मणिपुर के तामेंगलोंग ज़िले के ऐबेन गांव के किसान ऐलिंग*, जो पिछले 30 वर्षों से अधिक समय से झूम खेती कर रहे हैं, कहते हैं, “हमारे पूर्वजों के समय झूम खेती बहुत अच्छी तरह काम करती थी, क्योंकि उस समय भूमि पर दबाव कम था। अब धान का उत्पादन घट गया है और हमें सब्ज़ियों की खेती में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। हम गांव के पास ही खेती करना चाहते हैं, इसलिए सात से नौ वर्ष के भीतर हम उसी खेत पर वापस लौट आते हैं।”
पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर, नागालैंड और मिज़ोरम सहित कई राज्यों में प्रचलित झूम खेती, जिसे स्थानांतरण कृषि (शिफ्टिंग कल्टिवेशन) या ‘स्लैश-ऐंड-बर्न’ भी कहा जाता है, सदियों पुरानी कृषि पद्धति है। जनवरी के अंत में किसान ज़मीन के चुने हुए हिस्से पर उगी वनस्पतियों को काटना शुरू करते हैं और नीचे की मिट्टी को सूखने के लिए छोड़ देते हैं। इसके बाद मानसून आने से पहले सूखी बची हुई वनस्पतियों को नियंत्रित तरीके से जलाया जाता है। इस चक्रीय प्रक्रिया के माध्यम से ज़मीन खेती के लिए तैयार होती है और जली हुई फसलों तथा वनस्पतियों की राख मानसून के दौरान बोई जाने वाली नई फसलों के लिए ज़रूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराती है। झूम खेती मुख्य रूप से निर्वाह-आधारित कृषि पद्धति रही है। इसमें किसान अपने ही बीजों का उपयोग करते रहे हैं, जिन्हें वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखते और आगे बढ़ाते आए हैं। इस खेती में बाहरी कृषि निवेशों या मशीनों पर निर्भरता भी बहुत कम रही है।
परंपरागत रूप से किसान एक या दो वर्षों तक किसी भूमि पर खेती करते थे और उसके बाद उस खेत को 5 से 30 वर्षों तक परती छोड़ देते थे, ताकि भूमि अपनी उर्वरता पुनः प्राप्त कर सके। इसके बाद ही उस पर दोबारा खेती शुरू की जाती थी।
हालांकि, समय के साथ इस कृषि पद्धति में बड़े बदलाव आए हैं।


अनिश्चित मौसम और भूमि पर बढ़ता आजीविका का दबाव
किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक परती अवधि (फ़ैलो पीरियड) का लगातार कम होना है, जिससे गांव के समुदायों और भूमि के बीच का पारंपरिक रिश्ता प्रभावित हुआ है। इस परिवर्तन के पीछे कई कारण हैं। अब लोग गांव के निकट स्थित भूमि पर खेती करना अधिक पसंद करते हैं, जिसके कारण किसान बार-बार उसी भूमि पर लौट आते हैं। यह पारंपरिक झूम खेती की स्थानांतरण (शिफ्टिंग) प्रकृति से अलग है। इसके अलावा, गांवों की बढ़ती आबादी के कारण कृषि भूमि की मांग भी बढ़ी है, जिससे खेतों का परिवारों के बीच विभाजन होने लगा है। लकड़ी कटाई, सीढ़ीनुमा खेती और स्थायी कृषि जैसी अन्य गतिविधियों के विस्तार ने भी भूमि पर अतिरिक्त दबाव डाला है। नतीजतन, परती छोड़ी जाने वाली भूमि का कुल क्षेत्रफल लगातार कम होता गया है।
नोनी ज़िले के पुइची गांव के किसान थोइबा*, जो पिछले दो दशकों से झूम खेती कर रहे हैं, कहते हैं, “जब परती अवधि कम हो जाती है, तो मिट्टी को पहले की तरह पुनर्जीवित होने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। इससे उसकी उर्वरता घट जाती है और फसल की पैदावार भी पहले जैसी नहीं रहती।”
इस गांव के ही एक अन्य किसान ऐनिंग* कहते हैं, “पहले लंबी परती अवधि मिट्टी को फिर से उपजाऊ बनने का समय देती थी, जिससे उसकी उत्पादकता लौट आती थी और अच्छी पैदावार होती थी। परती अवधि कम होने से मिट्टी कमज़ोर और भुरभुरी हो जाती है। इससे उत्पादन घट गया है। मौसम भी अब अनिश्चित होता जा रहा है और हमारी फसलों को जंगली जानवरों तथा कृंतकों (रोडेंट्स) से नुकसान पहुंचता है। चूंकि हम किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थ या उर्वरक का उपयोग नहीं करते, इसलिए हम पूरी तरह प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर निर्भर रहते हैं। इसलिए इस खेती में बहुत मेहनत लगती है।”
वह आगे कहते हैं, “यदि उत्पादन घटता है, तो हमारी फसल परिवार का पूरे वर्ष का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त नहीं होती। हम जो धान उगाते हैं, वह साल भर नहीं चल पाता। इसके साथ ही, सब्ज़ियां उगाकर और बेचकर जो अतिरिक्त कमाई हो सकती थी, वह भी समाप्त हो जाती है।”
आय में यह कमी समय के साथ और अधिक गंभीर होती गई है, विशेषकर इसलिए क्योंकि तामेंगलोंग, नोनी और चुराचांदपुर (लामका) जैसे ज़िलों के ग्रामीण आदिवासी समुदाय अब अपनी रोज़ाना की ज़रूरतों के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक नकद आय और बाज़ारों पर निर्भर हो गए हैं।
इसके अलावा, जहां एक ओर किसान पहले से ही घटती मिट्टी की उर्वरता और उसके झूम खेती पर पड़ने वाले प्रभावों से जूझ रहे हैं, वहीं पिछले कुछ दशकों में कुछ परिवारों ने एकल फसल (मोनोकल्चर) आधारित बागान शैली की खेती भी अपनाई है, जिससे यह संकट और गहरा गया है। इसके सामने दो प्रमुख चुनौतियां हैं। पहली, हमने देखा है कि एकल फसल वाले बागान मिट्टी से पोषक तत्वों का अधिक दोहन करते हैं, जिससे उसका प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है। दूसरी, जब किसान केवल एक ही फसल उगाते हैं, तो फसल के ख़राब होने की स्थिति में उन्हें अत्यंत गंभीर नुकसान उठाना पड़ता है।
इन क्षेत्रों में झूम खेती आज भी प्रमुख कृषि पद्धति बनी हुई है, विशेषकर सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित सीमांत किसानों के बीच, जो अपने परिवार की ज़रूरतों के लिए धान और सब्ज़ियां उगाने के लिए इसी पद्धति पर निर्भर हैं। लेकिन बागान आधारित खेती के व्यापक पारिस्थितिकीय प्रभावों, विशेष रूप से मिट्टी पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों, ने पूरे गांव के समुदाय की आजीविका को और अधिक अनिश्चित बना दिया है।
इसी परिप्रेक्ष्य में, पिछले कुछ वर्षों से सनबर्ड ट्रस्ट पुइची गांव के किसानों के साथ मिलकर स्लोपिंग एग्रीकल्चरल लैंड टेक्नोलॉजी (सॉल्ट) तकनीकों को विकसित करने का कार्य कर रहा है। चूंकि झूम खेती अभी भी व्यापक रूप से प्रचलित है, इसलिए अब तक हमारा प्रयास सॉल्ट को झूम खेती के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने का नहीं, बल्कि एक ऐसी सहायक पद्धति के रूप में स्थापित करने का रहा है, जो मिट्टी के कटाव को कम करने, जल संरक्षण में सुधार लाने और फसल उत्पादन बढ़ाने में सहायक हो।


सॉल्ट: टिकाऊ कृषि का एक विकल्प
स्लोपिंग एग्रीकल्चरल लैंड टेक्नोलॉजी (सॉल्ट) का विकास मूल रूप से 1970 के दशक में फ़िलीपींस के दक्षिणी भाग में स्थित मिंडानाओ बैपटिस्ट रूरल लाइफ सेंटर द्वारा किया गया था। यह अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों की ढलानदार भूमि के लिए विकसित एक टिकाऊ कृषि पद्धति है। इस तकनीक के अंतर्गत मिट्टी के कटाव को रोकने और उसकी उर्वरता बढ़ाने के लिए ऊंचाई वाले भूभाग की प्राकृतिक समोच्च रेखाओं (कॉन्टूअर) के साथ नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले पौधों की झाड़ीदार पट्टियां लगाई जाती हैं। इन झाड़ीदार पट्टियों की नियमित छंटाई की जाती है और काटे गए पौधों का उपयोग मल्च के रूप में किया जाता है। इन पट्टियों के बीच खेतों में खाद्यान्न फ़सलें, सब्ज़ियां और वृक्ष-आधारित फसलें उगाई जाती हैं। इस प्रणाली में छोटे पशुओं को भी शामिल किया जाता है, ताकि एक ओर अल्पकाल में अतिरिक्त कमाई हो सके और दूसरी ओर उनके मल का उपयोग मिट्टी के लिए जैविक खाद के रूप में किया जा सके।
मणिपुर में सॉल्ट खेती की शुरुआत का श्रेय मुख्य रूप से कृषि विशेषज्ञ डेविड गांधी के प्रयासों को जाता है। वर्ष 2016 में ऐबेन गांव के किसानों ने उन्हें एक पुराने सॉल्ट कार्यक्रम के बारे में बताया, जिसे वर्ष 1995 से 2000 के बीच एक गैर-लाभकारी संगठन ने शुरू किया था। लेकिन, लगभग एक दशक बाद ये सॉल्ट के खेत छोड़ दिए गए और किसान फिर से झूम खेती की ओर लौट गए। इसके बाद डेविड ने स्थानीय किसानों के साथ मिलकर पारंपरिक झूम खेती के एक टिकाऊ विकल्प के रूप में सॉल्ट का नया प्रयोग शुरू किया। वर्ष 2017 के मानसून के दौरान तीन किसानों के साथ मिलकर पहले प्रायोगिक सॉल्ट के खेत स्थापित किए गए।
वर्ष 2019 में हमने नोनी ज़िले के किसानों के साथ सॉल्ट लागू करने की संभावनाओं का पता लगाने के लिए डेविड से संपर्क किया और अपनी टीम के कुछ सदस्यों को ऐबेन में उनके तथा सॉल्ट डेवलपमेंट कमेटी (एसडीसी) के साथ प्रशिक्षण के लिए भेजा। वर्ष 2021 में हमने पुइची गांव में एक प्रदर्शन फ़ार्म स्थापित किया। चार एकड़ में फैले इस फ़ार्म में 37 प्रकार की अल्पकालिक सब्ज़ियां, आठ प्रकार की मध्यम अवधि वाली फसलें तथा दीर्घकालिक किस्मों के 400 से अधिक पौधे लगाए गए हैं। इस फ़ार्म में विभिन्न पशुपालन गतिविधियां भी संचालित की जा रही हैं, जिनमें 50 ब्रॉयलर मुर्गियों वाली पोल्ट्री इकाई, 12 बकरियों वाली बकरी पालन इकाई, मधुमक्खी पालन इकाई, मत्स्य पालन इकाई तथा प्रस्तावित बतख पालन इकाई शामिल हैं।
वर्तमान में हम पुइची क्लस्टर के सात गांवों में 172 किसानों के साथ काम कर रहे हैं। वर्ष 2025 में हमने चुराचांदपुर ज़िले के सिंगंगाट उपखंड में भी 30 अतिरिक्त किसानों के साथ काम शुरू किया।
यद्यपि सॉल्ट दीर्घकाल में एक टिकाऊ कृषि प्रणाली है, लेकिन इसके लाभ पूरी तरह सामने आने में कुछ वर्ष लगते हैं। उदाहरण के लिए, मौसमी और अल्पकालिक पौधों से आय प्राप्त होने में एक वर्ष तक का समय लग सकता है और इससे होने वाली आमदनी आमतौर पर 5000 से 10000 रुपये के बीच होती है। वहीं, दीर्घकालिक पौधों से होने वाली आय भूमि के आकार पर भी निर्भर करती है। इसी कारण हम किसानों को पशुधन खरीदने में भी सहयोग प्रदान करते हैं, क्योंकि इससे होने वाली आय सामान्यतः एक से तीन वर्षों के भीतर शुरू हो जाती है और इससे प्रतिवर्ष लगभग 20000 रुपये तक की अतिरिक्त आय प्राप्त हो सकती है।
इस प्रकार, उन लघु एवं सीमांत किसानों को, जिनकी आजीविका प्रत्येक कृषि चक्र पर निर्भर करती है, सॉल्टअपनाने के लिए प्रेरित करने में विश्वास का निर्माण, निरंतर सहयोग तथा आय के अतिरिक्त स्रोत उपलब्ध कराना अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।


किसानों को साथ जोड़ने के लिए सहयोगात्मक नज़रिया ज़रूरी है
सॉल्ट स्थायी (सेडेंटरी) कृषि की एक पद्धति है और नोनी ज़िले में यह पूरी तरह एक नई प्रणाली है। इसलिए हमने इसे गांव की मौजूदा कृषि व्यवस्था के एक पूरक तरीके के रूप में सावधानीपूर्वक प्रस्तुत किया है। शुरुआती चरण में किसानों को पशुधन खरीदने के लिए रिवॉल्विंग फ़ंड सहित वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है।
सॉल्ट के माध्यम से हम इन-सीटू मिट्टी एवं जल संरक्षण पर कार्य करते हैं, साथ ही मिट्टी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम के स्तर को बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं। नाइट्रोजन की पूर्ति झाड़ीदार पट्टियां बनाने के नाइट्रोजन-स्थिरीकरण करने वाले पौधों – टेफ्रोसिया और इंडिगोफेरा – के माध्यम से की जाती है। फॉस्फोरस की पूर्ति पशुओं के मल से तैयार खाद द्वारा होती है, जबकि पोटैशियम रसोई में उपयोग होने वाली जलने की लकड़ी की राख से प्राप्त किया जाता है। इसका उद्देश्य मिट्टी की ऊपरी परत को बिना नुकसान पहुंचाए उसकी उर्वरता को बढ़ाना है।
किसान लगभग एक एकड़ भूमि के छोटे से हिस्से को साफ करके शुरुआत करते हैं तथा झूम खेती की तरह ही वहां की वनस्पतियों को काटकर जलाते हैं। यह काम जनवरी और फरवरी में किया जाता है। अप्रैल में, मानसून आने से पहले झाड़ीदार पट्टियां लगाई जाती हैं और मई से जुलाई के बीच पौधरोपण किया जाता है। वर्ष में चार बार खेत की सफ़ाई की जाती है, जिसमें खरपतवार हटाना भी शामिल है। सॉल्ट के अंतर्गत किसान अब मिर्च, सेम, केला, पपीता, संतरा, अनानास और कटहल सहित पहले की तुलना में कहीं अधिक विविध प्रकार की फसलें उगाने में सफल हुए हैं।
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान हमारा मुख्य उद्देश्य किसानों को सॉल्ट पद्धति अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना और उसके लाभों का स्वयं आकलन करने का अवसर देना रहा है। प्रदर्शन फ़ार्म जहां एक ओर इस पद्धति के प्रभाव को प्रत्यक्ष रूप से दिखाने और स्थानीय ज़रूरतों के अनुरूप सॉल्ट को ढालने का एक माध्यम है, वहीं दूसरी ओर हमने समुदायों के साथ मिलकर उनकी शंकाओं का समाधान करने और जागरूकता बढ़ाने के लिए भी लगातार काम किया है।
हम किसानों को सॉल्ट के बारे में व्यावहारिक प्रशिक्षण और खेतों के भ्रमण के माध्यम से जानकारी तथा कौशल प्रदान करने से शुरुआत करते हैं। अब तक हमने पुइची क्षेत्र के किसानों के लिए पांच प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए हैं, दो अध्ययन भ्रमण कराए हैं – एक ऐबेन और दूसरा उत्तर प्रदेश के लखनऊ (बकरी प्रबंधन के प्रशिक्षण हेतु) – तथा मणिपुर और नागालैंड के नागरिक समाज संगठनों के लिए दो बाह्य प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए हैं। नियमित बैठकों और शिक्षण सत्रों के अतिरिक्त, हम किसान दिवस भी आयोजित करते हैं, जिसमें सभी सॉल्ट किसानों को पुइची स्थित फ़ार्म पर आमंत्रित किया जाता है। यहां वे सामूहिक गतिविधियों, सहकर्मियों से सीखने तथा अनुभव साझा करने से जुड़ी गतिविधियों में भाग लेते हैं।
इसके साथ-साथ, कार्यक्रम की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए हमने सहभागी लर्निंग (पार्टिसिपेटरी लर्निंग) पद्धतियों को भी अपनाया है। पुइची में किसानों ने गांव में कार्यक्रम लागू होने से पहले ही मिलकर एक स्थानीय सॉल्ट डेवलपमेंट कमेटी (एसडीसी) का गठन किया था। यह समिति किसानों के सामने आने वाली चुनौतियों का समाधान करने, बैठकों का आयोजन करने और खेतों की निगरानी करने की ज़िम्मेदारी निभाती है। इसके बाद प्रत्येक गांव में सहभागी कार्यक्रमों और एसडीसी का गठन किया गया है। इनमें एसडीसी किसानों के साथ-साथ अन्य गैर-लाभकारी संगठनों को भी सॉल्ट तकनीकों का प्रशिक्षण देने वाली नोडल संस्था के रूप में कार्य करती है।
पुइची और अन्य गांवों में कार्य करते हुए हमने यह सीखा है कि सॉल्ट को एक समूचे समाधान की तरह किसानों पर थोपा नहीं जा सकता। किसान इस पूरी प्रक्रिया के समान भागीदार हैं, और हम सभी मिलकर चुनौतियों को समझते हैं, उनसे सीखते हैं और आपसी सहयोग के साथ चुनौतियों का सामना करते हैं।


साथ ही, चूंकि मणिपुर में यह प्रणाली अभी प्रारंभिक अवस्था में है, इसलिए इसके लिए व्यापक सहयोगी तंत्र विकसित करने की भी आवश्यकता है:
1. औपचारिक शिक्षा में सॉल्ट को शामिल करना: वर्तमान में कॉलेज स्तर के कृषि पाठ्यक्रमों में सॉल्ट शामिल नहीं है। नतीजतन, इन तकनीकों का प्रशिक्षण फिलहाल केवल डेविड द्वारा स्थापित एसडीसी जैसी समितियों के माध्यम से ही दिया जा रहा है। इसलिए वर्तमान पाठ्यक्रमों में संशोधन कर विद्यार्थियों को सॉल्ट के वैज्ञानिक अध्ययन और व्यावहारिक प्रशिक्षण का अवसर दिया जाना चाहिए। इससे कुछ सीमित गैर-लाभकारी संगठनों द्वारा समय और संसाधनों की बाधाओं के बीच लोगों को शुरू से प्रशिक्षण देने की ज़रूरत कम होगी, और कॉलेजों के माध्यम से बड़ी संख्या में प्रशिक्षित लोग तैयार किए जा सकेंगे, जो ज़मीनी स्तर पर इसके प्रभावी कार्यान्वयन में सहयोग कर सकें।
2. स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं का समूह तैयार करना: सॉल्ट का प्रभावी विस्तार सुनिश्चित करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे लोगों का होना भी आवश्यक है, जो किसानों के साथ मिलकर काम कर सकें। सनबर्ड ट्रस्ट में हम स्थानीय समुदायों के युवाओं, विशेष रूप से कृषि में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, के साथ काम कर रहे हैं ताकि वे सॉल्ट की समझ और उससे जुड़े कौशल का विकास कर सकें।
3. सरकार का बेहतर सहयोग और मौजूदा योजनाओं के साथ समन्वय: सॉल्ट को बागवानी और कृषि संबंधी नीतियों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। स्थानीय सरकारी संस्थाएं भी सार्वजनिक प्रणालियों के माध्यम से किसानों को अच्छी गुणवत्ता के पौधे और बीज उपलब्ध कराने तथा राज्य सरकार की योजनाओं के अंतर्गत पशुधन खरीदने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इसके अतिरिक्त, ग्राम स्तर पर सॉल्ट फ़ार्म विकसित करने के लिए मनरेगा (अब विकसित भारत–रोज़गार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) जैसी योजनाओं के साथ समन्वय की भी पर्याप्त संभावनाएं हैं। उदाहरण के लिए, सॉल्ट फ़ार्म स्थापित करने के लिए किसानों द्वारा शुरुआती चरण में किए जाने वाले काम को मिशन के अंतर्गत श्रम दिवस के रूप में मान्यता देकर उसका पारिश्रमिक दिया जा सकता है। इसी प्रकार, राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (एसआरएलएम) के अंतर्गत किसान स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को सॉल्ट फ़ार्म स्थापित करने के लिए अनुदान या ऋण उपलब्ध कराया जा सकता है।
4. सामाजिक क्षेत्र में बेहतर वित्तीय सहयोग: यद्यपि सॉल्ट किसानों को अधिक टिकाऊ कृषि आय उपलब्ध करा सकता है, लेकिन इस प्रणाली को पूरी तरह स्थापित होने और स्थायी आय देने में लगभग छह से आठ वर्ष लगते हैं। पहला वर्ष पूरी तरह प्रशिक्षण पर केंद्रित होता है। जैसा कि हमारे अनुभवों से पता चला है, इस अवधि में किसानों को निरंतर सहयोग की आवश्यकता होती है। गैर-लाभकारी संगठनों को इस प्रकार का काम प्रभावी ढंग से करने के लिए अधिक लचीली और दीर्घकालिक फंडिंग की आवश्यकता है, ताकि सॉल्ट के मध्यम और दीर्घकालिक परिणाम पूरी तरह हासिल किए जा सकें। उदाहरण के लिए, बहुवर्षीय फंडिंग व्यवस्था में कुछ मदों – जैसे कृषि निवेश (इनपुट्स) – को निश्चित सहायता के अंतर्गत रखा जा सकता है, जबकि आपातकालीन परिस्थितियों के लिए लचीली फंडिंग की व्यवस्था भी उपलब्ध होनी चाहिए।
पीढ़ियों से झूम खेती मणिपुर के समुदायों की आजीविका का आधार रही है और उसने लोगों तथा भूमि के बीच के संबंधों को आकार दिया है। लेकिन बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियां, परती अवधि का लगातार कम होना और बढ़ते आर्थिक दबाव के कारण, अब किसान इस प्रणाली पर उस प्रकार भरोसा नहीं कर पा रहे हैं, जैसा कि वे पहले कर पाते थे।
ऐसे परिदृश्य में सॉल्ट जैसी कृषि पद्धतियां मौजूदा कृषि ज्ञान को आधार बनाते हुए मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार, जल संरक्षण और समय के साथ आजीविका को अधिक सुदृढ़ बनाने के अतिरिक्त अवसर प्रदान कर सकती हैं। किसानों को इन पद्धतियों को अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाने में सहायता देने के लिए सरकारों, नागरिक समाज संगठनों और वित्तपोषकों – सभी की ओर से दीर्घकालिक प्रतिबद्धता और सहयोग ज़रूरी है।
अगली चुनौती केवल कृषि को अधिक उत्पादक बनाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि समुदाय ऐसे तरीकों से खेती कर पायें जो पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी व्यवहार्य हों।
* गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदल दिए गए हैं।
* सभी प्रकाशित चित्र सनबर्ड ट्रस्ट के सौजन्य से।
अनुवाद सौजन्य: शब्द एआई
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लेखक के बारे में
- प्रतीप गांगुली सनबर्ड ट्रस्ट में सामुदायिक विकास टीम में वरिष्ठ प्रबंधक हैं। इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करने के बाद सामाजिक क्षेत्र में आने से पहले वह टीच फॉर इंडिया फेलोशिप का हिस्सा थे। कक्षा के बाहर समुदायों के साथ काम करते हुए उन्हें यह एहसास हुआ कि उनकी वास्तविक रुचि सीधे समुदायों के साथ मिलकर काम करने में है। उनके प्रमुख कार्यक्षेत्र कृषि-आधारित आजीविका और ग्रामीण विकास हैं।
- पार्थोना फुकन सनबर्ड ट्रस्ट में सोशल मीडिया और संचार सहयोगी हैं। पत्रकारिता की पृष्ठभूमि रखने वाली पार्थोना ने वर्ष 2023 में सामाजिक क्षेत्र में कदम रखा और एफएक्सबी इंडिया सुरक्षा के साथ काम किया। उनकी ज़मीनी कहानियों को सामने लाने और उनका डॉक्युमेंटेशन करने में विशेष रुचि है। उनका मानना है कि हर कहानी में सोच को प्रभावित करने और बदलाव लाने की क्षमता होती है।




