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पहली बार मैनेजर बनने पर इन बातों का रखें ध्यान

पहली बार मैनेजर बनना केवल पद बदलना नहीं होता। काम, टीम और ज़िम्मेदारियों को देखने का हमारा तरीका भी बदल जाता है। विकास सेक्टर के मैनेजरों के अनुभवों से जानिए, इस बदलाव में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और उन्हें कैसे संभालें।

फोर्ब्स फाउंडेशन द्वारा समर्थित क्षमता वर्धन (कैपेसिटी बिल्डिंग) पर आधारित सात लेखों की यह श्रृंखला ज़मीनी संस्थाओं के काम के असर को बेहतर बनाने के लिए ज़रूरी बातों पर ध्यान देती है। इसका उद्देश्य संस्थाओं और उनसे जुड़े लोगों को ऐसी आसान और उपयोगी जानकारी देना है, जिससे वे अपने नेतृत्व, अंदरूनी व्यवस्थाओं, काम करने के तरीकों और संसाधनों को बेहतर बना सकें।

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“नई भूमिका में आने के बाद मेरे लिए सबसे बड़ा बदलाव यह था कि जो समय पहले फील्ड और कम्युनिटी के साथ बीतता था, मैनेजर के रोल में आने पर रूटीन पूरा बदल गया। मीटिंग, प्लानिंग, रिव्यू कॉल, रिपोर्टिंग करना और टीम को साथ लेकर चलना होता था। लेकिन उस समय मुझे बिल्कुल भी समझ नहीं आ रहा था कि इतना सब एक साथ कैसे हैंडल करूं। कभी-कभी लगता था कि पूरा दिन निकल गया, लेकिन मैंने कुछ नहीं किया।” यह कहना है नेटवर्क फॉर यूथ डेवलपमेंट एंड हेल्दी एनवॉयरमेंट (निधि) में सीनियर मैनेजर बिराज कृष्ण उपाध्याय का, जब वह पहली बार मैनेजर बने। 

अगर आप भी पहली बार मैनेजर बने हैं, तो शायद आपको भी ऐसा महसूस हुआ हो। काम बांटना, फीडबैक देना, प्राथमिकताएं तय करना और अपने फैसलों की जवाबदेही लेना — ये सब एक साथ नए मैनेजर की भूमिका का हिस्सा बन जाते हैं। 

दरअसल विकास सेक्टर में कई लोग अपने फील्ड या प्रोग्राम से जुड़े अनुभव के आधार पर मैनेजर की भूमिका में आते हैं। वहीं, कुछ नई संस्था में आते ही मैनेजर की ज़िम्मेदारी संभाल लेते हैं। दोनों ही स्थितियों में आपसे यह अपेक्षा होती है कि आप पुरानी कार्यशैली से आगे बढ़ें और नए तरह के काम और कौशल सीखें। 

कई नए मैनेजर पुरानी भूमिका की ज़िम्मेदारियां भी संभालते रहते हैं और नई भूमिका की अपेक्षाएं भी पूरी करते हैं। इससे वे खुद काम के बोझ में फंस जाते हैं और टीम में जिम्मेदारियों का बंटवारा ठीक तरह से नहीं कर पाते हैं। 

मैनेजर बनते ही केवल काम नहीं बदलता 

पहली बार मैनेजर बनने पर केवल ज़िम्मेदारियां नहीं बढ़तीं, काम करने का तरीका भी बदलता है। 

नए मैनेजर की भूमिका का केंद्र पूरी तरह खुद पर न रहकर इस पर आ जाता है कि पूरी टीम मिलकर क्या कर रही है। छोटी संस्थाओं में यह बदलाव और जटिल हो जाता है, जहां अलग-अलग कामों के लिए अलग टीमें या विभाग नहीं होते हैं। वहां मैनेजर को अपनी मुख्य ज़िम्मेदारियों के अलावा कई दूसरे काम भी संभालने पड़ सकते हैं। जैसे एमआईएस, प्रोग्राम की ट्रैकिंग करना, रिपोर्ट तैयार करना, कम्युनिकेशन, डिज़ाइनिंग, प्लानिंग और प्रोजेक्ट के लिए नए सिस्टम तैयार करना आदि। 

इस पर बिराज उपाध्याय का कहना है, “डेस्क पर काम करते हुए शुरुआत में रिपोर्टिंग को लेकर काफी उलझन हुई। एक्टिविटीज़ और एमआईएस संभालना भी मेरी ही ज़िम्मेदारी में आया। मेरे लिए यह बड़ी चुनौती थी क्योंकि इससे पहले मेरे पास इन कामों को करने का कोई अनुभव नहीं था। मैं जिस प्रोजेक्ट को लीड कर रहा था वह अप्रूवल के बाद मेरे पास आया तो उसे डिज़ाइन करना, डेवलप करना, ट्रैक करना, ये सब मुझे ही करना पड़ा। नई भूमिका में आने के साथ-साथ मैंने ये सारे काम भी धीरे-धीरे खुद ही सीखे।”

लेकिन बदलाव केवल कामों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं होता। आपको काम खुद करने के बजाय यह तय करना होता है कि कौन-सा काम किसे सौंपना है, कितना सहयोग देना है और कब खुद आगे बढ़कर ज़िम्मेदारी संभालनी है।

इस बारे में प्रवाह में टीम लीड नयनिका दास का कहना है, “बदलाव काम बांटने तक का नहीं, बल्कि उसको देखने के तरीके का भी था। पहले मेरी भूमिका यह थी कि मैं लोगों को सुनूं कि हम क्या डिस्कस कर रहे हैं और फिर उसको एक स्ट्रक्चर दूं। लेकिन अब मेरा काम दूसरे व्यक्ति को बताना था कि यह ठीक भी है या नहीं। इसे प्रोसेस करने में भी दिक्कतें आईं। और किसी के काम को रिव्यू करने की भी एक सीमा होती है। पूरा समय फीडबैक में जाता है, जिसे आप धीरे-धीरे अपनाते हैं। वरना काम को लेकर यह भाव रहता है कि मैं खुद ही कर लेती। इतना ही नहीं, मैं शुरुआत में फीडबैक देने में भी पीछे रही।”

एक कमरे में बैठकर कोई दस्तावेज पढ़ते कुछ कर्मचारी_मैनेजर
नए मैनेजर की भूमिका का केंद्र पूरी तरह खुद पर न रहकर इस पर आ जाता है कि पूरी टीम मिलकर क्या कर रही है। | चित्र साभारः फ्लिकर

अक्सर ये बदलाव एक नए मैनेजर के लिए इसलिए भी मुश्किल हो सकते हैं क्योंकि अपनी विशेषज्ञता से अपने काम को ठीक से करना एक अलग बात होती है। मगर दूसरे के काम को बेहतर बनाने में उसकी मदद करने के लिए अलग तरह के कौशलों की ज़रूरत होती है।

पुराने रिश्तों के बीच नई भूमिका बनाना

अगर आप अपनी संस्था में नए-नए मैनेजर बने हैं, तो बदलाव केवल काम में नहीं, रिश्तों में भी आता है। कल तक जो लोग आपके साथियों की तरह काम कर रहे थे, अब आपको उन्हें काम देना होता है, प्राथमिकताएं तय करनी होती हैं, फीडबैक देना होता है और काम की समीक्षा करनी होती है। ऐसे में पुरानी सहजता और नई ज़िम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना भी एक चुनौती हो सकती है। टीम आपसे पहले जैसी सहजता की उम्मीद कर सकती है, जबकि संस्था आपसे अधिक रणनीतिक भूमिका निभाने और फैसले लेने की अपेक्षा कर सकती है।

इस बारे में प्रोजेक्ट पोटेंशियल ट्रस्ट में प्रोग्राम मैनेजर के पद पर काम कर चुके प्रेमचंद अपने अनुभव को साझा करते हुए बताते हैं, “जब मेरा अपनी एक पुरानी संस्था में प्रमोशन हुआ, तो टीम में कुछ लोग समझते थे कि संस्था में काम करते हुए मुझे लंबा समय हो गया है, इसलिए मेरा दबदबा ज़्यादा है। वहीं, वर्तमान की संस्था के साथ जब मैं मैनेजर के तौर पर जुड़ा, तो टीम का एक नज़रिया यह था कि ये तो अभी नए-नए आए हैं, इनको तो सीखने में वक्त लगेगा। तो भूमिका बदलने पर इस तरह की चीज़ों का भी अनुभव करना पड़ता है।” 

यहां एक और ध्यान देने वाली बात यह है कि मैनेजर का अधिकार केवल उसके पद से तय नहीं होता है। टीम के सदस्य मैनेजर के फीडबैक और नेतृत्व को किस तरह से लेंगे इसमें उम्र, जेंडर और दूसरी सामाजिक पहचानें भी भूमिका निभा सकती हैं। 2024 में एकेडमी ऑफ मैनजमेंट प्रोसीडिंग में प्रकाशित शोध के मुताबिक़ मैनेजर की उम्र और जेंडर का असर इस बात पर पड़ सकता है कि टीम के सदस्य उनके फीडबैक को किस तरह स्वीकार करते हैं। इसलिए एक नए मैनेजर के लिए टीम के अलग-अलग सामाजिक और व्यक्तिगत अनुभवों को समझना और उनका ध्यान रखना ज़रूरी होता है।

मैनेजर बनने के बाद: तुरंत क्या न करें 

जब आपको मैनेजर बने कुछ ही समय हुआ होता है, तो सब कुछ नया होता है। ऐसे में काम को पूरा करने के लिए कुछ आसान रास्ते अपनाना स्वाभाविक है। जैसे, हर काम खुद कर लेना, टीम के काम में बार-बार दखल देना या काम सौंपकर पूरी तरह अलग हट जाना। लेकिन आगे चलकर ये तरीके टीम और आपके लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं।

सेंटर फॉर क्रिएटिव लीडरशीप की रिसर्च बताती है कि नए मैनेजर के सामने सबसे आम चुनौतियों में बढ़े हुए काम के भार को संतुलित करना, टीम के काम की ज़िम्मेदारी लेना और काम के बंटवारे के साथ भरोसा बनाना शामिल होता है। पहली बार मैनेजर बने 26% लोगों का लगता था कि शुरुआत में दूसरों का नेतृत्व करने के लिए वे तैयार ही नहीं थे।

इसलिए शुरुआत में यह समझना ज़रूरी है कि कहां आपको खुद आगे बढ़कर ज़िम्मेदारी लेनी है, कहां टीम को ज़िम्मेदारी देनी है और कहां सिर्फ काम पर नज़र रखनी है।

1. सारा काम खुद न करें: जब टीम से अपेक्षित नतीजे नहीं मिलते है तो ऐसे में हर काम अपने हाथ में ले लेना आपको आसान लग सकता है। लेकिन इससे टीम की ज़िम्मेदारी लेने और सीखने की गुंजाइश कम होती है। आपको यह समझना ज़रूरी है कि टीम को किस तरह का सहयोग देना है। 

प्रोजेक्ट पोटेंशियल ट्रस्ट में ऑपरेशनल मैनेजर राज किशोर कहते हैं, “शुरुआत में एक आसान रास्ता यह लगता है कि टीम को बार-बार समझाने या काम को मॉनिटर करने के बजाय खुद कर लें। इस तरह की आदत धीरे-धीरे हर छोटे-बड़े काम में आपको उलझा देती है। इसका छिपा पहलू यह भी है कि धीरे-धीरे टीम पर भरोसा करने के बजाय हर काम खुद करने की आदत बन जाती है।” 

2. माइक्रो मैनेजमेंट से बचें: काम सौंपने के बाद लोगों के हर फैसले और उनके हर छोटे-बड़े काम पर लगातार नज़र रखना टीम की स्वतंत्रता और भरोसे दोनों को प्रभावित कर सकता है। टीम को स्वतंत्रता देने का मतलब यह नहीं है कि आप पूरी तरह पीछे हट जाएं, बल्कि इसका मतलब यह है कि आप हर छोटे फैसले को अपने हाथ में लेने से बचें।

3. काम सौंपकर निश्चिंत न हो जाएं: काम सौंपने के बाद उसकी प्रगति पर नज़र रखना ज़रूरी है, ताकि ज़रूरत पड़ने पर समय रहते टीम की मदद की जा सके और आखिरी समय में काम खुद संभालने की नौबत न आए। 

इस पर बिराज का कहना है, “जब आप काम देते हो और वह मन के अनुसार नहीं होता तो फ्रस्ट्रेशन होता है। साथ ही सोचना पड़ता है, फोर्स करना पड़ता है, हैंड होल्डिंग भी करनी पड़ती है और सपोर्ट भी देना पड़ता है। जैसे, कुछ काम फील्ड में हैंडल नहीं हो पा रहा है, तो फील्ड पर जाना पड़ता है। वहां जाकर कौशल विकसित करना पड़ता है और मिल-जुलकर आगे बढ़ना होता है।”

इन स्थितियों के बीच संतुलन बनाना ही नए मैनेजर की भूमिका का एक अहम हिस्सा होता है। 

नई भूमिका को संभालने के लिए क्या करें? 

इस बदलाव को संभालने के लिए कुछ तरीके ऐसे हैं जो आपकी मदद कर सकते हैं:

  1. अपने काम की प्लानिंग करें: मैनेजर बनने के बाद आपके पास पहले से ज़्यादा काम होंगे, इसलिए हर काम का तुरंत पूरा हो पाना संभव नहीं होगा। अपने प्रोग्राम और हफ्ते के हिसाब से प्राथमिकताएं तय करें। पहले से ही यह तय करें कि किन कामों में आपको खुद समय देना होगा और कहां टीम के साथ मिलकर आगे बढ़ना होगा। इससे अचानक आने वाले दूसरे कामों की वजह से ज़रूरी काम नहीं छूटेंगे। 
  2. सुनें और काम की दिशा स्पष्ट करें: लोगों को मैनेज करने की शुरुआत उन्हें निर्देश देने से नहीं, बल्कि उनकी राय और समझ को जानने से करें। किसी काम का तरीका तय करने से पहले टीम के सुझाव और उससे जुड़ी दिक्कतें सुनें। काम देते समय स्पष्ट करें कि उसका नतीजा क्या होना चाहिए, समय-सीमा क्या है और टीम अपने स्तर पर कौन से फैसले ले सकती है। इससे बातचीत एकतरफा निर्देश देने तक सीमित न होकर दोतरफा संवाद बन पाती है और टीम के हर सदस्य की ज़िम्मेदारी भी स्पष्ट रहती है। 
  3. टीम की क्षमता से जुड़ी असली समस्या पहचानें: अगर काम उम्मीद के मुताबिक नहीं हो रहा हो, तो पहले इसकी वजह समझें। क्या काम बहुत ज़्यादा है? क्या लोगों या काम की प्रक्रिया से जुड़ी कोई समस्या है? क्या टीम को किसी तरह की ट्रेनिंग की ज़रूरत है? वजह को समझे बिना केवल व्यक्ति की क्षमता पर सवाल उठाना ठीक नहीं है, बल्कि समस्या को समझकर हल निकालना आपके काम का हिस्सा होता है।
  4. गलतियों की गुंजाइश रखें: अगर टीम के किसी सदस्य से कोई गलती हो जाती है या कोई योजना असफल हो जाती है, तो तुरंत काम अपने हाथ में लेना सबसे आसान प्रतिक्रिया हो सकती है। गलतियों की गुंजाइश रखने का मतलब गुणवत्ता या जवाबदेही से समझौता करना कतई नहीं है। गलतियों को सुधारने और टीम को उनसे सीखने का मौका दें। 
  5. समस्या आने पर हार न मानें: किसी योजना के असफल होने का मतलब यह नहीं है कि आपको वहीं रुक जाना है। समाधान निकालने के लिए धैर्य रखना ज़रूरी है। यहां प्रेमचंद अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं, “अगर प्लान ‘ए’ काम नहीं कर रहा है, तो प्लान ‘बी’ आज़माकर देखिए। प्लान ‘बी’ भी काम नहीं कर रहा है तो ‘सी’ खोजिए। एकदम से किसी चीज़ को छोड़ना नहीं है।” उनके मुताबिक ज़रूरत पड़ने पर अपनी टीम के सीनियर सदस्यों से सलाह लेना और बातचीत करना भी समस्या सुलझाने का एक तरीका हो सकता है।
  6. सहयोग का माहौल बनाएं: टीम में ऐसा माहौल बनाएं जहां लोग बिना झिझक सवाल पूछ सकें, अपनी बात रख सकें और ज़रूरत पड़ने पर मदद मांग सकें। इसके लिए बतौर मैनजेर पहल आपको करनी होगी। इस पर अपने एक प्रयोग के बारे में प्रेमचंद्र बताते हैं, “टीम में सहज माहौल बनाने के लिए हमने ऑफिस में चाय का चार्ट बनाया है। इसके अनुसार हर दिन टीम के किसी सदस्य की चाय बनाने की बारी होती है और इसमें मैनेजर समेत सभी के नाम शामिल हैं। जो जैसी चाय बनाए, सबको उसे स्वीकार करना होता है। इस तरह की गतिविधि टीम में बराबरी और सहयोग की भावना को मज़बूत करती है।” 

अगर आप भी मैनेजर के तौर पर इस तरह की स्थितियों का सामना कर रहे हैं, तो बदलाव की शुरुआत किसी बड़े फैसले से नहीं, बल्कि अगले काम से ही हो सकती है। अगली बार टीम का कोई काम आपके पास आए, तो खुद से यह सवाल पूछिए कि क्या यह काम सचमुच मुझे ही करना है? अगर जवाब नहीं है, तो उसे टीम में भेजें। मैनेजर की भूमिका में आने की शुरुआत यहीं से हो सकती है। 

इस लेख में प्रस्तुत विचार नेटवर्क फॉर यूथ डेवलपमेंट एंड हेल्दी एनवॉयरमेंट (निधि) के बिराज कृष्ण उपाध्याय, प्रवाह संस्था की नयनिका दास, प्रोजेक्ट पोटेंशियल ट्रस्ट के राज किशोर और प्रेमचंद के साथ हुई बातचीत और उनके साझा अनुभवों पर आधारित हैं।

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  • पढ़ें, विकास सेक्टर में नेतृत्व परिवर्तन: कब, क्यों और कैसे?
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लेखक के बारे में

  • पूजा राठी आईडीआर हिंदी में संपादकीय विश्लेषक (एडिटोरियल एनालिस्ट) हैं। इससे पहले, उन्होंने फेमिनिज़्म इन इंडिया में सह-संपादक के रूप में काम किया है, जहां उन्होंने जेंडर, पर्यावरण और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को कवर किया। पूजा को यूएन लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित किया गया है और वह 2024 की लाडली मीडिया फैलो भी रह चुकी हैं। इसके अलावा, वह खबर लहरिया की रूरल मीडिया फेलोशिप और एटलस फॉर बिहेवियर चेंज इन डेवलपमेंट की बिहेवियरल जर्नलिज़्म फेलोशिप की पूर्व फेलो रह चुकी हैं। पूजा ने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है।
  • तेजस पहलाजानी इक्विस्ट के फाउंडर हैं। उन्हें टेक महिंद्रा, दसरा, सत्व कंसल्टिंग और कॉग्निजेंट सहित कॉर्पोरेट तथा विकास सेक्टर में काम करने का लगभग 16 वर्षों का अनुभव है। तेजस, इक्विस्ट में व्यक्तिगत और टीम प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए संगठनों को कोचिंग प्रदान करते है। उनके पास कंप्यूटर इंजीनियरिंग में बीई और इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस से एमबीए की डिग्री है।

फोर्ब्स फाउंडेशन द्वारा समर्थित क्षमता वर्धन (कैपेसिटी बिल्डिंग) पर आधारित सात लेखों की यह श्रृंखला ज़मीनी संस्थाओं के काम के असर को बेहतर बनाने के लिए ज़रूरी बातों पर ध्यान देती है। इसका उद्देश्य संस्थाओं और उनसे जुड़े लोगों को ऐसी आसान और उपयोगी जानकारी देना है, जिससे वे अपने नेतृत्व, अंदरूनी व्यवस्थाओं, काम करने के तरीकों और संसाधनों को बेहतर बना सकें।

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