बस्तर जैसे दूरस्थ इलाके लंबे समय से हिंसा, राजनीतिक संघर्ष और विस्थापन जैसे बेहद मुश्किल हालात से गुज़र रहे हैं। इन इलाकों में कार्यरत सामाजिक संस्थाओं और कार्यकर्ताओं का हरेक दिन लोगों के संघर्षों, दुखों और असुरक्षा की कहानियों के बीच बीतता है। दिन ढलने पर औपचारिक रूप से दफ्तर का समय भले ही खत्म हो जाता हो, लेकिन दिनभर सुनी और देखी गई कहानियां यहां काम करने वाले कार्यकर्ताओं के भीतर लगातार चलती रहती हैं। इसके परिणामस्वरूप, विकास सेक्टर में काम की शुरुआत करते समय उनमें जो उत्साह और बदलाव लाने की लगन होती है, समय के साथ वह धीरे-धीरे थकान, निराशा और बर्नआउट में बदलने लगती है।
मैं पिछले कुछ वर्षों से बस्तर (दंतेवाड़ा) के सुदूर इलाकों में काम कर रहा हूं। इस इलाके पर होने वाली चर्चाओं में आमतौर पर संघर्ष, सुरक्षा और विकास जैसे मुद्दे प्रमुखता से सामने आते हैं। लेकिन इन चर्चाओं में एक सवाल अक्सर छूट जाता है – जो लोग हर दिन समुदाय के लोगों की मुश्किलों को सुनते हैं, उनकी अपनी मुश्किलें सुनने की जगह कहां हैं? आखिर वे किसके पास जायें?
फील्ड की कहानियां गहरा असर डालती हैं
बस्तर जैसे इलाकों में कार्यकर्ताओं का काम केवल किसी कार्यक्रम को लागू करने या समुदाय के साथ बैठक करने तक सीमित नहीं है। यहां के समुदायों के साथ काम करने वाले लोगों के लिए फील्ड की मुश्किलें कई बार उनके घर तक चली आती हैं। उदाहरण के लिए, यहां के बच्चों को हिंसा और असुरक्षा के माहौल में बड़ा होते देखना उन लोगों के लिए भी आसान अनुभव नहीं है जो उनके साथ काम करते हैं। इन बच्चों को बेहतर शिक्षा प्रदान करने के लिए पोटा केबिन जैसे आवासीय स्कूल बनाए गए, मगर कभी-कभी यहां के बच्चे आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं इसका भी हम पर बहुत असर पड़ता है।
पिछले डेढ़ साल में इन आवासीय स्कूलों में रह रहे बच्चों की आत्महत्या से मौत जैसी घटनाओं के बारे में जानना मेरे लिए ख़ुद बेहद कठिन अनुभव रहा। ऐसी घटनाओं के बाद बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के बारे में सोचते हुए मैं ख़ुद तनाव महसूस करता हूं। मेरे खुद के अनुभवों के आधार पर यह सवाल उठना लाज़मी है कि समुदाय के साथ लगातार काम करने वाले ज़मीनी कार्यकर्ताओं के मानसिक स्वास्थ्य पर इन अनुभवों का कैसा असर पड़ता है।


सभी कार्यकर्ता समुदाय से बाहर के नहीं होते
विकास सेक्टर में काम करने वाले सभी लोग बाहर से आए लोग नहीं होते हैं। हमारी टीम में भी ज़्यादातर स्थानीय लोग हैं। जब स्थानीय आदिवासी युवा सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम करते हैं, तो वे दोहरे बोझ का सामना करते हैं। वे केवल एक पेशेवर की तरह काम नहीं कर रहे होते, बल्कि वे स्वयं उसी पीड़ित और संघर्षरत समुदाय का हिस्सा होते हैं। समुदाय का दुख उनके लिए कोई बाहरी कहानी नहीं, बल्कि उनका अपना भोगा हुआ यथार्थ होता है।
उदाहरण के लिए, हमारे एक युवा साथी के पिता पूर्व में एक माओवादी संगठन के साथ जुड़े थे और बाद में वे सरकारी नौकरी में चले गए। इसके बाद वे लंबे समय तक अपने गांव वापस नहीं आ सके। उस युवा की उसके पिता से दूरी, गांव से जुड़े उसके डर और उसी इलाके में काम करना इन सबको केवल ‘काम का तनाव कह’ देने तक सीमित नहीं किया जा सकता है। यहां काम और निजी जीवन के बीच उस तरह का स्पष्ट विभाजन नहीं रहता है, जिसका होना हम अक्सर मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा करते समय ज़रूरी मानकर चलते हैं। यही वजह है कि ऐसी जगहों पर काम करने वाले स्थानीय युवाओं की मानसिक सेहत की स्थिति को समझने के लिए केवल यह पूछना काफी नहीं है कि उन्हें का करने में किस किस्म की मुश्किलें आ रही हैं, बल्कि यह भी देखना ज़रूरी है कि उस व्यक्ति का उस जगह से किस तरह का जुड़ाव है।
मानसिक स्वास्थ्य को स्थानीय सन्दर्भ में समझना है ज़रूरी
हर जगह मानसिक स्वास्थ्य को केवल एक चिकित्सीय या स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या के रूप में काम करते हुए नहीं देखा जा सकता। ख़ासकर आदिवासी समाज के साथ काम करने वाले स्थानीय कार्यकर्ताओं के संदर्भ में मानसिक और भावनात्मक अनुभव उनकी पहचान, भाषा, साझा संस्कृति और सामाजिक परिस्थितियों से गहराई से जुड़े होते हैं। “मेंटल हेल्थ”, “सेल्फ-केयर” या “इमोशनल वेलबीइंग” जैसे भारी भरकम शब्दों का स्थानीय भाषा में अनुवाद करके यहां के लोगों की मानसिक अवस्था को नहीं समझा जा सकता है। इसके बजाए ज़रूरत यह समझने की है कि स्थानीय लोग दुख, तनाव, चिंता, डर, अकेलेपन या असुरक्षा को किन शब्दों, अनुभवों और सामाजिक संदर्भों में समझते और व्यक्त करते हैं। इसलिए इन अवधारणाओं को समुदाय की भाषा, बोली, अनुभव और सांस्कृतिक समझ से जोड़ना ज़रूरी है। सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए तो यह दोहरी चुनौती है। उन्हें केवल समुदाय की “केयर” की बात नहीं करनी होती है, बल्कि अपनी खुद की संस्था के भीतर भी सेल्फ केयर की संस्कृति विकसित करने की ज़रूरत पर ध्यान देना होता है।
दोहरे मानसिक तनाव का सामना करते हैं ऐसे इलाकों के ज़मीनी कार्यकर्ता
रोजगार और भविष्य की चिंताएं भी स्थानीय लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डालती हैं। रोज़गार के नाम पर स्थानीय युवाओं के पास बस्तर फाइटर जैसे सैन्य दस्तों में शामिल होने जैसे सीमित विकल्प ही हैं। वहीं दूसरी ओर, कई बड़े संस्थानों में उच्च पदों पर स्थानीय आदिवासियों की उपस्थिति न के बराबर है। उनकी भूमिका मुख्यतः तृतीय/चतुर्थ श्रेणी के पदों या ठेका मज़दूरी तक सीमित है। इस उपेक्षा के विरोध में पिछले साल सैंकड़ों युवाओं ने सड़कों पर उतरकर एक ऐसे ही नामी संस्थान (60 से भी अधिक वर्षों से यहां स्थित एनएमडीसी) के खिलाफ़ आंदोलन भी किया। रोज़गार के स्तर पर मौजूद इस असमानता और भविष्य को लेकर अनिश्चितता को केवल ‘व्यक्तिगत तनाव’ मानकर नहीं देखा जा सकता है।
आर्थिक अनिश्चितता और करियर का संकट युवाओं के मानसिक तनाव को और गहरा करते हैं। विकास सेक्टर में काम करने वाले इन युवाओं के लिए नौकरी केवल एक पेशेवर भूमिका नहीं होती, बल्कि आर्थिक सुरक्षा और उनके भविष्य से जुड़ा सवाल भी होती है। इसलिए सामाजिक क्षेत्र में काम करने का अनुभव इन युवाओं के लिए कई स्तरों पर दबाव पैदा कर सकता है। यानी जिन समुदायों के हालात को बदलने के लिए वे काम कर रहे होते हैं, वहां की परिस्थितियों का असर उनकी अपनी ज़िंदगी पर भी पड़ता है। रोज़गार की अनिश्चितताओं और रोज़गार के सीमित विकल्पों के चलते वे इस बारे में बात करने से हिचकिचाते हैं। ज़मीनी कार्यकर्ताओं के मानसिक दबाव को समझने के लिए उन्हें केवल कर्मचारी की तरह नहीं, बल्कि उस समुदाय की तरह समझना होगा जिसके साथ वे काम करते हैं।
मज़बूत बने रहने का दबाव
अक्सर संस्थाओं का नेतृत्व करने वाले लोग भी ज़मीनी कार्यकर्ताओं पर पड़ने वाले मानसिक दबाव और उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक जटिलताओं को लेकर आवश्यक संवेदनशीलता नहीं बरतते है। इसकी वजह यह है कि विकास सेक्टर में एक अलिखित फ़िलॉसफ़ी बनी हुई है कि यहां काम करने वाले लोगों को मज़बूत बने रहना चाहिए। समस्या यह है कि इस तरह की मज़बूत बने रहने की अपेक्षाएं कई बार कार्यकर्ताओं को अपनी परेशानी को सामने रखने से भी रोक देती हैं।


मैंने खुद महसूस किया है कि फील्ड में लगातार काम करने के बाद शरीर से ज़्यादा दिमाग को आराम की ज़रूरत पड़ती है। लेकिन उस आराम को काम की प्राथमिकता में जगह देना हमेशा आसान नहीं रहता है। कई बार ऐसा हुआ है कि सुबह उठते ही किसी बच्चे के साथ हुई किसी घटना की खबर मिली और दिनभर उस खबर का असर मन में बना रहा। जैसे, पिछले साल जनवरी में हुए एक माओवादी हमले में हमारी टीम के एक साथी के परिवार के युवा सदस्य की भी मृत्यु हो गई। इस खबर ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। मन में कई तरह के सवाल और बेचैनी थी। यह जानते हुए कि यह घटना हमारे ही काम और कार्यक्षेत्र से जुड़ी है, उससे सामान्य तरीके से अलग हो पाना मेरे लिए आसान नहीं था। लेकिन इस सबके बावजूद अगले ही दिन या कई बार उसी दिन, हमें अपने बाकी कामों के बीच वापस लौटना पड़ता है। बैठकें करनी होती हैं, फील्ड में जाना होता है, युवाओं के साथ काम करना होता है और अपनी पेशेवर ज़िम्मेदारियों को निभाना होता है। बाहर से खुद को सामान्य और मज़बूत दिखाते हुए इस तरह काम करते रहना पड़ता है, जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन सच तो यह है कि हम पर ऐसी घटनाओं का असर लंबे समय तक रहता है।
मुझे याद है कि जिस दिन मुझे यह खबर मिली उस दिन मैं काम तो कर रहा था, लेकिन भीतर से आम दिनों जैसा सहज और सामान्य नहीं महसूस कर रहा था। मन बार-बार उसी घटना की तरफ लौट रहा था। एक तरफ घटना का असर था और दूसरी तरफ यह ज़िम्मेदारी थी कि काम रुकना नहीं चाहिए। मेरे लिए शायद सबसे मुश्किल यही था कि मेरे पास रुककर यह समझने की जगह नहीं थी कि मैं खुद क्या महसूस कर रहा हूं। मुझे आगे बढ़ना था, खुद को संभालना था और सामान्य तरीके से काम करते रहना था। इस अनुभव ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए किसी गंभीर घटना के बाद अपने भावनात्मक अनुभव को स्वीकार करने और उसके साथ कुछ समय बिताने की जगह होना कितना ज़रूरी है।
क्या संस्थाओं में सुनने की जगह है?
सामाजिक संस्थाओं में ज़मीनी कार्यकर्ता का काम केवल किसी परियोजना, लक्ष्य या तय गतिविधि को पूरा करना नहीं होता। वे अक्सर समुदाय के लिए लोगों के लिए ‘सुनने वाले व्यक्ति’ भी होते हैं। लेकिन कई बार संस्थाओं के भीतर यह सवाल कहीं पीछे रह जाता है कि उस कार्यकर्ता की बात कौन सुनेगा? कई संस्थाओं में खुले संवाद की बात तो होती है, लेकिन पदानुक्रम और पावर डायनामिक्स के कारण हाशिए के समुदायों से आने वाले कार्यकर्ताओं के पास अपनी पीड़ा व्यक्त करने का न तो साहस होता है और न ही भाषा।
कई बार टीम के सदस्यों के बीच नियमित बातचीत, एक-दूसरे का हाल पूछना, किसी कठिन अनुभव के बाद थोड़ी देर साथ बैठना या बिना कोई राय रखे किसी को सुन भर लेना भी बहुत मायने रखता है।
ऐसे हालात में कई ज़मीनी कार्यकर्ताओं की प्राथमिक आवश्यकता किसी पेशेवर थेरेपी या काउंसलिंग से पहले यह हो सकती है कि निर्णय लेने वाले पदों पर बैठे लोग महीने में एक बार बैठकर उनकी बातें सुनें। मैंने यह भी अनुभव किया है कि जब कोई कार्यकर्ता मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा होता है तो नेतृत्वकर्ताओं को भेजे गए संदेशों पर हफ्तों तक कोई प्रतिक्रिया तक नहीं मिलती। अक्सर नेतृत्वकर्ताओं को इसके बनिस्बत दूसरे मुद्दे ज़्यादा ज़रूरी लगते हैं।
समावेशी और संवेदनशील दृष्टिकोण विकसित करना है ज़रूरी
ज़्यादातर संस्थाओं में ज़मीनी कार्यकर्ताओं के लिए नियमित संवाद, सुपरविज़न, काउंसलिंग या भावनात्मक सहयोग की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती। बेशक, इसके पीछे सीमित बजट और मानव संसाधन जैसी व्यावहारिक वजहें हो सकती हैं, लेकिन बात केवल संसाधनों की नहीं है। कई बार संस्था की कार्य-संस्कृति में भी ऐसी जगह नहीं बन पाती, जहां कोई कार्यकर्ता सहजता से यह कह सके कि वह थक गया है, किसी घटना से परेशान है या उसे थोड़े समय और सहयोग की ज़रूरत है। शायद हमें यह समझने की ज़रूरत है कि किसी कार्यकर्ता का मज़बूत दिखना और वास्तव में मज़बूत होना, दोनों अलग बातें हैं।
कई बार टीम के सदस्यों के बीच नियमित बातचीत, एक-दूसरे का हाल पूछना, किसी कठिन अनुभव के बाद थोड़ी देर साथ बैठना या बिना कोई राय रखे किसी को सुन भर लेना भी बहुत मायने रखता है। लेकिन यह भी ज़रूरी है कि संस्था के काम करने के तौर-तरीकों, नेतृत्व और निर्णय लेने की प्रतिक्रियाओं में देखभाल के लिए जगह बनाई जाए। आखिरकार, समुदाय के साथ लंबे समय तक काम करने की क्षमता केवल कार्यकर्ता की प्रतिबद्धता से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि संस्था उसके साथ कितनी मज़बूती से खड़ी है।
बस्तर और दंतेवाड़ा जैसे इलाकों में सलवा जुडूम के दौर को देख चुकी और पोटा केबिनों में पली-बढ़ी पीढ़ी के लिए पुलिस और माओवादी के बीच के संघर्ष और रोज़गार के अवसरों के अभाव से उपजा तनाव दशकों पुराना है। एक-दो वर्कशॉप या थेरेपी के सत्रों से न तो उनके दर्द को दूर किया जा सकता है और न ही उन समुदायों के साथ काम करने वाले कार्यकर्ताओं के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर किया जा सकता है।
इसका समाधान केवल यह नहीं हो सकता कि कार्यकर्ता खुद को संभालना सीखें। उनके मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने की ज़िम्मेदारी संस्थाओं को भी लेनी होगी। तभी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा कोई भी हस्तक्षेप केवल सतही न रहकर असल में कामयाब हो सकेगा।
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लेखक के बारे में
- धीरज कुमार यदु युवा विकास एवं नेतृत्व, जेंडर एवं यौनिकता, शिक्षा एवं उच्च शिक्षा तक पहुंच, आदिवासी युवाओं के विकास एवं सामुदायिक विकास तथा फेलोशिप और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में काम करते हैं। वे स्वयं को नारीवादी सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचानते हैं और सामाजिक क्षेत्र में छह वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। छत्तीसगढ़ से आने वाले धीरज को विशेष रूप से युवाओं के साथ काम करना पसंद है। युवाओं के साथ संवाद, उनकी क्षमताओं का विकास और उनके लिए उच्च शिक्षा तथा नेतृत्व के अवसर निर्मित करना उनके काम के प्रमुख क्षेत्र रहे हैं।



