

असम में हर साल बाढ़ आती है। लोग इसके साथ जीना भी सीख चुके हैं। लेकिन जुलाई 2026 की बाढ़ का मिजाज़ अलग है। इस बार पानी उन इलाकों तक पहुंच गया, जहां लोगों ने पहले कभी ऐसी तबाही नहीं देखी थी। यही वजह है कि राज्य के कृषि, सिंचाई और संसदीय कार्य मंत्री पीयूष हजारिका ने इसे पिछले 60 सालों की सबसे भीषण बाढ़ बताया है। शिवसागर, चराइदेव और जोरहाट जैसे ज़िले, जहां पहले कभी इस स्तर की बाढ़ नहीं आई थी, इस बार बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।
बाढ़ में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इतना ही नहीं अब तक छह लाख से ज़्यादा लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं और बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर छोड़कर सुरक्षित जगहों पर जाना पड़ रहा है।
चराइदेव और डिब्रूगढ़ जैसे बाढ़ से प्रभावित ज़िलों में काम करने वाली ज़मीनी संस्था ‘सुरुजमुखी’ के संस्थापक मनुज दत्ता कहते हैं, “इन इलाकों के लोगों ने पहले कभी ऐसी बाढ़ नहीं देखी थी। इसलिए वे इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। जिन इलाकों में हर साल बाढ़ आती है, वहां लोग खंभों पर बने घरों में रहते हैं। उनके पास अपनी नावें होती हैं और उनका पूरा जीवन इस आपदा के हिसाब से ढल चुका होता है। लेकिन इस बार जिन इलाकों में बाढ़ आई है, वहां लोगों के पास ऐसी कोई तैयारी नहीं थी।”
स्थिति इसलिए भी ज़्यादा गंभीर हो गई क्योंकि कई इलाकों में पानी बहुत तेज़ी से पहुंचा। मनुज बताते हैं, “शिवसागर ज़िले के बिहुबोर इलाके में लोगों को संभलने के लिए सिर्फ 30 मिनट से लेकर एक घंटे तक का का समय ही मिल पाया। यही वजह है कि वे अपने ज़रूरी दस्तावेज़, बच्चों की किताबें और यहां तक कि घरों की छतें भी नहीं बचा सके।”
कई इलाकों में घर कई दिनों तक पानी में डूबे रहे। मिट्टी के घर पूरी तरह ढह गए हैं। खेती पर निर्भर समुदायों की ज़मीन को भी ऐसा नुकसान पहुंचा है जिसकी भरपाई होने में लंबा समय लग जाएगा।
मनुज कहते हैं, “हमें कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) से जुड़े फाउंडेशनों से आजीविका से जुड़े कामों के लिए परियोजना आधारित फंडिंग मिलती है। लेकिन इस समय समुदायों की ज़रूरतें बदल गई हैं। बच्चों की किताबें और स्टेशनरी बह गई हैं, इसलिए हम उन्हें छात्र किट देना चाहते हैं। जो लोग इस आपदा के बाद घबराहट और चिंता का सामना कर रहे हैं, उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी काम करने की ज़रूरत है। इसके लिए हमें दूसरे स्रोतों से धन जुटाना होगा।”
असम में आजीविका के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था ‘सेस्टा’ (SeSTA) में फंडरेज़िंग, कम्युनिकेशन और पार्टनरशिप की टीम एंकर प्रीतिषा सिंघा कहती हैं, “जिन फंडर्स से हमारी बात हुई है, उनका ज़ोर लंबे समय के पुनर्वास पर है। उनका मानना है कि तत्काल राहत ज़रूरी है, लेकिन सिर्फ राहत सामग्री बांट देने से बाढ़ का असर खत्म नहीं होगा। मसलन, कई परिवारों ने अपने कमाने वाले सदस्य खो दिए हैं। ऐसे परिवारों के लिए राहत पैकेज काफी नहीं होगा। उन्हें इससे ज़्यादा सहायता की ज़रूरत होगी।”
वे आगे कहती हैं, “ऐसी आपदाओं का असर राहत कार्यों में जुटे लोगों पर भी पड़ता है। उन्हें पानी से भरे रास्तों से होकर गुज़रना पड़ता है। अभी के हालात में कई जगह यह समझना मुश्किल हो गया है कि सड़क कहां है और पानी का रास्ता कहां है। मुख्य सड़क के किनारे बसे घरों तक राहत सामग्री पहुंचाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन दूर-दराज़ के इलाकों तक पहुंचने में आधा दिन लग जाता है। अगर राहतकर्मियों या फ्रंटलाइन वर्कर्स को और राहत सामग्री या उपकरण लेने के लिए वापस लौटना पड़े और फिर दोबारा जाना पड़े, तो राहत-कार्य में और भी ज़्यादा समय लग जाता है।”
अब जब कई इलाकों से पानी उतरने लगा है, तो राहत कार्यों की ज़रूरतें भी बदल रही हैं। ऐसे में राहत सामग्री भी लोगों की नई ज़रूरतों के हिसाब से तैयार करनी होगी।
विकास क्षेत्र से जुड़े एक पेशेवर अभिजीत कुंवर* कहते हैं, “पानी उतरने के बाद लोगों को सबसे पहले घरों की सफाई के लिए फिनाइल और ब्लीचिंग पाउडर की ज़रूरत होती है। बाढ़ के बाद मच्छरों का प्रकोप भी बढ़ जाता है, इसलिए मच्छरदानियां भी ज़रूरी होती हैं। लेकिन अभी भी कई राहत अभियान ज़रूरत से ज़्यादा चावल और दाल बांटने पर ही केंद्रित हैं।”
*गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदल दिया गया है।
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लेखक के बारे में
- देबोजीत दत्ता आईडीआर में संपादकीय सहायक हैं और लेखों के लिखने, संपादन, सोर्सिंग और प्रकाशन के जिम्मेदार हैं। इसके पहले उन्होने सहपीडिया, द क्विंट और द संडे गार्जियन के साथ संपादकीय भूमिकाओं में काम किया है, और एक साहित्यिक वेबज़ीन, एंटीसेरियस, के संस्थापक संपादक हैं। देबोजीत के लेख हिमल साउथेशियन, स्क्रॉल और वायर जैसे प्रकाशनों से प्रकाशित हैं।
