

मैं अगस्त 2026 के आख़िरी हफ्ते में राहत कार्य के लिए चुटिया बस्ती पहुंचा। वहां मेरी मुलाक़ात एक स्थानीय निवासी से हुई, जिन्होंने कहा, “हमारा भी एक वीडियो बना दीजिए। हमारे गांव का आज तक किसी ने वीडियो नहीं बनाया है। इसलिए लोग हमारे बारे में जानते ही नहीं हैं।”
चराइदेव ज़िले के लकवा ब्लॉक में स्थित चुटिया बस्ती उन कई गांवों में से एक थी, जहां बाढ़ का पानी घरों में घुस आया था। देसांग और सफरी नदियों के बीच बसे लकवा इलाके में एक बड़ा तटबंध है। पानी बढ़ने पर परिवार अपने घर छोड़कर तटबंध पर आ गए थे, जहां वे अस्थायी आश्रयों में रह रहे थे। लोगों ने मुझे बताया कि बाढ़ आने के बाद से वहां कोई भी राहत संगठन नहीं पहुंचा था।
19 जुलाई को जब बाढ़ का पानी ऊपरी असम तक पहुंचा, तो तबाही की तस्वीरें और वीडियो तेज़ी से सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे। इन वीडियो में डूबे हुए घर, फंसे हुए परिवार और पानी में डूबी सड़कें दिखाई दे रही थी। सनबर्ड ट्रस्ट की सामुदायिक विकास टीम के हिस्से के रूप में मैं पिछले कुछ वर्षों से बाढ़ राहत कार्यों में शामिल रहा हूं। लेकिन इस बार हालात अलग थे। बाढ़ का स्तर कहीं ज़्यादा था और आपदा से जुड़ी जानकारी पहले के मुकाबले कहीं तेज़ी से फैल रही थी।
राहत कार्य की योजना बनाते हुए मैं सबसे पहले शिवसागर ज़िले के नेपाली खुति, संतोक, बिहुबोर और हुलांग कटोनी गांवों का जायज़ा लेने पहुंचा। सोशल मीडिया पर इन जगहों की काफी चर्चा हो रही थी। ये सभी गांव बुरी तरह प्रभावित थे, लेकिन वहां वॉलंटियर और संगठन पानी, भोजन और दूसरी ज़रूरी चीज़ें लेकर पहुंच रहे थे।
इसी दौरान हमने इन इलाकों से बाहर के हालात समझने के लिए जानकारी जुटानी शुरू की। जल्द ही हमें एहसास हुआ कि हर जगह स्थिति एक जैसी नहीं थी। एक दोस्त ने मुझे असम रिलीफ एप्प के बारे में बताया। इसके ज़रिए मुझे उन लोगों के फोन नंबर मिले, जिन्होंने मदद की गुहार लगायी थी। मैंने उन्हें फोन किया, जानकारी की पुष्टि की और प्रभावित समुदायों की स्थिति के बारे में और जानने की कोशिश की।
इस तरह हम लकवा इलाके के चोलापाथर, चुटिया बस्ती, तेंगापुखुरी और दूसरे गांवों तक पहुंचे। बाढ़ के करीब एक महीने बाद जब हम वहां गए, तो आम जनजीवन ठप था। फसलें बर्बाद हो चुकी थी, कई दुकानें बंद थी और राहत सामग्री भी नियमित रूप से नहीं पहुंच रही थी। तब तक लोगों को यह भी समझ आ गया था कि कई बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में सोशल मीडिया के ज़रिए राहत जुटाई जा रही है। इसलिए उन्होंने मुझसे कहा कि मैं उनकी ज़रूरतों को लोगों तक पहुंचाने के लिए एक वीडियो बनाऊं।
शुरुआती दिनों में राहत के लिए सोशल मीडिया पर की जा रही अपीलों में पीने के पानी और सूखे राशन जैसी तात्कालिक ज़रूरतों पर सबसे ज़्यादा ध्यान दिया जा रहा था। इन अपीलों पर तुरंत प्रतिक्रिया भी मिल रही थी। लेकिन करीब एक महीने बाद जब लोग राहत शिविरों से अपने घरों को लौटने लगे, तो उनकी ज़रूरतें बदल चुकी थी। अब उन्हें अपने घर दोबारा बसाने के लिए मदद चाहिए थी। गद्दों, चादरों, बर्तनों और घर में इस्तेमाल होने वाली दूसरी ज़रूरी चीज़ों की मांग बढ़ रही थी।
तब तक सोशल मीडिया पर भी चर्चा का रुख बदल चुका था। कई वॉलंटियर अपने रोज़मर्रा के काम और ज़िम्मेदारियों की ओर लौट चुके थे। हमें समझ आया कि बाद में सामने आने वाली इन ज़रूरतों के लिए लोगों से पहले जैसी मदद नहीं मिल रही थी।
इसमें कोई संदेह नहीं कि असम में बाढ़ राहत कार्य में सोशल मीडिया की अहम भूमिका रही है। इसकी मदद से बड़ी संख्या में वॉलंटियर जुटे। लोगों ने वीडियो और पोस्ट के ज़रिए प्रभावित सूबों की पहचान की और वहां राहत सामग्री पहुंचाने की हर संभव कोशिश की।
लेकिन सिर्फ सोशल मीडिया ही राहत पहुंचाने का आधार नहीं हो सकता। हमारे अनुभव ने हमें सिखाया कि डिजिटल माध्यमों से मिलने वाली जानकारी को ज़मीनी स्तर पर परखना भी उतना ही ज़रूरी है। सनबर्ड ट्रस्ट में हमने बाढ़ राहत के लिए एक विशेष कार्यदल बनाया है। हमारी फील्ड टीमें सीधे समुदायों के साथ काम करती हैं, जबकि पर्दे के पीछे काम करने वाली टीम राहत से जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म, खबरों और ज़रूरतों पर नज़र रखती है।
इससे हमें बदलते हालात और ज़रूरतों के मुताबिक समय पर सही रिस्पॉन्स देने में मदद मिली है।
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लेखक के बारे में
- ब्रूनो कचुआ सनबर्ड ट्रस्ट में सामुदायिक विकास समन्वयक हैं। वह असम में माजुली, धेमाजी, गोलाघाट और कार्बी आंगलोंग समेत कई ज़िलों के ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के साथ काम करते हैं। वह शिक्षा, कौशल विकास, आजीविका, सरकारी योजनाओं के साथ समन्वय और आपदा के समय राहत कार्यों से जुड़ी पहलों में शामिल रहे हैं। उनके काम में समुदाय को एकजुट करना, गांवों की ज़रूरतों का आकलन करना, प्रोजेक्ट की योजना बनाना और उन्हें लागू करना, समुदाय की भागीदारी वाले विकास कार्यक्रमों का दस्तावेज़ीकरण और निगरानी करना शामिल है।
