

दिल्ली में चार साल तक रिटेल और सेल्स की नौकरी करने और दो साल पाक कला की डिग्री हासिल करने के बाद, मैं दिसंबर 2024 में आइज़वाल स्थित अपने घर लौट आया। यहां आकर मैंने नीली दुकान नाम की एक चाय की दुकान खोली। मेरी दुकान बहुत छोटी है और यहां ग्राहकों के बैठने के लिए सिर्फ एक बेंच है। लेकिन फिर भी यहां हमेशा लोगों का तांता लगा रहता है। स्थानीय लोगों के अलावा बाहरी लोग भी मेरी दुकान पर आते हैं, क्योंकि मैं हिंदी में बात कर सकता हूं। गुवाहाटी, शिलांग, सिल्चर और कोलकाता जैसे शहरों के लोगों को भी यहां अपनापन महसूस होता है।
नीली दुकान की लोकप्रियता ने इसे एक स्थिर और सफल व्यवसाय में बदल दिया है। लेकिन इस सफर में मैंने कई अहम सबक भी सीखे हैं। शुरुआत में मैं ग्राहकों के लिए एक बार इस्तेमाल होने वाली डिस्पोज़ेबल कटलरी का उपयोग करता था। लेकिन जल्द ही मुझे एहसास हुआ कि इससे बहुत अधिक कचरा पैदा हो रहा था। इस चुनौती से निपटने के लिए मैंने कुछ सरल उपाय अपनाए।
चूंकि प्लास्टिक की बोतलों से एक ही दिन में कूड़ेदान भर जाता था, इसलिए मैंने उनका इस्तेमाल बंद किया और कांच के गिलास में पानी पिलाना शुरू कर दिया। इसी तरह, भोजन परोसने के लिए मैंने स्टील की प्लेटों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। पिछले वर्ष तक मैं पैकेज्ड कार्टन दूध का उपयोग करता था। इससे प्रतिदिन 20–25 खाली कार्टन जमा हो जाते थे, जो कूड़ेदान भर देते थे। कचरे का यह ढेर बढ़ता जाता था और तब तक जगह घेरे रहता था, जब तक कचरा गाड़ी नहीं आती थी। शुरुआत में मैंने इन खाली कार्टनों को गिलियड स्पेशल स्कूल को दान करना शुरू किया, जहां उन्हें रिसाइकल कर के कागज़ की प्लेटें बनायी जाती हैं। लेकिन हर दिन यह कर पाना संभव नहीं था।
दिसंबर 2025 से मैंने स्थानीय स्तर पर मिलने वाले दूध का उपयोग शुरू किया। यह दूध मैं लुंगलेंग गांव के एक सप्लायर से लेता हूं, जो एक डेयरी फार्म भी चलाते हैं। यह गांव आइज़वाल से कुछ किलोमीटर की दूरी पर है। इस दूध की गुणवत्ता बहुत अच्छी है। मैं रोज़ाना प्लास्टिक और स्टील के कनस्तरों में इसे भर लेता हूं। अब मुझे खाली कार्टनों के निपटान की चिंता नहीं रहती। इस तरह यह बदलाव न केवल मेरी दुकान के लिए अधिक सुविधाजनक साबित हुआ है, बल्कि पर्यावरण की दृष्टि से भी एक ज़िम्मेदार विकल्प है।
मुझे पता है कि ये समाधान हर व्यवसाय के लिए काम नहीं कर सकते हैं। मेरे पास कटलरी को धोने और सुखाने के लिए जगह है, लेकिन कई व्यवसायों के पास यह सुविधा नहीं होती। फिलहाल मैं अपनी समस्या को इस तरह हल कर पा रहा हूं।
भविष्य को ध्यान में रखते हुए मैं कुछ ऐसे बदलाव करने की सोच रहा हूं जो भले ही बहुत बड़े न हों, लेकिन व्यावहारिक और टिकाऊ हैं। उदाहरण के लिए, मैं इस संभावना पर विचार कर रहा हूं कि नींबू का रस प्लास्टिक के पैकेटों में लेने के बजाय किसी विक्रेता से कांच की बोतलों में भरवाया जाए। इससे मैं बोतलों को साफ करके बार-बार इस्तेमाल कर सकूंगा।
हालांकि एक साथ बड़ी संख्या में कांच की बोतलें खरीदना हमारे लिए आसान नहीं होगा, लेकिन उनकी खासियत है कि वे लंबे समय तक उपयोग में आती हैं। इसलिए समय के साथ न केवल मेरी लागत कम होगी, बल्कि दुकान से निकलने वाले कचरे की मात्रा भी घटेगी।
चुऔज़िकपुइया पाचौउ मिज़ोरम के आइज़वाल में नीली दुकान के मालिक हैं।
यह लेख आईडीआर नॉर्थईस्ट फैलो 2025–26 मालसॉमदावंगलियानी तारा के साथ हुई बातचीत पर आधारित है।
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लेखक के बारे में
- चुऔज़िकपुइया पाचौउ मिज़ोरम के आइज़वाल में स्थित ‘नीली दुकान’ के संचालक हैं। इससे पहले वह स्पोर्ट्स रिटेल और कम्युनिकेशंस के क्षेत्र में काम कर चुके हैं। उन्होंने इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कलिनरी आर्ट्स (आईआईसीए) से पाक कला में डिप्लोमा प्राप्त किया है।
