राजस्थान के बारां ज़िले में स्थित छबड़ा ब्लॉक को अधिकतर लोग छबड़ा थर्मल पावर प्लांट की वजह से जानते हैं। इस विशाल प्लांट को राज्य की बिजली व्यवस्था का आधार स्तंभ माना जाता है। इससे बनी बिजली राजस्थान के एक बड़े हिस्से को रोशनी से सराबोर करती है। लेकिन विकास के इस चमकते सिक्के का दूसरा पहलू बेहद स्याह है। इस प्लांट के आसपास बसे गांवों के लोगों के लिए यह प्लांट उतनी सुनहरी तस्वीर नहीं पेश करता है। इस बिजली उत्पादन की कीमत उन्हें प्रदूषण, घटती खेती, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और अधूरे विकास के रूप में चुकानी पड़ रही है।
छबड़ा थर्मल प्लांट मेरे गांव मोतीपुरा चौकी में स्थित एक सरकारी पॉवर प्लांट है। इस थर्मल प्लांट का असर मोतीपुरा चौकी के साथ-साथ तीतरखेड़ी, भटखेड़ी, मावासा, अकोदियापार, कराड़ियापार, बिशनखेड़ीपार, हनुवतखेड़ा और सेवनखेड़ी जैसे कम से कम 10 गांवों पर पड़ रहा है। थर्मल प्लांट के धुएं और राख से इन गांवों की हवा इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि सांस लेने में तकलीफ और त्वचा से जुड़ी बीमारियां घर-घर फैल चुकी हैं।
पानी की किल्लत झेलते स्थानीय लोग
इसी मोतीपुरा चौकी में, जहां से राज्य को बिजली मिलती है, स्थानीय लोगों के पास पीने के पानी तक की समुचित व्यवस्था नहीं है। यहाँ के ज़्यादातर लोग निजी पाइपलाइन के ज़रिए पानी खरीदकर पीते हैं। इसके लिए उन्हें हर महीने करीब 400 रुपए चुकाने पड़ते हैं।


पावर प्लांट के सुचारू संचालन के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है, जिसकी आपूर्ति मुख्य रूप से बेतली और पार्वती नदियों से की जाती है। भारी मात्रा में नदियों के पानी के दोहन के कारण पूरे क्षेत्र का भूजल स्तर (वाटर टेबल) तेज़ी से नीचे जा रहा है। इसका असर आसपास के गांवों में भी दिखाई दे रहा है, जहां के कई हैंडपंप, कुएं और ट्यूबवेल सूख चुके हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, पानी की जरूरत पूरी करने के लिए की गई निजी बोरिंग करीब 400 फीट गहरी है।
सड़कों की बदहाली
गांव की सड़कों की हालत इतनी खराब है कि कई जगह तो देखकर यह अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल हो जाता है कि वहां कभी सड़क रही होगी। यही नहीं, नालियों और पानी की निकासी की कोई पुख्ता व्यवस्था न होने की वजह से गांव की गलियों में अक्सर कीचड़ और गंदा पानी भरा रहता है। बारिश के दिनों में स्थिति और भी खराब हो जाती है और पैदल चलना मुश्किल हो जाता है।
इसका असर सिर्फ आने-जाने पर नहीं पड़ता, बल्कि किसानों की रोज़मर्रा की जिंदगी भी इससे प्रभावित होती है। खेतों में तैयार फसल को गाड़ी से सीधे घर तक लाना उनके लिए संभव नहीं होता। ऐसे में किसानों को रास्ते में ही फसल उतारनी पड़ती है और फिर उसे कंधों पर ढोकर घर तक लाना पड़ता है।


खेती पर बढ़ता संकट
गर्मियों में यहां पानी की समस्या और गहरी हो जाती है। नदियों के ऊंचाई वाले इलाकों में पानी पूरी तरह सूख जाता है। ऐसे में किसानों को अपने खेतों की सिंचाई के लिए 1 से 2 किलोमीटर दूर से अस्थायी पाइपलाइन बिछानी पड़ती है। इसके लिए उन्हें अतिरिक्त साधन जुटाने के साथ-साथ अपनी जेब से पैसा भी खर्च करना पड़ता है।
पानी की समस्या के साथ-साथ प्लांट से निकलने वाला अपशिष्ट जल भी किसानों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। यह अपशिष्ट पानी सीधे पार्वती नदी में बहा दिया जाता है। इससे नदी के किनारे की ज़मीन और वहां होने वाली खेती प्रभावित हो रही है। इसका सीधा असर फसलों की गुणवत्ता और उनके उत्पादन पर पड़ रहा है।


जिन किसानों के पास अपने कुएं हैं या ट्यूबवेल के ज़रिए स्वच्छ पानी की स्वतंत्र व्यवस्था है, वे ही किसी तरह सब्ज़ियां उगा पा रहे हैं या पशुपालन कर दूध बेच पा रहे हैं। बाकी किसानों के लिए खेती करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।
सरकारी विद्यालयों के हाल भी हैं बेहाल
आसपास के गांवों में स्कूल भी खस्ताहाल स्थिति में हैं। कई स्कूलों की इमारतें जर्जर हालत में हैं। अभी 7 महीने पहले ही प्लांट के पास स्थित गांव सेवनखेड़ी के एक सरकारी स्कूल की निर्माणाधीन दीवार ढह गई। वो तो गनीमत रही कि किसी को कोई चोट नहीं आई, वरना एक बड़ा हादसा हो सकता था। मोतीपुरा चौकी के स्कूल के भी यही हाल हैं और उसकी इमारत भी जर्जर हो चुकी है।


शिक्षा के मामले में सबसे बड़ी मार यहां की बेटियों पर पड़ रही है। आसपास के गांवों के स्कूल अधिकतर 10वीं कक्षा तक ही हैं। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए न तो पास में कोई स्कूल है और न ही कॉलेज। उच्च शिक्षा के लिए छबड़ा ही एकमात्र विकल्प है।


संसाधनों की कमी और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण अधिकांश परिवार अपनी बेटियों को आगे की पढ़ाई के लिए इतनी दूर भेजने में सक्षम नहीं हैं। नतीजन, कई लड़कियों को 10वीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़नी पड़ती है।
स्वास्थ्य व्यवस्था सिर्फ ज़ुकाम-बुखार के इलाज तक सीमित है
यहां के गांवों की सड़कों पर लगातार राख से लदे और प्लांट से जुड़े ट्रकों की आवाजाही बनी रहती है। इनसे उड़ने वाली धूल और प्लांट से होने वाले प्रदूषण के कारण स्थानीय लोगों में त्वचा संबंधी एलर्जी, अस्थमा और सांस लेने में कठिनाई जैसी समस्याएं आम हैं।
हालांकि, क्षेत्र में प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मौजूद हैं। लेकिन वहां दर्द और बुखार जैसी सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं का इलाज ही मिल जाता है। सोनोग्राफ़ी जैसी जांच या किसी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए लोगों को क्षेत्र से बाहर जाना पड़ता है। यहां विशेषज्ञ डॉक्टरों और ज़रूरी जांच सुविधाओं का अभाव है।


बेरोज़गारी से जूझते स्थानीय लोग
जब 2005 में प्लांट का निर्माण शुरू हुआ, तब बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को मज़दूरी का काम मिला। प्लांट का निर्माण पूरा हो जाने के बाद कुछ लोगों ने कारपेंट्री और मैकेनिक का काम सीखा और उन्हें प्लांट में आगे भी रोज़गार मिल पाया। हालांकि, इनमें से अधिकांश नौकरियां मज़दूर स्तर की ही थीं।
इन नौकरियों में भी मज़दूरों का शोषण होता है। यहां काम करने वाले मज़दूरों को हर महीने मज़दूरी के तौर पर केवल 7–9 हज़ार रुपए मिलते हैं। इतने कम पैसे में परिवार का खर्च चलाना उनके लिए बेहद मुश्किल होता है। उनका कहना है कि जब वे बाथरूम जैसी बुनियादी सुविधाओं या न्यूनतम मज़दूरी को लेकर सवाल उठाते हैं, तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है। अब तो नौकरी पर रखने से पहले ही मज़दूरों से ऐसे दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करा लिए जाते हैं, जिनमें धरना-प्रदर्शन या विरोध में शामिल न होने की शर्त होती है।


आख़िर कहां जा रहा सीएसआर का पैसा
नियमों के मुताबिक, स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके मुनाफा कमाने वाली कंपनियों के लिए कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत स्थानीय विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल जैसी सुविधाओं पर खर्च करना अनिवार्य है। लेकिन 2026 में आरटीआई के ज़रिए सामने आई जानकारी के मुताबिक, छबड़ा प्लांट के पास 2.17 करोड़ रुपए का अप्रयुक्त CSR बजट था। 2022 के बाद से इस राशि में से स्थानीय विकास पर कोई खर्च नहीं किया गया है।
यह भी स्पष्ट नहीं है कि CSR के लिए उपलब्ध बाकी राशि का उपयोग किस तरह किया गया और अप्रयुक्त राशि अब तक खर्च क्यों नहीं की गई। हमारे इलाके से कुछ दूरी पर स्थित दूसरी कंपनियों के प्लांट के आसपास के गांवों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई देती है।
इस प्रकार, एक तरफ तो छबड़ा थर्मल पावर प्लांट की चिमनियों से निकलता धुआं देश के विकास के पहिये को तो गति दे रहा है।दूसरी तरफ, इसके साए में सांस ले रहे हज़ारों ग्रामीण मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जीने को मजबूर हैं।
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लेखक के बारे में
- पवन केवट राजस्थान के छबड़ा थर्मल पावर प्लांट में काम कर चुके श्रमिक अधिकार कार्यकर्ता हैं। वे प्लांट में कार्यरत श्रमिकों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। वे श्रमिकों के न्यूनतम वेतन तथा बोनस से जुड़े अधिकारों के लिए लगातार आवाज़ भी उठाते रहे हैं। काम करने की बेहतर स्थितियों की मांग को लेकर उन्होंने कई बार हड़तालों का नेतृत्व किया और श्रमिकों को संगठित कर उन्हें सामूहिक रूप से अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित किया। पवन सामाजिक न्याय के आंदोलनों से भी जुड़े हुए हैं। वर्तमान में वे भीम आर्मी भारत एकता मिशन के ब्लॉक अध्यक्ष हैं और आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) से जुड़े हुए हैं, जहां वे वंचित समुदायों के सशक्तीकरण के लिए काम करते हैं। इसके अलावा, वे केवट समुदाय में अध्यक्ष के रूप में भी नेतृत्व की भूमिका निभाते हैं।



