पर्यावरण

आपदा से जूझता नागालैंड और सवालों के घेरे में राहत का सिस्टम

जुलाई 2026 में पूर्वी नागालैंड की बाढ़ ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं—क्या राज्य का अर्ली वार्निंग सिस्टम तैयार था? क्या सरकारी राहत समय पर पहुंची? और क्या मीडिया प्रभावित इलाकों की पूरी तस्वीर सामने ला पाया?
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19 जुलाई की सुबह करीब 6 बजे, नागालैंड के मोन शहर में एक भूस्खलन हुआ। जुलाई के अंत में आई रिपोर्टों के मुताबिक, इस आपदा में 11 लोगों की जान चली गई। इसका असर 280 गांवों और वार्डों में रहने वाले 28,000 से ज़्यादा परिवारों पर पड़ा। इस दौरान 1,746 घर क्षतिग्रस्त हुए और 1,593 एकड़ खेती की ज़मीन बर्बाद हो गई।

नागालैंड में लगातार हो रही मॉनसून की बारिश, अचानक बाढ़, कीचड़ धंसाव, बादल फटने और भूस्खलन से प्रभावित कई जिलों में मोन भी शामिल था। अन्य प्रभावित जिलों में मोकोकचुंग, लोंगलेंग, मेलुरी और नोकलाक शामिल हैं। नागालैंड के इन जिलों में हर साल मॉनसून के दौरान मुश्किल हालात पैदा होते हैं, जिससे लोगों के लिए आवाजाही और आजीविका से जुड़ी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। हालांकि, इस साल आपदा का पैमाना इतना बड़ा था कि लोगों ने इससे पहले कभी ऐसी तबाही नहीं देखी थी।

दीमापुर की एक पत्रकार मैरी* ने बताया, “यह घटना वाकई अभूतपूर्व है। मोन और बाढ़ से प्रभावित तिजित और नागिनिमोरा जैसे इलाकों के लोगों ने बताया कि उन्होंने अपने जीवन में बाढ़ का ऐसा स्तर और इतने भूस्खलन नहीं देखे। सड़कों और पुलों के बड़े पैमाने पर बह जाने से पूरे-पूरे गांव जिला मुख्यालय से कट गए थे।”

आज जब भूस्खलन, बाढ़ और बादल फटने जैसी घटनाएं नागालैंड में भारी तबाही मचा रही हैं, तब यह समझना ज़रूरी है कि आपदा का पैमाना कितना बड़ा है और प्रभावित समुदायों तक किस तरह की मदद पहुंच रही है। साथ ही, आपात स्थिति से निपटने में सरकार और सामुदायिक संस्थाओं की क्या भूमिका है? दूरदराज के इलाकों तक राहत पहुंचने में बुनियादी ढांचा किस तरह की बाधाएं पैदा कर रहा है? और इस आपदा ने लोगों और सार्वजनिक जीवन को किस हद तक प्रभावित किया है?

एक पहाड़ी ज़मीन पर एक साथ जमा ढेर सारे लोग_बाढ़
मोन टाउन में राहत-बचाव के काम के लिए जुटे लोग। | चित्र साभार: कोन्याक स्टूडेंट्स यूनियन

डेटा की कमी

इस आपदा ने कई सवाल खड़े किए हैं—इतनी बड़ी तबाही की वजह क्या थी और क्या समुदायों को इसके बारे में पर्याप्त चेतावनी दी गई थी?

मैरी* ने बताया, “यह समझने के लिए विशेष जांच की स्पष्ट ज़रूरत है कि इस बार तबाही इतनी ज़्यादा क्यों हुई? इस जांच में बारिश और क्षेत्रीय भूगोल से जुड़े आंकड़ों को देखा जाना चाहिए। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि क्या मोन में हुई बारिश की तीव्रता वास्तव में सामान्य से बहुत ज़्यादा थी? क्या सड़कें, पुल और बस्तियां ज़्यादा जोखिम वाले इलाकों में बनाई गई थी? और क्या वहां पहले से कोई प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (अर्ली वार्निंग सिस्टम) मौजूद थी?” उन्होंने आगे कहा कि अधिकारियों को यह भी पता लगाना चाहिए कि अगर बारिश जारी रहती है, तो किन गांवों में आगे भूस्खलन का खतरा बना हुआ है।

मोन के स्वतंत्र पत्रकार मन्नो वांगनाओ ने कहा, “हर कोई राहत और बचाव के काम में जुटा है। लेकिन कोई भी अब तक पूरी स्थिति का जायज़ा नहीं ले रहा। क्या दोबारा भी ऐसा होगा? अब तक एक समिति बन जानी चाहिए थी।”

इस स्टोरी के लिए जिन लोगों से बात की गई, उन्होंने बताया कि भूस्खलन और बाढ़ से पहले उन्हें नागालैंड स्टेट डिज़ास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनएसडीएमए) की ओर से मौसम को लेकर कोई अलर्ट नहीं मिला था। यह लेख लिखे जाने तक, इतनी बड़ी तबाही क्यों हुई, इसकी जांच के लिए किसी विशेषज्ञ समिति के गठन की सार्वजनिक रूप से कोई घोषणा नहीं की गई थी। यह गौरतलब है कि इस आपदा का असर सिर्फ तत्काल हुई जान-माल की क्षति तक सीमित नहीं है।

आपात स्थिति में लचर हालात

मोन के वांगखाओ गवर्नमेंट कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर डब्ल्यू वांगजिन ने बताया कि भूस्खलन के दौरान उनके पिता की तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ गई थी। सामान्य परिस्थितियों में उनके गांव चिंगफोई से मोन के जिला सिविल अस्पताल तक पहुंचने में करीब तीन घंटे लगते हैं। लेकिन इस बार भूस्खलन के कारण सड़कें कई जगह से टूट गई थी।

उनके पिता को चार अलग-अलग वाहनों से अस्पताल ले जाना पड़ा। जहां-जहां सड़क टूट चुकी थी, वहां गांव के लोगों ने एक अस्थायी स्ट्रेचर पर उठाकर उन्हें सड़क के क्षतिग्रस्त हिस्से के पार पहुंचाया। दूसरी तरफ एक और वाहन इंतज़ार करता था, जो उन्हें अगले रास्ते के बंद होने तक आगे ले जाता था। फिर वहां दोबारा यही प्रक्रिया दोहराई जाती थी। वांगजिन ने कहा, “मेरे पिता इसलिए बच पाए क्योंकि मैं अपने निजी संपर्कों के ज़रिए उनके लिए आने-जाने के साधन का इंतज़ाम कर सका और मेरे पास ऐसा करने के लिए ज़रूरी संसाधन भी थे। बहुत से परिवारों के पास ऐसे संसाधन और संपर्क नहीं होते।”

जहां सड़क मार्ग पहले से ही कमज़ोर हो और स्वास्थ्य सुविधाएं भी सीमित हों, वहां एक भूस्खलन तत्काल हुए नुकसान के अलावा भी कई आपात स्थितियां पैदा कर सकता है। 

समुदाय से पहुंचती राहत

इस बार की घटना में राहत पहुंचाने का काम काफी हद तक सामुदायिक संस्थाओं पर निर्भर रहा है। कोन्याक यूनियन ने कोन्याक स्टूडेंट्स यूनियन और कोन्याक नुपुह शेको खोंग (या कोन्याक महिला संघ) के साथ मिलकर एक संयुक्त समिति बनाई। इसका मकसद था नागालैंड के भीतर और बाहर से लोगों और दूसरे संगठनों की ओर से मिलने वाली राहत सामग्री का समन्वय करना।

कोन्याक स्टूडेंट्स यूनियन के सोशल और कल्चरल सेक्रेटरी एस. कीएंग ओलियांग ने कहा कि यह प्रतिक्रिया सामुदायिक भागीदारी की परंपरा को दर्शाती है। वह कहते हैं, “हमारे समुदाय में मुश्किल वक्त आने पर लोग सरकार का इंतज़ार नहीं करते। वे खुद आगे आते हैं और एक-दूसरे की मदद करते हैं।”

सामुदायिक संगठनों ने प्रभावित लोगों तक चावल, दूध, चीनी, कपड़े, रसोई के बर्तन, दवाइयां और अन्य राहत सामग्री पहुंचाई है। वहीं, सिविल सोसाइटी से मिलने वाली आर्थिक मदद से प्रभावित लोगों की बदलती ज़रूरतों को भी पूरा किया जा सकता है। ओलियांग कहते हैं, “जब लोग अपना सबकुछ खो देते हैं, तो हम उनकी ज़रूरतों की कोई एक सूची नहीं बना सकते। बहुत से लोगों ने अपना घर, कपड़े, अनाज, खेती के औजार और दस्तावेज़ खो दिए हैं। ऐसे में उनके लिए लगभग हर चीज़ ज़रूरी हो जाती है।”

भूस्खलन ने धान के खेतों, झूम के खेतों और चाय व सुपारी जैसी लंबे समय तक उपज देने वाली नकदी फसलों को भी तबाह कर दिया। खेती पर निर्भर परिवारों के लिए नुकसान सिर्फ इस सीज़न की फसल तक सीमित नहीं है। कुछ मामलों में, ऐसी फसलों पर बरसों की मेहनत भी बर्बाद हो चुकी है, जिन्हें तैयार होने में लंबा समय लगता है। कुछ पहाड़ियां पूरी तरह बह गई हैं, जबकि कुछ खेत मलबे और कीचड़ से भर गए हैं। परिवार इस बात को लेकर अनिश्चित हैं कि वे इन खेतों में वापस लौट भी पाएंगे या नहीं, क्योंकि ज़मीन को दोबारा खेती लायक बनाने में कई साल लग सकते हैं।

नागालैंड सरकार ने तत्काल राहत के तौर पर 70 लाख रुपये मंज़ूर किए हैं। वांगजिन का कहना है कि सरकार की इस मदद को तबाही के पैमाने को ध्यान में रखकर देखा जाना चाहिए। वह बताते हैं, “यह रकम सुनने में बड़ी लगती है, लेकिन जिस स्तर पर तबाही हुई है, उसके मुकाबले यह बहुत कम है।”

द बेटर लाइफ फाउंडेशन (टीबीएलएफ) के संस्थापक सेथ्रिकेम सांगतम की संस्था के कर्मचारी मोन में तैनात हैं और जिला आपदा प्रबंधन अधिकारियों के साथ डेटा जुटाने में मदद कर रहे हैं। उनका कहना है, “राहत के काम में लगी किसी भी संस्था, सरकारी निकाय या एजेंसी के लिए यह ज़रूरी है कि वह तात्कालिक राहत से आगे की तैयारी भी करे। हमें राहत योजना को प्रभावित लोगों के नज़रिए से देखना होगा और समझना होगा कि उनके लिए सबसे ज़रूरी क्या है। फिर भले ही हम उसमें से सिर्फ 10 प्रतिशत ही उपलब्ध करा पाएं।”

उन्होंने बताया कि कुछ संगठनों ने अस्थायी आश्रय के लिए तिरपाल देने की पेशकश की है। लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि प्रभावित परिवारों को तिरपाल की ही ज़रूरत हो, क्योंकि जिन परिवारों के घर तबाह हुए हैं, उनमें से ज़्यादातर अपने रिश्तेदारों के यहां या किराए के मकानों में रह रहे हैं। इसके बजाय टीबीएलएफ ने टिन की चादरों की मांग की, क्योंकि इससे ज़्यादा टिकाऊ तरीके से लोगों को दोबारा बसाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, यह ज़रूरत पूरी नहीं हो सकी।

बाढ़ के बाद कीचड़ में सनी चीजों की पानी से सफ़ाई करते लोग_बाढ़
मोन जिले के तिजित से बरामद सामान से कीचड़ साफ करते लोग। | चित्र साभार: कोन्याक स्टूडेंट्स यूनियन

उनके लिए सवाल यह नहीं है कि तत्काल राहत मिल रही है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या यह राहत किसी दीर्घकालिक समाधान की दिशा में योगदान दे रही है?

आपदा की असमान कवरेज

मोन और मोकोकचुंग शहरों में हुई मौतों और राहत-बचाव अभियानों के चलते इन इलाकों पर स्वाभाविक रूप से ज़्यादा ध्यान गया है। लेकिन मोन के वाकचिंग और तिजित इलाकों के गांवों के साथ-साथ लोंगलेंग, तुएनसांग, मेलुरी, मोकोकचुंग, कोहिमा, फेक और दूसरे जिलों के कुछ हिस्सों में भी बड़े पैमाने पर तबाही हुई है।

हालांकि, इन इलाकों से सामने आने वाली रिपोर्टें सीमित रही हैं। इसकी एक वजह नागालैंड में ज़मीनी स्तर पर काम करने की अपनी कुछ मुश्किलें हैं। कई वर्षों से राज्य को कवर कर रहीं पत्रकार रीता क्रोचा ने बताया कि राज्य के अंदर यात्रा का खर्च, खराब सड़कें और संचार व्यवस्था में मौजूद खामियां रिपोर्टिंग के लिए प्रभावित इलाकों तक पहुंचने को मुश्किल बनाती हैं। साथ ही, वहां संवाददाताओं को बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने कहा, “पत्रकार कोहिमा और दीमापुर से बाहर जाकर रिपोर्टिंग करने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह मुश्किल है क्योंकि नागालैंड में सफर करना महंगा है और सड़क तथा संचार का बुनियादी ढांचा भरोसेमंद नहीं है।”

मैरी* ने मौजूदा आपदा के दौरान सामने आई इन कमियों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा, “एक रिपोर्टर के तौर पर आपदा की शुरुआत से ही इसकी रिपोर्टिंग की गई है। भूस्खलन, सड़कों को हुए नुकसान और बाढ़, स्कूलों और घरों की तबाही, लोगों की मौत और प्रभावित परिवारों की कहानियों से जुड़ी तस्वीरें और खबरें सामने आती रही हैं। लेकिन जो चीज़ गायब रही या जिस पर कम रिपोर्टिंग हुई, वह जिला मुख्यालयों से दूर स्थित गांवों पर पड़ा असर था। इसकी वजह यह थी कि वहां संपर्क का कोई ज़रिया नहीं था और उन इलाकों तक पहुंचना भी संभव नहीं था।”

वह आगे कहती हैं, “क्षतिग्रस्त घरों, फसलों, पशुधन या विस्थापित परिवारों की कोई अपडेटेड सूची उपलब्ध नहीं थी। मोन या दूरदराज के गांवों में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौतियां वहां तक पहुंचना और नेटवर्क की समस्या थी। इसकी वजह से तत्काल अपडेट मिलना मुश्किल था और हमें देरी से मिलने वाली सूचनाओं पर निर्भर रहना पड़ता था।” उन्होंने पत्रकारों के लिए उपलब्ध सत्यापित जानकारी की कमी की ओर भी इशारा किया।

उन्होंने कहा, “नुकसान और ज़रूरतों से जुड़ा मौजूदा और सत्यापित डेटा उपलब्ध नहीं था। मीडिया के साथ डीआईडीएमए के संपर्क नंबर भी साझा नहीं किए गए थे, इसलिए हमारे पास ब्लॉक के हिसाब से रिपोर्ट हासिल करने या आंकड़ों की पुष्टि करने के लिए कोई सीधा संपर्क नहीं था। डीआईडीएमए के संपर्क सूत्र उपलब्ध न होने पर मीडिया के लिए औपचारिक तौर पर जानकारी मांगना भी मुश्किल हो जाता है। इसका नतीजा यह हुआ कि रिपोर्टिंग धीमी रही और कई बार ज़मीनी स्तर पर पुष्टि के बजाय दूसरी जगहों से मिली जानकारी पर निर्भर रही।”

राहत के काम में लगी किसी भी संस्था, सरकारी निकाय या एजेंसी के लिए यह ज़रूरी है कि वह तात्कालिक राहत से आगे की तैयारी भी करे।

मन्नो ने नागालैंड से जुड़ी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया कवरेज के संदर्भ में एक बड़ा सवाल भी उठाया—आखिर नागालैंड की कहानी कहने का अधिकार किसके पास है? उनका कहना है कि “नागा लोगों को लेकर मौजूदा नैरेटिव बाहरी लोग तैयार करते हैं, जबकि यह खुद नागा लोगों को तैयार करना चाहिए।” उन्होंने कहा कि जब देश और क्षेत्र में कहीं और होने वाली घटनाएं नागालैंड को देखने के नज़रिए को प्रभावित करने लगती हैं, तब यह समस्या और ज़्यादा साफ दिखाई देती है।

मिसाल के तौर पर, असम में आई बाढ़ के संदर्भ में असम के कुछ सोशल मीडिया यूज़र्स और राजनेताओं ने बाढ़ के लिए नागालैंड में खनन और वनों की कटाई समेत कई वजहों को ज़िम्मेदार ठहराया। उनके मुताबिक, इस मामले में नागालैंड सरकार या दूसरी एजेंसियों की ओर से पर्याप्त प्रतिक्रिया न आना इस बात को उजागर करता है कि नागालैंड के भीतर से अपनी बात रखने वाला कोई मज़बूत नैरेटिव मौजूद नहीं था। वह कहती हैं, “हमें राज्य के भीतर से ऐसी आवाज़ों की ज़रूरत है, जो इस तरह की चर्चाओं में संदर्भ, जटिलता और अलग-अलग नज़रिए जोड़ सकें।”

रीता क्रोचा ने राज्य के भीतर भी स्थानीय मीडिया के कोहिमा और दीमापुर में केंद्रित होने की ओर इशारा किया। उनका कहना है, “अखबार या मीडिया संगठन हर जिले में संवाददाता रखने का खर्च नहीं उठा सकते।” इसके चलते मोन जैसे जिलों से आने वाली कहानियों के लिए लगातार मीडिया कवरेज का हिस्सा बन पाना और मुश्किल हो जाता है।

आपदा के ‘खत्म’ हो जाने के बाद भी समुदायों की मुश्किलें खत्म नहीं होतीं। वे अपनों को खोने, क्षतिग्रस्त सड़कों, स्वास्थ्य और शिक्षा तक बाधित पहुंच, बर्बाद खेतों और घरों से जूझते रहते हैं और आगे होने वाले संभावित नुकसान का खतरा भी बना रहता है।

फिलहाल सवाल तत्काल राहत से कहीं आगे का है: क्या-क्या दर्ज होने से रह गया, कौन से जवाब अभी भी बाक़ी हैं और उन समुदायों का भविष्य क्या होगा, जिनके घर, खेत और सड़कें तबाह हो चुके हैं?

क्योंकि अगर अगले साल फिर ऐसी आपदा आई, तो क्या राज्य उससे निपटने के लिए तैयार होगा?

*गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदले गए हैं।

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लेखक के बारे में

  • कुवेथिलु थुलुओ ने वर्ष 2026 में अशोका यूनिवर्सिटी से यंग इंडिया फेलोशिप पूरी की है। वह नागालैंड की रहने वाली हैं और इससे पहले शिक्षिका के तौर पर काम कर चुकी हैं।
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