अधिकार

राज्य सरकारें ट्रांसजेंडर अधिकारों की रक्षा कैसे कर सकती हैं?

2026 का संशोधन अधिनियम ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा का दायरा सीमित करता है। हालांकि, राज्य सरकारों के पास अब भी यह शक्ति है कि वे ज़मीनी स्तर पर उनके अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित कर सकती हैं।
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ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026, के ज़रिए ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में बदलाव किए गए हैं। यह संशोधन 25 मई, 2026 को लागू हुआ। इसके तहत 2019 के कानून में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं:

  • ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा बदल दी गई है। 2019 के कानून में ऐसे किसी भी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर माना गया था जिसकी लैंगिक पहचान जन्म के समय निर्धारित जेंडर से मेल नहीं खाती। नए संशोधन में इस परिभाषा को सीमित कर दिया गया है। अब इसमें चार सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों—हिजड़ा, किन्नर, जोगता और अरावानी—के लोगों, जन्म के समय इंटरसेक्स विविधताओं वाले व्यक्तियों और उन लोगों को शामिल किया गया है जिन्हें ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर किया गया हो। इस बदलाव के कारण ट्रांसजेंडर पुरुष और नॉन-बाइनरी ट्रांसजेंडर व्यक्ति इस परिभाषा और कानून के दायरे से बाहर हो जाते हैं।
  • पहचान प्रमाणपत्र पाने की प्रक्रिया बदल गई है। 2019 के कानून के तहत किसी व्यक्ति के लिए अपनी लैंगिक पहचान बताने का अधिकार ही उसके लिए पहचान प्रमाणपत्र पाने का आधार था। अब किसी व्यक्ति की पहचान को कानूनी मान्यता देने से पहले ज़िला मजिस्ट्रेट को एक नए चिकित्सा प्राधिकरण की सिफ़ारिशों की जांच करनी होगी। यानी संशोधन के ज़रिए व्यक्ति द्वारा अपनी लैंगिक पहचान खुद तय करने के अधिकार को भी कानून से हटा दिया गया है।
  • जेंडर-अफ़र्मिंग सर्जरी से जुड़ी जानकारी साझा करना अनिवार्य होगा। नए कानून के तहत, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की जेंडर-अफ़र्मिंग सर्जरी करने वाले चिकित्सा संस्थानों को इसकी जानकारी ज़िला मजिस्ट्रेट के साथ साझा करनी होगी। 2019 के कानून में, यदि कोई ट्रांसजेंडर व्यक्ति अपने पहचान प्रमाणपत्र में जेंडर के उल्लेख को ‘पुरुष’ या ‘महिला’ में बदलना चाहे, तो इस बारे में राज्य को जानकारी देना उनकी इच्छा पर निर्भर था।
  • नए अपराध और कड़ी सज़ाओं के प्रावधान जोड़े गए हैं। इनमें ऐसे मामलों को शामिल किया गया है, जिनमें कथित तौर पर किसी व्यक्ति को सर्जरी, रासायनिक या हार्मोनल प्रक्रियाओं के ज़रिए ट्रांसजेंडर बनने के लिए ‘लुभाया’ या ‘मजबूर’ किया जाता है। इसी तरह, भीख मंगवाने के उद्देश्य से किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर के रूप में पेश होने के लिए ‘मजबूर’ करने को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है। हालांकि, इन प्रावधानों में इस्तेमाल की गई भाषा अस्पष्ट और व्यापक है। ये ट्रांसजेंडर समुदाय के बारे में प्रचलित रूढ़िवादी धारणाओं को भी बढ़ावा दे सकते हैं। इससे यह आशंका पैदा होती है कि मूल परिवार इन प्रावधानों का दुरुपयोग कर सकते हैं।

ये बदलाव सुप्रीम कोर्ट के 2014 के ऐतिहासिक नालसा फ़ैसले से काफी अलग हैं। इस फ़ैसले में कोर्ट ने माना था कि हर व्यक्ति को अपनी जेंडर पहचान खुद तय करने का अधिकार है और यह अधिकार संविधान के तहत संरक्षित एक मौलिक अधिकार है। इसी आधार पर कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि वे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की जेंडर पहचान को पुरुष, महिला या तीसरे जेंडर के रूप में कानूनी मान्यता दें। कोर्ट ने यह भी साफ़ किया था कि किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान को कानूनी मान्यता देने के लिए चिकित्सा प्रक्रिया से गुज़रना ज़रूरी नहीं है।

संशोधन अधिनियम की संवैधानिक वैधता को अलग-अलग अदालतों में चुनौती दी गई है। हालांकि, राज्य सरकारों के पास अब भी अपने राज्यों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाने की पर्याप्त गुंजाइश है। 2019 का अधिनियम राज्य सरकारों को अपने यहां कानून लागू करने के लिए नियम बनाने का अधिकार देता है। यह अधिकार संशोधन अधिनियम को लागू करने से जुड़े नियम बनाने पर भी लागू होता है। तमिलनाडु ने इसी अधिकार का इस्तेमाल करते हुए तमिलनाडु ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) नियम, 2022 बनाए हैं। इसके अलावा, राज्य सरकारें अपनी कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल करके कानून को लागू करने के लिए आदेश, अधिसूचनाएं, दिशानिर्देश और प्रक्रियाएं भी जारी कर सकती हैं।

इन अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए राज्य सरकारें कई अहम कदम उठा सकती हैं। इनमें राज्य स्तर पर ट्रांसजेंडर पहचान पत्र जारी करना, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों तक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना, पहचान प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करने और पहचान पत्र में जेंडर पहचान बदलने की प्रक्रिया को आसान बनाना शामिल है। राज्य सरकारें यह भी सुनिश्चित कर सकती हैं कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को समावेशी और भेदभाव से मुक्त स्वास्थ्य सेवाएं मिलें। साथ ही, उनकी निजी जानकारी कब और किन परिस्थितियों में साझा की जा सकती है, इसके लिए स्पष्ट मानक तय किए जा सकते हैं। हालांकि, कानून लागू करने के लिए राज्य सरकारों के पास मौजूद ये अधिकार असीमित नहीं हैं। 2019 के अधिनियम और संशोधन अधिनियम को लागू करने के लिए उठाया गया कोई भी कदम इन कानूनों की मूल भावना के अनुरूप होना चाहिए। राज्य सरकारें अपने नियमों और आदेशों के ज़रिए संसद द्वारा बनाए गए कानून में बुनियादी बदलाव नहीं कर सकतीं।

राज्य सरकारें क्या कर सकती हैं?

राज्य सरकारें अपने नियम बनाने और अन्य कार्यकारी अधिकारों का इस्तेमाल करके लोगों की गरिमा, समानता और संविधान से मिले दूसरे अधिकारों की रक्षा कर सकती हैं और उन्हें बढ़ावा दे सकती हैं।

1. ‘ट्रांसजेंडर’ शब्द की परिभाषा स्पष्ट करें

संशोधन अधिनियम में ‘ट्रांसजेंडर’ की परिभाषा को चार सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों तक सीमित किया गया है। हालांकि, इन समूहों के नामों का कोई एक तय अर्थ नहीं है और न ही ये देश के सभी हिस्सों में प्रचलित हैं। राज्य सरकार एक सरकारी आदेश जारी करके यह स्पष्ट कर सकती है कि उसके राज्य में प्रचलित कौन-से सामाजिक-सांस्कृतिक समूह इस परिभाषा के दायरे में आते हैं। ऐसा करते समय अलग-अलग ट्रांसजेंडर समूहों से बातचीत करना ज़रूरी है, ताकि उनकी पहचान और अनुभवों को ध्यान में रखते हुए समावेशी तरीके से निर्णय लिया जा सके। इसके अलावा, राज्य सरकार अपना ‘स्टेट ट्रांसजेंडर कार्ड’ जारी कर सकती है और राज्य की सभी कल्याणकारी सुविधाओं को इस कार्ड से जोड़ सकती है।

2. चिकित्सा प्राधिकरण की भूमिका सीमित करें

संशोधन अधिनियम के तहत, ट्रांसजेंडर व्यक्ति का पहचान प्रमाणपत्र जारी करने से पहले ज़िला मजिस्ट्रेट के लिए चिकित्सा प्राधिकरण की सिफ़ारिशों पर विचार करना अनिवार्य है। राज्य सरकार अपने स्तर पर इस कानूनी प्रावधान को बदल नहीं सकती। हालांकि, वह यह तय कर सकती है कि चिकित्सा प्राधिकरण किस तरह अपनी भूमिका निभाए। मसलन, राज्य सरकार स्पष्ट कर सकती है कि चिकित्सा प्राधिकरण आवेदक की किसी भी तरह की शारीरिक जांच नहीं करेगा। इसके बजाय, व्यक्ति द्वारा अपनी पहचान की स्व-घोषणा को आधार बनाया जा सकता है और ज़रूरत पड़ने पर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के प्रति संवेदनशील मनोवैज्ञानिक आकलन किया जा सकता है।

राज्य सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि चिकित्सा प्राधिकरण अपनी सिफ़ारिशें ज़िला मजिस्ट्रेट को भेजने के लिए तय समय-सीमा का पालन करे। इससे देरी और मनमाने फैसलों की गुंजाइश कम हो सकती है। इसके साथ ही, इस काम के लिए नामित चिकित्सा प्राधिकरणों को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की ज़रूरतों और उनके अधिकारों को समझने के लिए उचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि वे संवेदनशीलता के साथ उनकी पहचान से जुड़े मामलों पर विचार कर सकें।

3. अपनी जेंडर पहचान खुद तय करने के अधिकार को बनाए रखें

नालसा फ़ैसले में स्पष्ट किया गया था कि हर व्यक्ति को अपनी जेंडर पहचान खुद तय करने का अधिकार है और यह एक मौलिक अधिकार है। संशोधन अधिनियम में इस अधिकार का ज़िक्र न होने के बावजूद, यह अधिकार बना हुआ है। राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे इस अधिकार को मान्यता दें और इसकी रक्षा करें।

एक गुंबद वाला बड़ा सा इमारत_ट्रांसजेंडर
राज्य सरकारों के पास अपने राज्यों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए पर्याप्त शक्ति है। | चित्र साभार: पेक्सेल्स 

4. संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा करें

2019 के अधिनियम के विपरीत, संशोधन अधिनियम के तहत अब उन चिकित्सा संस्थानों के लिए यह अनिवार्य है, जहां ट्रांसजेंडर व्यक्ति जेंडर-अफ़र्मिंग प्रक्रियाएं करवाते हैं। उन्हें इस बारे में जानकारी ज़िला मजिस्ट्रेट के साथ साझा करनी होगी।

इससे निजता को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा होती हैं, क्योंकि किसी व्यक्ति के संवेदनशील स्वास्थ्य संबंधी विवरण और लैंगिक पहचान से जुड़ी जानकारी उसकी सहमति के बिना साझा की जा सकती है।

इसलिए राज्य सरकारों को ऐसे स्पष्ट नियम और प्रक्रियाएं तय करनी चाहिए, जिनसे यह सुनिश्चित हो कि इस जानकारी को कैसे इकट्ठा किया जाएगा, एक जगह से दूसरी जगह कैसे भेजा जाएगा, कहां सुरक्षित रखा जाएगा और कब नष्ट किया जाएगा। ये सभी प्रक्रियाएं निजता के मौलिक अधिकार को मान्यता देने वाले सुप्रीम कोर्ट के 2018 के पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ फ़ैसले के अनुरूप होनी चाहिए।

इसके लिए राज्य सरकारों को कुछ अहम कदम उठाने चाहिए:

  • केवल ज़रूरी जानकारी ही लें: उतना ही डेटा इकट्ठा और साझा किया जाए, जितना व्यक्ति की पहचान की पुष्टि करने और पहचान पत्र में जेंडर पहचान को ‘पुरुष’ या ‘महिला’ में बदलने के लिए आवश्यक हो।
  • जानकारी सुरक्षित रखने के स्पष्ट निर्देश दें: राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संवेदनशील डेटा को सुरक्षित तरीके से रखा जाए और उस तक अनधिकृत लोगों की पहुंच न हो।
  • जानकारी तक पहुंच सीमित रखें: डेटा केवल उन्हीं अधिकारियों के साथ साझा किया जाए, जिनकी पहचान पत्र जारी करने की प्रक्रिया में भूमिका है।
  • काम पूरा होने के बाद डेटा नष्ट करें: पहचान पत्र जारी करने की प्रक्रिया पूरी होने और डेटा की ज़रूरत खत्म हो जाने के बाद, संबंधित प्राधिकरण के लिए उस जानकारी को नष्ट करना अनिवार्य होना चाहिए।

इसके अलावा, राज्य सरकार को एक तय फ़ॉर्म भी तैयार करना चाहिए, जिसमें चिकित्सा संस्थानों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी साझा करते समय स्पष्ट रूप से निर्धारित कॉलम भरने हों। इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि कौन-सी जानकारी मांगी जा सकती है और यह सुनिश्चित होगा कि ज़रूरत से ज़्यादा निजी जानकारी इकट्ठा न की जाए।

5. जेंडर-अफ़र्मिंग स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करें

संशोधन अधिनियम का जेंडर-अफ़र्मिंग स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, मुकदमा चलाए जाने के डर से कुछ स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ये सेवाएं देने से इनकार करना शुरू कर दिया है। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि 2019 का अधिनियम स्वास्थ्य सेवाएं देने से इनकार करने या पहले से मिल रही सेवाएं बंद करने को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव का एक रूप मानता है। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 भी जेंडर पहचान के आधार पर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में भेदभाव करने पर रोक लगाता है।

संशोधन अधिनियम की नई धाराओं के अंतर्गत शिकायत मिलने पर पुलिस को पहले मामले की प्रारंभिक जांच करनी चाहिए।

ऐसे में, राज्य सरकारों के लिए ज़रूरी है कि वे सभी क्लिनिकल प्रतिष्ठानों और चिकित्सा पेशेवरों को स्पष्ट निर्देश जारी करें कि कानून के तहत वैध जेंडर-अफ़र्मिंग स्वास्थ्य सेवाएं बंद नहीं की जानी चाहिए। इन निर्देशों में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि मौजूदा कानूनों, चिकित्सा पेशेवरों पर लागू नियमों और नैतिक दिशानिर्देशों के तहत इन सेवाओं को उपलब्ध कराना उनकी जिम्मेदारी है।

6. नए अपराधों से जुड़े प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी करें

संशोधन अधिनियम में जोड़े गए नए अपराधों से जुड़े प्रावधानों के दुरुपयोग की आशंका भी है। खासकर, इनका इस्तेमाल ट्रांसजेंडर कार्यकर्ताओं, नागरिक समाज संगठनों, चिकित्सा पेशेवरों और ट्रांसजेंडर समुदाय के समूहों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के मूल परिवार उन लोगों के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकते हैं, जो उन्हें सहायता देते हैं। परिवार यह आरोप लगा सकते हैं कि ये लोग संबंधित व्यक्ति को ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

इस जोखिम को कम करने के लिए राज्य सरकारों को पुलिस के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने चाहिए। इनके तहत, संशोधन अधिनियम की नई धाराओं के अंतर्गत शिकायत मिलने पर पुलिस को पहले मामले की प्रारंभिक जांच करनी चाहिए। यदि जांच में पता चलता है कि संबंधित व्यक्ति वयस्क है और उसने अपनी इच्छा से सहायता लेने या जेंडर-अफ़र्मिंग स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करने का फैसला किया है, तो पुलिस को उसका बयान दर्ज करना चाहिए। ऐसी स्थिति में एफ़आईआर दर्ज नहीं की जानी चाहिए और मामले को बंद कर देना चाहिए।

यदि सुप्रीम कोर्ट संशोधन अधिनियम को बरकरार रखता है, तो उसे लागू करने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय न होने पर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के कई संवैधानिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इनमें शामिल हैं:

  • अनुच्छेद 14: कानून के सामने समानता और कानून का समान संरक्षण।
  • अनुच्छेद 15: भेदभाव से सुरक्षा।
  • अनुच्छेद 19(1)(a): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
  • अनुच्छेद 21: गरिमा, अपनी ज़िंदगी से जुड़े फैसले खुद लेने की स्वतंत्रता और निजता का अधिकार।

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए इन अधिकारों की रक्षा करना कई वजहों से ज़रूरी है। इससे उनकी जेंडर पहचान को लगातार कानूनी मान्यता मिल सकेगी, वे अपने संवेदनशील स्वास्थ्य संबंधी डेटा पर नियंत्रण रख सकेंगे और जेंडर-अफ़र्मिंग स्वास्थ्य सेवाओं समेत दूसरी ज़रूरी सेवाएं प्राप्त कर पाएंगे।

अगर इन अधिकारों की रक्षा के लिए प्रभावी सुरक्षा उपाय नहीं किए गए, तो 2019 के अधिनियम के तहत मिले अधिकार समुदाय के एक बड़े हिस्से के लिए सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह सकते हैं। इसलिए, संशोधन अधिनियम को लेकर कानूनी प्रक्रिया जारी रहने के दौरान भी ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य सरकारों को सक्रिय और ठोस कदम उठाने होंगे।

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लेखक के बारे में

  • नम्रता मुखर्जी विधि सेंटर फ़ॉर लीगल पॉलिसी की लीगल डिज़ाइन और रेगुलेशन टीम में सीनियर रेज़िडेंट फ़ेलो हैं। वह मुख्य रूप से सार्वजनिक कानून पर काम करती हैं, जिसमें उनका फ़ोकस कानून और टेक्नोलॉजी, जेंडर, सेक्शुअलिटी और कानून, श्रम कानून और रेगुलेटरी डिज़ाइन पर केंद्रित है। नम्रता क्वीयर अधिकार संगठनों सैफो फ़ॉर इक्वेलिटी और वार्ता ट्रस्ट के साथ भी काम करती हैं।
  • प्रज्ञा सिंह विधि सेंटर फ़ॉर लीगल पॉलिसी की लीगल डिज़ाइन ऐंड रेगुलेशन टीम में सीनियर रेज़िडेंट फ़ेलो हैं। इससे पहले उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार में लीगल असिस्टेंट के रूप में काम किया है, जहां वह रेगुलेटरी कम्प्लायन्स, लेजिस्लेटिव ड्राफ़्टिंग, नीतिगत शोध और सरकारी अनुबंधों से संबंधित ज़िम्मेदारियां संभालती थी। उन्होंने हिदायतुल्लाह नैशनल लॉ यूनिवर्सिटी से बीए एलएलबी (ऑनर्स) और नैशनल लॉ यूनिवर्सिटी, ओडिशा से संवैधानिक कानून में एलएलएम की डिग्री प्राप्त की है।
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