकनीकी जानकारी होना काफी नहीं रह जाता।

देखभाल की ज़िम्मेदारियों का बोझ महिलाओं पर पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक पड़ता है। इसका असर उनकी पेशेवर ज़िंदगी पर भी पड़ता है। उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य क्षेत्र में महिलाओं के नेतृत्व की स्थिति का अंदाज़ा लगाने के लिए किए गए वुमनलिफट हेल्थ के एक तुलनात्मक अध्ययन में पाया गया कि भारत के 38.9 प्रतिशत प्रतिभागियों ने निजी ज़िम्मेदारियों और काम के बीच तालमेल बिठाने को अपने करियर की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया। अध्ययन में शामिल महिलाओं ने यह भी बताया कि शादी करने और बच्चे पैदा करने का दबाव उनके करियर की योजना को प्रभावित करता है। कुछ महिलाओं ने बच्चे पैदा करने के समय और करियर की ज़रूरतों के बीच तालमेल न बैठा पाने के कारण उन पदों को भी ठुकरा दिया, जिन्हें पाने की वे लंबे समय से इच्छा रखती थीं।

बड़े सामाजिक क्षेत्र के संगठनों के पास संसाधन अधिक होते हैं, इसलिए उनसे उम्मीद की जाती है कि वे कर्मचारियों को देखभाल से जुड़ी ज़िम्मेदारियां निभाने में मदद करने के लिए बेहतर सुविधाएं देंगे। लेकिन स्थिति इसके उलट है। केवल 43 प्रतिशत बड़े संगठन देखभाल के लिए वेतन सहित छुट्टी देते हैं, जबकि छोटे संगठनों में यह सुविधा 57 प्रतिशत में उपलब्ध है। छोटे संगठनों के पास ऐसे संसाधन जुटाने की क्षमता भी अपेक्षाकृत कम होती है। काम के समय में लचीलेपन की सुविधा के मामले में भी यही स्थिति दिखाई देती है। जहां 67 प्रतिशत छोटे संगठन काम के समय में लचीलापन देते हैं, वहीं बड़े संगठनों में ऐसा करने वालों की हिस्सेदारी केवल 50 प्रतिशत है।

देखभाल की ज़िम्मेदारियों का बोझ महिलाओं पर पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक पड़ता है। इसका असर उनकी पेशेवर ज़िंदगी पर भी पड़ता है।

मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) का दौर आमतौर पर उसी उम्र में आता है, जब महिलाओं के पास काम का सबसे ज़्यादा अनुभव होता है और वे संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर होती हैं। इसके बावजूद, संस्थानों में इस पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। सामाजिक विकास के क्षेत्र में मेनोपॉज को लेकर भले ही ज़्यादा शोध न हुआ हो, लेकिन दूसरे क्षेत्रों में हुए अध्ययनों से इसके असर का पता चलता है।

मेनोपॉज के दौरान होने वाले लक्षणों, जैसे अचानक गर्मी लगना, सोचने-समझने में परेशानी, नींद में खलल, मनोदशा में बदलाव और थकान का सीधा संबंध काम करने की क्षमता में कमी, काम से छुट्टी लेने और गंभीर मामलों में समय से पहले नौकरी छोड़ने से है। भारत में भी इसके आंकड़े चिंताजनक हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक, लगभग 48 प्रतिशत भारतीय महिलाएं मेनोपॉज के गंभीर लक्षणों का अनुभव करती हैं। इनमें कम रक्तस्राव, डिप्रेशन, यौन संबंध के दौरान दर्द और माहवारी में बहुत अधिक रक्तस्राव जैसे लक्षण शामिल हैं।

भले ही आज मेनोपॉज पर पहले से ज़्यादा खुलकर बात हो रही है और इस पर चर्चा संस्थानों की संस्कृति का हिस्सा बन रही है, लेकिन भारत में अब तक कार्यस्थल पर मेनोपॉज से जुड़ी ज़रूरतों को ध्यान में रखने वाली कोई नीति नहीं है।

अनुभवी महिलाएं क्या देखने-समझने की क्षमता रखती हैं

आज कार्यस्थलों में सबसे बड़े बदलावों में से एक अलग-अलग पीढ़ियों की सोच में आया बदलाव है। जेनरेशन ज़ेड यानी नई पीढ़ी के युवा ऐसी अपेक्षाओं के साथ संगठनों में आ रहे हैं, जो पहले की पीढ़ियों से काफी अलग हैं। हाल के राष्ट्रीय आंदोलनों से भी पता चलता है कि यह पीढ़ी पद और अधिकार के अंतर को लेकर अधिक पारदर्शिता चाहती है, काम के घंटों के दौरान दफ्तर में मौजूद रहने के बजाय काम के समय में लचीलापन चाहती है और हर हाल में मज़बूत बने रहने का दिखावा करने के बजाय ऐसा माहौल चाहती है, जहां लोग बिना किसी डर के अपनी बात रख सकें। यह पीढ़ी ऐसे नेतृत्व की भी अपेक्षा करती है, जो केवल नियमों और प्रक्रियाओं के प्रति नहीं, बल्कि लोगों के प्रति जवाबदेह हो।

विडंबना यह है कि ये आकांक्षाएं नई नहीं हैं। हममें से कई महिलाओं ने भी, जो आज अपने करियर के बीच के दौर में हैं, इन्हीं उम्मीदों के साथ काम करना शुरू किया था। लेकिन तब हमें इन्हें बदलने की बहुत कम गुंजाइश मिली। हमने ऐसे संगठनों की कल्पना की थी, जहां मिल-जुलकर काम करने, एक-दूसरे की भावनाओं और ज़रूरतों को समझने और साझा उद्देश्य को महत्व दिया जाता हो। लेकिन अपने करियर का बड़ा हिस्सा हमने ऐसे नेतृत्व के तौर-तरीकों के साथ तालमेल बिठाने में बिताया, जहां पद और अधिकार के अंतर, ज़रूरत से ज़्यादा काम करने और तय ढर्रे पर चलने को बढ़ावा दिया जाता था।

आंकड़े स्पष्ट हैं, लेकिन महिलाओं के नेतृत्व से जुड़ी सामाजिक परिस्थितियां भी बार-बार सामने आती हैं। महिला नेतृत्वकर्ता अक्सर बताती हैं कि फैसले लेने वाली बैठकों में उनकी बात को दबा दिया जाता है और पुरुष सहकर्मी, जो पद में उनसे जूनियर होते हैं, उनकी राय को दरकिनार कर देते हैं। वरिष्ठ पदों पर ज़्यादातर पुरुषों के होने के कारण, वे महिलाओं के अधिकार और नेतृत्व को आसानी से स्वीकार नहीं करते। किसी महिला को नेतृत्वकर्ता मान लेना और नेतृत्व करने के लिए उसे वास्तव में ज़रूरी अधिकार और जगह देना, दोनों अलग बातें हैं। इन दोनों के बीच का यही अंतर करियर के बीच के दौर में महिलाओं के नेतृत्व को कमज़ोर करता है।

हालांकि, समय के साथ कर्मचारियों की अपने नेतृत्वकर्ताओं से अपेक्षाएं काफी बदल गई हैं। अब युवा कर्मचारी ऐसे लीडर्स को पसंद करते हैं, जो भरोसा कायम कर सकें, लोगों के वास्तविक अनुभवों को अहमियत दें, अलग-अलग विचारों और पृष्ठभूमियों वाले लोगों के साथ मिलकर काम करें और सभी को फैसलों और ज़िम्मेदारियों में बराबर की भागीदारी दें। कुछ अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि दूसरों के साथ रिश्ते बनाने और उन्हें मज़बूत करने की ये क्षमताएं महिला नेतृत्वकर्ताओं में अधिक देखने को मिलती हैं। हालांकि, इन्हें नारीवादी नेतृत्व की प्रमुख विशेषताओं के रूप में समझना ज़्यादा बेहतर होगा।

भले ही आज मेनोपॉज पर पहले से ज़्यादा खुलकर बात हो रही है और इस पर चर्चा संस्थानों की संस्कृति का हिस्सा बन रही है, लेकिन भारत में अब तक कार्यस्थल पर मेनोपॉज से जुड़ी ज़रूरतों को ध्यान में रखने वाली कोई नीति नहीं है।

नारीवादी नेतृत्व केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि नेतृत्व के पदों पर कितनी महिलाएं हैं। यह इस बात पर भी सवाल उठाता है कि सत्ता और अधिकारों का इस्तेमाल कैसे होता है, किन लोगों की बात सुनी जाती है, किनकी देखभाल से जुड़ी ज़िम्मेदारियों, मेनोपॉज या मातृत्व को समस्या मानने के बजाय काम की योजना बनाते समय ध्यान में रखा जाता है और किनके ज्ञान व अनुभव को महत्व दिया जाता है। इसका उद्देश्य केवल नेतृत्व में महिलाओं की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि संस्थानों की कार्यप्रणाली को नए सिरे से तैयार करना है।

आज एक खास तरह का मेल देखने को मिल रहा है। संगठन अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और संवेदनशील बनना चाहते हैं। वहीं, करियर के बीच के दौर में पहुंची महिलाओं के पास जीवन के वास्तविक अनुभव और लोगों के साथ मिलकर काम करने के वे कौशल हैं, जिनकी मदद से ऐसा बदलाव लाया जा सकता है। वे केवल मौजूदा व्यवस्था के भीतर नेतृत्व करने के लिए तैयार नहीं हैं, बल्कि उसे बदलने की स्थिति में भी हैं। इसलिए चुनौती सिर्फ नेतृत्व के पदों पर अधिक महिलाओं को पहुंचाने की नहीं है, बल्कि उन बाधाओं को दूर करने की है, जो उन्हें पूरी क्षमता से नेतृत्व करने से रोकती हैं।

संगठनों को प्रतिनिधित्व से आगे बढ़ना होगा

करियर के बीच के दौर में महिलाओं के सामने आने वाली बाधाओं को केवल खुद को संभालने और मुश्किलों से उबरने की उनकी खुद की क्षमता के भरोसे दूर नहीं किया जा सकता। हम पहले से जानते हैं कि इसके लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं। जैसे, करियर में ब्रेक के बाद काम पर लौटने के रास्ते बनाना, पदोन्नति की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना, देखभाल से जुड़ी ज़िम्मेदारियों में सहयोग देना, भर्ती में समान अवसर सुनिश्चित करना और नेतृत्वकर्ताओं को जवाबदेह बनाना। इन उपायों की जानकारी तो है, मगर हम इन्हें ठोस रूप नहीं दे पा रहे हैं। इनमें से कई कदम उठाना मुश्किल भी नहीं है।

संगठन वेतन और पदोन्नति के पैटर्न की समीक्षा कर सकते हैं, ताकि पता चले कि संस्था के भीतर महिला और पुरुष कर्मचारियों के साथ किस तरह का व्यवहार हो रहा है। वे समान स्तर पर काम करने वाले महिला और पुरुष प्रबंधकों के बीच संसाधनों का समान बंटवारा सुनिश्चित कर सकते हैं। इसके अलावा, वे महिलाओं के लिए ऐसे कार्यक्रम बना सकते हैं, जिनमें उन्हें केवल मार्गदर्शन (मेंटॉरशिप) ही न मिले, बल्कि संगठन में प्रभावशाली लोगों का सक्रिय सहयोग और समर्थन (स्पॉन्सरशिप) भी मिले। इससे करियर के बीच के दौर में महिलाओं को रणनीतिक फैसले लेने की प्रक्रिया में शामिल होने, महत्वपूर्ण काम करने और संगठन में अपना प्रभाव बढ़ाने के वास्तविक अवसर मिलेंगे, न कि केवल बड़े पदनाम।

संगठनों के बोर्ड को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वरिष्ठ प्रबंधन इन नीतियों को लागू करने के लिए जवाबदेह हो, न कि केवल इनके बारे में घोषणाएं करने तक सीमित रहे।

महिलाएं जटिल परिस्थितियों को संभालने और लोगों के साथ मिलकर काम करने वाले रिश्ते बनाने में कई वर्ष बिताती हैं। ये ऐसी क्षमताएं हैं, जिन्हें वे व्यवस्थाएं पहचान नहीं पातीं, जो किसी दूसरे तरह के काम को मापने के लिए बनाई गई हैं। करियर, परिवार की देखभाल और घर की ज़िम्मेदारियों को एक साथ संभालने का उनका अनुभव भी अक्सर उनके काम के आकलन या नेतृत्व से जुड़े मानकों का हिस्सा नहीं बन पाता। ये अनुभव अनौपचारिक रूप से मेंटॉरशिप या व्यक्तिगत संपर्कों के ज़रिए सामने आते हैं। काम के प्रदर्शन को मापने के तरीकों में बदलाव करके इन क्षमताओं को भी विशेषज्ञता के रूप में पहचाना जा सकता है।

इसके लिए और शोध करने की ज़रूरत नहीं है। संगठनों को अपने यहां करियर के बीच के दौर में काम कर रही महिलाओं से यह पूछना होगा कि व्यवस्था में खास तौर पर क्या दिक्कतें हैं और फिर उनके जवाबों के आधार पर कदम उठाने होंगे। बड़ा सवाल यह नहीं है कि मौजूदा नेतृत्व व्यवस्था में महिलाओं को कैसे बनाए रखा जाए। असली सवाल यह है कि क्या हम महिलाओं के अनुभवों और उनकी क्षमताओं के आधार पर इस व्यवस्था को बदलने के लिए तैयार हैं?

यह सिर्फ नेतृत्व में महिलाओं की संख्या बढ़ाने से कहीं आगे की बात है।

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लेखक के बारे में

  • प्राची शर्मा सम्यक में साझेदारी और जनवकालत का नेतृत्व करती हैं। उनका काम शहरी जीवन, लैंगिक समानता और जलवायु के बीच के आपसी संबंधों को ध्यान में रखते हुए भारत के शहरी गरीबों में स्वास्थ्य से जुड़ी असमानताओं को दूर करने पर केंद्रित है। उन्होंने यौन और प्रजनन स्वास्थ्य, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और महिला नेतृत्व जैसे विषयों पर काम किया है। वह वुमनलिफ्ट हेल्थ, पीरामल फाउंडेशन और ग्लोबल हेल्थ स्ट्रैटेजीज़ के साथ भी काम कर चुकी हैं। प्राची ने मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ और आइसलैंड विश्वविद्यालय से मास्टर्स की डिग्री हासिल की है। 2019 में स्वीडिश इंस्टीट्यूट ने उन्हें युवा नेतृत्वकर्ता के रूप में मान्यता दी थी।
  • डॉ. आयशा चौधरी वुमनलिफ्ट हेल्थ के भारत में चल रहे कार्यों का नेतृत्व करती हैं। इससे पहले वह भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय में ओएसडी (विशेष कार्य अधिकारी) और नीति आयोग के अटल इनोवेशन मिशन में निदेशक के रूप में काम कर चुकी हैं। इन भूमिकाओं में उन्होंने विज्ञान पर आधारित उद्यमशीलता का माहौल तैयार करने में योगदान दिया। आयशा एक मेडटेक स्टार्टअप की सह-संस्थापक भी हैं और उन्हें स्वास्थ्य सेवा उद्योग में काम करने का अनुभव है। वह नवाचार के ज़रिए सकारात्मक बदलाव लाने पर काम करने वाले संगठनों को सलाह भी देती हैं।
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