

मेरा नाम वनिता है और मैं पुणे के बुधवार पेठ रेड लाइट इलाके में रहती हूं। यहां मैं सहेली संस्था के साथ जुड़कर महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और अधिकारों के लिए काम करती हूं।
हमारा वाड़ा (इलाका) आसपास की पांच-छह गलियों तक फैला हुआ है। यह एक रेड लाइट इलाका है। यह क्षेत्र छोटा है, लेकिन यहां दिन-रात करीब 2500 से 3000 महिलाओं की आवाजाही रहती है। इनमें से कुछ महिलाएं यहीं रहती हैं, जबकि कुछ दिन या रात की शिफ्ट में यहां काम करने आती हैं। आम बस्तियों की तरह ही यहां भी कई परिवार और छोटे बच्चे हैं। हमारे अनुमान के मुताबिक, यहां शून्य से छह वर्ष की उम्र के करीब 100 बच्चे हैं। देशभर में बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और शुरुआती देखभाल के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों की भूमिका और इनकी अहमियत पर बात होती रहती है। लेकिन हमारे इलाके में आज भी कोई सरकारी आंगनबाड़ी केंद्र नहीं है।
जब हमने यह समझने की कोशिश की कि इतने बच्चों की मौजूदगी के बावजूद यहां आंगनबाड़ी क्यों नहीं है, तो हमें प्रशासनिक पेचीदगियों का सामना करना पड़ा। स्थानीय प्रशासन के मुताबिक, महाराष्ट्र सरकार के नियमों के तहत आंगनबाड़ी केंद्र केवल उन जगहों पर खोले जा सकते हैं, जिन्हें आधिकारिक रूप से शहरी बस्ती या ग्रामीण क्षेत्र घोषित किया गया हो। बुधवार पेठ का हमारा इलाका पुरानी इमारतों और वाड़ों से बना है। सरकारी रिकॉर्ड में इसे शहरी स्लम के तौर पर चिह्नित नहीं किया गया है। इसलिए मौजूदा वर्गीकरण के मुताबिक यह इलाका आंगनबाड़ी खोलने के लिए पात्र नहीं है। रेड लाइट इलाके के तौर पर हमारी पहचान भी एक अतिरिक्त चुनौती है। कई बार बाहरी स्वास्थ्यकर्मी यहां आकर काम करने में सहज महसूस नहीं करते। इसका सीधा असर बच्चों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच पर पड़ता है।
इसका एक उदाहरण हाल के पल्स पोलियो अभियान में देखने को मिला। हमारे इलाके में सरकारी आंगनबाड़ी न होने के कारण बच्चों का कोई संगठित और आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। इस वजह से यहां की आशा कार्यकर्ता रवीना जी को एक-एक निजी डे केयर सेंटर में जाकर बच्चों को पोलियो की खुराक दिलाने के लिए कहना पड़ा। कुछ निजी केंद्रों ने यह कहते हुए ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया कि मां की अनुमति के बिना वे बच्चों को दवा नहीं पिला सकते। इसके चलते कुछ बच्चों को पोलियो की खुराक मिलने में चार से छह दिन की देरी हो गई।
अगर यहां सरकारी आंगनबाड़ी होती, तो बच्चों का रिकॉर्ड पहले से उपलब्ध होता और पल्स पोलियो अभियान के दौरान सभी बच्चों तक पहुंचना आसान होता। उन्हें खुराक भी समय पर मिल जाती।
फिलहाल हमारे इलाके में कुछ निजी संस्थाएं डे केयर सेंटर चला रही हैं। मगर इन केंद्रों की अपनी सीमाएं हैं। मसलन, अगर किसी बच्चे को कोई गंभीर बीमारी हो या उसके ज़रूरी कागज़ात पूरे न हों, तो यह गुंजाइश होती है कि ये उसके दाखिले से इनकार कर दें। सरकारी आंगनबाड़ी में ऐसी स्थिति नहीं होती है। वहां किसी बच्चे को सिर्फ इसलिए सेवा से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसके कागज़ात पूरे नहीं हैं। यही नहीं, निजी संस्थाएं फंडिंग के लिए बाहरी स्रोतों पर निर्भर रहती हैं, इसलिए उनकी सेवाएं कितने लंबे समय तक जारी रहेंगी, यह कुछ तय नहीं होता।
हमारे इलाके में बच्चों की देखभाल से जुड़ी ज़रूरतें भी बाकी जगहों से अलग हैं। यहां कई माएं रात की शिफ्ट में काम करती हैं, इसलिए उनके बच्चों के लिए सिर्फ दिन के कुछ घंटों की देखभाल पर्याप्त नहीं होती। कई परिवारों को 24 घंटे की देखभाल या नाइट-शेल्टर जैसी सुविधाओं की ज़रूरत होती है। विडंबना यह है कि पारंपरिक आंगनबाड़ी केंद्र आम तौर पर दिन में ही चलते हैं और दोपहर तक बंद हो जाते हैं।
इसलिए हमारे सामने सवाल सिर्फ एक आंगनबाड़ी केंद्र खोलने का नहीं है। ज़रूरत इस बात की है कि सरकारी बाल देखभाल और स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा उन समुदायों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाया जाए, जहां काम के घंटे, परिवार की परिस्थितियां और बच्चों की ज़रूरतें अलग हैं।
अगर हमारे इलाके में सरकारी आंगनबाड़ी केंद्र शुरू होता है, तो पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ कई दूसरी ज़रूरी सुविधाओं तक भी बच्चों की पहुंच सुनिश्चित की जा सकेगी। जन्म प्रमाणपत्र और दूसरे ज़रूरी दस्तावेज़ बनवाने में परिवारों को मदद मिल सकेगी और बच्चों का एक आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार हो सकेगा। इससे स्वास्थ्य अभियानों के दौरान बच्चों तक पहुंचना भी आसान हो जाएगा।
हम चाहते हैं कि सरकारी व्यवस्था बुधवार पेठ जैसे इलाकों को सिर्फ उनके प्रशासनिक वर्गीकरण के आधार पर न देखे, बल्कि यहां रहने वाले बच्चों और परिवारों की ज़रूरतों को ध्यान में रखे। बच्चों को सेवाओं से जोड़ने के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि व्यवस्था पहले उन्हें अपने रिकॉर्ड में जगह दे।
वनिता सहेली संस्था के साथ काम करती हैं।
–
अधिक जानें: जानिए, झारखंड की जल सहिया 15 साल से आंदोलन क्यों कर रही हैं?
अधिक करें: लेखक से जुड़ने और उन्हें सहयोग देने के लिए उनसे [email protected] पर संपर्क करें।
लेखक के बारे में
- वनिता श्रीकांत माने पिछले 10 वर्षों से सहेली एचआईवी/एड्स कार्यकर्ता संघ के साथ पीयर एजुकेटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्होंने 3 वर्षों तक एनएनएसडबल्यू में मेंबर कॉर्डिनेटर के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। वह शारीरिक स्वास्थ्य, लैंगिक एवं प्रजनन स्वास्थ्य व शिक्षा को लेकर लोगों में जागरूकता फैलाने व सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक दस्तावेज़ बनवाने में उनका सहयोग करती हैं।
