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झारखंड में शिक्षक बनने के सपनों पर व्यवस्था की मार

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अप्रैल 2026 में झारखंड के करीब 8,000 शिक्षक भूख हड़ताल पर रहते हुए भी कक्षाओं में पढ़ाते रहे। उनका यह विरोध उन ख़बरों के बाद शुरू हुआ, जिनके मुताबिक़ स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए राज्य के 523 ग़ैर-अनुदान प्राप्त संस्थानों में से 223 को दी जाने वाली वित्तीय सहायता रोक दी थी। शिक्षकों ने चेतावनी दी कि इस फ़ैसले से करीब चार लाख छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। इसके विरोध में उन्होंने रांची में राज्यव्यापी महाधरने का ऐलान किया।

इसी महीने, सरकार ने लंबे समय से लंबित झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटीईटी) को भी टाल दिया। यह राज्य-स्तरीय परीक्षा केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की ओर से आयोजित राष्ट्रीय स्तर की केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा (सीटीईटी) के समान है। प्राथमिक और सहायक स्कूल शिक्षक के पदों पर नियुक्ति पाने के इच्छुक अभ्यर्थियों के लिए जेटीईटी पास करना अनिवार्य है। लेकिन झारखंड में पिछले एक दशक से यह परीक्षा आयोजित नहीं हुई है।

एक ओर, वित्तीय सहायता में कटौती के कारण शिक्षक बिना वेतन के पढ़ाने को मजबूर हैं। दूसरी ओर, शिक्षक बनने की योग्यता रखने वाले अनगिनत अभ्यर्थी परीक्षा का इंतज़ार कर रहे हैं। ये दोनों स्थितियां एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की ओर इशारा करती हैं, जिसने धीरे-धीरे अपनी ही बुनियाद को मज़बूत करने में निवेश करना बंद कर दिया है। इसका असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ना तय है।

शिक्षकों की कमी और कक्षाओं में असंतुलित छात्र-शिक्षक अनुपात 

2025–26 की यूनिफ़ाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फ़ॉर्मेशन सिस्टम फ़ॉर एजुकेशन (यूडीआईएसई) रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में कुल 44,378 स्कूल हैं। इनमें से 35,819 राज्य सरकार द्वारा संचालित हैं, जबकि 1,146 सरकारी सहायता प्राप्त संस्थान हैं। इन सभी स्कूलों में करीब 75 लाख छात्र पढ़ते हैं। इनमें से 55 लाख बच्चे बुनियादी (पूर्व-प्राथमिक), प्रारंभिक (प्राथमिक) और उच्च प्राथमिक स्तर पर शिक्षा हासिल कर रहे हैं।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत प्राथमिक स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात (पीटीआर) 30:1 निर्धारित किया गया है। इस मानक के मुताबिक़, झारखंड में 1,85,238 शिक्षक होने चाहिए। लेकिन आंकड़ों के अनुसार, राज्य में प्राथमिक स्तर पर कम से कम 60,000 शिक्षकों की कमी है। अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज़्यां द्रेज़ की ओर से दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करते हुए रांची हाईकोर्ट ने 2025 में 26,000 शिक्षकों की भर्ती का आदेश दिया था। हालांकि, जेटीईटी में देरी समेत कई कारणों से अब तक इस आदेश पर अमल नहीं हो सका है।

इसका असर स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता पर भी साफ़ दिखाई देता है। राज्य के 9,827 स्कूलों में सिर्फ़ एक शिक्षक है। यह राज्य के कुल स्कूलों का 20 प्रतिशत से भी अधिक है। इन स्कूलों में चार लाख से ज़्यादा बच्चे पढ़ते हैं। ऐसे स्कूलों में अकेला शिक्षक अक्सर पूरे स्कूल की ज़िम्मेदारी संभालता है। उसे कक्षाओं में पढ़ाने के साथ-साथ मिड-डे मील की व्यवस्था जैसे दूसरे काम भी देखने पड़ते हैं। इन तमाम ज़िम्मेदारियों को अकेले निभाने के लिए न तो उसके पास पर्याप्त संसाधन होते हैं और न ही ज़रूरी प्रशिक्षण।

हालांकि, झारखंड में शिक्षक बनने की राह की चुनौतियां कक्षाओं में शिक्षकों की कमी या जेटीईटी परीक्षा में देरी तक सीमित नहीं हैं। शिक्षक बनने की इच्छा रखने वालों को इससे बहुत पहले ही शिक्षा और प्रशिक्षण की ऐसी व्यवस्था का सामना करना पड़ता है, जिस पर बाज़ार की सोच हावी होती जा रही है। नतीजतन, यह व्यवस्था सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देने के बजाय मुनाफ़ा कमाने वाली वस्तु की तरह काम करने लगी है।

सार्वजनिक संस्थानों की कमी और निजी प्रशिक्षण का प्रसार 

संविधान के अनुच्छेद 246(2) की सातवीं अनुसूची के तहत संविधान शिक्षा के लिए एक साझा विधायी ढांचा स्थापित करता है। इसके तहत केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों को शिक्षा से जुड़े क़ानून बनाने का अधिकार है। इस व्यवस्था के तहत झारखंड में शिक्षक शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है। फ़िलहाल राज्य में बीएड कार्यक्रमों के लिए पंजीकृत लगभग 139 शिक्षक शिक्षा संस्थान (टीईआई) हैं, जहां 15,000 से अधिक शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जाता है। लेकिन इनमें से केवल चार संस्थानों को सरकारी वित्तीय सहायता मिलती है और इन सभी को मिलाकर महज़ 400 सीटें उपलब्ध हैं।

यहां तक कि जब छात्र इन संस्थानों में दाख़िले के योग्य हो जाते हैं, तब भी कोर्स की फ़ीस और उससे जुड़े अन्य ख़र्च उनके लिए बड़ी बाधा बनते हैं। सरकारी संस्थानों में दो वर्षीय बीएड डिग्री की सालाना फ़ीस औसतन 20,000 से 30,000 रुपये के बीच होती है। इसमें रहने, खाने और रोज़मर्रा के दूसरे ख़र्च शामिल नहीं हैं। इन सभी ख़र्चों को जोड़ दें, तो कुल लागत लगभग 2 से 2.5 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। दूसरी ओर, झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय को छोड़कर राज्य के ज़्यादातर विश्वविद्यालयों में शिक्षा विभाग ही नहीं हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालय में दो वर्षीय बी.एड. कार्यक्रम की फ़ीस लगभग 65,000 रुपये है। इसमें भी रहने और दूसरी ज़रूरी चीज़ों का ख़र्च शामिल नहीं है। इस तरह, सरकारी सहायता मिलने के बावजूद, इन संस्थानों में पढ़ाई का ख़र्च कई छात्रों के लिए इतना ज़्यादा है कि वे इसे पूरा नहीं कर सकते। मैंने अपने सहपाठियों और साथियों के बीच भी यह स्थिति देखी है।

झारखंड में शिक्षक बनने की चाह रखने वालों के सामने मोटे तौर पर दो ही विकल्प हैं: या तो वे सरकारी संस्थानों में सीमित सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करें या फिर निजी शिक्षक शिक्षा संस्थानों (टीईआई) में दाखिला लें, जहां शिक्षा की गुणवत्ता अपेक्षाकृत कमतर है।

शिक्षक शिक्षा पर न्यायमूर्ति वर्मा आयोग की रिपोर्ट (2012) और नैशनल करिक्युलम फ़्रेमवर्क ऑन टीचर एजुकेशन (2009), दोनों ने शिक्षक शिक्षा संस्थानों (टीईआई) और विश्वविद्यालयों के शिक्षा विभागों के बीच इस दूरी पर चिंता जताई थी। दोनों रिपोर्टों में शिक्षक शिक्षा संस्थानों की बदहाल स्थिति को भी रेखांकित किया गया था। इसके बाद बी.एड. कार्यक्रमों की अवधि बढ़ाई गई है और इंटर्नशिप की शुरुआत भी हुई है। लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षण की आलोचनात्मक समझ विकसित करने और अकादमिक परिश्रम जैसे बुनियादी सवाल अब भी जस के तस हैं। इसके बजाय, शिक्षक प्रशिक्षण की प्रक्रिया धीरे-धीरे अधिक तकनीकी होती गई है और इसमें मुख्य रूप से तकनीकी कौशल विकसित करने पर ज़ोर दिया जाने लगा है।

राज्य में सरकारी वित्तपोषित संस्थानों की कमी और सीमित सीटों के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने छात्रों को निजी शिक्षक शिक्षा संस्थानों (टीईआई) की ओर जाने के लिए मजबूर कर दिया है। इन संस्थानों में से कई नैशनल काउन्सिल फ़ॉर टीचर एजुकेशन (एनसीटीई) द्वारा निर्धारित गुणवत्ता मानकों की अनदेखी करते पाए गए हैं। ये निजी संस्थान फ़ीस के नाम पर भारी-भरकम रकम भी वसूलते हैं। यहां दो वर्षीय बीएड कार्यक्रम की फ़ीस दो लाख रुपये से अधिक है। रहने, फ़ील्ड वर्क और इंटर्नशिप पर होने वाले ख़र्च जोड़ दें, तो कुल लागत लगभग दोगुनी हो जाती है।

अंततः, इन सभी कारणों के चलते उन छात्रों के लिए शिक्षक प्रशिक्षण हासिल करना लगभग असंभव हो जाता है, जो अपने परिवार में पहली बार उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं या जो आर्थिक और सामाजिक रूप से कमज़ोर तथा अन्य हाशिए पर रहने वाले समुदायों से आते हैं।

कमरे में रखी कुछ बेंच_टीचर
झारखंड में शिक्षक बनने की आकांक्षा रखने वालों के सामने दो ही विकल्प हैं: या तो वे सरकारी संस्थानों में सीमित सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करें, या फिर उन निजी शिक्षक शिक्षा संस्थानों (टीईआई) में जाने को मजबूर हों, जहां शिक्षा की गुणवत्ता कम है। | चित्र साभार: पेक्सेल्स

सिल्ली के एक अनुसूचित जनजाति समुदाय से आने वाले रमेश* ने मुझे बताया, “झारखंड में साधारण और आदिवासी परिवारों के बच्चे बीएड की पढ़ाई कर ही नहीं सकते। दो साल के इस कोर्स के लिए 3–4 लाख रुपये आख़िर कौन जुटा सकता है?” वह रांची के एक अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा संचालित माध्यमिक विद्यालय में गणित के शिक्षक हैं। रमेश को एक सरकारी संस्थान में बीएड में दाख़िला तो मिल गया, लेकिन उनकी कोर्स फ़ीस पर कोई सब्सिडी नहीं थी। यह फ़ीस लगभग उतनी ही थी, जितनी किसी निजी संस्थान में होती है। अपनी पढ़ाई का ख़र्च उठाने के लिए रमेश को स्थानीय साहूकारों और दोस्तों से कर्ज़ लेना पड़ा। उन्होंने वादा किया था कि राज्य सरकार से अलग से मिलने वाली पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति की रकम से वह उनका पैसा लौटा देंगे।

लेकिन छात्रवृत्ति की राशि जारी करने में अनियमितताओं और देरी के कारण रमेश के लिए कर्ज़ चुकाना मुश्किल हो गया। उन्होंने आगे बताया, “कई बार ऐसा भी हुआ है कि मुझे पूरा हफ़्ता सिर्फ़ उबले चावल का पानी, नमक और मिर्च खाकर गुज़ारा करना पड़ा।”

झारखंड में शिक्षक बनने की चाह रखने वालों के सामने मोटे तौर पर दो ही विकल्प हैं: या तो वे सरकारी संस्थानों में सीमित सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करें या फिर निजी शिक्षक शिक्षा संस्थानों (टीईआई) में दाखिला लें, जहां शिक्षा की गुणवत्ता अपेक्षाकृत कमतर है। ऊंची फ़ीस और छात्रवृत्ति के सीमित अवसर इस चुनौती को और बढ़ा देते हैं। शिक्षा हासिल करने के अवसरों तक पहुंच मुश्किल होने के कारण, मेरे कुछ साथियों ने पढ़ाने में रुचि होने के बावजूद बीएड करने का विचार त्याग दिया। उनके लिए निजी संस्थानों की फ़ीस चुकाना संभव नहीं था और राज्य सरकार से वित्तीय सहायता पाने वाले संस्थानों में सीटें सीमित थीं।

इसके चलते, कई छात्रों को पढ़ाई के लिए झारखंड से बाहर जाना पड़ा है। अपने अनुभव की बात करूं, तो मैंने भी झारखंड में पढ़ाई करने के बजाय दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के बी.एड. कार्यक्रम में दाख़िला लिया। इसकी दो वजहें थीं: झारखंड के संस्थानों में फ़ीस का बहुत ज़्यादा होना और वहां के निजी शिक्षक शिक्षा संस्थानों (टीईआई) की शिक्षा की गुणवत्ता पर भरोसा न होना। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) और जामिया जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालयों में फ़ीस झारखंड के संस्थानों के मुक़ाबले कम है। लेकिन दिल्ली जैसे बड़े शहरों में रहने और गुज़र-बसर का ख़र्च ज़्यादा है। ऐसे में, शिक्षक बनने की राह चुनने वाले अभ्यर्थियों को पढ़ाई की फ़ीस और दूसरे शहर में रहने के ख़र्च के बीच लगातार संतुलन बैठाना पड़ता है।

इस बीच, झारखंड के सभी 24 ज़िला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों (डीआईईटी) में भी ऐसे ही हालात देखने को मिले हैं। ये ज़िला स्तर के सरकारी संस्थान हैं, जहां स्कूली शिक्षकों को सेवाकालीन और पूर्व-सेवा शिक्षक प्रशिक्षण दिया जाता है।

सरकारी संस्थानों की कमज़ोर स्थिति या उनका अभाव और निजी, अनियंत्रित संस्थानों का बेलगाम विस्तार, शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता के लिए तय न्यूनतम मानकों को भी कमज़ोर कर रहा है।

इन संस्थानों का उद्देश्य 33,000 से अधिक बुनियादी, प्रारंभिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित करना है। लेकिन नैशनल करिक्युलम फ़्रेमवर्क ऑन टीचर एजुकेशन (एनसीएफ़टीई) की 2009 में प्रकाशित रिपोर्ट, अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन की 2010 की रिपोर्ट, नैशनल कोएलिशन फ़ॉर एजुकेशन की 2015 की रिपोर्ट और विश्व बैंक की 2025 की रिपोर्ट में लगातार कई समस्याओं का ज़िक्र किया गया है। इनमें प्रशिक्षण की गुणवत्ता, बुनियादी ढांचे से जुड़ी बाधाएं, छात्रों की शैक्षणिक योग्यताओं के प्रमाणन में अनियमितता, शिक्षकों के ख़ाली पद, जानबूझकर वित्तीय प्रावधानों से अधिक ख़र्च करना और शोध व प्रशिक्षण की सीमित क्षमता जैसी समस्याएं शामिल हैं।

इन समस्याओं और गुणवत्ता मानकों का पालन न किए जाने के कारण एनसीटीई को भी समय-समय पर कई संस्थानों की मान्यता रद्द करनी पड़ी है।

सरकारी वित्तीय सहायता की कमी ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। 2024 में शिक्षा मंत्रालय की ओर से संसद में दिए गए एक जवाब से पता चला कि समग्र शिक्षा अभियान (एसएसए) के तहत वित्त वर्ष 2023-24 के लिए 92,320.18 करोड़ रुपये की राशि मंज़ूर की गई थी, लेकिन देशभर के ज़िला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों (डीआईईटी) को केवल 30,559.13 करोड़ रुपये ही जारी किए गए। ये संस्थान शोध करने, पाठ्यक्रम विकास में सहयोग देने और शिक्षकों की क्षमता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में डीआईईटी को मज़बूत बनाने की महत्वाकांक्षी योजना शामिल की गई है। लेकिन वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने और प्रशासनिक स्तर पर ठोस प्रतिबद्धता की कमी से यह आशंका पैदा होती है कि ये वादे अमल में लाने के बजाय महज़ बयानबाज़ी तक सीमित रह सकते हैं।

इस बीच, सरकारी संस्थानों की कमज़ोर स्थिति या उनका अभाव और निजी, अनियंत्रित संस्थानों का बेलगाम विस्तार, शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता के लिए तय न्यूनतम मानकों को भी कमज़ोर कर रहा है। उदाहरण के लिए, 2025–26 के यूडीआईएसई प्लस के आंकड़ों के अनुसार, झारखंड के सभी स्तरों के स्कूलों में कार्यरत कुल 2,07,697 शिक्षकों में से लगभग 33 प्रतिशत यानी 68,872 शिक्षकों के पास शिक्षण से जुड़ी व्यावसायिक योग्यता नहीं थी। यह स्थिति तब है, जब पिछले कई वर्षों से फ़र्ज़ी डिग्रियों के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति होने की ख़बरें आती रही हैं।

नीतिगत स्तर पर महत्त्व की कमी और बुनियादी ढांचे के लिए पर्याप्त सहायता न मिलने के साथ-साथ शिक्षक शिक्षा का व्यावसायीकरण और उसे मुनाफ़ा कमाने वाली वस्तु बना देना, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की भावना को कमज़ोर करता है। इन प्रावधानों में सामाजिक न्याय और संवैधानिक नैतिकता पर आधारित समावेशी और समान शिक्षा की परिकल्पना की गई थी। जब शिक्षक बनने की तैयारी की प्रक्रिया ही इतनी बहिष्कारी हो, तो समता, समावेशन और सामाजिक न्याय के दावे कैसे किए जा सकते हैं?

तत्काल सुधार नहीं किए गए, तो झारखंड में टीचर एजुकेशन महज़ एक खोखला वादा बनकर रह जाएगी। इससे लोगों को सामाजिक बंधनों से मुक्त करने और उन्हें सशक्त बनाने की इसकी क्षमता भी कमज़ोर पड़ जाएगी।

संवैधानिक आदर्शों को ढहने से बचाना और सुधारों की तात्कालिक राजनीतिक ज़रूरत

इन गंभीर हालात को देखते हुए कुछ सवाल उठना स्वाभाविक है:

  1. क्या कड़े और सुलभ शिक्षक प्रशिक्षण के बिना गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा संभव है? 
  2. क्या शिक्षकों को वैसे “सामाजिक बदलाव के एजेंट” के रूप में तैयार किया जा रहा है, जैसी परिकल्पना राष्ट्रीय नीतियों में की गई है? 
  3. राज्य ने सरकारी शिक्षक शिक्षा संस्थानों (टीईआई) में निवेश करने के अपने संवैधानिक कर्तव्य की अनदेखी क्यों की है? 
  4. झारखंड के राज्य विश्वविद्यालयों में शिक्षा पर शोध करने वाले सरकारी वित्तपोषित विभाग क्यों नहीं हैं? 

ये तकनीकी या प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक सवाल हैं। ऐसे समय में, जब भारत की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था नव-उदारवादी, सांप्रदायिक और लोकतंत्र-विरोधी ख़तरों का सामना कर रही है, टीचर एजुकेशन को मुनाफ़ा कमाने वाली वस्तु बनाए जाने की प्रवृत्ति का विरोध करना ज़रूरी है। ख़ासकर इसलिए, क्योंकि इसके चलते उन छात्रों और भावी शिक्षकों के लिए रास्ते बंद होते जा रहे हैं, जो अपने परिवार में पहली बार शिक्षा हासिल कर रहे हैं या ऐसे समुदायों से आते हैं, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से शिक्षा से वंचित रखा गया है।

सरकारी वित्तपोषित शिक्षक शिक्षा संस्थानों (टीईआई) और ज़िला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों (डीआईईटी) की संख्या बढ़ाना और टीचर एजुकेशन तक पहुंच को आसान बनाने की तत्काल आवश्यकता है, ख़ासकर हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए।

एनसीएफ़टीई 2009 और शिक्षक शिक्षा पर न्यायमूर्ति वर्मा आयोग की रिपोर्ट (2012) में टीचर एजुकेशन संस्थानों (टीईआई) को मज़बूत बनाने और उन्हें विनियमित करने के लिए पहले ही कई सुझाव दिए जा चुके हैं। इनमें संस्थानों की स्थापना के लिए सरकारी निवेश बढ़ाना, शिक्षकों को तैयार करने की संस्थागत क्षमता का विस्तार करना, संस्थानों को बहु-विषयक और अंतर्विषयक शैक्षणिक परिवेश का हिस्सा बनाना और विश्वविद्यालयों में शिक्षा के क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने के लिए कुल निवेश बढ़ाना शामिल है। इसके तहत शिक्षक शिक्षा में शोध को प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है।

सक्षम, आलोचनात्मक और संवेदनशील शिक्षकों के बिना हम शिक्षा को आज़ादी का साधन नहीं बना सकते। हेनरी गिरू और पाउलो फ्रेरे जैसे आलोचनात्मक शिक्षाविदों और भारत में जाति-विरोधी समाज सुधारकों एवं शिक्षाविदों ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले और फ़ातिमा शेख़ ने यह कल्पना की। मिसाल के तौर पर, फुले ने 1882 के ‘मेमोरियल एड्रेस्ड टू द एजुकेशन कमीशन’ में प्राथमिक विद्यालयों की संख्या बढ़ाने की मांग की थी। उन्होंने सुझाव दिया था कि “मौजूदा देशी विद्यालयों का उचित उपयोग किया जाए और उन्हें प्रशिक्षित तथा प्रमाणपत्र प्राप्त शिक्षकों के ज़रिए चलाया जाए। इसके लिए इन विद्यालयों को उदारतापूर्वक अनुदान भी दिया जाए।”

महात्मा फुले के उस ज्ञापन के 144 साल बाद भी टीचर एजुकेशन की स्थिति बेहद चिंताजनक है। इस व्यवस्था में गहराई तक जड़ें जमा चुकी ख़ामियों को स्वीकार करना और उन्हें दूर करना ज़रूरी है। यह सिर्फ़ झारखंड के भविष्य का सवाल नहीं है, बल्कि भारत में लोकतंत्र को मज़बूत बनाने की दिशा में एक सामाजिक और राजनीतिक अनिवार्यता भी है।

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लेखक के बारे में

  • शिशु रंजन ऑल इंडिया फ़ोरम फ़ॉर राइट टू एजुकेशन (एआईएफ़आरटीई) के प्रेसिडियम सचिवालय के सदस्य हैं। वह झारखंड और राष्ट्रीय स्तर पर छात्र राजनीति में सक्रिय रहे हैं, और उनका काम शिक्षा, सामाजिक न्याय और पहली पीढ़ी के शिक्षार्थियों पर केंद्रित है, विशेष रूप से उन छात्रों पर जो पर्याप्त सामाजिक-आर्थिक पूंजी तक पहुंच के बिना कानून की पढ़ाई कर रहे हैं। शिशु के पास स्कूल और स्नातक स्तर पर पढ़ाने का अनुभव भी है। उन्होंने यौन और प्रजनन स्वास्थ्य पर काम किया है, और शिक्षा के क्षेत्र में एक शोधकर्ता रहे हैं। उच्च शिक्षा और सामाजिक न्याय पर उनके लेख द वायर, द इंडियन एक्सप्रेस, मक्तूब और द लीफ़लेट सहित विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म पर प्रकाशित हुए हैं। शिशु एक शेवनिंग स्कॉलर हैं और उन्होंने बर्कबेक, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से शिक्षा और सामाजिक न्याय में एमएससी की डिग्री प्राप्त की है।
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