विविधता और समावेश

शिक्षा और असमानता के बीच समुदाय का पुल

जहां औपचारिक व्यवस्था की पहुंच सीमित है, वहां सामुदायिक परिवेश वंचित छात्रों के लिए नई राह बना रहे हैं। जानिए, यह बदलाव कैसे हो रहा है।
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हर रविवार, सुरेखा* महाराष्ट्र के नागपुर में स्थित एक विहार (बौद्ध समुदाय के लिए सामुदायिक जगह) में एक स्टडी ग्रुप में शामिल होती हैं। यहां वह बेंगलुरु और लंदन के मास्टर डिग्री कार्यक्रमों में आवेदन की तैयारी कर रही हैं। 20 से अधिक अन्य विद्यार्थियों के साथ वह ग्रुप डिस्कशन, पब्लिक स्पीकिंग, अंग्रेज़ी भाषा और वाद-विवाद से जुड़ी अपनी क्षमताओं को बेहतर बनाने पर काम करती हैं। यह स्व-प्रेरित समूह बिना किसी शिक्षक के संचालित होता है। इन छात्रों ने स्थानीय निवासियों के कड़े विरोध के बावजूद हर रविवार विहार में तीन घंटे बैठकर पढ़ने की अनुमति हासिल करने के लिए काफी संघर्ष किया है। सुरेखा सहित अधिकांश छात्र उत्तरी नागपुर के दलित/बौद्ध परिवारों से आते हैं। उच्च शिक्षा में भर्ती के दौरान कई चुनौतियों का सामना करने के बाद उनके सीनियर्स ने इस समूह की शुरुआत की थी। इसलिए जब वे ख़ुद उच्च शिक्षा के पायदान तक पहुंचे, तो उन्होंने अपने मोहल्ले के अन्य छात्रों के लिए भी ऐसी ही जगह तैयार करने का इरादा कर लिया।

लगभग 90 किलोमीटर दूर चंद्रपुर ज़िले में, मनीष* विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए अपने गांव खोपड़ी से रोज़ाना 23 किलोमीटर की यात्रा कर चिमूर स्थित एक स्टडी रूम तक जाते हैं। अपने खर्चों को पूरा करने के लिए वह शाम को ड्राइवर का काम करते हैं। करीब 40 अन्य छात्र भी उनके साथ इस स्टडी रूम में आते हैं और इस मुफ़्त सुविधा का उपयोग करने के लिए 7 से 20 किलोमीटर तक का सफर तय करते हैं। एक सरकारी स्कूल के शिक्षक मुकेश* ने सात अन्य लोगों के साथ मिलकर यह पुस्तकालय शुरू किया था। उन्होंने ज़िले और आसपास के गांवों के वंचित छात्रों के लिए बेहतर अवसर सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक फ़ाउंडेशन की स्थापना की। उन्होंने स्थानीय लोगों को छात्रों के लिए ऐसी जगह उपलब्ध कराने के लिए राज़ी किया, जहां वे परीक्षाओं की तैयारी करने के साथ-साथ सॉफ्ट और हार्ड स्किल्स विकसित कर सकें। वह हर सप्ताहांत पुस्तकालय आते हैं, छात्रों को लेक्चर देते हैं और अतिथि वक्ताओं को आमंत्रित करते हैं। वह नियमित रूप से व्हाट्सऐप या फ़ेसबुक ग्रुप और अपने इंस्टाग्राम पेज पर अवसरों से जुड़ी जानकारी भी पोस्ट करते हैं। साथ ही, वह छात्रों को ऐसे अन्य उपयुक्त लोगों से भी जोड़ते हैं, जो उन्हें बेहतर मार्गदर्शन दे सकें।

नागपुर का विहार और चिमूर का स्टडी रूम ऐसी कई कोशिशों की नज़ीर हैं, जहां समान सामाजिक और सामुदायिक पृष्ठभूमि वाले लोग मिलकर विद्यार्थियों को आगे बढ़ने में मदद कर रहे हैं। इन जगहों से वंचित विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंचने के नए रास्ते खुल रहे हैं।

तैयारी की सामुदायिक जगह 

विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आने वाले छात्र उच्च शिक्षा की तैयारी किस तरह करते हैं, इसे समझने के दौरान हमें ऐसी कई सामुदायिक जगहें मिली मिले। दिसंबर 2023 से सितंबर 2024 के बीच 10 महीने चले हमारे फ़ील्डवर्क में महाराष्ट्र (मुंबई, पुणे, फलटन, नागपुर, चंद्रपुर, चिमूर, भंडारा और जिवती), दिल्ली, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में ऐसे 23 जगहों का अध्ययन किया गया। हमने ऑनलाइन समूहों और स्थानों को भी इसमें शामिल किया। इस अध्ययन के दौरान 45 से अधिक हितधारकों—जिनमें छात्र लीडर, समुदाय के आयोजक और इन सामूहिक पहलों का नेतृत्व करने के लिए वापस लौटे पूर्व छात्र शामिल थे—के साथ साक्षात्कार और सामूहिक चर्चाएं की गई। साथ ही, इन संसाधनों का इस्तेमाल कर चुके 150 छात्रों से भी बातचीत की गई।

ये सामुदायिक अध्ययन और तैयारी की जगहें, जिन्हें अतिरिक्त-संस्थागत स्थान भी कहा जा सकता है, मुख्यधारा की स्कूली शिक्षा के समानांतर काम करते हैं। वे छात्रों में ऐसे कौशल विकसित करने में मदद करते हैं, जिनकी ज़रूरत उन्हें ‘प्रतिष्ठित’ उच्च शिक्षा संस्थानों में दाखिले के लिए होती है। ऐसी जगहों का भी हालांकि एक पूरा दायरा है। आम तौर पर जिन तैयारी केंद्रों को हम जानते हैं, उनका मकसद छात्रों को प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश दिलाने में मदद करना होता है। ये अक्सर मेडिकल या इंजीनियरिंग जैसी पढ़ाई पर केंद्रित होते हैं और आम तौर पर उच्च आय वाले परिवारों के छात्रों के लिए अधिक सुलभ होते हैं।

इसके अलावा, कुछ छोटे लेकिन महत्वपूर्ण समूह ऐसे हैं, जो सामुदायिक पहचान और अपनत्व की भावना से विकसित होते हैं। ऊपर बताए गए विहार और स्टडी रूम इसी के उदाहरण हैं। ये विशेष रूप से वंचित पृष्ठभूमि के छात्रों की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। इनका उद्देश्य केवल छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए तैयार करना नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि वहां पहुंचने के बाद उनका अनुभव अधिक समान और न्यायपूर्ण हो। इसके लिए ये समुदाय और पहचान पर आधारित रणनीतियों के साथ-साथ अपने हक़ और बेहतर व्यवस्था के लिए आवाज़ उठाने पर भी ज़ोर देते हैं।

गौरतलब है कि आवाज़ उठाना कोई अलग गतिविधि नहीं है। इन पहलों की बुनियाद में मौजूद अंबेडकरवादी विचारधारा के कारण, यह इनके काम का अभिन्न हिस्सा है। उच्च शिक्षा तक पहुंच के लिए तैयारी और अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना, यहां एक ही प्रक्रिया के दो हिस्से हैं। इसलिए जब सरकारी नीतियों में बदलाव या प्रशासनिक नियमों में अचानक किए गए परिवर्तन छात्रों की उच्च शिक्षा तक पहुंच को प्रभावित करते हैं—जैसे राज्य की विदेशी छात्रवृत्ति के मानदंडों में बदलाव—तो ये नेटवर्क मिलकर अपनी आवाज़ उठाते हैं। उनके लिए व्यवस्थागत बाधाओं का विरोध करना कोई अलग राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन और संघर्ष का ही हिस्सा है।

इनकी ज़रूरत क्यों है?

इन पहचान-आधारित सामुदायिक जगहों की ज़रूरत उन चुनौतियों से पैदा होती है, जिनका सामना वंचित समुदायों के विद्यार्थियों को तब करना पड़ता है, जब मुख्यधारा की शिक्षा और कोचिंग तक उनकी पहुंच नहीं बन पाती। जिन मेंटर्स से हमने बात की, उन्होंने बताया कि ये जगहें सिर्फ़ महंगे कोचिंग केंद्रों के विकल्प के तौर पर नहीं बनी हैं। ये उच्च शिक्षा व्यवस्था की उन कमियों को दूर करने की कोशिश है, जिनकी वजह से आज भी क्षेत्रीय माध्यम से पढ़ने वाले विद्यार्थी सही जानकारी समय पर न मिलने और भाषा से जुड़े दबावों के कारण पीछे छूट जाते हैं। मुख्यधारा के कोचिंग और सहायता केंद्र कई विद्यार्थियों के लिए आसानी से सुलभ नहीं होते। इसकी एक वजह यह है कि वे एक बेहद प्रतिस्पर्धी ढांचे के हिसाब से काम करते हैं। इस व्यवस्था में अंग्रेज़ी को लेकर विद्यार्थियों के भीतर पैदा होने वाली झिझक और डर को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। साथ ही, पहले से कई तरह के दबाव झेल रहे विद्यार्थियों की थकावट और इस व्यवस्था से बार-बार बाहर रह जाने वाले विद्यार्थियों के लिए किसी वैकल्पिक रास्ते के अभाव को भी नज़रअंदाज़ किया जाता है।

खुली किताब के साथ एक कुर्सी पर बैठा एक आदमी और सामने किताबों की ढेर_उच्च शिक्षा
तैयारी के ये केंद्र स्कूली शिक्षा के साथ-साथ चलते हैं और छात्रों को उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए ज़रूरी कौशल सिखाते हैं। | चित्र साभार: पेक्सेल्स

जिन छात्रों से हमने बातचीत की, उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि ये बाधाएं केवल आर्थिक सीमाओं तक ही सीमित नहीं हैं। एक छात्र ने बताया, “अगर मैं उन कोचिंग संस्थानों का खर्च उठा भी लूं, तब भी मुझे वहां अपनेपन का एहसास नहीं होगा। उन जगहों का हिस्सा बनने के बाद भी मेरी जातिगत पहचान के आधार पर मुझे अलग नज़र से देखा जाएगा। लोग पूछेंगे, ‘क्या आप एससी, एसटी या ओबीसी श्रेणी के तहत आवेदन कर रहे हैं?’ और जैसे ही आप जवाब देंगे…आप पर एक ठप्पा लगा दिया जाएगा।”

कई छात्रों के लिए ऐसी जगह तक पहुंचना, जहां वे पढ़ाई कर सकें और ज़रूरी मार्गदर्शन पा सकें, अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। लंबी और थकाने वाली दूरी तय करना किसी अस्थायी परेशानी की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसी हक़ीक़त की तरह देखा जाता है जिसे उन्हें स्वीकार करना पड़ता है, क्योंकि उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। उच्च शिक्षा में दाखिले की कोशिश करते समय भी इन छात्रों की योग्यता या प्रदर्शन को अक्सर पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि, भाषा या सुविधाओं और अवसरों की कमी के आधार पर उन्हें ‘कम सक्षम’ मान लिया जाता है।

क्षेत्रीय माध्यम से पढ़े एक विद्यार्थी ने ऐसी एक बाधा के बारे में बात की। उन्होंने बताया, “मेरी मातृभाषा मराठी है, लेकिन मैं पुणे में बोली जाने वाली मराठी (बोली) में बात नहीं करता। इसलिए मुझे एक बाहरी व्यक्ति जैसा महसूस हुआ… मेरी मराठी को इसलिए निशाना बनाया जाता था कि मैं गांव से हूं। इस वजह से हम खुलकर बात नहीं कर पाते [इस डर से कि हमारी भाषा को जज किया जाएगा]।”

यहां बहिष्कार किसी साफ़ लिखे नियम के रूप में सामने नहीं आता। यह धीरे-धीरे उस असहजता के रूप में महसूस होता है, जो विद्यार्थियों के भीतर हीनता की भावना पैदा करती है। उन्हें यह एहसास होने लगता है कि उस जगह का हिस्सा बनने के लिए जिन सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभवों की ज़रूरत है, वे उनके पास नहीं हैं। ऐसे में विद्यार्थियों को इन सामुदायिक पहलों की ओर खींचने वाली वजह सिर्फ़ उनकी साझा पहचान नहीं है। उन्हें जोड़ता है बहिष्कृत किए जाने का साझा अनुभव—अवसरों से दूर रह जाने का अनुभव और ऐसी जगहों से बाहर कर दिए जाने का अनुभव, जहां उनकी पृष्ठभूमि को सवालों के घेरे में लाने के बजाय समझा और स्वीकार किया जाता है।

बुनियाद: पहचान और अपनेपन की भावना 

ये सामुदायिक जगहें छात्रों को अपनी पहचान के साथ सहजता और अपनेपन का एहसास कराती हैं। यहां उन्हें समझे जाने के लिए बार-बार अपने संघर्षों को बताने या यह साबित करने की ज़रूरत नहीं पड़ती कि वे किन परिस्थितियों से आए हैं। एक छात्र कहते हैं, “यहां कोई मुझे अलग नहीं समझेगा। कोई मुझ पर इस या उस पहचान का ठप्पा नहीं लगाएगा।”

छात्रों को पढ़ाई और आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी व्यावहारिक जानकारी और मदद का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं नेटवर्कों के ज़रिए मिलता है। यह मदद उन लोगों तक भी पहुंचती है, जो उनसे पहले इसी रास्ते से गुज़र चुके हैं। ये नेटवर्क छात्रों के जीवन के अनुभवों को समझते हैं और उन्हें महत्व देते हैं। इस तरह, साझा स्मृतियों और संघर्षों से मिली समझ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रहती है।

ये नेटवर्क छात्रों को अपनेपन का एक खास एहसास भी देते हैं। वे सिर्फ़ अवसरों से वंचित रह जाने की समस्या को नहीं देखते, बल्कि उसके ऐतिहासिक संदर्भ और उसके लिए ज़िम्मेदार शिक्षा व्यवस्था को भी समझते हैं। इस तरह, वे उस सामुदायिक भावना को मजबूत करते हैं, जो वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

कई मामलों में, ये जगहें छात्रों को पूर्व छात्रों के नेटवर्क, पेशेवरों और दूसरे संसाधनों से भी जोड़ती हैं, जहां से उन्हें मार्गदर्शन और नए अवसर मिल सकते हैं। इससे छात्रों के लिए अपने भविष्य की संभावनाओं को अधिक स्पष्ट और ठोस रूप में देख पाना आसान होता है। समान सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले वे मेंटर्स, जिन्होंने खुद उच्च शिक्षा की राह तय की है, छात्रों को यह कल्पना करने में मदद करते हैं कि वे आगे क्या हासिल कर सकते हैं। मेंटर्स की सलाह और प्रोत्साहन उन्हें उच्च शिक्षा की चुनौतियों से निपटने में मदद करते हैं और उनकी आकांक्षाओं को भी दृढ़ करते हैं।

हमने जिन जगहों का सर्वेक्षण किया, वहां छात्रों को उन सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों के बारे में भी समझाया जाता है, जिन्होंने उच्च शिक्षा में मौजूदा असमानताओं को जन्म दिया है। इस तरह के अपेक्षाकृत अनौपचारिक माहौल को आंबेडकरवादी विचारधारा एक स्पष्ट दिशा और आधार देती है। जिन मेंटर्स से हमने बात की, वे अक्सर अपनी भागीदारी को इन शब्दों में समझाते हैं: “हमें समाज से जो भी मिला है, हम उसे लौटाते हैं। यही आंबेडकरवादी विचारधारा का मूल है।”

छात्रों को किस तरह की मदद दी जाए, इसका तरीका अलग-अलग जगहों पर अलग हो सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि वहां के मेंटर और अन्य लोग वंचना, मुक्ति और सामाजिक गतिशीलता को किस तरह समझते हैं।

यह विचारधारा केवल किसी स्थिर सिद्धांत तक सीमित नहीं रहती। यह उन लोगों के लिए एक व्यावहारिक जिम्मेदारी बन जाती है, जिन्होंने कुछ हासिल किया है और अब उसे उन लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं, जो अभी अपनी राह तलाश रहे हैं। यही सोच इन जगहों को स्थानीय, सामाजिक और भौतिक परिस्थितियों के अनुसार ढलने की दिशा देती है। उदाहरण के लिए, हमने एक ऐसी जगह का दौरा किया, जो एक रूढ़िवादी ग्रामीण क्षेत्र में थी। वहां महिलाओं की शिक्षा के रास्ते में पुरुषों और महिलाओं के बीच मेलजोल को लेकर सामाजिक संकोच एक बड़ी बाधा था। इसे देखते हुए मेंटर ने अध्ययन स्थल की व्यवस्था में बदलाव किए और महिलाओं के लिए अलग अध्ययन क्षेत्र बनाए। उन्होंने बालिकाओं के लिए एक नेतृत्व कार्यक्रम भी शुरू किया, ताकि उन्हें अपनी चुनौतियों और अनुभवों के बारे में खुलकर बात करने का अवसर मिल सके।

इन सामूहिक प्रयासों से छात्रों को मिलने वाली मदद केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रहती। उन्हें जिस तरह की बारीकी और व्यापकता से सहयोग मिलता है, वह उल्लेखनीय है। इसमें ऑनलाइन फ़ॉर्म भरने या ‘स्टेटमेंट ऑफ़ पर्पज़’ लिखने में मदद करना, प्रवेश प्रक्रिया के लिए दूसरे शहर जाने वाले छात्रों के रहने की व्यवस्था करना, कैंपस जीवन को समझने और उसमें अपनी जगह बनाने के लिए सही लोगों और नेटवर्क से जोड़ना, और यहां तक कि प्रवेश परीक्षा की फ़ीस या इंटरनेट डेटा का खर्च उठाना भी शामिल है, ताकि छात्र ऑनलाइन संसाधनों का इस्तेमाल कर सकें।

हमने जिन जगहों का दौरा किया, उनमें से एक में छात्रों को मुफ़्त शिक्षा दी जाती है। वहां से जुड़े लोगों ने आवास उपलब्ध कराने वालों से बातचीत करके छात्रों के लिए बड़ी अग्रिम जमा राशि की शर्त हटवाई और केवल मासिक किराया देने की व्यवस्था कराई। उन्होंने पास के एक कॉलेज की मेस के साथ भी साझेदारी की, जहां छात्रों को रियायती दर पर खाना मिलता है। इसके अलावा, एक स्थानीय बेकरी के साथ मिलकर छात्रों के लिए नाश्ते की भी व्यवस्था की गई है।

छात्रों को किस तरह की मदद दी जाए, इसका तरीका अलग-अलग जगहों पर अलग हो सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि वहां के मेंटर और अन्य लोग वंचना, मुक्ति और सामाजिक गतिशीलता को किस तरह समझते हैं। कुछ जगहें संस्थागत साझेदारियों पर ज़ोर देती हैं, कुछ अपनी ऑनलाइन मौजूदगी और नेटवर्क का इस्तेमाल करती हैं, जबकि कुछ छात्रों के लिए रोज़गार के अवसर पैदा करने और उनके लिए करियर की राह तैयार करने को प्राथमिकता देती हैं।

फ़ील्डवर्क के दौरान हमने पाया कि इन जगहों की कार्यप्रणाली में समाज के लिए कुछ करने की भावना की बड़ी भूमिका है। मेंटर और छात्र, दोनों ही इस सोच को बौद्ध और अंबेडकरवादी विचारधारा से जोड़ते हैं। यह केवल एक विचार या मान्यता नहीं है, बल्कि वह नैतिक आधार है जो इनमें से कई जगहों को लगातार चलाए रखता है। यह भावना व्यवहार में भी कई तरह से दिखाई देती है। अलग-अलग जगहों पर एक ही मेंटर अपनी सेवाएं देते हैं, छात्र एक जगह से दूसरी जगह पर आते-जाते हैं और पूर्व छात्र भी लौटकर मेंटर की भूमिका निभाते हैं या एक-दो दिन के शिविरों में हिस्सा लेते हैं।

ये जगहें एक-दूसरे से अलग-थलग या प्रतिस्पर्धा करने वाले केंद्रों की तरह काम करने के बजाय, आपस में सहयोग करने वाले नेटवर्क के रूप में विकसित हुई हैं। वे छात्रों की ज़रूरतों के हिसाब से उन्हें वहां पहुंचाती हैं, जो उनके लिए सबसे उपयुक्त हो। कुछ महत्वपूर्ण लोग भी इन अलग-अलग जगहों के बीच आते-जाते रहते हैं, ताकि छात्र एक-दूसरे से जुड़ें और उनके लिए मदद का नेटवर्क हमेशा उपलब्ध हो।

मान्यता और सहयोग की ज़रूरत

तैयारी की औपचारिक और संस्थागत व्यवस्था में अक्सर एक ही मॉडल दिखाई देता है, जो मुख्य रूप से नीट, आईआईटी-जेईई और यूपीएससी जैसी परीक्षाओं पर केंद्रित होता है। इसके विपरीत, पहचान-आधारित सामुदायिक व्यवस्था में मेंटर और अन्य लोग तैयारी के कई अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। ये तरीके छात्रों की सामाजिक गतिशीलता के पूरे सफर को ध्यान में रखते हैं। सामाजिक गतिशीलता की परिभाषा भी बदल रही है। जो लोग पहले मुख्य रूप से सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं की तैयारी करते थे, वे अब उच्च शिक्षा के अवसरों पर भी विचार कर रहे हैं। वहीं, उच्च शिक्षा हासिल करने की इच्छा रखने वाले छात्र पहले काम का अनुभव हासिल करने का रास्ता भी चुन सकते हैं। ऐसे में मेंटर भी इस विविधता को समझते हैं और छात्रों को उनकी परिस्थितियों और लक्ष्यों के हिसाब से आगे बढ़ने में मदद करते हैं।

नीति-निर्माताओं को उच्च शिक्षा को एक अलग-थलग क्षेत्र के रूप में देखने से आगे बढ़ना होगा। इसे सामाजिक गतिशीलता की एक व्यापक जीवन-यात्रा के हिस्से के रूप में समझना होगा। वंचित छात्रों के लिए ये सामुदायिक तैयारी स्थल इस यात्रा का एक अहम हिस्सा हैं। यह समझना भी ज़रूरी है कि छात्र ऐसी जगहें क्यों तलाशते हैं, जहां उन्हें अपनी वंचित पृष्ठभूमि को बार-बार समझाने या साबित करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। यह इस बात का भी संकेत है कि औपचारिक संस्थान आज भी उनके लिए कितने असहज हो सकते हैं।

हमारा फ़ील्डवर्क एक और महत्वपूर्ण कमी की ओर इशारा करता है। औपचारिक व्यवस्थाओं का ध्यान मुख्य रूप से दाखिले के समय आने वाली बाधाओं पर केंद्रित होता है। लेकिन संस्थान में दाखिले के बाद छात्रों को जिस अलगाव और भाषा से जुड़ी असहजता का सामना करना पड़ता है, उसे लेकर ये व्यवस्थाएं अब भी संरचनात्मक रूप से उदासीन हैं।

इन सामुदायिक जगहों से हमें यह सीख मिलती है कि रोज़मर्रा के स्तर पर काम करने वाली कुछ सहयोगी व्यवस्थाओं को व्यापक संस्थागत नीतियों का हिस्सा बनाया जा सकता है। राज्य की नीतियों में सार्थक बदलाव का मतलब केवल सतह पर लागू होने वाली योजनाओं (जैसे ट्यूशन फ़ीस में छूट) तक सीमित रहना नहीं है। इसके साथ स्थानीय स्तर पर ऐसी भाषाई व्यवस्थाएं भी विकसित करनी होंगी, जो बहुभाषी संवाद और समझ को संभव बनाएं। साथ ही, विकेंद्रीकृत और छात्रों के नेतृत्व वाले समूहों को बढ़ावा देना भी ज़रूरी है।

पहचान-आधारित इन सामुदायिक जगहों की भूमिका को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, जबकि वे ज़मीनी स्तर पर अधिक से अधिक छात्रों को उच्च शिक्षा तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इन सामूहिक प्रयासों का अनौपचारिक ढांचा कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा विकल्प है। यही उन्हें उन छात्रों के लिए सुलभ बनाए रखता है, जिन्हें औपचारिक व्यवस्थाएं अक्सर बाहर कर देती हैं।

हमने जिन जगहों का दौरा किया, उनमें से कई आज भी पर्याप्त संसाधन जुटाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। इसलिए एक महत्वपूर्ण चुनौती यह है कि इन पहलों को नीतिगत ढांचे में मान्यता दी जाए। लेकिन इस प्रक्रिया में उन्हें इतना औपचारिक न बना दिया जाए कि उनकी मूल भावना और प्रासंगिकता ही खत्म हो जाए।

*गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदल दिए गए हैं। 

इस लेख में प्रस्तुत शोध को आंशिक रूप से स्पेंसर फ़ाउंडेशन से प्राप्त अनुदान (संदर्भ संख्या #202300204) का सहयोग मिला है। इसमें व्यक्त विचार केवल लेखक/लेखकों के हैं और ज़रूरी नहीं कि वे स्पेंसर फ़ाउंडेशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों।

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