
वर्ष 1989 में मेरे माता-पिता काम की तलाश में झारखंड से दिल्ली आए थे। उस वक्त मेरी उम्र आठ-नौ साल थी। हम उत्तर-पूर्वी दिल्ली की इंदिरा जेजे कॉलोनी में रहने लगे। आज हमें दिल्ली में रहते हुए करीब 30 साल हो चुके हैं।
मैंने बचपन से अपने माता-पिता जैसे मज़दूरों को इस शहर में रोज़ी-रोटी कमाने और अपना वजूद बनाए रखने के लिए संघर्ष करते देखा है। मैंने यह भी देखा कि किस तरह वे अपने हक़ के लिए एकजुट होते थे। मैं अपने माता-पिता के साथ मज़दूरों की बैठकों में शामिल होती थी। वहीं से मुझे समझ आया कि दूसरों की तरह हमें भी राशन पाने, वोट देने और इस शहर में सम्मान के साथ रहने का पूरा अधिकार है।
मैं वर्ष 2006 से घरेलू कामगार वेलफेयर ट्रस्ट की अध्यक्ष और घरेलू कामगार यूनियन (दिल्ली) की सदस्य हूं। हम मज़दूरों को उनके हक़ के लिए आवाज़ उठाने में मदद करते हैं। इसमें रेस्तरां में काम करने वाले और घरेलू कामगारों के लिए उचित मेहनताना सुनिश्चित करने की लड़ाई लड़ना, मज़दूरों के लिए पेंशन की मांग करना, ज़रूरी दस्तावेज़ बनवाने में मदद करना और मतदान के अधिकार तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करने के लिए सरकार के सामने अपनी बात रखना शामिल है।
हम हमेशा से जानते थे कि लोगों के पास आधार और वोटर आईडी होना ज़रूरी है, ताकि वे वोट दे सकें और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी लेते रहें। लेकिन विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर ने सब कुछ बदल दिया है। इसका मकसद देशभर में मतदाता सूची में दर्ज नामों की जांच करना और उनका सत्यापन करना बताया गया था। लेकिन अब यह उन लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित करने का ज़रिया बन गया है, जो समाज के हाशिये पर हैं।
दिल्ली में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू होने से काफी पहले ही हमने बैठकें करनी शुरू कर दी थी, ताकि लोगों के साथ बैठकर समझ सकें कि इसका उन पर क्या असर पड़ सकता है। हम दूसरे राज्यों में लोगों के हालात भी जान रहे थे। इससे हमारी बस्तियों के लोगों को एसआईआर के बारे में पहले से जानकारी तो मिल गई, लेकिन इसके बाद जो अफरा-तफरी मची, उससे निपटने के लिए वे तैयार नहीं थे।
हमारी बस्तियों में सैकड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें एसआईआर की सूची में अपना नाम नहीं मिल रहा है। वे अपने भविष्य को लेकर डरे हुए हैं। साथ ही, इस पूरी प्रक्रिया के दौरान उन्हें जिस अपमान और परेशानी से गुज़रना पड़ रहा है, उसे लेकर उनमें गुस्सा भी है।
यहां कई मज़दूर बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से आए हैं और दशकों से दिल्ली में रह रहे हैं। इनमें वे महिलाएं भी शामिल हैं, जिन्हें राशन कार्ड में परिवार के मुखिया के रूप में दर्ज किया गया है। ऐसे में, वे अचानक उन जगहों के दस्तावेज़ कहां से लाएंगी, जिन्हें बरसों पहले छोड़कर वे यहां आ गई थी? अगर मतदाता सूची से उनके नाम हटा दिए गए, तो क्या उनके परिवारों को भूखे रहने की नौबत आ जाएगी?
झारखंड से आए प्रवासी मज़दूरों के सामने एक और संकट है। वर्ष 2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य बना था। इस वजह से कई लोगों के नाम 2002-03 की झारखंड की मतदाता सूची में दर्ज ही नहीं थे। मेरे पति गुमला ज़िले के हेसाग गांव से दिल्ली आए थे। उस साल की मतदाता सूची में उनके गांव के भी बहुत से लोगों के नाम नहीं मिल रहे हैं।
हमारी बस्तियों में एसआईआर से जुड़े दस्तावेज़ों का काम पहले से ही काम के बोझ तले दबी आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के जिम्मे आ गया है। ब्लॉक-लेवल ऑफिसर (बीएलओ) तो वैसे ही यहां नहीं आते। हमें 2002-03 की मतदाता सूची में दर्ज अपने नाम का प्रिंटआउट लेकर आंगनवाड़ी केंद्र जाना है और वहां अपना पंजीकरण करवाना है। लोगों के नाम ऑनलाइन देखने के लिए आंगनवाड़ी केंद्रों को कंप्यूटर तक नहीं दिए गए हैं। हमें बस इतना बताया जाता है कि इसके लिए एक ऐप है। लेकिन हर कोई ऐप इस्तेमाल करना नहीं जानता। ऐसे में लोग ठगी का शिकार भी हो रहे हैं। कुछ साइबर कैफे वाले 200-300 रुपये लेकर मतदाता सूची में नाम खोजने का वादा करते हैं, और लोग मजबूरी में उनके पास चले जाते हैं।
हम अपनी शिकायतें लेकर ब्लॉक स्तर के अधिकारियों के पास गए, लेकिन उनका जवाब बस यही होता है कि “एसआईआर तो ज़रूरी है। हम पर भी दबाव है।” हमारी समस्या का उनके पास एक ही समाधान है: हम अपने गांव के मुखिया के पास जाएं और उनसे लिखित में प्रमाणित करवाएं कि हम अपने गांव के मूल निवासी हैं। लेकिन इतने सालों में कितने मुखिया आए और चले गए! अब हम कहां से उन लोगों को ढूंढें?
हम घरेलू कामगार और मज़दूर लोग हैं। हमने मिलकर इस शहर को बनाया है। फिर भी, बार-बार हमें ही यह साबित क्यों करना पड़ता है कि हम इस देश के नागरिक हैं? क्या हमें यहां रहने और अपने हक़ के साथ जीने का अधिकार नहीं है?
जिन मज़दूरों ने दिल्ली को बनाया है, उनके बिना क्या यह शहर टिक पाएगा?
सुनीता रानी घरेलू कामगार वेलफेयर ट्रस्ट की संस्थापक और अध्यक्ष हैं।
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लेखक के बारे में
- सुनीता रानी घरेलू कामगार वेलफेयर ट्रस्ट और घरेलू कामगार यूनियन (दिल्ली) की संस्थापक-अध्यक्ष हैं। वह घरेलू कामगारों और निर्माण मज़दूरों सहित विभिन्न श्रमिकों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाती हैं। घरेलू कामगार यूनियन (दिल्ली) शोषणकारी परिस्थितियों में काम करने वाली घरेलू कामगारों को वहां से निकालने और उनके पुनर्वास के लिए भी सक्रिय रूप से काम करती है।