दशकों से भारत के पूर्वोत्तर में स्वास्थ्य पर होने वाली लगभग हर गंभीर चर्चा एक ही बात से शुरू होती है — यहां भरोसेमंद शोध, साक्ष्य और आंकड़ों की कमी है। नीति से जुड़े दस्तावेज़ अपनी सीमाओं को मानते हैं। शोध-पत्र बताते हैं कि इस क्षेत्र पर बहुत कम अध्ययन हुए हैं। सरकारी कार्यक्रमों की समीक्षा रिपोर्टें भी कमज़ोर रिपोर्टिंग की ओर इशारा करती हैं। लेकिन इन कमियों को बार-बार स्वीकार करने के बावजूद, पूर्वोत्तर भारत राष्ट्रीय स्वास्थ्य चर्चा में पीछे छूटता नज़र आता है। नक्शे पर यह क्षेत्र साफ़ दिखाई देता है, लेकिन स्वास्थ्य से जुड़े साक्ष्यों और जानकारी में अक्सर इसकी मौजूदगी नहीं दिखती।
मेघालय इसकी सबसे बड़ी मिसाल है।
30 लाख से अधिक आबादी वाले इस राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था ज़िला प्रशासन, पारंपरिक संस्थाओं और स्वायत्त ज़िला परिषदों की कई स्तरों वाली व्यवस्था पर आधारित है। इसके बावजूद, राष्ट्रीय स्वास्थ्य साहित्य (नेशनल हेल्थ लिटरेचर) में मेघालय को शायद ही कभी विस्तार से जगह मिली। उसका ज़िक्र अधिकांश किसी तालिका में सिर्फ़ एक आंकड़े के रूप में हुआ। उससे भी अधिक चिंताजनक यह रहा कि कई जगह उसके लिए कोई आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं था।
विश्वसनीय आंकड़ों की कमी सिर्फ़ एक तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि इसका दूरगामी असर सीधे लोगों तक पहुंचता है। जब सही आंकड़े नहीं होते, तब भी फैसले लिए जाते हैं। लेकिन ऐसे फैसले अक्सर दूसरी जगहों से ली गई मान्यताओं, पूरे देश के औसत आंकड़ों या ऐसे अधिकारियों की समझ पर टिके होते हैं, जो स्थानीय हालात से परिचित हो भी सकते हैं और नहीं भी। आंकड़ों की कमी कभी तटस्थ नहीं होती। वही तय करती है कि किसकी गिनती होगी, किन समस्याओं पर ध्यान दिया जाएगा और किन लोगों की ज़िंदगी और चुनौतियां नज़रअंदाज़ हो जाएंगी।
कम आबादी होना एक ऐसी संरचनात्मक चुनौती है, जिसका राष्ट्रीय सर्वेक्षणों की रूपरेखा में कभी पर्याप्त समाधान नहीं किया गया। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफ़एचएस) और स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली (एचएमआईएस) जैसे राष्ट्रीय सर्वेक्षण अक्सर कम आबादी वाले और भौगोलिक रूप से बिखरे हुए राज्यों में ज़िला स्तर पर भरोसेमंद अनुमान उपलब्ध कराने में असफल रहते हैं। री भोई या दक्षिण-पश्चिमी खासी हिल्स जैसे ज़िलों के स्वास्थ्य अधिकारी केवल राज्य-स्तरीय औसत के आधार पर प्रभावी ढंग से स्वास्थ्य सेवाओं की योजना नहीं बना सकते। ऐसा इसलिए, क्योंकि ये औसत उनके सेवा क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) की वास्तविक परिस्थितियों से मेल ही नहीं खाते।
यही कारण है कि मेघालय में इस समय हो रहे बदलाव पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए। राज्य ने डेटा गवर्नेंस की व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सार्थक रूप से निवेश किया है। उदाहरण के लिए, स्टेट हेल्थ सिस्टम्स रिसोर्स सेंटर ने मेघालय हेल्थ एटलस प्रकाशित किया है। यह ज़िला-स्तर के प्रमुख स्वास्थ्य संकेतकों का एक संकलन है, जिसे साक्ष्य-आधारित योजना निर्माण को बेहतर बनाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसके अलावा, राज्य ने ऑक्सफर्ड पॉलिसी मैनेजमेंट इंडिया के साथ एक औपचारिक समझौता भी किया है, जिसके तहत निरंतर निगरानी और मूल्यांकन पर आधारित एक वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण भी किया जाएगा।
नतीजतन, राज्य प्रशासन और चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के बीच होने वाली मासिक और त्रैमासिक समीक्षा बैठकें अब सिर्फ़ औपचारिक बैठकें नहीं रह गई हैं। वे अब ऐसी बैठकों में बदल गई हैं, जहां ज़मीनी हालात के आधार पर काम की समीक्षा होती है। इनमें मातृ और शिशु मृत्यु, टीकाकरण, टीका लगवाने से इनकार के मामले, संस्थागत प्रसव और दूसरे अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा होती है। अब ज़िला स्तर के आंकड़े सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और उपकेंद्रों तक पहुंचते हैं, ताकि हर स्तर पर स्थानीय हालात के अनुसार उनकी समीक्षा की जा सके। अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मी, जो एक दशक पहले तक टार्गेट, कवरेज और कैचमेंट जैसे शब्दों से परिचित नहीं थे, अब इन्हें अपने रोज़मर्रा के काम का हिस्सा मानते हैं। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे अपने क्षेत्र के आंकड़ों को समझें, उनकी व्याख्या करें और उन पर चर्चा भी करें। मातृ स्वास्थ्य की वास्तविक समय में निगरानी के लिए मदर ऐप के साथ-साथ डैशबोर्ड और दूसरे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म लगातार बेहतर बनाए जा रहे हैं। यह दिखाता है कि राज्य अब साक्ष्यों के आधार पर फैसले लेने वाली व्यवस्था को मज़बूत करने के लिए गंभीरता से काम कर रहा है।
लेकिन इस प्रगति के पीछे एक असहज सच भी है। मेघालय ने आंकड़ों पर आधारित व्यवस्था का ढांचा तो बना लिया है, लेकिन उसे अब तक भरोसेमंद आंकड़ों से पूरी तरह भर नहीं पाया है।
शासन की व्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ी है, लेकिन आंकड़े अब भी पीछे हैं
समीक्षा की संस्कृति और निगरानी की व्यवस्था को मज़बूत करने में राज्य ने गंभीर निवेश किया है, और यह काबिल-ए-तारीफ़ है। ज़िला और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों को अपने ही आंकड़ों को समझने और उनके आधार पर फैसले लेने के लिए तैयार करना, स्थानीय अनुभव और जानकारी को सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बनाने की कोशिश है। इससे अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों के रोज़मर्रा के अनुभव और सरकारी रिकॉर्ड के बीच की दूरी कम होती है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि कोई भी व्यवस्था उतनी ही मज़बूत होती है, जितने भरोसेमंद आंकड़े उसमें शामिल होते हैं। और मेघालय में इन आंकड़ों की गुणवत्ता अब भी हर जगह एक जैसी नहीं है।
समीक्षा बैठकों में सिर्फ़ उन्हीं मुद्दों पर चर्चा हो सकती है, जिनका रिकॉर्ड मौजूद हो। लेकिन जहां रिपोर्टिंग अधूरी हो, स्वास्थ्य केंद्रों में कर्मचारियों की कमी हो, और सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मी इतने काम में लगे हों कि उनके पास रिकॉर्ड रखने के लिए ही समय न बचता हो, वहां ज़िला स्तर तक पहुंचने वाले आंकड़े ज़मीनी हालात की पूरी तस्वीर नहीं दिखा पाते। वे केवल उसका एक हिस्सा ही सामने लाते हैं।
समस्या सिर्फ़ आंकड़ों की कमी की नहीं है। समस्या यह भी है कि जो आंकड़े दर्ज होते हैं, वे अक्सर सभी समुदायों की स्थिति को बराबरी से नहीं दिखाते। सबसे दूर-दराज़ और दुर्गम इलाकों में रहने वाले लोग – खासकर वे, जिनके गांवों तक केवल पैदल पहुंचा जा सकता है – आधिकारिक रिकॉर्ड से छूट जाने की सबसे ज़्यादा आशंका रखते हैं।
मेघालय में प्रत्येक स्वास्थ्य उपकेंद्र को औसतन लगभग 3,000 लोगों को सेवाएं प्रदान करने के लिए बनाया गया है। लेकिन व्यवहार में इसका अर्थ यह हो सकता है कि एक उपकेंद्र के अंतर्गत 9 से लेकर 28 तक गांव आते हों। यानी, कार्यभार या भौगोलिक मुश्किलें तो बाद की बातें हैं। यहां तो एक अकेली आशा कार्यकर्ता का सेवा क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) ही इतना विस्तृत और बिखरा हुआ होता है कि उनके लिए हर जानकारी का नियमित और व्यवस्थित रिकॉर्ड रखना लगभग असंभव हो जाता है। इस तरह, जो समुदाय भौगोलिक रूप से सबसे दूर हैं, वही अक्सर आंकड़ों में भी सबसे कम दिखाई देते हैं। यह दोनों समस्याएं मिलकर एक-दूसरे को और गहरा कर देती हैं।
आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन और अन्य डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों के माध्यम से डिजिटल स्वास्थ्य प्रणालियों में हो रहे बदलाव ने कई मामलों में स्पष्टता बढ़ाने के बजाय जटिलता को बढ़ा दिया है। पश्चिमी गारो हिल्स जैसे ज़िलों में इन प्रणालियों के लागू होने के बाद स्वास्थ्यकर्मियों पर समानांतर रिपोर्टिंग का अतिरिक्त भार आ गया है, जहां उन्हें एक ही जानकारी कागज़ पर और डिजिटल प्रणालियों – दोनों में अलग-अलग दर्ज करनी पड़ती है।
उदाहरण के लिए, आशा कार्यकर्ता आज भी समुदाय-आधारित आकलन चेकलिस्ट (सीबीएसी) फ़ॉर्म पहले कागज़ पर भरती हैं और फिर वही जानकारी गैर-संचारी रोग (एनसीडी) पोर्टल पर भी दर्ज करती हैं। इस तरह की दोहरी रिपोर्टिंग से प्रशासनिक कार्यभार बढ़ता है, समुदायों के बीच काम करने के कम समय मिलता है और अलग-अलग प्रणालियों में दर्ज आंकड़ों के बीच असंगति की संभावना भी बढ़ जाती है। इस बढ़े हुए कार्यभार से आंकड़ों की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ है। बल्कि कई मामलों में इसकी गुणवत्ता और भी प्रभावित हुई है।
आंकड़ों की पारदर्शिता को व्यवहार में लाना
समस्या केवल तकनीकी नहीं है। यह सांस्कृतिक और राजनीतिक भी है, और व्यवस्था के दोनों सिरों पर समान रूप से मौजूद है। लेकिन सिर्फ़ अच्छी व्यवस्था बना देना काफ़ी नहीं होता। आंकड़ों की कोई भी प्रणाली तभी काम करती है, जब नेतृत्व यह तय करे कि सही और ईमानदार आंकड़े, चाहे वे व्यवस्था की कमियां ही क्यों न दिखाएं, उन्हें छिपाने से ज़्यादा ज़रूरी हैं। यह बात सुनने में साधारण लग सकती है, लेकिन व्यवहार में ऐसा कम ही होता है।
मेघालय में यह सोच अपनाई गई है और उसके नतीजे भी दिखते हैं। यहां समीक्षा बैठकें सिर्फ़ औपचारिकता नहीं हैं। उनमें आंकड़ों की गंभीरता से समीक्षा होती है और जवाबदेही हर स्तर तक पहुंचती है। इसका एक अच्छा उदाहरण मेघालय का रेस्क्यू मिशन है, जिसे राज्य में लगातार ऊंची बनी हुई मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए शुरू किया गया।
इस मिशन की समीक्षा व्यवस्था जानबूझकर सरल रखी गई है। ज़िला स्तर की बैठकों में ज़िला आयुक्त, ज़िला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और दूसरे संबंधित अधिकारी संस्थागत प्रसव, मातृ मृत्यु और शिशु मृत्यु के मामलों की समीक्षा करते हैं। वे इन घटनाओं के कारणों की पहचान करते हैं और सामने आई चुनौतियों के आधार पर आगे की कार्ययोजना बनाते हैं। अगली समीक्षा बैठक में हर ज़िले से यह भी पूछा जाता है कि पिछली बैठक में तय किए गए कदमों पर कितना काम हुआ और क्या प्रगति हुई।
जहां आंकड़ों को सिर्फ़ दर्ज किया जाता है, लेकिन उन्हें समझने और उन पर सवाल उठाने की कोशिश नहीं होती, वहां सबसे अच्छी व्यवस्था भी महज़ एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाती है। ऐसी व्यवस्था में रिकॉर्ड तो पूरे हो जाते हैं, लेकिन आंकड़े न किसी को असहज करते हैं और न ही किसी बदलाव की वजह बनते हैं।


इस व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ आखिरकार अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों पर ही पड़ता है। उनसे एक साथ स्वास्थ्य सेवा देने, समुदाय के साथ काम करने और आंकड़े दर्ज करने की उम्मीद की जाती है। यह सब उन्हें ऐसे मोबाइल फ़ोन पर करना पड़ता है, जहां नेटवर्क अक्सर ठीक से काम नहीं करता। साथ ही, उन्हें अलग-अलग प्रारूपों में जानकारी दर्ज करनी होती है और कई बार एक बहुत बड़े सेवा क्षेत्र की ज़िम्मेदारी भी संभालनी पड़ती है।
जब आंकड़ों की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं, तो सबसे पहले उंगली अक्सर इन्हीं स्वास्थ्यकर्मियों पर उठती है। लेकिन जो स्वास्थ्यकर्मी एक बड़े ग्रामीण क्षेत्र में काम करते हुए पांच अलग-अलग रिपोर्टिंग प्रणालियों के लिए भी जानकारी भर रही हो, वह अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में विफल नहीं हो रही होती। वह बस ऐसी व्यवस्था के भीतर काम कर रही होती है, जिसे उसकी वास्तविक ज़मीनी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाया ही नहीं गया।
असल कमी व्यवस्था के ऊपरी स्तर पर है। अगर जवाबदेही की बात करनी है, तो उसकी शुरुआत भी वहीं से होनी चाहिए। मेघालय की स्वास्थ्य व्यवस्था तक पहुंचने वाले आंकड़ों की गुणवत्ता केवल बेहतर तकनीक या ज़्यादा समीक्षा बैठकें करने से नहीं सुधरेगी।
इस समस्या के समाधान के लिए राज्य को कई स्तरों पर सुनियोजित और निरंतर प्रयास करने होंगे। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:
1. आंकड़ों की गुणवत्ता के स्वतंत्र ऑडिट की व्यवस्था स्थापित करना
मेघालय को ऐसी स्थायी व्यवस्था की ज़रूरत है, जो समय-समय पर स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता की स्वतंत्र जांच करे। यह व्यवस्था उन कार्यक्रमों से अलग होनी चाहिए, जो खुद ये आंकड़े तैयार करते हैं। आखिर कोई भी कार्यक्रम ऐसे आंकड़े सामने लाना नहीं चाहता, जो उसकी अपनी कमियों को उजागर करें।
ऐसी स्वतंत्र व्यवस्था—चाहे वह राज्य की स्वास्थ्य एजेंसी, किसी तकनीकी संस्थान या किसी अन्य नामित स्वतंत्र निकाय के तहत बनाई जाए—यह पहचान सकती है कि कहां आंकड़े अधूरे, असंगत या भरोसेमंद नहीं हैं। इससे ज़िला स्तर के अधिकारियों को योजना बनाने और फैसले लेने के लिए ज़्यादा ईमानदार और भरोसेमंद आधार मिलेगा। जब तक ऐसी व्यवस्था नहीं बनती, तब तक समीक्षा की सबसे मज़बूत संस्कृति भी अधूरे और अनिश्चित आंकड़ों पर ही निर्भर रहेगी।
2. उप-जिला स्तर के आंकड़ों को प्राथमिकता देना
मेघालय जैसे विविधता वाले राज्य में सिर्फ़ राज्य या ज़िले के औसत आंकड़ों के आधार पर योजना बनाना काफ़ी नहीं है। राज्य के तीन प्रमुख क्षेत्र—गारो हिल्स, खासी हिल्स और जैंतिया हिल्स—एक-दूसरे से काफ़ी अलग हैं। उनकी अपनी जातीय पहचान, परंपराएं, भाषाएं, खान-पान, भौगोलिक परिस्थितियां और स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां हैं।
ऐसे में पूरे राज्य का एक औसत आंकड़ा इन क्षेत्रों के बीच मौजूद बड़े अंतर को छिपा सकता है। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, उनका इस्तेमाल और स्वास्थ्य परिणाम हर क्षेत्र में अलग हो सकते हैं। इसलिए स्वास्थ्य योजनाएं जितना संभव हो, ब्लॉक और गांव स्तर के आंकड़ों के आधार पर बननी चाहिए। इनमें मातृ मृत्यु, टीकाकरण, पोषण और प्रमुख बीमारियों जैसे महत्वपूर्ण संकेतकों को शामिल किया जाना चाहिए।
इसके लिए उप-ज़िला स्तर पर बेहतर आंकड़े जुटाने की क्षमता विकसित करने में योजनाबद्ध निवेश करना होगा। साथ ही, उन अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों को भी ज़रूरी सहयोग देना होगा, जो अधिकांश आंकड़े तो जुटाते हैं, लेकिन उन आंकड़ों के आधार पर फैसले लेने या उनकी समीक्षा की प्रक्रिया में शायद ही कभी शामिल किए जाते हैं।
3. अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कर्मियों पर रिपोर्टिंग का बोझ कम करना
आज स्वास्थ्यकर्मियों को एक ही जानकारी कई बार दर्ज करनी पड़ती है—कागज़ी रजिस्टरों में, ऑनलाइन पोर्टलों पर और अलग-अलग सरकारी कार्यक्रमों के प्लेटफ़ॉर्मों पर। यह किसी सोची-समझी डेटा व्यवस्था का हिस्सा नहीं है, बल्कि समय के साथ जुड़ती गई अलग-अलग रिपोर्टिंग ज़रूरतों का नतीजा है।
राज्य को आशा कार्यकर्ताओं, एएनएम और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के कर्मचारियों से जुड़ी सभी रिपोर्टिंग ज़रूरतों की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए। इस दौरान यह पहचानना ज़रूरी है कि कहां एक ही जानकारी बार-बार मांगी जा रही है और कहां अलग-अलग व्यवस्थाएं एक-दूसरे से मेल नहीं खाती। इसके बाद ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जिसमें जानकारी सिर्फ़ एक बार दर्ज करनी पड़े और वहीं से अलग-अलग कार्यक्रमों और प्रशासनिक स्तरों की ज़रूरत के मुताबिक उसका इस्तेमाल किया जा सके।
4. दस्तावेज़ीकरण के ज़रिए संस्थागत अनुभव को सुरक्षित रखना
मेघालय में यह जानकारी कि कौन-सी पहल सफल रही, कौन-सी नहीं चली और स्थानीय स्वास्थ्य चुनौतियां वास्तव में क्या हैं, अक्सर कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों के अनुभवों तक ही सीमित रहती है। लेकिन जब उनका तबादला हो जाता है, वे सेवानिवृत्त हो जाते हैं या दूसरी ज़िम्मेदारी संभाल लेते हैं, तो यह अनुभव भी व्यवस्था से लगभग गायब हो जाता है। इसलिए राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रमुख कार्यक्रमों से जुड़े फैसलों, उनके पीछे के कारणों और उनके नतीजों का व्यवस्थित रिकॉर्ड रखा जाए। यह दस्तावेज़ सिर्फ़ सरकारी फाइलों तक सीमित न रहे, बल्कि नए अधिकारियों के लिए ऐसा संसाधन बने, जिससे वे आसानी से सीख सकें और योजना बना सकें।
नए कार्यक्रम शुरू करने या संसाधनों का बंटवारा करने से पहले अधिकारियों को इन दस्तावेज़ों की समीक्षा करनी चाहिए। इससे उन्हें पता चल सकेगा कि पहले क्या काम आया, क्या नहीं चला और किन वजहों से दिक्कतें आईं। इस आधार पर वे नए कार्यक्रमों को स्थानीय ज़रूरतों के मुताबिक तैयार कर सकेंगे, बजाय हर बार पुराने या सामान्य समाधान दोहराने के। ऐसा दस्तावेज़ीकरण नए अधिकारियों के प्रशिक्षण में भी मदद करेगा, बार-बार होने वाले तबादलों से होने वाले नुकसान को कम करेगा और कार्यक्रमों की निरंतरता बनाए रखेगा। समय के साथ इससे योजना बनाना कुछ लोगों के व्यक्तिगत अनुभव पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के साझा अनुभव और सीख पर आधारित हो सकेगा।
मेघालय ने पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में काफ़ी प्रगति की है। राज्य ने स्वास्थ्य शासन की एक ऐसी व्यवस्था विकसित की है, जो सिर्फ़ कागज़ों तक सीमित नहीं है। इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि अब आंकड़ों को केवल औपचारिक रिपोर्टिंग का हिस्सा नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने के एक ज़रूरी साधन के रूप में देखा जाने लगा है। इस बदलाव को बनाए रखना और आगे बढ़ाना ज़रूरी है।
लेकिन आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि राज्य की मज़बूत समीक्षा व्यवस्था और उसमें पहुंचने वाले आंकड़ों की गुणवत्ता के बीच अब भी बड़ा अंतर है। इसे सिर्फ़ बेहतर डैशबोर्ड बनाने या ज़्यादा समीक्षा बैठकें करने से दूर नहीं किया जा सकता। इसके लिए उन बुनियादी समस्याओं को ठीक करना होगा, जिनकी वजह से शुरुआत से ही अधूरे या अविश्वसनीय आंकड़े तैयार होते हैं। इनमें संसाधनों की कमी से जूझ रहे अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मी, बिखरी हुई रिपोर्टिंग व्यवस्था और ऐसी प्रणाली शामिल हैं, जिसमें कई बार सही तस्वीर दिखाने से ज़्यादा अच्छे प्रदर्शन का दिखना महत्वपूर्ण बन जाता है।
ज़रूरत बेहतर आंकड़ों का इंतज़ार करने की नहीं है। ज़रूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जो मौजूद आंकड़ों को ईमानदारी से सामने लाए, उन्हें फैसले लेते समय इस्तेमाल करे और यह सुनिश्चित करे कि वे ज़मीनी हकीकत को सही तरह से दिखाएं।
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लेखक के बारे में
- जैस्मिन मारिंगमेई इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ, शिलांग में कार्यरत हैं। इससे पहले वह इंटरनेशनल एड्स वैक्सीन इनिशिएटिव के ‘एक्ज़ेम्प्लर्स इन ग्लोबल हेल्थ नेटवर्क’ में स्वास्थ्य प्रणालियों और स्वास्थ्य नीति अनुसंधान विशेषज्ञ के रूप में काम कर चुकी हैं। जैस्मिन दिल्ली और मणिपुर की राज्य सरकारों में भी विभिन्न पदों पर काम कर चुकी हैं। वह अटलांटिक फेलोज़ फॉर हेल्थ इक्विटी की वरिष्ठ फेलो हैं और उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई से एमफिल की उपाधि प्राप्त की है।
- डॉ. तियामेरेन जमीर एक चिकित्सक और जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं, जिन्हें आपातकालीन चिकित्सा, स्वास्थ्य प्रबंधन, चिकित्सा शिक्षा, आपदा प्रबंधन और अनुसंधान के क्षेत्र में 18 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वह इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक हेल्थ, शिलांग में रजिस्ट्रार हैं और साथ ही आपातकालीन चिकित्सक के रूप में अपनी क्लिनिकल प्रैक्टिस भी करते हैं। वह आपातकालीन चिकित्सा से जुड़े अनेक अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों में प्रशिक्षक भी हैं। उनका काम मुख्य रूप से स्वास्थ्य प्रणालियों को सुदृढ़ बनाने, क्षमता निर्माण, कार्यान्वयन अनुसंधान तथा साक्ष्य-आधारित नीति और व्यवहार के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार पर केंद्रित है।




