“इन सा* क**नों को थोड़ी बॉक्सिंग करवाओ! फिर देखना ये कैसे लाइन पर आते हैं।”
हम प्रोजेक्ट सेकंड चांस नाम की एक गैर-लाभकारी संस्था चलाते हैं, जो भारत में जेल सुधार और जेल से बाहर आ चुके लोगों के साथ मिलकर काम करती है। इस संस्था की एक प्रस्ताव बैठक में एक सीएसआर लीडर ने हमसे (मोहित और सांची)* यह बात कही थी। लेकिन न तो यह बयान असामान्य है और न ही इसके पीछे की सोच: कि जेल में बंद लोगों में कोई ऐसी कमी है, जिसे पंचिंग बैग ही ठीक कर सकता है; और यह कि उनकी समस्याएं सिर्फ उनकी अपनी हैं।
फंडर्स के साथ कॉन्फ्रेंस और बैठकों में हमें अक्सर यह समझाना पड़ता है कि आखिर जेल से बाहर आ चुके लोगों को नई शुरुआत का मौका क्यों मिलना चाहिए। जेल सुधार, न्याय तक पहुंच और पुनर्वास से जुड़ी चर्चाएं अक्सर छोटे-छोटे प्रयासों या कुछ समय के वोकेशनल प्रोग्राम तक सिमट जाती हैं, जहां ज़मीनी बदलाव के बजाय बड़े पैमाने पर दिखने वाले नतीजों को प्राथमिकता दी जाती है।
इसमें जेल जाने से जुड़ी वह सोच भी झलकती है, जो समाज में व्यापक रूप से मौजूद है। आज भी आम धारणा में हमारी जेलें उन अपराधियों को बंद रखने और सज़ा देने की जगहें हैं, जिन्हें कानून की तय सीमाएं तोड़ने वाला माना जाता है। लेकिन सच्चाई इतनी सीधी नहीं है। किसी भी व्यक्ति को अगर सज़ा होती भी है, तो उसे दोषी ठहराए जाने में कई साल लग सकते हैं। लेकिन असल सज़ा तो वह पूरी प्रक्रिया है, जिसमें उसे कई स्तर से गुज़रना पड़ता है: यानी पुलिस की थका देने वाली कारवाई, अदालतों के चक्कर और सामाजिक बहिष्करण। और यह सब उसी पल से शुरू हो जाता है, जब व्यक्ति ने जेल की चौखट पर कदम भी नहीं रखा होता।
इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 के मुताबिक, भारत में 1332 जेलें हैं, जिनमें 4.4 लाख लोगों को रखने की क्षमता है। लेकिन इस समय जेलों में 5.3-5.8 लाख लोग बंद हैं और देशभर की 12 जेलों में क्षमता से 400 प्रतिशत तक ज़्यादा लोग क़ैद में हैं। इतना ही नहीं, जेलों में बंद लोगों में 76 प्रतिशत विचाराधीन कैदी हैं, जिनमें से 49 प्रतिशत की उम्र 18 से 30 साल के बीच है।
आज भी आम धारणा में हमारी जेलें उन अपराधियों को बंद रखने और सज़ा देने की जगहें हैं, जिन्हें कानून की तय सीमाएं तोड़ने वाला माना जाता है।
ये आंकड़े भारत में कारावास और जेल व्यवस्था के पैमाने और दायरे को सामने रखते हैं। लेकिन डेटा जितना कुछ उजागर करता है, उतना ही काफी कुछ छिपा भी सकता है। वह अलग-अलग ज़िंदगियों को एक ऐसी भीड़ में बदल देता है, जिसमें हर व्यक्ति एक जैसा नज़र आता है। इसलिए जेल व्यवस्था जैसे बहु-स्तरीय ढांचे में यह समझना मुश्किल हो सकता है कि सुधार की शुरुआत कहां से और कैसे की जाए।
भारत की जेलों में एक दशक तक काम करने के बाद हम कह सकते हैं कि इस तंत्र में एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने के मौके बहुत कम सामने आते हैं। इसके अलावा, सुधार अक्सर किसी एक जेल तक ही सीमित रह जाता है। मसलन, देहरादून जिला जेल के जेलर पवन कोठारी ने जेल में मुलाकात की प्रक्रिया में व्यापक बदलाव किया है। पहले कैदियों और उनके परिवारों के बीच मुलाकात के लिए बदहाल कमरों का इस्तेमाल होता था, जिनमें दरारों वाली धुंधली स्क्रीन लगी होती थी। उन्होंने इसे हटाकर एक खुले परिसर में मुलाक़ात का प्रावधान किया, जहां कैदी अपने परिवारों से मिल और बातचीत कर सकते थे।
लेकिन जब ऐसी पहलें अलग-अलग स्तरों पर, एक-दूसरे से अलग-थलग चलती हैं, तो अक्सर उनका शीर्ष स्तर की नीतिगत चर्चाओं या ‘एविडेंस-बेस्ड’ कार्रवाई से कोई संबंध नहीं बन पाता। दिल्ली, उत्तराखंड और हरियाणा समेत कई जगहों पर कैदियों और अधिकारियों के साथ काम करने के दौरान हमने यह भी पाया है कि कार्रवाई और बदलाव अक्सर जेल से जुड़े किसी एक व्यक्ति के विवेक और पहल पर निर्भर रहते हैं। इसका मतलब है कि अगर किसी अधिकारी का तबादला हो जाए या उनकी नियुक्ति बदल जाए, तो काम रुक सकता है या पूरी तरह बंद हो सकता है। इससे संस्थागत स्तर पर सुधार लाना भी मुश्किल हो जाता है।
भारत में जेलों में बंद लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या हम लोगों को सज़ा देने और जेल में रखने के लिए और अधिक इंतज़ाम करें, या फिर उनके पुनर्वास और सुधार पर निवेश करें, ताकि वे दोबारा समाज का हिस्सा बन सकें।
पुनर्वास और समाज में वापसी की ओर
भारत अपने जेल सिस्टम पर हर साल करीब एक अरब डॉलर खर्च करता है। इस रकम का बड़ा हिस्सा पुनर्वास के बजाय लोगों को कैद रखने में खर्च होता है। लेकिन जेलों में आखिर कौन लोग बंद हैं? और क्या भारत की जेलों में एक ही जैसे लोग बंद हैं?
आंकड़े लगातार दिखाते रहे हैं कि भारत की जेलों में हाशिए पर रहने वाले समुदायों की आबादी उनके अनुपात से कहीं ज्यादा है: दलित समुदायों के लोग 22 प्रतिशत, मुस्लिम 16.5 प्रतिशत और आदिवासी समुदायों के लोग 13 प्रतिशत। कुछ साल पहले हमने एक अध्ययन किया था। इसमें पाया गया कि गरीब लोग, जिन्हें उचित कानूनी मदद नहीं मिल पाती, अक्सर अपनी सज़ा की अवधि से 200-250 दिन तक ज़्यादा जेल में रहते हैं। इनमें से कई लोगों के मामले को आगे बढ़ाने के लिए परिवार के सिर्फ एक या दो सदस्य ही मौजूद होते हैं। एक दूसरा समूह इससे भी ज़्यादा उपेक्षित है—यानी वे लोग जो इस व्यवस्था में कहीं खो गए हैं। उनके पास न परिवार है, न वकील और न ही कोई संसाधन।
इस संदर्भ में हम कुछ अहम सवालों पर काम करना चाहते हैं:
- जो लोग प्रशासनिक और कानूनी उलझनों में फंसे हुए हैं और बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं देख पा रहे, उन्हें जेल से बाहर कैसे निकाला जाए?
- जेल के अंदर लोगों को किस तरह का सहयोग दिया जा सकता है, ताकि वे अपनी ज़िंदगी दोबारा शुरू कर सकें और भविष्य में दुबारा गिरफ्तारी, दोषी ठहराए जाने और जेल भेजे जाने से बच सकें?
हालांकि कानूनी मदद और न्याय इस काम के अहम हिस्से हैं, लेकिन पुनर्वास के लिए नीतियों की दिशा बदलने और पर्याप्त फंडिंग की भी ज़रूरत है। इस बात के सबूत मौजूद हैं कि अगर खर्च करने का तरीका बदला जाए, तो बेहतर नतीजे हासिल किए जा सकते हैं। दिप्पर्णा जाना और सैबल कर के 2025 के एक अध्ययन में पाया गया कि प्रति कैदी होने वाला खर्च पुनर्वास के नतीजों पर सकारात्मक और सांख्यिकीय रूप से बड़ा असर डालता है, जिसका प्रभाव करीब एक साल बाद दिखाई देता है। इसके अलावा, कुछ अनुमानों के मुताबिक प्रभावी पुनर्वास से हर साल 1200 करोड़ रुपये तक की बचत हो सकती है।
लेकिन पुनर्वास का सवाल सिर्फ सरकारी खर्च को बेहतर तरीके से इस्तेमाल करने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य जेल से बाहर आने वाले लोगों को लंबे समय तक स्थिर जीवन जीने और दोबारा समाज का हिस्सा बनने में मदद करना भी है। यह इसलिए ज़रूरी है क्योंकि जेल जाने का कलंक उनके सामाजिक और सामुदायिक रिश्तों और रोज़गार के अवसरों पर असर डाल सकता है।
रिहाई के बाद बेहतर पुनर्वास के लिए सहयोग की ज़रूरत
वर्ष 2017 से प्रोजेक्ट सेकंड चांस ने शिक्षा, आजीविका सहयोग और जमानत सहायता जैसे मुद्दों पर 11,000 से ज़्यादा कैदियों के साथ काम किया है। हमने जेल अधिकारियों के साथ मिलकर काम किया है और फंडिंग संगठनों और सोशल सेक्टर के ऐसे साझेदारों से भी संपर्क किया है, जो वाक़ई में सुधार और पुनर्वास के लिए अपना समय और संसाधन लगाने को तैयार हैं। इस प्रक्रिया में हमें ऐसे माहौल में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा और कई सबक मिले, जहां गलतियों या प्रयोग की गुंजाइश अक्सर बहुत कम होती है।
1. हालात के अनुसार ढलना
हमने जेलों के भीतर स्कूल शुरू किए हैं। इस व्यवस्था को बनाने में हमें पांच से छह साल लगे। इनमें से एक जेल में अधिकारियों ने हमारा काफी सहयोग किया। उन्होंने स्कूल शुरू करने के लिए हमें करीब 10 बैरक की जगह दी और हमने वरिष्ठ कैदियों को शिक्षक के तौर पर ट्रेनिंग दी। लेकिन एक बार जब जेल प्रशासन की कमान बदली, तो उन्होंने इस प्रोजेक्ट में कोई ख़ास उत्साह नहीं दिखाया। इसके बाद कोविड-19 आया और कैदियों को बैरकों से बाहर निकलने पर रोक लगा दी गई। इस तरह हमारा कार्यक्रम पूरी तरह रुक गया।
इस व्यवस्था को दोबारा खड़ा करने में हमें करीब डेढ़ साल लगा। इस बार हमने तय किया कि जेल के आधिकारिक ‘ग्रीन पेपर’ पर ही पूरा काम किया जाएगा। एक गैर-लाभकारी संस्था के कार्यक्रम के बजाय स्कूल को जेल की अपनी पहल के तौर पर पेश किया गया। इसलिए जड़ न रहना और बदलते हालात के मुताबिक खुद को ढालना हमारे लिए एक बड़ा सबक रहा है।
कैदियों को मदद का हकदार न मानने वाली पुरानी सोच के अलावा, पीएसयू, सीएसआर फाउंडेशन और दूसरे फंडर्स जेल सुधार के काम में पैसा लगाने से इसलिए भी हिचकते हैं क्योंकि उन्हें नियमों के पालन को लेकर कई व्यावहारिक चिंताएं होती हैं।
2. जेल अधिकारियों और फंडिंग संगठनों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाना
जेल अधिकारियों के साथ सीधे काम करने से हमें अपने कुछ प्रोजेक्ट लागू करने के लिए ज़रूरी सहयोग मिला है। लेकिन फंडिंग और साझेदारी जुटाने में हमें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। खासतौर पर पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (पीएसयू) और अर्ध-सरकारी संस्थाएं जेलों के साथ काम करने से पहले हमारे और जेल अधिकारियों के बीच एमओयू या त्रिपक्षीय समझौता चाहती हैं। हालांकि, जेल अधिकारी अक्सर ऐसी औपचारिक साझेदारी करने के इच्छुक नहीं होते।


इसकी एक वजह सरकारी व्यवस्था के साथ काम करते समय सामने आने वाली नौकरशाही की जटिलताएं और प्रक्रियाओं की कठोरता भी है। कानूनी ज़िम्मेदारी और जवाबदेही को लेकर बनी धारणाओं और तय सीमाओं के कारण अधिकारी या विभाग निजी या गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ समझौता करने से हिचक सकते हैं। इसके अलावा, जेलों में काम करते समय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं का भी ध्यान रखना पड़ता है। कुछ मामलों में केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालय से मंजूरी लेनी पड़ सकती है, जो छोटे स्तर के कार्यक्रमों के लिए मुश्किल हो सकता है। इन प्रक्रियाओं के कारण छोटे कार्यक्रमों को लागू करना भी एक बड़ी लॉजिस्टिक्स चुनौती बन जाता है।
3. अनुपालन से जुड़े पूर्वाग्रह से निपटना
कैदियों को मदद का हकदार न मानने वाली पुरानी सोच के अलावा, पीएसयू, सीएसआर फाउंडेशन और दूसरे फंडर्स जेल सुधार के काम में पैसा लगाने से इसलिए भी हिचकते हैं क्योंकि उन्हें नियमों के पालन को लेकर कई व्यावहारिक चिंताएं होती हैं। उन्हें यह भी साफ़ नहीं होता कि मौजूदा सीएसआर दिशानिर्देशों के तहत जेलों में चलाए जाने वाले कार्यक्रमों के लिए फंडिंग की जा सकती है या नहीं।
वहीं, कुछ फंडर्स से आर्थिक सहयोग मिलने के बाद भी जेल सुधार की समस्या को देखने का उनका नज़रिया अक्सर सीमित रहता है। वे किसी कार्यक्रम के लक्ष्य और उसकी सफलता मापने के तरीके को कुछ तय संख्याओं तक सीमित कर देते हैं—जैसे 500 लोगों को कानूनी मदद देना या 200 लोगों को प्लंबिंग जैसे किसी वोकेशनल कोर्स की ट्रेनिंग देना।
अब हालांकि माहौल बदल रहा है। कुछ फंडर्स और फ़िलैनथ्रॉपिक संगठन ऐसे भी हैं, जो जेल सुधार और पुनर्वास के काम में दिलचस्पी रखते हैं, इसकी ज़रूरत समझते हैं और इसे सहयोग देने के लिए तैयार हैं। मसलन, रोहिणी नीलेकणी फिलैंथ्रॉपीज़ जैसे फंडर्स से मिलने वाली भरोसे पर टिकी कई वर्षों की फंडिंग ने हमें प्रयोग करने का मौका दिया है। इसी सहयोग से हमने कुंजी की शुरूआत की—एक हेल्पलाइन, जो हाल ही में रिहा हुए लोगों को स्थानीय गैर-लाभकारी संस्थाओं और सरकारी संस्थानों से जोड़ती है। साथ ही हमने जेलों में बंद लोगों के लिए एक कानूनी टेक प्लेटफॉर्म भी तैयार किया है।
इन बदलावों के बावजूद, फिलैंथ्रॉपिक और गैर-लाभकारी क्षेत्र भी समाज और सिविल सोसाइटी की सोच से प्रभावित है। इसलिए जेल सुधार पर जागरूकता और कार्रवाई, दोनों बढ़ाने की ज़रूरत है।
पैरवी की संस्कृति और भाषा को मज़बूत करना
पुनर्वास और सुधार की बात सिर्फ व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों तक सीमित नहीं है। यह उस सोच से भी जुड़ी है, जो हमारे आसपास की दुनिया और मीडिया के जरिए लगातार बनती है। भारत में जेलों को लेकर लंबे समय से कोई मजबूत सामाजिक समझ या सार्वजनिक चर्चा नहीं रही है। हमारे यहां विरोध प्रदर्शनों, सामाजिक न्याय आंदोलनों और कानूनी सक्रियता का लंबा इतिहास है, लेकिन जेल में रहने के अनुभव पर बहुत कम बात हुई है।
हालांकि, अब देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी पहलें बढ़ रही हैं, जो जेल में रहने के अनुभवों को संवेदनशील और रचनात्मक तरीके से सामने ला रही हैं। खास बात यह है कि इनमें अपनी कहानी वही लोग बता रहे हैं, जिन्होंने खुद जेल में रहने का अनुभव किया है।
मसलन, एक्शन रिसर्च कलेक्टिव स्टूडियो नीलिमा गुवाहाटी के पांच सुधार गृहों में लोगों के साथ काम करता है। इस पहल के तहत जेल में बंद कवियों और बाहर के संगीतकारों ने साथ मिलकर असम का पहला जेल म्यूज़िक एल्बम तैयार किया। इसके गीत इंतज़ार, पछतावे और घर की याद जैसी भावनाओं को सामने लाते हैं—ऐसी भावनाएं जो हर इंसान महसूस करता है, लेकिन जिन पर ‘कैदी’ की पहचान अक्सर हावी हो जाती है। स्टूडियो नीलिमा रीडिंग सर्कल, हेल्थ कैंप और वेल-बीइंग प्रोग्राम भी चलाता है।
इसी तरह, अगामी की ओर से हर साल आयोजित होने वाला जस्टिसमेकर्स मेला एक ऐसा आयोजन है, जिसमें न्याय और सामाजिक बदलाव के अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले 1,000 से ज्यादा लोग एक साथ जुटते हैं। मार्च 2026 में हमारे द्वारा आयोजित इंडिया प्रिज़न वॉइसेज़ भी सांस्कृतिक स्तर पर इस पैरवी और आपसी सीख के काम को आगे बढ़ाने की एक कोशिश थी। इस आयोजन में जेल व्यवस्था से जुड़े अलग-अलग क्षेत्रों के 100 से ज्यादा लोग शामिल हुए—जेल से बाहर आ चुके लोग, कैदियों के परिवार, जेल विभाग, अकादमिक जगत, न्यायपालिका, सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि और फिलैंथ्रॉपिक संगठन। इसका मकसद अनुभवों को साझा करना और आपसी भरोसे की भावना को मज़बूत करना था।
सीखने और अनुभव साझा करने के नए मौके बनाना
प्रोजेक्ट सेकंड चांस में हमारा काम इस समझ पर आधारित है कि जिन लोगों ने जेल व्यवस्था का अनुभव खुद किया है, उन्हें इस पर होने वाली बातचीत की अगुवाई करनी चाहिए। उनकी बात को हाशिए पर रखी गई टिप्पणी के तौर पर नहीं, बल्कि जेल व्यवस्था की समस्याओं को समझने और उन पर कार्रवाई की दिशा तय करने के आधार के रूप में देखा जाना चाहिए। मसलन, हमारे 75 प्रतिशत से ज़्यादा कर्मचारी ऐसे हैं जो खुद जेल में रह चुके हैं। इसलिए यह सवाल सिर्फ काम करने के तरीके का नहीं, बल्कि संगठनों की संरचना का भी है—और इस बात का भी कि संगठन की यह संरचना उसके काम में किस तरह दिखाई देती है।
बदलाव की प्रक्रिया अक्सर धीमी और अलग-अलग हिस्सों में बंटी होती है। ऐसे में इसे टिकाऊ बनाने के लिए साथ मिलकर सीखना और खुलकर बातचीत करना ज़रूरी है।
इससे समस्याओं को देखने और कार्यक्रम तैयार करने के नए तरीके सामने आते हैं और धीरे-धीरे इन बदलावों को संस्थागत रूप देने का रास्ता भी खुलता है। अपने काम में हमने अब तक तीन प्रमुख बातें पहचानी हैं:
1. साथ मिलकर सीखने की जगह बनाना: हमने जेल में रह चुके लोगों और जेल सुधार व पुनर्वास पर काम करने वाले लोगों और संगठनों के बीच सीधे संवाद के मौके बनाए हैं। मसलन, कोई यह समझना चाहता है कि अत्यधिक गर्मी का जेल में रहने पर क्या असर पड़ता है, तो वह हमारे ऑफिस आकर उन लोगों से बात कर सकता है, जिन्होंने ऐसी बैरकों में समय बिताया है। इन बैरकों में तापमान 55 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। ऐसे संवाद जेल में रह चुके लोगों के अनुभवों को सामने लाते हैं। साथ ही, दूसरों को इन समस्याओं को उनकी नज़र से समझने का मौका देते हैं।
2. संस्थानों तक पहुंच आसान बनाना: काम के दौरान हमने जेल अधिकारियों के साथ रिश्ते बनाए हैं। इससे हमें जेलों में जाने और वहां रह रहे लोगों के साथ सीधे काम करने का मौका मिला है। लेकिन यह व्यवस्था अभी भी काफी नाज़ुक है। युवा शोधकर्ताओं और नए संगठनों के लिए जेलों तक पहुंच बनाना अक्सर मुश्किल होता है। ऐसे में संगठनों को अपने मौजूदा नेटवर्क का इस्तेमाल करके एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए। इससे वे इस व्यवस्था को बेहतर समझ पाएंगे और सहयोग के नए रास्ते भी खुलेंगे।
3. नए विचारों के लिए फंडिंग: ऐसे काम के लिए फंडिंग और ग्रांट की ज़रूरत होती है, खासकर उभरते शोधकर्ताओं के लिए। लेकिन बहुत कम फंडर्स जेल से बाहर आ चुके लोगों या ऐसे युवा शोधकर्ताओं को सीधे सहयोग देते हैं, जिनके पास किसी बड़े संस्थान का समर्थन नहीं है। हम ऐसे लोगों को इनक्यूबेट करते हैं और उन्हें अपने विचारों और नए तरीकों को आजमाने की जगह देते हैं। इससे वे प्रयोग कर सकते हैं, गलतियों से सीख सकते हैं, और अपने तरीकों में बदलाव कर सकते हैं।
पिछले एक दशक से हम लगातार यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि जेल सुधार की शुरुआत आखिर कहां से होती है। क्या यह बैरकों से शुरू होती है? जन-आंदोलनों और पैरवी से? ग्रीन पेपर में दर्ज प्रस्तावों और जेल अधिकारियों के साथ बंद कमरों में होने वाली बैठकों से? या फिर फंडर्स की कॉन्फ्रेंस से?
बदलाव की प्रक्रिया अक्सर धीमी और अलग-अलग हिस्सों में बंटी होती है। ऐसे में इसे टिकाऊ बनाने के लिए साथ मिलकर सीखना और खुलकर बातचीत करना ज़रूरी है। हमें ऐसे छोटे-छोटे कार्यक्रमों से आगे बढ़ना होगा, जो अपनी रिपोर्ट में तो प्रभावशाली दिखते हैं, लेकिन असल बदलाव सीमित होता है। इसके बजाय, हमें पुनर्वास और लोगों को दोबारा समाज का हिस्सा बनाने की प्रक्रिया में निवेश करना होगा। साथ ही, ऐसी मज़बूत पैरवी की संस्कृति बनानी होगी, जो जेल और अदालतों की चारदीवारी से बाहर निकलकर कैद के मुद्दे को सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनाए।
इसका कोई एक तय जवाब या समाधान नहीं है। लेकिन शुरुआत की दिशा साफ है—जेल व्यवस्था से जुड़े लोगों के अनुभवों और उनकी गरिमा को केंद्र में रखना। हमें इसे सिर्फ एक विचार के रूप में नहीं, बल्कि अपने काम का आधार बनाना होगा।
*यह लेख प्रोजेक्ट सेकंड चांस के संस्थापकों मोहित राज और सांची मरवाहा तथा ऋषभ ललानी के सहयोग से तैयार किया गया है। लेख में ‘हम’, ‘हमने’ और ‘हमारा’ जैसे सभी संदर्भ सीधे मोहित और सांची के अनुभवों से लिए गए हैं। यह लेख ऋषभ ललानी द्वारा 25 मार्च 2026 को लिखे और प्रकाशित किए गए इस लेख का रूपांतरित और अपडेट किया हुआ संस्करण है।
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अधिक जानें
लेखक के बारे में
- मोहित राज प्रोजेक्ट सेकंड चांस के सह-संस्थापक हैं। यह जेल सुधार के लिए काम करने वाली एक पहल है, जो जेल में बंद युवाओं को न्याय व्यवस्था के भीतर बदलाव की अगुवाई करने के लिए सशक्त बनाती है। उन्होंने 10 से ज्यादा ऐसे प्रोजेक्ट्स को इनक्यूबेट किया है, जो जेलों में बंद लोगों के पुनर्वास और समाज में उनकी वापसी को लेकर रूढ़िवादी सोच को चुनौती देते हैं। मोहित कोलंबिया यूनिवर्सिटी में ओबामा फाउंडेशन स्कॉलर्स प्रोग्राम के 2020–21 बैच का हिस्सा रहे हैं। अपने काम और पैरवी के लिए उन्हें एक चेंजमेकर के तौर पर भी पहचान मिली है।
- ऋषभ ललानी फंडरेजिंग पर काम करने वाले एक स्वतंत्र रणनीतिकार हैं। उन्होंने विप्रो फाउंडेशन, माइकल एंड सुसन डेल फाउंडेशन, एडलगिव फाउंडेशन, और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज से लेकर संगमा, शिक्षार्थ और आगामी जैसे बड़े तथा उच्च-स्तरीय संगठनों के साथ काम किया है। ललानी ने बीते नौ सालों में 80 करोड़ रुपए से अधिक राशि जुटाई है। इसके साथ ही वे अपनी शाला फाउंडेशन के बोर्ड का हिस्सा हैं और क्षेत्र फाउंडेशन फॉर डायलॉग के सलाहकार बोर्ड में भी बतौर सदस्य ज़िम्मेदारियां निभाते हैं।




