मेरा नाम पूनम है और मैं राजस्थान के जोधपुर ज़िले में रहती हूं। मैंने अपने करियर की शुरुआत रियल एस्टेट और मार्केटिंग के क्षेत्र से की थी। वर्ष 2022 में मैं विकास सेक्टर से जुड़ी, जहां मेरी बड़ी बहन पहले से काम कर रही थीं। मैंने अलग-अलग संगठनों के साथ मिलकर समुदायों में स्वच्छता से जुड़ी परियोजनाओं और स्कूलों में लैंगिक समानता के मुद्दों पर काम किया है। अपनी सबसे हालिया भूमिका में मैंने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न यानी एसआईआर) से जुड़े एक सर्वेक्षण पर काम किया।
भारत के निर्वाचन आयोग ने वर्ष 2025 के आखिर के महीनों में राजस्थान में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू की। इसका कथित उद्देश्य यह पक्का करना था कि हर पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में शामिल हो और किसी भी अपात्र व्यक्ति का नाम उसमें न रहे। लेकिन हर पात्र नागरिक को शामिल करने की इस प्रक्रिया में मेरा और मेरे पिता का नाम ही मतदाता सूची से कट गया।
मेरे पिता सरकारी नौकरी में थे, इसलिए उनके तबादलों के चलते हमारा परिवार एक जगह से दूसरी जगह जाता रहता था। वर्ष 2017 में उनके सेवानिवृत्त होने के बाद हम जोधपुर के रावटीइलाके में लौट आए। मेरा परिवार मूल रूप से यहीं का रहनेवाला है। आधार कार्ड और राशन कार्ड पर तो नया पता आसानी से अपडेट हो गया, लेकिन वोटर आईडी बनवाना आसान नहीं था।


वर्ष 2019 में मेरे पिता ने नया वोटर आईडी बनवाने के लिए ई-मित्र केंद्र पर आवेदन किया। वह कम से कम 10 बार वहां गए और पैसे भी दिए, लेकिन उन्हें न तो कोई रसीद मिली और न ही आवेदन संख्या। हर बार उनसे यही कहा गया कि कार्ड उनके घर पहुंच जाएगा, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ।
इसी दौरान मैंने भी अपना वोटर आईडी बनवाया। इसके लिए मैंने पड़ोस में रहने वाले एक व्यक्ति के वोटर आईडी की कॉपी को संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल किया। उस समय किसी पड़ोसी या रिश्तेदार का मतदाता पहचान पत्र संदर्भ के लिए पर्याप्त था। लेकिन आज वोटर आईडी बनवाने के लिए भाग-दौड़ करना मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गया है।
सुबह 7 बजे: मेरा दिन सुबह सात बजे शुरू होता है। एक कामकाजी महिला के लिए सुबह किसी मैराथन से कम नहीं होती। एक तरफ चाय चूल्हे पर चढ़ती है, तो दूसरी तरफ दोपहर के खाने की तैयारी शुरू हो जाती है। इसके बाद बर्तन और कपड़े धोने का काम होता है। फिर मैं अपने भांजे और भांजी को तैयार करके स्कूल छोड़ने जाती हूँ।
जब मैं एसआईआर सर्वेक्षण पर काम कर रही थी, तो मुझे सुबह आठ बजे तक फील्ड में पहुंचना होता था, क्योंकि जिन दिहाड़ी मज़दूरों का हम साक्षात्कार लेते थे, वे नौ बजे तक काम पर निकल जाते थे। उनमें से कुछ गांवों से थे, जो शहर में मज़दूरी करने आते हैं। उनसे बात करने के लिए हमारे पास उनके काम पर निकलने से पहले का आधा घंटा ही होता था।
हमने आसपास के विधानसभा क्षेत्रों के कुछ मतदान केंद्रों पर सर्वेक्षण किया। कई लोगों को पता ही नहीं था कि वोटर लिस्ट से उनका नाम हटा दिया गया है। इनमें से कुछ महिलाएं भी थीं, जो शादी के बाद दूसरे राज्यों में चली गई थीं। वहीं, कुछ लोगों के नाम हटाए जाने का कोई स्पष्ट कारण नहीं था। उन्होंने मुझसे कहा कि वे हर चुनाव में मतदान करते हैं, फिर उनका नाम सूची से क्यों काट दिया गया?
मेरे पिता एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी हैं। वे ई-मित्र केंद्र के कई चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन आज तक उन्हें उनका वोटर आईडी नहीं मिला है। ऐसे लोगों का क्या होता होगा, जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते? जो हर बार वोटर लिस्ट में अपना नाम दोबारा जुड़वाने के लिए केंद्र तक पहुँचने में एक दिन की मज़दूरी और आने-जाने का किराया गंवा देते हैं?


दोपहर 1 बजे: आमतौर पर इस समय ऑफिस में मेरे लंच का समय होता है। एक दिन दोपहर में जब मैं काम पर थी, तब बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) हमारे घर आए। वे घर-घर जाकर लोगों से संपर्क कर रहे थे। उन्होंने मेरे भांजे से कहा कि एसआईआर सूची में अपने नाम से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए मुझे मेरे इलाके के स्कूल में लगे एसआईआर शिविर में जाना चाहिए।
अगले दिन मैंने ऑफिस से छुट्टी ली और स्कूल पहुंच गई। वहां मुझे बताया गया कि एसआईआर के तहत यह जांच की जा रही है कि लोग इस देश के नागरिक हैं या नहीं। इसके बाद मुझे एक फॉर्म दिया गया, जिसमें मेरा वोटर आईडी और मेरे परिवार के सदस्यों के वोटर आईडी से जुड़ी जानकारी मांगी गई थी।
मेरे पास मेरे पिता के पुराने वोटर आईडी का नंबर था जो भोपालगढ़ का था। जोधपुर आने से पहले हम वहीं रहते थे। मां का वोटर आईडी नंबर मेरे पास नहीं था, क्योंकि उनका निधन वर्ष 2002 में हो गया था। उनका वोटर आईडी भी पिता के वोटर आईडी के साथ ही बना था। इसलिए मैंने पिता के कार्ड के नंबर से मां का नंबर निकालने की कोशिश की। मुझे लगा कि दोनों नंबरों में सिर्फ दो अंकों का अंतर होगा।
जब मैं फॉर्म जमा करने वापस गई, तोमैंने भोपालगढ़ की वर्ष 2002 की मतदाता सूची लेकर उसे क्रम संख्या के हिसाब से देखना शुरू किया। उसमें मेरे माता-पिता के नाम नहीं थे। कई दूसरे लोगों के नाम भी सूची में नहीं मिले। मेरा फॉर्म खारिज कर दिया गया। बीएलओ ने मुझे बताया कि वर्ष 2002 की सूची में मेरे माता-पिता के नाम नहीं होने के कारण मेरा नाम मतदाता सूची से हटाया जा रहा है।
मेरे पिता सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी हैं और पेंशनभोगी भी हैं। उनके पास आधार कार्ड, राशन कार्ड और बाकी सभी दस्तावेज़ हैं। इसके बावजूद अब तक उनका नाम मतदाता सूची में नहीं जुड़ा है। मैंने और मेरी बहन ने भोपालगढ़ की सूची तीन बार खंगाली, लेकिन उसमें उनका नाम नहीं मिला।
हाल ही में हुए नगर निकाय चुनावों के दौरान मेरे पिता अस्पताल में भर्ती थे, इसलिए वे मतदान नहीं कर पाए। मैंने अधिकारियों के सामने पिता के सभी दस्तावेज़ रख दिए। इनमें उनका आधार कार्ड, पुराना वोटर आईडी और सेवानिवृत्ति से जुड़े दस्तावेज़ शामिल थे। मैंने उन्हें यह भी बताया कि नए मतदाता के रूप में उनका पंजीकरण करवाने में हमें कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। मैंने पूछा कि क्या उनका नया वोटर आईडी बनाया जा सकता है। मेरे बार-बार अनुरोध करने के बावजूद अधिकारियों ने मना कर दिया।
आखिरकार बीएलओ का धैर्य भी जवाब दे गया। उन्होंने कहा, “अब आपको कोर्ट-कचहरी जाना पड़ेगा। वहां जाकर जवाब दीजिए। क्या पता, आप इस देश के ही न हों।”
यह सुनकर मैं हैरान रह गई। उनकी टीम के एक अन्य सदस्य ने मुझे शांत किया और समझाया कि फिलहाल सिर्फ नाम हटाए जा रहे हैं और तीन से छह महीने में नाम दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। उन्होंने मुझे चिंता न करने के लिए कहा। किसी ने यह भी बताया कि शायद बीएलओ कम संसाधनों के बीच काम करने के कारण परेशान थे।
जब वोटर लिस्ट से आपका नाम हटा दिया जाता है, तो आपके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है, मानो आप मर चुके हों, मानो आपका कोई अस्तित्व ही न हो। हम जीवित हैं, लेकिन हमसे यह साबित करने को कहा जा रहा है कि हम कौन हैं।
सर्वेक्षण के दौरान एक सेवानिवृत्त व्यक्ति ने मुझसे कहा, “मतदाता सूची हर पांच साल में बनती है, लेकिन एसआईआर की सूची हर 20 साल में बनती है। अगर एसआईआर की सूची में आपका नाम नहीं है, तो आपके बच्चों के नाम भी उसमें नहीं होंगे।”
मैंने उनकी बात की सच्चाई जानने के लिए इस विषय पर और जानकारी जुटाने का सोचा, लेकिन तभी मेरे भांजे का एक्सीडेंट हो गया और मैं ऐसा नहीं कर पाई। खुद मुझे भी सामान्य मतदाता सूची और एसआईआर सूची के बीच का अंतर पूरी तरह नहीं पता है।
लेकिन एक बात मैं जानती हूं, लोग डरे हुए हैं। उन्हें डर है कि उनके दस्तावेज़ों में हुई एक छोटी-सी गलती उनके बच्चों को उनके अधिकारों से वंचित कर सकती है।


शाम 6 बजे: ऑफिस से घर लौटकर मैं अपने भतीजे और भतीजी से उनके दिन के बारे में पूछती हूं और कुछ देर आराम करती हूँ। इसके बाद सुबह की भाग-दौड़ में छूट गए काम निपटाने की बारी आती है। आमतौर पर इसमें कपड़े धोना शामिल होता है। फिर मैं अपनी बहन के साथ रात का खाना खाती हूँ।
शाम के कामों में आजकल एक और काम जुड़ गया है — बीएलओ को व्हाट्सऐप पर संदेश भेजना और उनसे लगातार संपर्क करते रहना। बार-बार फॉलो-अप करने और कई दिनों तक कागज़ी कार्रवाई के बाद आखिरकार मेरा नाम मतदाता सूची में जुड़ गया और मेरा वोटर आईडी बन गया। हाल ही में बीएलओ ने मुझे मेरा वोटर आईडी भेजा।
कार्ड पर मेरा नाम, जन्मतिथि, पता और पिता का नाम सही थे, लेकिन उस पर दर्ज मोबाइल नंबर मेरा नहीं था। वह नंबर हमारे परिवार में किसी का भी नहीं है। आवेदन करते समय मैंने यह नंबर दिया भी नहीं था। जब मैंने बीएलओ से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, “सिस्टम में यही नंबर अपडेट हुआ है।”
मेरी बहन की शादी वर्ष 2010 में हुई थी। वर्ष 2017 से वह अपने दो बच्चों के साथ हमारे साथ रह रही है। उसे भी इसी तरह की समस्या का सामना करना पड़ा, क्योंकि वर्ष 2002 की वोटर लिस्ट के आधार पर उसके नाम पर भी आपत्ति दर्ज की गई थी। हालांकि, उसके बीएलओ ने धैर्यपूर्वक उसकी बात सुनी, उसे पूरी प्रक्रिया समझाई और फोन पर ही उसकी समस्या का समाधान कर दिया।
लेकिन अब भी उसके वोटर आईडी पर पता और जन्मतिथि गलत दर्ज हैं। उसे बताया गया कि एक बार में केवल एक ही गलती सुधारी जा सकती है। हर सुधार के लिए नया आवेदन करना पड़ता है और अतिरिक्त पैसे भी खर्च करने होते हैं। इसके लिए उसे महीने-दर-महीने ई-मित्र केंद्र और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में हमारा समय और पैसा, दोनों खर्च होते हैं।
रात 9 बजे: सोने से पहले मैं बच्चों से उनकी पढ़ाई के बारे में बात करती हूँ। इसके बाद मैं अपनी डायरी में दिनभर की समीक्षा करती हूं।
भले ही मेरा नाम वोटर लिस्ट में दोबारा जुड़ गया है, लेकिन इसके बावजूद मैं आज भी यह नहीं बता सकती कि मतदाता सूची और एसआईआर सूची एक ही हैं या अलग-अलग। मुझे यह भी नहीं पता कि मेरा नाम दोनों सूचियों में है या नहीं।
पिछले कुछ समय से मैं लगातार सोच रही हूँ कि हमारी व्यवस्थाएं इतनी जटिल क्यों हैं। आधार कार्ड में पता बदलवाने के लिए किरायानामा दिखाने भर से काम हो जाता है और पता बदल जाता है। लेकिन वोटर आईडी के मामले में कुछ भी इतना आसान नहीं है। मुझे समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों है।
जब मैं मतदान करती हूँ, तो यह साबित करती हूं कि मैं इस लोकतंत्र का हिस्सा हूं। जब तक कागज़ी प्रक्रिया सरल और पारदर्शी नहीं बनती, तब तक मेरे जैसे अनगिनत पात्र नागरिक बिना किसी गलती के अपने इस अधिकार से वंचित होते रहेंगे। जैसा कि पूनम ने आईडीआर को बताया।
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लेखक के बारे में
- पूनम डांगी राजस्थान के जोधपुर से हैं। उन्होंने काम की शुरुआत रियल एस्टेट और मार्केटिंग से की। बाद में उन्होंने सेंटर फॉर डेवलपमेंट कम्युनिकेशन (CDC) और 'कोरो इंडिया' के 'छुआछूत मुक्त राजस्थान अभियान' जैसी ज़मीनी पहलों में काम किया। उन्होंने एक संस्था के माध्यम से एसआईआर पर हुए सर्वे में भी भाग लिया। वर्तमान में पूनम, महिला हाउसिंग सेवा ट्रस्ट संस्था के साथ फील्ड ऑर्गेनाइजर के रूप में भूमिका में है।



