हल्का-फुल्का

शिक्षक दिवस की बधाई मिली क्या?

शिक्षक दिवस पर, एक शिक्षक की डायरी- सम्मान और जश्न के बीच वह सब, जो अक्सर अनकहा रह जाता है। इसके सभी पात्र काल्पनिक हैं भी और नहीं भी।

प्रधानाचार्य ने स्टाफ मीटिंग में घोषणा की, “इस बार शिक्षक दिवस पूरी तरह से शिक्षकों के नाम रहेगा।” सुनकर मुझे राहत मिली। लगा, शायद इस बार कोई एक्स्ट्रा काम नहीं मिलेगा। लेकिन अगले ही पल सच्चाई से सामना हुआ—मंच सजाना, बच्चों को भाषण याद करवाना, मुख्य अतिथि का परिचय लिखना, स्वागत गीत तैयार करवाना, मिठाई बांटना और फिर रिपोर्ट बनाना।

मैंने हिम्मत जुटाकर पूछा, “सर…इस लिस्ट में शिक्षक कहां हैं?” प्रधानाचार्य ने तपाक से कहा, “आप ही तो शिक्षक हैं! अब आपको अलग से ढूंढना पड़ेगा?” यह सुनकर मेरे ज्ञान चक्षु खुले।

कार्यक्रम की सुबह स्टाफ ग्रुप पर मैसेज आया—“शिक्षक दिवस की बधाई हो। आप हमारे असल योद्धा हैं। कृपया सभी लोग समय से पहले विद्यालय पहुंचें।”

स्कूल गेट पर पहुंचा तो सम्मान की शुरुआत काम से हुई। चौकीदार बोला, “सर, ये कुर्सियां अंदर रखवा दीजिए।” अंदर पहुंचा तो एक बच्चे ने पूछा, “सर, आज पढ़ाई नहीं होगी?”

“नहीं, आज शिक्षक दिवस है।”

“तो आज शिक्षक पढ़ाएंगे नहीं?”

“नहीं।”

“तो फिर क्या करेंगे?”

मैं सोच में पड़ गया और मुस्कुराकर वहां से दूसरी तरफ निकल गया। कुछ ही देर बाद विधायक जी चीफ गेस्ट बनकर पधारे। उन्होंने भाषण दिया, “शिक्षक राष्ट्र की रीढ़ हैं।” सबने तालियां पीटी। मैंने सोचा—अगर रीढ़ की हड्डी का इलाज करवाना हो, तो अस्पताल जाना होगा या स्कूल?

धूप में किसी को इशारे से पुकारता एक आदमी_शिक्षक दिवस
प्रधानाचार्य ने स्टाफ मीटिंग में घोषणा की थी कि इस बार शिक्षक दिवस पूरी तरह से शिक्षकों के नाम रहेगा। | चित्र साभार: पेक्सेल्स

इसके बाद माइक पर पांचवी कक्षा के सोनू की बारी थी। शिक्षक दिवस के पावन महोत्सव पर सोनू को स्टाफ रूम के बाहर शिक्षकों की नकल उतारते देखा जा चुका था। उसे भाषण थमाते हुए मैंने साफ हिदायत दी थी, “इसे अच्छे से घोंट ले सोनू। वरना लड्डू आधा ही मिलेगा!” तब सोनू ने ऐसे सिर हिलाया, जैसे पूरी जनसभा उसी के कंधों पर टिकी हो। लेकिन जैसे ही माइक के सामने पहुंचा, अर्थ का अनर्थ हो गया।

पहले विधायक जी को देखा…फिर मुझे…फिर विधायक जी को…और बोला, “आदरणीय… वि… वि… विलायक जी…”

मैंने दूर से होंठ हिलाकर कहा, “विधायक!”

सोनू ने दोबारा कोशिश की, “आदरणीय विलायक जी…”

मैंने सर पकड़ लिया। इतने में एक साथी ने याद दिलाया कि पिछली बार भी एक बच्चा भाषण में बोल रहा था कि गणतंत्र दिवस वह दिन है, जब गांधीजी ने अंग्रेज़ों से पकौड़े छीन लिए थे।

सोनू ने आगे बढ़ते हुए ऐलान किया, “शिक्षक राष्ट्र की नींद होते हैं।”

मैंने तुरंत टोका, “नींव!”

लेकिन अब तक सोनू का भाषण ऑडिट में बदल चुका था। उसमें आत्मविश्वास झलक रहा था। वह गरजा, “शिक्षक हमें समय का महत्व बताते हैं।” यह सुनते ही मुझे याद आया कि मैं सुबह 40 मिनट देर से पहुंचा था।

कार्यक्रम समाप्त हुआ। विधायक जी ने तस्वीरें खिंचवाई, हाथ जोड़े और रवाना हो गए। सोनू मेरे पास आया और बोला, “सर, विलायक जी हमारे टीचर नहीं बनेंगे?”

“नहीं, वह बस चीफ गेस्ट हैं।”

“तो चीप गेस्ट क्या करते हैं?”

“बड़ी-बड़ी बातें।”

“टीचर की तरह, सर?”

मुझे जवाब नहीं सूझा। फिर मुझे प्रधानाचार्य की बात याद आई—“इस बार शिक्षक दिवस पूरी तरह से शिक्षकों के नाम रहेगा।”

बात सही थी। पूरा दिवस हमारे ही नाम तो लिखा गया था। वाटर कूलर ड्यूटी, स्टाफ रूम ड्यूटी, नोटिस बोर्ड ड्यूटी, असेंबली ड्यूटी, टॉयलेट ड्यूटी, स्टेज ड्यूटी, समोसा ड्यूटी, लड्डू ड्यूटी, कोई-बच्चा-नाक-में-हाथ-नहीं-डालेगा ड्यूटी वग़ैरह वग़ैरह…

मुझे मंच के सामने खड़ा किया गया था। सोनू पीछे था। विधायक जी आगे। बैनर ठीक मेरे सामने।

शाम को तस्वीरें देखी तो पता चला मैं ड्यूटी पर आधा हाज़िर पाया गाया। एक फ़ोटो में सिर्फ़ कंधा दिखा, एक में बाल, एक में पीठ। बाकी शायद विधायक जी की माला के फूलों ने कवर कर दिया था।

मैंने खुद को दिलासा दिया, “अगली बार मंच के बीच में आने की तैयारी नए सिरे से की जाएगी।”

लेखक के बारे में

  • इंद्रेश शर्मा आईडीआर हिंदी में पार्टनरशिप और आउटरीच हेड हैं। वे संगठन की पहुंच बढ़ाने और असरदार साझेदारी बनाने के लिए विकास सेक्टर से जुड़े विभिन्न हितधारकों के साथ मिलकर काम करते हैं। इन्द्रेश संस्थागत सहयोग को मजबूत करने के साथ-साथ जमीनी संगठनों के लिए कैपेसिटी बिल्डिंग से जुड़े लेखन में भी सक्रिय रूप से योगदान देते हैं। उनके पास विकास सेक्टर में 13 वर्षों से अधिक का पेशेवर अनुभव है। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता, ग्रामीण विकास और पंचायती राज जैसे क्षेत्रों में काम किया है। इससे पहले वे प्रथम और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च संस्थाओं से जुड़े रहे हैं, जहां उन्होंने रिसर्च, कार्यक्रम निर्माण और प्रशिक्षण जैसे कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई है।
  • ​​कुमार उन्नयन ​​आईडीआर​​ में सीनियर एडिटोरियल एसोसिएट के रूप में कार्यरत हैं। वे नियमित रूप से भाषा और समुदाय से जुड़े विषयों पर काम करते रहे हैं। इस दौरान उन्होंने मौखिक इतिहास शोध, फील्ड पत्रकारिता, लेखन और अनुवाद जैसे क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई है। ​​आईडीआर​​ से पहले वह सेंटर फॉर कम्युनिटी नॉलेज, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एशियन स्टडीज़, नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी, कथा और द कारवां जैसे संस्थानों से जुड़े रहे हैं। उन्होंने साहित्य में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है और मौखिक इतिहास में प्रशिक्षित हैं।​