स्वास्थ्य और पोषण

ग्रामीण भारत की ज़रूरतों से दूर होती कॉन्डम की पैकेजिंग       

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तस्वीर में एक अस्पताल में मरीज़ और डॉक्टर_गर्भनिरोध
परिवार नियोजन उत्पादों की पैकेजिंग पर भी जागरूकता अभियानों जितना ध्यान दिया जाना चाहिए। | इलस्ट्रेशन साभार: सुगम

मैं वर्ष 2023 में एक शोध के सिलसिले में झारखंड में थी, जहां मैं दुमका ज़िले के एक गांव में काम कर रही थी। इस शोध का मकसद था दंपतियों को गर्भनिरोध के बारे में जागरूक करना और उन्हें परिवार नियोजन से जुड़े फैसले लेने में मदद करना। एक दिन गांव में महिलाओं के एक समूह के साथ गर्भनिरोध पर बातचीत शुरू हुई। बात करते-करते कॉन्डम का ज़िक्र आया। मैंने महिलाओं से पूछा कि वे कॉन्डम खरीदने के लिए अपने पति पर निर्भर क्यों रहती हैं? इसके जवाब में गीता* ने कहा, “दीदी, आपने कभी उसका पैकेट देखा है? कितना ख़राब लगता है!”

गीता सरकारी कॉन्डम ब्रांड निरोध डीलक्स के पैकेट की बात कर रही थी। पैकेट पर पश्चिमी कपड़ों में एक युवा, शहरी दंपति की तस्वीर है। इस तस्वीर का अंदाज़ कुछ हद तक कामुक है और ब्रांडिंग व उत्पाद से जुड़ी बाकी जानकारी अंग्रेज़ी में है। गीता ने पैकेट की ओर इशारा करते हुए कहा, “ये तस्वीर देखिए। लगता है जैसे ये शहर में रहने वाले लोगों के लिए है। हमारे यहां ये सब नहीं होता। इसे देखकर ही शर्म आती है।”

जिन दूरदराज़ के गांवों में यह शोध किया जा रहा था, वहां कुछ ही दुकानों पर कॉन्डम उपलब्ध थे और दुकानदार उन्हें दूसरी चीज़ों के पीछे छिपाकर रखते थे। महिलाओं ने बताया कि उन्हें दुकान पर जाकर कॉन्डम लेना ठीक नहीं लगता है, क्योंकि दुकानदार अक्सर उनके परिवार को जानते हैं। ऐसे में, कॉन्डम की पैकेजिंग महिलाओं के लिए पहले से ही असहज स्थिति को और मुश्किल बना देती है। पैकेट पर बनी तस्वीरें उन्हें सहज महसूस कराने के बजाय कॉन्डम को लेकर उनकी झिझक और बढ़ा देती हैं।

समूह में शामिल एक और महिला रानी* ने कहा, “हमारे पास आशा या एएनएम दीदी का इंतज़ार करने के अलावा कोई और चारा नहीं है। हमें दुकान पर जाकर कॉन्डम मांगना ठीक नहीं लगता। इसलिए आमतौर पर पति ही ख़रीदकर लाते हैं। वे बाइक से गांव से दूर किसी मेडिकल स्टोर तक जा सकते हैं।” यानी, पुरुषों के लिए आसानी से दूर जाकर कॉन्डम खरीदना आसान है और वे इस काम को बिना किसी की नज़र में आए कर सकते हैं। वहीं महिलाओं के पास ऐसी सुविधा और निजता नहीं है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में आम तौर पर जानकारी की कमी, कीमत, उपलब्धता और सेवा आपूर्ति जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया जाता है। लेकिन पैकेजिंग को शायद ही कभी सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा माना जाता है। निरोध की पैकेजिंग पिछले कुछ सालों में कई बार बदली गयी है। इसका मूल उद्देश्य इस उत्पाद से जुड़ी झिझक कम करना था। पैकेजिंग को पारंपरिक मेडिकल रंगरूप से अलग कुछ ऐसा बनाने की कोशिश की गयी, जिसे लोग सहजता से खरीद सकें। इस नए रूप ने शहरी और मध्यमवर्गीय लोगों के बीच निरोध को एक नई पहचान तो दी, लेकिन इसके मुख्य उपभोक्ता समूह से उसे दूर भी कर दिया।

इसलिए परिवार नियोजन से जुड़े उत्पादों की पैकेजिंग पर भी उतना ही ध्यान दिया जाना चाहिए, जितना उनसे जुड़े संदेशों और जागरूकता अभियानों पर दिया जाता है।

गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदले गए हैं।

मनीषा चौधरी सार्वजनिक स्वास्थ्य, जेंडर और डिजिटल समावेशन के क्षेत्र में काम करने वाली मिश्रित-पद्धति शोधकर्ता (मिक्स्ड-मेथड रिसर्चर) हैं।

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लेखक के बारे में

  • मनीषा चौधरी क्विकसैंड डिज़ाइन स्टूडियो के साथ काम करने वाली सामाजिक शोधकर्ता हैं। वह अलग-अलग तरीकों से शोध करने के साथ-साथ कार्यक्रम प्रबंधन, निगरानी और मूल्यांकन और लोगों की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर समाधान तैयार करने का काम करती हैं। उन्हें भारत के ग्रामीण और वंचित समुदायों के साथ ज़मीनी स्तर पर काम करने का लंबा अनुभव है। अपने शोध में वह अलग-अलग पहलुओं को साथ देखकर यह समझने की कोशिश करती हैं कि असमानता लोगों के जीवन को कैसे प्रभावित करती है। उनकी खास दिलचस्पी इस बात में है कि समुदायों के अनुभवों और उनसे मिले सबूतों को नीतियों और सरकारी व्यवस्था से कैसे जोड़ा जाए।