बात वर्ष 1983 की है। उस समय मैं और मेरे साथी गुजरात के गोलाना गांव में स्थानीय दलित समुदाय के लोगों के साथ काम कर रहे थे। मैं वहां की स्थानीय सहकारी समिति का सचिव था। उन लोगों को भूमि-सुधार कानून के तहत करीब 33 एकड़ ज़मीन आवंटित की गई थी, लेकिन सवर्ण जातियों के दबंग उन्हें उस ज़मीन पर अधिकार नहीं जताने दे रहे थे। हमारा मानना था कि अगर ज़मीन उनके नाम पर है, तो उन्हें कानूनन उस पर काबिज़ होने का अधिकार मिलना चाहिए। हमने पंचायत कार्यालय में दो लोगों को भेजा और उस ज़मीन के मालिकों को भी बुलाया। समुदाय के लोगों ने उनसे कहा, “हमने आपकी ज़मीन नहीं छीनी है। यह वही ज़मीन है जो सरकार ने हमें दी है। अगर ज़मीन हमारे नाम पर है, तो हमें उसका इस्तेमाल करने का हक है।” लेकिन उन्होंने किसी की एक नहीं सुनी और हमारे लोगों को वहां से भगा दिया।
इसके बाद मैंने स्थानीय ज़मींदारों को यह कहते हुए एक पत्र लिखा कि “चूंकि आप हमारी बात सुनने और हमसे बातचीत करने के लिए तैयार नहीं हैं, इसलिए हम अगले सप्ताह एक तय दिन सुबह दस बजे आएंगे और ज़मीन को अपने नाम करने की प्रक्रिया शुरू कर देंगे।” मैं तय किए गए दिन से एक रात पहले गांव पहुंचा, जहां मेरे साथ करीब 100 दलित परिवार और भी थे। अगली सुबह जब मैं उठा और बाहर आया, तो देखा कि तकरीबन सभी घरों में बुज़ुर्गों और बच्चों को छोड़कर कोई मौजूद नहीं था। जब मैंने इसका कारण पूछा, तो मुझे बताया गया कि उस सुबह सभी पुरुषों को कोई ज़रूरी काम था। मुझे समझ आ आया कि रात में ही सबको यह धमकी दी गई होगी कि “जो भी ज़मीन पर आया, वह सलामत घर वापस नहीं लौटेगा।”
मैं वहां सड़क के बीचों-बीच अकेला खड़ा था और सोच रहा था कि अब क्या करूं? मैंने खुद से कहा, “देखो मार्टिन, अगर तुममें हिम्मत नहीं है, तो बेहतर है कि घर लौट जाओ, फिल्में देखो और कोई सरकारी नौकरी कर लो। या फिर जो करने के लिए तुम यहां आए हो, उसे पूरा करो। जिस बात पर तुम्हारा विश्वास है, उसके लिए खड़े रहो।” मैंने अकेले ही ज़मीन पर जाने का फैसला किया। हालांकि वह ज़मीन मेरी नहीं थी, लेकिन पत्र मैंने ही लिखा था। मेरे साथ सहकारी समिति का एक अकाउंटेंट और एक ड्राइवर भी था। वे दोनों भी बाहर के लोग थे। हम ट्रैक्टर लेकर ज़मीन पर गए। वहां करीब 20 लोग हाथों में लाठियां लिए खड़े थे। मैं ट्रैक्टर से उतरा और कहा, “ज़मीन जोतना शुरू करो।” जल्द ही वे एक-एक कर वहां से हटने लगे। उन्हें समझ आ गया था कि हम ज़मीन पर टिके रहने के अपने फैसले पर अडिग हैं। उस दिन हमने उस ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया। उस ज़मीन पर, जो कानूनी तौर पर हमारी ही थी।
ज़िंदगी का पहला सबक
जब हम गांव वापस लौटे, तो देखा कि दलित समुदाय के सभी लोग वहां खड़े थे और छिपकर सब कुछ देख रहे थे। उस दिन मुझे समझ आया कि आपका सबसे बड़ा दुश्मन आपकी जाति या धर्म नहीं, बल्कि आपका अपना डर होता है। यह बात मैंने 40 वर्ष पहले गोलाना के दलित आंदोलन में सीखी थी और उसके बाद से आज तक इसे लगातार देखता आ रहा हूं। हमें अक्सर आगे बढ़ने से जो चीज़ रोकती है, वह है यह डर कि पता नहीं आगे क्या होगा।
पिछले महीने शिक्षा सुधारों को लेकर हुए युवाओं के विरोध प्रदर्शनों ने भी यह दिखाया कि अपने डर पर काबू पाकर लोग क्या कुछ कर सकते हैं। युवाओं ने दिखा दिया कि उन्होंने डरना छोड़ दिया है। वे जंतर-मंतर पर, देशभर की सड़कों पर एकजुट होकर खड़े हुए और सत्ता पर काबिज लोगों को स्पष्ट संदेश दिया कि ‘आप चाहे कितने भी ताकतवर क्यों न हों, हमें आपसे डर नहीं लगता। हमें कानून और संविधान पर भरोसा है। सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन हमारे मौलिक अधिकार बने रहेंगे, हमारा संविधान बना रहेगा।’
हम किसके साथ हैं?
पिछले साढ़े चार दशकों में मैंने हर उम्र के लोगों के साथ काम किया है। इस दौरान मैंने जाना कि अमूमन बच्चों में कोई डर नहीं होता। लेकिन जैसे-जैसे हम वयस्क होते हैं और सामाजिक रूप से परिपक्व होने लगते हैं, हमारा डर भी बढ़ता जाता है। जब हम डरे हुए होते हैं, तो हमारे लिए अपना पक्ष तय करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए शायद हम सभी को खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि हम कहाँ खड़े हैं?
मैंने वर्ष 1989 में नवसर्जन नाम की संस्था की शुरुआत की थी। यह संस्था देशभर में, खासकर गुजरात में, छुआछूत की प्रथा के खिलाफ काम करने के लिए जानी जाती है। इसलिए जब वर्ष 2016 में हमारा एफसीआरए लाइसेंस रद्द हुआ, तो यह कोई हैरानी की बात नहीं थी। उसी समय, तीस्ता सीतलवाड़ के सबरंग ट्रस्ट समेत कुछ अन्य संस्थाओं के एफसीआरए पंजीकरण भी रद्द किए गए थे। यह वह शुरुआती दौर था जब सरकार मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के लिए काम करने वाली संस्थाओं की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए एफसीआरए कानून का इस्तेमाल कर रही थी।
उपरोक्त घटनाओं से सबक लेते हुए नवसर्जन ट्रस्ट और दलित शक्ति केन्द्र (हाशिए पर रहने वाले युवाओं के लिए एक व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र) में हमने यह रुख अपनाया है। हम सरकार से कहते हैं, “आप हमारा लाइसेंस ले सकते हैं, हमारे दफ्तर बंद करवा सकते हैं या जो करना चाहें कर सकते हैं। लेकिन हम यहां रहकर अपना काम जारी रखेंगे।”


हमने यह संगठन इसलिए शुरू नहीं किया था कि हमारे पास एफसीआरए, 12ए और 80जी था। हमने इसे इसलिए शुरू किया क्योंकि समाज में दलितों के साथ छुआछूत का व्यापक चलन, दमनकारी हिंसा और अत्याचार आम हैं। इन सामाजिक कुरीतियों को ख़त्म करना हमारे जीवन का उद्देश्य है। फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे पास लाइसेंस हैया नहीं, या संगठन बना रहेगाया नहीं। मसलन, फिलहाल आयकर विभाग के साथ हमारा एक मामला चल रहा है। उन्होंने हमारा 80जी रद्द कर दिया है और अब वे हमारा 12ए भी वापस लेना चाहते हैं।
सामाजिक काम की निजी कीमत
सामाजिक क्षेत्र में इतने लंबे समय तक काम करने के बाद अब हमारी देश में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी पहचान बन गई है। मेरे दोस्तों और शुभचिंतकों का एक बड़ा नेटवर्क है। इसलिए जब हमारा एफसीआरए रद्द हुआ, तो इस खबर को भारतीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में काफी जगह मिली। फिर भी इनमें से किसी ने मुझसे संपर्क नहीं किया। कुछ दोस्तों के फोन ज़रूर आए, लेकिन उनके अलावा किसी और ने मुझसे बात नहीं की।
यह मेरे लिए बेहद निराशाजनक था, क्योंकि मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी इसी काम में लगाई है। मैंने खुद से कहा, “तुमने इतनी बार सत्ता के सामने खड़े होकर उसका सामना किया है और यह कभी आसान नहीं रहा। फिर भी, जब तुम्हारे लिए खड़े होने की ज़रूरत थी, तो बहुत कम लोग तुम्हारे साथ आए।” कई बार ऐसे अनुभव आपको बहुत अकेला कर देते हैं। मौजूदा राजनीतिक माहौल में बहुत से लोग डर के कारण पीछे हट गए हैं और कई लोग आगे भी पीछे हटते जाएंगे। वहीं, आप पूरी ताकत के साथ अपनी लड़ाई लड़ते रहते हैं। ऐसे में आपका समाज में अलग-थलग पड़ जाना काफी हद तक तय होता है — समुदाय से ही नहीं, बल्कि अपने साथ काम करने वाले लोगों और दोस्तों से भी। अपनी ज़िंदगी में मुझे पहली बार ऐसा महसूस हो रहा कि मैं एक अछूत हूं। यह दर्दनाक है, लेकिन सच भी यही है। बुद्ध के शब्दों में कहें तो “यह आपकी लड़ाई है। आप किसी और की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं। इसलिए आपको खुद तय करना होगा कि आपको क्या करना है।”
बाबासाहेब आंबेडकर ने संविधान छिपकर नहीं लिखा था। उन्होंने इसे सबके सामने लिखा, ताकि हर कोई इसे देख सके और इसकी आलोचना भी कर सके। उन्होंने ऐसा संविधान बनाया, जो 3000 साल पुरानी जाति व्यवस्था की सोच और दमनकारी प्रथाओं के खिलाफ खड़ा था। और उन्होंने यह रुख खुले तौर पर अपनाया। इससे मुझे सबक मिला कि लोगों के साथ किया जाने वाला हर काम सार्वजनिक होना चाहिए।
आज हमारे सेक्टर में लोग अपनी चुप्पी को भी एक रणनीति बताते हैं। वे सोचते हैं कि काम इस तरह किया जाए कि गुजराती कहावत के अनुसार, “सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।” यानी हर कदम के फायदे-नुकसान को तौलकर ऐसा रास्ता चुना जाए, जिसमें किसी तरह का जोखिम न उठाना पड़े। लेकिन यह सोच एक व्यापारी की सोच है, जो हर फैसले में फायदे और नुकसान का हिसाब करती है। मानवाधिकारों के लिए काम करते समय आप इस तरह नहीं सोच सकते हैं।
विरोधाभास हमारे काम का हिस्सा नहीं हो सकता
मैंने ऐसे कई गांवों में काम किया है, जहां सबसे कमज़ोर और हाशिए पर रहने वाली महिलाओं ने पुलिस और उसकी धमकियों का सामना किया। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ भी आवाज़ उठाई। मैंने उन्हें बिना डर के अपने अधिकारों के लिए खड़े होते देखा है। लेकिन उनके लिए काम करने का दावा करने वालेलोग और संस्थाएं रणनीति के नाम पर सुरक्षित रास्ता चुन रहे हैं और जोखिम लेने से बच रहे हैं।
ऐसे में मैं अक्सर उनसे और उनकी संस्थाओं को फंड देने वालों से एक सीधा सवाल पूछता हूं: आपने अपनी संस्था शुरू ही क्यों की थी? क्या इसलिए नहीं कि आपके सामने कोई गंभीर समस्या थी, जिसका समाधान करना ज़रूरी था? क्या आपने यह रास्ता इसलिए नहीं चुना था क्योंकि आपको लगता था कि समाज में कुछ ऐसा है जिसे बदलना ज़रूरी है, कुछ ऐसा है जिसके बारे में बोलना ज़रूरी है?
लेकिन आज हमारी सबसे बड़ी चिंताएं एफसीआरए, 12ए, 80जी और संस्था को किसी तरह चलाए रखने तक सिमट गई हैं। अगली फंडिंग कहां से आएगी, कौन-सा कागज़ कब जमा करना है, किससे संबंध खराब नहीं करने हैं और कौन-सा जोखिम नहीं उठाना है हम इन मसलों में इतने उलझ गए हैं कि शायद उस मूल सवाल से ही दूर हो गए हैं जिसने हमें इस काम में आने के लिए प्रेरित किया था।
हमारे काम की नैतिक ज़िम्मेदारी
एफसीआरए खोने के बाद नवसर्जन ने छुआछूत के खिलाफ खुले तौर पर 40 कार्यक्रम चलाए हैं। ये कोई छोटे या प्रतीकात्मक आयोजन नहीं, बल्कि बड़े स्तर के कार्यक्रम रहे हैं, जिन्हें किसी संस्थागत फंड के बिना आयोजित किया गया। इन्हें ग्रामीण समुदायों से मिले आर्थिक सहयोग से चलाया गया।
यही स्वतंत्रता हमें एक अलग तरह की ताकत देती है। जब किसी संस्था के पास खोने को ज्यादा कुछ नहीं होता है, तो वह शायद ज़्यादा निर्भीक होकर बोल पाती है और काम कर पाती है। हाल ही में राज्य के मुख्य सचिव ने मेरे एक पत्रकार मित्र से कहा कि हमारा लाइसेंस रद्द करके उन्होंने बहुत बड़ी गलती की। उन्होंने कहा, “अब उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। वे बहुत आक्रामक हो गए हैं और हम उन्हें नियंत्रित नहीं कर सकते। हम उनसे जो कुछ ले सकते थे, वह ले लिया। अब हमारे पास उनके काम को रोकने का कोई बहाना भी नहीं है।”
यह बात सुनकर हमारा डर और कम हो गया। जिस चीज़ को कभी हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी समझा जाता था, उसे हमने अपनी आज़ादी और उनके लिए मुसीबत में बदल दिया।
आज हमारी सबसे बड़ी चिंताएं एफसीआरए, 12ए, 80जी और संस्था को किसी तरह चलाए रखने तक सिमट गई हैं।
नागरिक समाज के रूप में हमारी ज़िम्मेदारी सिर्फ लोगों को जागरूक करने की नहीं है, बल्कि इस प्रक्रिया में लगातार खुद भी सीखते रहने की है। पिछले 30 से अधिक वर्षों में हमें जो अवसर मिला, उसका हमने पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया। 1990 के दशक से शुरू हुआ दौर हमारे सेक्टर के लिए शायद सबसे अनुकूल समय था। उस समय भारतीय और वैश्विक, दोनों तरह के फंडर्स से हमें पर्याप्त संसाधन मिल रहे थे। इन संसाधनों के बल पर हम वह काम कर सकते थे, जो किसी बड़े संघर्ष या दबाव के बीच अक्सर संभव नहीं हो पाता। हम समुदायों के साथ गहराई से काम कर सकते थे, लोगों को संगठित कर सकते थे और बदलाव की मज़बूत बुनियाद तैयार कर सकते थे। लेकिन हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमने उस अवसर का पूरा लाभ नहीं उठाया।
फिर भी, बीती हुई बातों पर केवल अफसोस करते रहने से कुछ नहीं बदलेगा। जैसा कि हम गुजराती में कहते हैं, ‘सूरज उगने के साथ ही दिन की शुरुआत होती है।’ लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं कि इतने कड़वे अनुभवों और चुनौतियों के बावजूद मैं अपना काम कैसे जारी रख पाता हूं। मैं उनसे कहता हूं कि इसका जवाब उन स्कूली बच्चों और युवाओं में छिपा है, जिनके साथ मैं काम करता हूं। उनमें मुझे बदलाव दिखाई देता है। उनके सवालों में, उनकी जिज्ञासा में और चीज़ों को अलग तरह से देखने की उनकी क्षमता में मुझे भविष्य की संभावनाएं दिखाई देती हैं।
वे मुझे हिम्मत देते हैं और मेरे भीतर नई ऊर्जा भरते हैं। दरअसल, हम अक्सर सोचते हैं कि हमें युवाओं को सिखाना है। लेकिन सच्चाई यह है कि हमें भी उनसे बहुत कुछ सीखना है। युवा सिर्फ देश का भविष्य नहीं हैं, बल्कि हमारे आज के शिक्षक भी हैं।
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लेखक के बारे में
- मार्टिन मैकवान गुजरात, भारत में स्थित एक अनुभवी सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वे नवसर्जन ट्रस्ट, दलित शक्ति केंद्र और दलित फाउंडेशन के संस्थापक हैं। उन्होंने अपने सामाजिक जीवन को मानवाधिकारों की रक्षा और जातिगत भेदभाव व छुआछूत जैसी अमानवीय प्रथाओं को समाप्त करने के संघर्ष के प्रति समर्पित किया है।



