लोकतंत्र तब तक दूर की कौड़ी लग सकता है, जब तक लोग एकजुट होकर उसे अपने जीवन का हिस्सा न बना लें।
पिछले कुछ हफ्तों में देशभर में हुए प्रदर्शनों ने अधिकारों और जवाबदेही से जुड़े सवालों को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। मज़दूरों, कलाकारों, कार्यकर्ताओं, संगठनों और छात्रों ने सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज़ उठाई है। इनमें से कई लोग पहली बार अपनी असहमति जताने और अपनी बात सुने जाने की मांग करने के लिए सड़कों पर उतरे हैं। विकास, सामाजिक न्याय और अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए ये सवाल रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं।
सड़कों पर गूंजते नारों के बीच, हमने भारत की सिविल सोसाइटी से जुड़े लोगों से पूछा कि उनके लिए लोकतंत्र के क्या मायने हैं।


















































नीचे दिए गए वीडियो में, आईडीआर के सदस्य लोकतंत्र को लेकर अपने विचार साझा कर रहे हैं।
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