पर्यावरण

भोपाल की झीलों में हर साल घुलता ज़हर

भोपाल जिला, मध्य प्रदेश
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मिट्टी की मूर्तियां बना रहे कुछ कलाकार_प्रदूषण
बीते कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश में गणेश उत्सव और नवरात्रि जैसे धार्मिक पर्व सामुदायिक आयोजनों से बड़े सार्वजनिक उत्सवों में बदल गए हैं। | चित्र साभार: प्रज्ञा शर्मा

पिछले कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश में गणेश उत्सव और नवरात्रि जैसे धार्मिक पर्वों का स्वरूप काफी बदल गया है। जो उत्सव कभी समुदायों के बीच सीमित रूप से मनाए जाते थे, वे अब बड़े सार्वजनिक आयोजनों में बदल चुके हैं। सड़कों पर भव्य झांकियों और पंडालों की बढ़ती संख्या के साथ सजावटी मूर्तियों की मांग भी बढ़ी है, खासकर प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनी मूर्तियों की। हालांकि राज्य में पीओपी के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है, फिर भी ऐसी मूर्तियां आज भी भोपाल के बाज़ारों के साथ-साथ उसकी झीलों तक बड़ी संख्या में पहुंच रही हैं।

हाल ही में मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) के एक अध्ययन में मूर्ति विसर्जन के बाद भोपाल की झीलों के पानी में ज़िंक, क्रोमियम, तांबा (कॉपर), सीसा (लेड), कैडमियम और कोबाल्ट जैसी धातुओं के अंश पाए गए। रिपोर्ट के अनुसार, पीओपी और सिंथेटिक रंगों से बनी मूर्तियों के पानी में घुलने पर जिप्सम, सल्फर और भारी धातुएं झीलों में मिल जाती हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ सुभाष सी. पांडे के अनुसार, स्थिति इससे भी अधिक गंभीर हो सकती है। उनका कहना है कि एमपीपीसीबी ने केवल छह धातुओं की जांच की थी, जबकि मूर्तियों में इस्तेमाल होने वाले रंगों में पारा (मरकरी) और आर्सेनिक जैसे कैंसर पैदा करने वाले तत्वों सहित 30 से अधिक विषैले पदार्थ हो सकते हैं।

पांडे बताते हैं कि जब पीओपी और रासायनिक रंग पानी में घुलते हैं, तो वे पानी में मौजूद ऑक्सीजन की मात्रा को कम कर देते हैं। प्रेमपुरा और खटलापुरा जैसे विसर्जन स्थलों पर मूर्तियों को पूरी तरह गलने में कई दिन लग जाते हैं। इस दौरान वे पानी में लगातार जहरीले पदार्थ छोड़ती रहती हैं। ऑक्सीजन की कमी और इन हानिकारक तत्वों के बढ़ते स्तर का सीधा असर मछलियों और दूसरे जलीय जीवों पर पड़ता है। इससे न केवल झीलों का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता है, बल्कि उन समुदायों की आजीविका भी प्रभावित होती है, जिनकी रोज़ी-रोटी इन जलाशयों पर निर्भर है, खासकर मछुआरा समुदाय।

भोपाल की बड़ी झील, छोटी झील, शाहपुरा झील और हथाईखेड़ा जलाशय आज प्रदूषण, गाद और विषैले तत्वों से बुरी तरह प्रभावित हैं। इन जलाशयों का पानी अब पीने लायक नहीं रह गया है। इनमें से बड़ी झील भोपाल के पेयजल का सबसे अहम स्रोत है।

वहीं, भोपाल नगर निगम के जनसंपर्क अधिकारी प्रेम शंकर शुक्ल का दावा है कि वर्ष 2025 में केवल ईको-फ्रेंडली मूर्तियों को ही अनुमति दी गई थी। लेकिन इसके बावजूद, शहर के कई इलाकों में गणेश और दुर्गा की पीओपी से बनी मूर्तियों की ख़रीद-फरोख्त और विसर्जन देखा गया।

शहर और आसपास के कुछ कारीगर आज भी मिट्टी की मूर्तियां बनाते हैं। इसके लिए वे अक्सर कोलकाता से पारंपरिक मूर्तिकारों को बुलाते हैं, जो अपनी कला को ईको-फ्रेंडली बताते हैं। लेकिन इन मूर्तियों पर भी डिस्टेंपर, रासायनिक रंग, सजावटी प्लास्टिक और कृत्रिम कपड़ों का इस्तेमाल होता है, जिनमें कई हानिकारक रसायन मौजूद होते हैं।

दूसरी ओर, भोपाल के आसपास के छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में कई कारीगर मानते हैं कि वे प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) के सांचों का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि यह सस्ता पड़ता है और इससे मूर्तियां बनाना आसान होता है। हुज़ूर तहसील के पास रहने वाले एक कारीगर ने बताया, “हमें मिट्टी की मूर्तियां बनानी नहीं आती। हम तो सांचे से ही मूर्तियां बनाते हैं। वैसे भी ग्राहकों को मिट्टी की मूर्तियां पसंद नहीं आती।”

भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के पर्यावरण समाजशास्त्री डॉ. इम्तियाज़ ख़ान का कहना है कि यह समस्या केवल पर्यावरण की नहीं, बल्कि आजीविका से भी जुड़ी है। उनके अनुसार, “त्योहारों के दौरान होने वाली कमाई पर कारीगरों और दुकानदारों की बड़ी निर्भरता होती है। इसलिए केवल नियम बनाकर इस समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। जब तक लोगों के पास व्यवहारिक आर्थिक विकल्प और जागरूकता न हो, तब तक कोई भी प्रतिबंध सिर्फ़ कागज़ों तक ही सीमित रहेगा।”

प्रज्ञा शर्मा शोधकर्ता, सबाल्टर्न समाजशास्त्री और स्वतंत्र पत्रकार हैं। उनका काम जेंडर, हाशिये पर मौजूद समुदायों और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर केंद्रित है।

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लेखक के बारे में

  • प्रज्ञा शर्मा शोधकर्ता, सबाल्टर्न समाजशास्त्री और स्वतंत्र पत्रकार हैं। उनका काम जेंडर, हाशिये पर मौजूद समुदायों और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर केंद्रित है। वह समाजशास्त्र में यूजीसी-नेट उत्तीर्ण हैं और वर्तमान में विकास संवाद में मैत्री रिसर्च फेलो के रूप में कार्यरत हैं। मध्य प्रदेश में ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों और उनके सामने मौजूद चुनौतियों पर उनका शोध-पत्र शोध दृष्टि पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा, उन्होंने राज्य में ट्रांसजेंडर अधिकारों पर तैयार की गई एक शोध रिपोर्ट में भी योगदान दिया है। उनकी पत्रकारिता से जुड़ी रचनाएं द मूकनायक और टीएनए इंडिया में प्रकाशित होती रही हैं।