वर्ष 2025 में भारत की अदालतों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित थे। देशभर के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों को बच्चों की बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक कौशल से जुड़े आंकड़े जुटाने में महीनों लग जाते हैं। दूसरी ओर, करोड़ों नागरिकों के लिए उनके रोज़मर्रा के जीवन को प्रभावित करने वाले कानूनों को समझना अब भी मुश्किल है। ये कानून अक्सर ऐसी भाषा में लिखे होते हैं जिसे आम लोग आसानी से समझ नहीं पाते और ऐसे माध्यमों से उपलब्ध कराए जाते हैं, जिन तक उनकी पहुंच नहीं होती। ये कमियां उन सार्वजनिक व्यवस्थाओं के लिए बड़ी चुनौती हैं, जो पहले से ही सीमित संसाधनों और कर्मचारियों की कमी के बीच काम कर रही हैं।
इसी संदर्भ में कुछ ग़ैर-लाभकारी संस्थाएं आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेन्स (एआई) की मदद से शासन से जुड़ी प्रक्रियाओं को आसान और अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश कर रही हैं। उदाहरण के लिए, अदालत एआई न्याय व्यवस्था के साथ मिलकर ऐसी बुनियादी संरचना तैयार कर रहा है, जिससे स्वचालित ट्रांस्क्रिप्शन, डिजिटल रिकॉर्ड और वर्कफ़्लो मैनेजमेंट की मदद से अदालतों को कागज़-मुक्त बनाया जा सके। वॉवेल्स ऑफ़ द पीपल एसोसिएशन (वीओपीए) ने एआई आधारित एक बुनियादी साक्षरता आकलन टूल विकसित किया है। इसका इस्तेमाल अब निपुण मिशन के तहत महाराष्ट्र के सरकारी स्कूलों में किया जा रहा है। मुंबई स्थित ग़ैर-लाभकारी संस्था सिविस भी एआई की मदद से सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रियाओं को अधिक आसान और सहभागी बनाने पर काम कर रही है। संस्था ने सरकारी विभागों के साथ साझेदारी की है, जिसके तहत कानूनों और नीतियों पर नागरिकों से मिले फ़ीडबैक को व्यवस्थित किया जाता है और उसका संक्षिप्त रूप तैयार किया जाता है।
लेकिन सही उत्पाद विकसित करना ही पर्याप्त नहीं है। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इन एआई मॉडलों पर भरोसा किया जा सके, वे किफ़ायती हों और पहले से ही दबाव में चल रही सार्वजनिक व्यवस्थाओं में प्रभावी ढंग से काम कर सकें। हालांकि ये तीनों संस्थाएं शासन के अलग-अलग क्षेत्रों में काम करती हैं, लेकिन सार्वजनिक संस्थानों के भीतर एआई को प्रभावी ढंग से काम करने लायक बनाने के दौरान उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण सबक सीखे हैं।
सही समस्या की पहचान करना
इन तीनों संस्थाओं के लिए कुछ भी उपयोगी तैयार करने से पहले यह समझना ज़रूरी था कि व्यवस्था में वास्तव में समस्या कहां है और उसे उन लोगों की नज़र से समझना ज़रूरी था, जो उस व्यवस्था के भीतर रहकर इन समस्याओं का बोझ उठा रहे हैं।
अदालत एआई के मामले में यह समझ भारत की ज़िला अदालतों में कानून की प्रैक्टिस करने के अनुभव से आई। इसके सह-संस्थापक उत्कर्ष सक्सेना ने ख़ुद देखा था कि अदालतों की समस्या सिर्फ कानून से नहीं जुड़ी है। वह कहते हैं, “न्याय केवल कानून का सवाल नहीं है। असल में यह लॉजिस्टिक्स का सवाल है।” पूरी दुनिया जहां गूगल कैलेंडर और माइक्रोसॉफ़्ट आउटलुक जैसे डिजिटल माध्यमों पर काम कर रही है, वहीं भारतीय अदालतों में आज भी हर चीज़ डायरियों में दर्ज करके तय की जाती है। इस व्यवस्था के कारण कई बार समन गवाहों तक पहुंच ही नहीं पाते। न्यायाधीश भी अदालत की कार्यवाही को हाथ से लिखने में काफ़ी समय लगाते हैं। अदालत एआई ने इसी समस्या को हल करने के लिए एक सुरक्षित और एंड-टू-एंड कागज़-मुक्त अदालत की बुनियादी संरचना विकसित करने का काम शुरू किया। इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिसमें मामला दायर होने से लेकर अंतिम आदेश जारी होने तक अदालत की पूरी प्रक्रिया बिना कागज़ के संचालित हो सके।
इस टूल पर भरोसा कायम करने में क्या मददगार रहा, इस बारे में उत्कर्ष ‘पेनकिलर’ और ‘मल्टीविटामिन’ के बीच के फ़र्क पर ज़ोर देते हैं। वह कहते हैं, “जब आप अपनी विश्वसनीयता कायम कर रहे होते हैं, तब लोगों को साथ लाने के लिए पेनकिलर ज़्यादा प्रभावी होते हैं।” अदालत एआई केस मैनेजमेंट सिस्टम या कागज़-मुक्त फ़ाईलिंग के लिए टूल विकसित कर सकता था, लेकिन वे ‘मल्टीविटामिन’ होते—ऐसी सुविधाएं, जिनका होना तो अच्छी बात है, लेकिन ऐसी व्यवस्था में उनके सफ़ल होने की संभावना कम होती है, जो पहले से ही कई तरह की लॉजिस्टिक और संस्थागत समस्याओं से जूझ रही हो। ट्रांस्क्रिप्शन एक बड़ी और वास्तविक समस्या थी। इसलिए पहले इसी समस्या को हल करने से अदालत एआई को आगे की व्यवस्था तैयार करने के लिए एक मज़बूत आधार मिला।
न्याय केवल कानून का सवाल नहीं है। असल में यह लॉजिस्टिक्स का सवाल है।
वीओपीए भी एक अलग रास्ते से इसी निष्कर्ष तक पहुंची। महाराष्ट्र के अलग-अलग ज़िलों में शिक्षक बुनियादी साक्षरता का आकलन कर रहे थे और कागज़ी फ़ॉर्म, गूगल फ़ॉर्म तथा चैटबॉट आधारित टूल के ज़रिए आंकड़े आगे भेज रहे थे। संगठन का नेतृत्व करने वाले प्रफ़ुल्ल शशिकांत इन प्रक्रियाओं को “अमानवीय और नीरस” बताते हैं। इस तरीके से आंकड़े जुटाने में काफ़ी हद तक व्यक्ति विशेष के काम करने के अलग-अलग तरीक़ों के कारण सब्जेक्टिविटी (व्यक्तिगत सोच और अनुभव से प्रभावित होना) भी दिखाई दी। उदाहरण के लिए, विकास के ज़्यादातर संकेतकों पर निचले पायदान के आसपास रहने वाला एक आकांक्षी ज़िला लगातार राज्य के आकलन परिणामों में शीर्ष ज़िलों में दिखाई देता था। यह साफ़ था कि आंकड़ों में कुछ गड़बड़ी थी। लेकिन एक साझा पद्धति, ऑबजेक्टिव आकलन टूल या रियल-टाइम में ऑथेंटिकेशन की व्यवस्था न होने के कारण यही चक्र हर साल दोहराया जाता था।
जब तक आंकड़ों में मौजूद इन विसंगतियों का पता चलता, तब तक छात्रों की मदद के लिए ज़िम्मेदार प्रशासन के पास कार्रवाई करने का ज़रूरी समय निकल चुका था और छात्रों को अगली कक्षा में प्रमोट कर दिया गया था। प्रफ़ुल्ल कहते हैं, “व्यवस्था के पास उस समय रियल-टाइम आंकड़ा ही नहीं था, जब उसके आधार पर हस्तक्षेप करना वाकई मायने रखता।” एआई की मदद से वीओपीए ने एक स्टैंडर्ड आकलन पद्धति विकसित की, जिसने आंकड़े जुटाने में सब्जेक्टिविटी को काफ़ी हद तक ख़त्म किया और जिसे राज्य स्तर पर बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकता था।
सिविस के लिए सबसे बड़ी चिंताएं थीं—पहुंच और अपनी बात रखने का अवसर। भारत की प्री-लेजिस्लेटिव परामर्श नीति के तहत सरकार को प्रस्तावित नीतियों का मसौदा सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए जारी करना होता है। लेकिन जिन लोगों पर इन नीतियों का सबसे अधिक असर पड़ता है, वे ऐतिहासिक रूप से इन पर अपनी राय रखने में सबसे कम सक्षम रहे हैं। उनके लिए भाषा सहज नहीं होती, प्रक्रिया अपरिचित होती है और अपनी बात रखने की मौजूदा व्यवस्था भी अधिकांश लोगों को इससे बाहर कर देती है। सिविस ने एआई की मदद से इस स्थिति को बदलने का प्रयास किया। उसने जटिल लीगल भाषा को आसानी से समझ में आने वाली भाषा में बदला, कई भाषाओं में अपनी बात रखने के विकल्प उपलब्ध कराए और आवाज़ के माध्यम से भागीदारी की सुविधा दी, जिससे लोग फ़ोन कॉल या वॉइस नोट के ज़रिए अपनी भाषा में जवाब दे सकें। सिविस की संस्थापक अंतरा वासुदेव कहती हैं, “जो लोग लंबे समय से नीतिगत चर्चाओं से लगभग बाहर रहे हैं, उनके लिए अपनी भाषा में आवाज़ के माध्यम से सवालों के जवाब देना और फ़ीडबैक देना एक बड़ा बदलाव लेकर आया है।”
इन तीनों संस्थाओं को जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हर संस्था ने पहले व्यवस्था के भीतर समय बिताया, वहां की वास्तविक दिक्कतों और बाधाओं को समझा और उसके बाद ही अपने समाधान को तैयार किया।


सरकार के साथ काम करने के लिए क्या ज़रूरी है?
1. आंकड़ों का सवाल
तीनों मामलों में आंकड़े एक साथ तकनीक, विश्वास और राजनीति—तीनों पहलुओं से जुड़े हुए हैं। यही वह आधार है, जिस पर आगे की पूरी व्यवस्था खड़ी होती है।
अदालत एआई के लिए यह बात ख़ास तौर पर महत्वपूर्ण थी। अदालतों की कार्यवाही बेहद संवेदनशील होती है और न्यायपालिका की एक स्पष्ट शर्त थी: आंकड़े देश की संप्रभु सीमाओं से बाहर नहीं जाने चाहिए। अदालत एआई ने इसका समाधान अपने एआई मॉडलों को पूरी तरह आंतरिक रूप से विकसित करके और केवल ऐसी कंपनियों के साथ काम करके किया, जिनके सर्वर भारत में स्थित हैं। अपने मॉडल पर विश्वास बढ़ाने के लिए उन्होंने एक एन्क्रिप्शन प्रणाली भी विकसित की। जब कोई न्यायाधीश अपना खाता बनाता है, तो उनके डिवाइस पर उन्हें एक एन्क्रिप्शन कुंजी प्राप्त होती है। यहां तक कि अदालत एआई की अपनी टीम भी इस डेटा को डिक्रिप्ट नहीं कर सकती। उत्कर्ष कहते हैं, “ऐसी विश्वास-रहित व्यवस्था की कल्पना, जिसमें सब कुछ सार्वजनिक हो लेकिन फिर भी कोई डेटा उजागर न हो, हमारी सुरक्षा संबंधी सोच की बुनियाद थी।”
सुरक्षा के इस स्तर के कारण एक और चुनौती सामने आई: अदालत एआई अपने मॉडलों को प्रशिक्षित करने के लिए वास्तविक यूज़र के आंकड़ों का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करता। इसलिए उसकी फ़ीडबैक और मॉडल में सुधार की पूरी प्रक्रिया इसी बात को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। इसके लिए टीम राज्य स्तर पर काम करने वाले प्रमुख लोगों से गुणात्मक जानकारी जुटाती है और यह समझने की कोशिश करती है कि मॉडल कहां और किस तरह ग़लत परिणाम दे रहा है। इसके बाद टीम सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कानूनी सामग्री जुटाती है, अपने आंतरिक भाषाविदों के साथ काम करती है और इन सभी स्रोतों को मिलाकर मॉडल के प्रशिक्षण के लिए आंकड़े तैयार करती है। जिन क्षेत्रों में संस्था काम करती है, वहां आँकड़ों की संवेदनशीलता को देखते हुए, इन सुरक्षा उपायों ने संस्था को लोगों का भरोसा कायम करने और उसे बनाए रखने में मदद की है।
प्रफ़ुल्ल के अनुसार, आंकड़ों की गुणवत्ता और विकेंद्रीकृत स्तर पर आंकड़ों तक पहुंच, वीओपीए के पूरे प्रोजेक्ट का केंद्र-बिंदु हैं। आकलन से जुड़े आंकड़ों को भरोसेमंद बनाने के लिए संस्था ने कई स्तरों पर सत्यापन की व्यवस्था की है। इसमें कुछ छात्रों का सुपरवाइज़र द्वारा दोबारा आकलन, स्वतंत्र रूप से ऑडियो रिकॉर्डिंग की जांच और अलग-अलग आकलन चक्रों में उन्हीं छात्रों की प्रगति पर लगातार नज़र रखना शामिल है। इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण नतीजा यह रहा कि ऐसे अनियमित मामलों का भी पता चल सका, जिन्हें पहले कागज़-आधारित प्रक्रिया में पकड़ पाना संभव नहीं था। एक ज़िले में सुपरवाइज़र द्वारा किए गए दोबारा आकलन में केवल 62.4 प्रतिशत मामलों में शिक्षकों के आकलन से समानता पाई गई। जब वीओपीए ने इसकी जांच के लिए मूल ऑडियो रिकॉर्डिंग सुनी, तो पता चला कि चिन्हित किए गए मामलों में से करीब 72 प्रतिशत में शिक्षक और सुपरवाइज़र ने एक ही छात्र का नहीं, बल्कि अलग-अलग छात्रों का आकलन किया था। हालांकि, वीओपीए के टूल को लागू करने के बाद 89 प्रतिशत मामलों में शिक्षक और सुपरवाइज़र के आकलन बिल्कुल एक जैसे पाए गए।
वीओपीए ने एक और महत्वपूर्ण निर्णय बहुत सोच-समझकर लिया—उसने मौजूदा सरकारी आंकड़ों के तंत्र के समानांतर अपना अलग ढांचा खड़ा करने के बजाय उसी पर आधारित होकर काम करने का फैसला किया। छात्रों का अपना अलग डेटाबेस बनाने के बजाय, वीओपीए ने छात्र रिकॉर्ड के लिए सरल, स्कूलों की पहचान के लिए यूडीआईएसई+ और प्रशासनिक ढांचे के लिए शालार्थ के साथ अपने सिस्टम को एकीकृत किया। इस फ़ैसले के पीछे की सोच समझाते हुए प्रफ़ुल्ल कहते हैं, “सरकारी आंकड़ों के तंत्र को दरकिनार करके बनाया गया एआई एक अच्छा डेमो तो तैयार कर सकता है, लेकिन वह कभी बड़े पैमाने पर काम नहीं कर पाएगा। इसके उलट, जो एआई मौजूदा व्यवस्था के भीतर ही शामिल हो जाता है, वह वास्तव में हर स्कूल तक पहुंच सकता है।”
सरकार के साथ सिविस के काम के बारे में बात करते हुए अंतरा दो अलग-अलग चिंताओं का उल्लेख करती हैं। पहली यह कि एआई जिन आंकड़ों और सूचनाओं पर निर्भर करता है, वे सत्यापित हों, उन तक पहुंच नियंत्रित हो और वे ओपन इंटरनेट के बजाय केवल सरकार द्वारा स्वीकृत स्रोतों से लिए गए हों। दूसरी चिंता यह है कि एआई द्वारा तैयार किए गए परिणाम सटीक और व्यापक हों। अंतरा के अनुसार, इन दोनों पहलुओं को सुनिश्चित करना ही सरकारी साझेदारों के मन में मौजूद संदेह को दूर करने और उन्हें एआई पर भरोसा करने के लिए तैयार करने में निर्णायक भूमिका निभाता है।
सरकार के लिए एआई समाधान विकसित करते समय आंकड़ों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
2. प्रक्रिया में मानवीय भूमिका
अंतरा के अनुसार, एआई को कभी भी ऐसा काम नहीं सौंपना चाहिए, जिसे इंसान ने पहले ख़ुद हज़ारों बार करके अच्छी तरह न समझा हो। वह कहती हैं, “नागरिकों के लिए किसी कानून का सरल और उपयोगी सारांश तभी तैयार किया जा सकता है, जब आप पहले ख़ुद यह काम कई बार कर चुके हों। इसी अनुभव और समझ को एआई में शामिल करने के बाद ही उसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर यही काम दोहराने के लिए किया जा सकता है।”
इसे थोड़ा अधिक सहज और स्पष्ट रखते हुए, मूल अर्थ और बारीकी को बनाए रखा जा सकता है:
प्रफ़ुल्ल कहते हैं, “मानवीय निगरानी कभी खत्म नहीं होती, बल्कि समय के साथ बदलती रहती है।” एआई किसी छात्र की सीखने से जुड़ी कमी को सामने लाता है, शिक्षक तय करता है कि उस कमी पर किस तरह काम करना है और ज़िला अधिकारी यह तय करता है कि संसाधनों को कहां लगाया जाए। यानी आंकड़ों की उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि उनसे मिलने वाली जानकारी के आधार पर किस तरह की मानवीय कार्रवाई की जाती है। वह आगे बताते हैं, “हम एआई का इस्तेमाल ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों की जगह लेने के लिए नहीं कर रहे हैं। भारत अभी उस स्थिति से बहुत दूर है और सच कहें तो ऐसा होना भी चाहिए।” मानवीय निगरानी के बिना सबसे सक्षम और बुद्धिमान सिस्टम भी सार्थक बदलाव की राह में बाधा बन सकता है, क्योंकि वह ज़मीनी हकीकत से अपना जुड़ाव खो सकता है।
अदालत एआई में मानवीय निगरानी को सीधे यूज़र इंटरफ़ेस का हिस्सा बनाया गया है। उदाहरण के लिए, जब किसी ट्रांस्क्रिप्शन में किसी कानूनी मामले का संदर्भ आता है, तो सिस्टम अपने आप उस संदर्भ की जानकारी खोजकर उसे दस्तावेज़ में जोड़ देता है, लेकिन उसे लाल रंग में चिह्नित भी करता है। न्यायाधीश तब तक दस्तावेज़ को डाउनलोड या इस्तेमाल नहीं कर सकते, जब तक वे उस संदर्भ की ख़ुद जांच और पुष्टि न कर लें। संस्था के सह-संस्थापक और सीटीओ अर्घ्य भट्टाचार्य कहते हैं, “दुनिया में कोई भी सिस्टम 100 प्रतिशत सटीक नहीं है। हमने ऐसी सुरक्षा व्यवस्थाएं तैयार की हैं, ताकि एआई पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर होने की स्वाभाविक प्रवृत्ति के बावजूद लोग ग़लतियां न कर सकें।”
लेकिन मानवीय निगरानी का मतलब सिर्फ़ ग़लतियां पकड़ना नहीं है। सिविस में जब एआई का इस्तेमाल कानूनों और नीतियों के ऐसे सरल और सहज सारांश तैयार करने के लिए किया जाता है, जिन्हें नागरिक आसानी से समझ सकें, तब संपादकीय समझ और विवेक भी उतना ही ज़रूरी होता है। यह तय करना पड़ता है कि सारांश तार्किक और स्पष्ट है या नहीं, कौन-सा उदाहरण विषय को लोगों के लिए अधिक प्रासंगिक और वास्तविक बना सकता है और कौन-सा सवाल उन्हें अपनी राय देने और प्रक्रिया में भाग लेने के लिए प्रेरित करेगा।
मानवीय निगरानी कभी खत्म नहीं होती, बल्कि समय के साथ बदलती रहती है। एआई किसी छात्र की सीखने से जुड़ी कमी को सामने लाता है, शिक्षक तय करता है कि उस कमी पर किस तरह काम करना है और ज़िला अधिकारी यह तय करता है कि संसाधनों को कहां लगाया जाए।
3. एआई प्रोडक्ट बनाना बनाम सरकारी व्यवस्था में एआई को शामिल करना
सरकारी व्यवस्था में एआई को शामिल करना सिर्फ़ एआई प्रोडक्ट तैयार करने से कहीं आगे की प्रक्रिया है। तीनों संस्थाएं इन दोनों कामों के बीच स्पष्ट अंतर करती हैं। एआई प्रोडक्ट बनाना इस प्रक्रिया का सिर्फ़ एक हिस्सा है, जबकि उसे सरकारी व्यवस्था में शामिल करना कहीं अधिक व्यापक काम है। इसमें सरकारी आंकड़ों की मौजूदा प्रणालियों के साथ तालमेल बैठाना, भरोसा कायम करना, वर्कफ़्लो और लागत का प्रबंधन करना और लंबे समय तक सहयोग बनाए रखने के लिए ज़रूरी व्यवस्थाएं तैयार करना शामिल है।
प्रफ़ुल्ल के अनुसार, “एआई शायद पूरे काम का सिर्फ़ 10 प्रतिशत है। बाकी 90 प्रतिशत विश्वास, प्रशिक्षण और संस्थागत तालमेल का है।” सार्वजनिक संस्थानों की अपनी सीमाएं होती हैं और वे करोड़ों लोगों के प्रति जवाबदेह होते हैं। ऐसे में उनके लिए ऐसी किसी व्यवस्था को अपनाना आसान नहीं है, जिसमें किसी स्तर पर लोगों को निराश होने का जोखिम हो।
अदालत एआई ऐसी सोच से सावधान करता है जिसमें एक ऐसा प्रोडक्ट बनाने की कोशिश की जाए, जो हर तरह के काम के लिए इस्तेमाल हो सके। किसी सरकारी संस्था के भीतर बदलाव लाना एक धीमी प्रक्रिया है। शुरुआत में संस्था ने केवल अपने स्पीच-टू-टेक्स्ट टूल पर ध्यान दिया और उसे अपनाने के लिए भी काफ़ी प्रयास करना पड़ा। लेकिन जब इस टूल ने एक वास्तविक समस्या को प्रभावी ढंग से हल करने की अपनी क्षमता साबित कर दी, तो अब अदालतें खुद उनसे और अधिक सुविधाएं विकसित करने का अनुरोध कर रही हैं। उत्कर्ष कहते हैं, “पहले आप उनकी ज़रूरत के मुताबिक एक समाधान निकालकर दिखाइए। इसके बाद धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था को एक ऊंचे स्तर पर ले जाया जा सकता है।” सरकारी संस्थानों की बदलती रुचि प्रगति के सबसे उत्साहजनक संकेतों में से एक रही है। अब वे ऐसे टूल और सुविधाओं की मांग कर रहे हैं, जिनमें 18 महीने पहले उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी।
किसी सिस्टम की सफ़लता इस बात पर निर्भर करती है कि उसका यूज़र अनुभव कैसा है। इसलिए यूज़र अनुभव को बाद में जोड़ी जाने वाली सुविधा के रूप में नहीं, बल्कि सिस्टम की शुरुआत से ही सोच-समझकर तैयार किए जाने वाले एक बुनियादी पहलू के रूप में देखना ज़रूरी है।
वीओपीए भी इस बात को लेकर समानांतर विचार रखती है कि यूज़र के सामने एआई किस रूप में दिखाई देना चाहिए। प्रफ़ुल्ल कहते हैं, “जैसे ही एआई शब्द का ज़िक्र होता है, कमरे में मौजूद आधे लोग मानसिक रूप से खुद को उस बातचीत से अलग कर लेते हैं।” ऐसे में हमारा उद्देश्य यह है कि किसी शिक्षक को बस इतनी जानकारी मिल जाए कि उसकी कक्षा में कौन-से बच्चे अपेक्षित स्तर के अनुसार पढ़ नहीं पा रहे हैं। यह जानकारी सामने लाने में एआई की भूमिका रही है या नहीं, इस बारे में शिक्षक को सोचने की ज़रूरत ही नहीं होनी चाहिए। वे आगे कहते हैं, “एआई को व्यवस्था में ऐसी सहजता से शामिल किया जाना चाहिए कि यूज़र को इसका एहसास तक न हो और पूरी व्यवस्था पहले की तरह ही चलती रहे।”
सिविस के अनुभव में, सरकारी व्यवस्थाओं में एआई को प्रभावी ढंग से शामिल करने के तरीके को दो व्यावहारिक चुनौतियां ख़ास तौर पर प्रभावित करती हैं। पहली है लागत। एक बार एआई टूल को बड़े पैमाने पर लागू कर दिया जाए, तो वह लगातार होने वाले बुनियादी ढांचे के खर्च का हिस्सा बन जाता है। अंतरा कहती हैं, “आप यह नहीं चाहेंगे कि आपके एआई के बिल में किसी कार्यालय के किराए की तरह हर महीने का किराया भी जुड़ जाए।” ऐसे टूल जो डेमो के तौर पर तो अच्छे काम करते हैं, लेकिन जिनको बड़े पैमाने पर लागू करना किफ़ायती न हो, वे कभी वास्तविक सरकारी बुनियादी ढांचे का हिस्सा नहीं बन पाते।
दूसरी चुनौती है सरकार की अपनी एआई संबंधी गाइडलाइंस के अनुरूप काम करना। इनमें ओपन-सोर्स तकनीक से जुड़ी ज़रूरतें, स्थानीय स्तर पर सिस्टम को तैनात करने की शर्तें और ख़रीद प्रक्रिया से जुड़े नियम शामिल हैं। इस क्षेत्र में काम करने वाली ग़ैर-लाभकारी संस्थाओं के लिए ज़रूरी है कि वे उत्पाद विकसित करने से पहले इन दिशानिर्देशों को अच्छी तरह समझें और लगातार अपना दायरा बढ़ाने के दबाव से बचें। अंतरा कहती हैं, “आपसे कई तरह के काम करने और अलग-अलग प्रोडक्ट बनाने के लिए कहा जाएगा। लेकिन यह सुनिश्चित करें कि आपको अपने काम की ख़ासियत और अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र अच्छी तरह पता हो और आप उसी पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित कर सकें।”
4. काम की एक अनिवार्य शर्त के रूप में यूज़र का अनुभव
तीनों संस्थाएं इस बात को मानती हैं कि किसी सिस्टम की सफ़लता इस बात पर निर्भर करती है कि उसका यूज़र अनुभव कैसा है। इसलिए यूज़र अनुभव को बाद में जोड़ी जाने वाली सुविधा के रूप में नहीं, बल्कि सिस्टम की शुरुआत से ही सोच-समझकर तैयार किए जाने वाले एक बुनियादी पहलू के रूप में देखना ज़रूरी है।
वीओपीए के लिए बड़े पैमाने पर काम करते समय मिली सबसे बड़ी सीख भाषा से जुड़ी थी। महाराष्ट्र में काम करने वाले शिक्षकों और प्रशासकों के लिए मराठी में टूल का उपलब्ध होना किसी सुविधा की बात नहीं, बल्कि यह तय करने वाली बुनियादी शर्त है कि वे उस टूल का इस्तेमाल करेंगे भी या नहीं। वीओपीए ने अपने इंजीनियरों को कक्षाओं में भी भेजा, जहां उन्होंने ख़ुद सैकड़ों बच्चों का आकलन किया। इस ज़मीनी अनुभव ने टूल को बेहतर बनाने में सीधे तौर पर मदद की। संस्था ने टूल को इस सोच के साथ भी तैयार किया कि यूज़र को बहुत कम प्रशिक्षण मिलेगा और वे इसे उतनी ही सहजता से इस्तेमाल कर सकें, जितनी सहजता से वे व्हाट्सऐप का इस्तेमाल करते हैं। अलग से समर्पित सपोर्ट टीम पर निर्भर रहने के बजाय, उन्होंने सेल्फ़-हेल्प सुविधाओं और सहकर्मी-सहायता की व्यवस्थाओं को सीधे ऐप में शामिल किया।
सिविस के अनुभवों के अनुसार, यूज़र एक्सपीरियंस का मतलब केवल टूल को इस्तेमाल करने में आसानी नहीं है, बल्कि लोगों के लिए उसमें भागीदारी को सहज बनाना भी है। लोगों के लिए भागीदारी आसान हो, इसके लिए भारतीय भाषाओं में आवाज़ के माध्यम से अपनी बात रखने की सुविधा बेहद ज़रूरी है। इंटरैक्टिव वॉइस रिस्पॉन्स (आईवीआर) की व्यवस्था के कारण लोग केवल फ़ोन कॉल करके अपना फ़ीडबैक दे सकते हैं। हाल ही में श्रम से जुड़े एक सार्वजनिक परामर्श में आवाज़ के माध्यम से भागीदारी का विकल्प जोड़ने से लोगों की भागीदारी बढ़ी। कुल भागीदारी में 38 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि पहली बार भाग लेने वाले लोगों की संख्या 27 प्रतिशत बढ़ी।
तीनों संस्थाओं के काम में एक साझा डिज़ाइन सिद्धांत स्पष्ट दिखाई देता है: टूल का इस्तेमाल उस समस्या की तुलना में आसान होना चाहिए, जिसके समाधान के लिए उसे बनाया गया है।
ग़ैर-लाभकारी संस्थाओं को प्रतिभाशाली लोगों के लिए निजी टेक्नोलॉजी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है, लेकिन फ़ंड देने वाली संस्थाएं अक्सर वरिष्ठ तकनीकी विशेषज्ञों को बाज़ार के अनुरूप वेतन देने में हिचकिचाती हैं।
चुनौतियां जो बरकरार हैं
सरकार के साथ काम करने की प्रक्रिया धीमी होती है। यह धीमी गति कोई आकस्मिक बात नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की संरचना में ही निहित है।
वीओपीए के लिए सबसे कठिन चुनौतियों में से एक संस्थागत स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया रही है। मंज़ूरी मिलने में समय लगता है। सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था में संस्था को एक साथ कई हितधारकों के साथ समन्वय करना पड़ता है— मसलन राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, शिक्षा आयुक्त, शिक्षा सचिव और कई अन्य अधिकारियों के साथ। इन सभी अधिकारियों का अक्सर तबादला होता रहता है। हर नए अधिकारी के आने पर उन्हें पूरी व्यवस्था और काम के बारे में नए सिरे से जानकारी देनी पड़ती है और उनकी सहमति बनानी पड़ती है। प्रफ़ुल्ल के अनुसार, यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि लगातार चलने वाला काम और सरकारी व्यवस्था के साथ काम करने की एक स्थायी वास्तविकता है।
अदालत एआई के लिए ग़ैर-लाभकारी संस्था के ढांचे के भीतर एक गंभीर और सक्षम इन-हाउस टेक्नोलॉजी टीम को बनाए रखना अपने आप में एक चुनौती है। उत्कर्ष कहते हैं, “आज के लेबर मार्केट में एआई इंजीनियरों की बहुत मांग है।” ऐसे प्रतिभाशाली लोगों को अलग राह चुनने के लिए तैयार करना आसान नहीं है। इसके लिए उन्हें संस्था के उद्देश्य, जिस समस्या पर काम किया जा रहा है उसकी अहमियत और उस स्तर की तकनीक के बारे में बताना पड़ता है, जिसे उन्हें विकसित करने का अवसर मिलेगा। उत्कर्ष मानते हैं कि शुरुआत में उन्होंने इस चुनौती को कम आंका था।
विकास सेक्टर में फ़ंडिंग से जुड़े नियम इस समस्या को और जटिल बना देते हैं। ग़ैर-लाभकारी संस्थाओं को प्रतिभाशाली लोगों के लिए निजी टेक्नोलॉजी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है, लेकिन फ़ंड देने वाली संस्थाएं अक्सर वरिष्ठ तकनीकी विशेषज्ञों को बाज़ार के अनुरूप वेतन देने में हिचकिचाती हैं। नतीजतन, एआई सिस्टम विकसित करने और उन्हें लगातार बेहतर बनाने के लिए ज़रूरी विशेषज्ञ टीम तैयार करना और उसे लंबे समय तक बनाए रखना अपने आप में एक बड़ी बाधा बन सकता है।
अदालत एआई के सामने बुनियादी ढांचे से जुड़ी चुनौतियां भी उतनी ही ठोस हैं। फ़िलहाल अदालतों के पास ग्राफ़िक्स प्रोसेसिंग यूनिट (जीपीयू) ख़रीदने की सुविधा नहीं है। इसके अलावा, अलग-अलग अदालतों में उपलब्ध हार्डवेयर में भी बहुत अंतर है—कहीं उच्च क्षमता वाले टचस्क्रीन लैपटॉप हैं, तो कहीं ऐसे कमरे हैं जहां तेज़ आवाज़ करने वाले पंखे लगे हैं और माइक्रोफ़ोन तक उपलब्ध नहीं हैं। अदालत एआई ने अपने सिस्टम को सबसे सीमित उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखकर तैयार किया है। इसके मॉडल इस तरह बनाए गए हैं कि वे बाहरी माइक्रोफ़ोन के बिना भी काम कर सकें। इन्हें साफ़-सुथरी स्टूडियो रिकॉर्डिंग के बजाय वास्तविक अदालतों में रिकॉर्ड किए गए शोरगुल वाले ऑडियो डेटा पर प्रशिक्षित किया गया है।
सिविस के लिए चुनौती केवल यह समझने तक सीमित नहीं है कि सरकार की मांगों का जवाब कैसे दिया जाए, बल्कि यह भी है कि इन मांगों को ध्यान में रखते हुए सोच-समझकर अपनी दिशा कैसे तय की जाए। जैसे-जैसे सरकारी विभाग तकनीक की क्षमताओं से परिचित होते जाते हैं, नई-नई मांगें सामने आती हैं—दस्तावेज़ों के विश्लेषण से लेकर प्रशासन से जुड़े दूसरे कामों तक। ये अवसर संस्था के लिए नए रास्ते खोलने और विश्वास कायम करने में मदद करते हैं, लेकिन साथ ही यह तय करना भी ज़रूरी हो जाता है कि इनमें से कौन-सा काम संस्था के मूल उद्देश्य को मज़बूत करता है और कौन-सा नहीं। इस लिहाज़ से चुनौती केवल अपने काम का दायरा बढ़ाने से बचना नहीं है, बल्कि सोच-समझकर और स्पष्ट उद्देश्य के साथ विस्तार करना है।
इन सभी चुनौतियों से निपटने के लिए व्यवस्था को भीतर से समझना ज़रूरी है—उसकी संस्थागत संस्कृति, राजनीतिक दबाव, आंकड़ों से जुड़ी सीमाएं और उन लोगों की ज़रूरतें, जो हर दिन इस टूल का इस्तेमाल करेंगे। किसी समाधान के बारे में सोचने से पहले यह ज़रूरी है कि समस्या को स्पष्ट रूप से पहचाना जाए और उसका गहराई से अध्ययन किया जाए। और जब उस समस्या के समाधान पर काम शुरू किया जाए, तो संस्थाओं को ख़ुद से कुछ महत्वपूर्ण सवाल पूछने चाहिए:
- क्या इस समाधान को मौजूदा सरकारी आंकड़ों की प्रणालियों और वर्कफ़्लो में शामिल किया जा सकता है?
- एआई के परिणामों की पुष्टि कौन करेगा?
- अधिकारियों के बदलने या तबादले के बाद क्या होगा?
- क्या सरकार इसे बड़े पैमाने पर लागू करने का खर्च उठा सकती है?
- आंकड़ों, मॉडल और उनके दीर्घकालिक रखरखाव की ज़िम्मेदारी किसकी होगी?
एक अच्छे एआई टूल और ऐसे एआई टूल में, जो सार्वजनिक व्यवस्था का हिस्सा बन सके, अंतर सिर्फ़ तकनीक का नहीं होता। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि उसे बनाने वाले लोग सार्वजनिक संस्थाओं की सीमाओं और ज़रूरतों को कितनी गहराई से समझते हैं और उस व्यवस्था के साथ लंबे समय तक काम करने के लिए कितने प्रतिबद्ध हैं।
–
अधिक जानें
लेखक के बारे में
- इंडिया डेवलपमेंट रिव्यू (आईडीआर) डेवलपमेंट कम्यूनिटी में काम कर रहे नेतृत्वकर्ताओं के लिए बना भारत का पहला स्वतंत्र मीडिया प्लैटफ़ॉर्म है। हमारा लक्ष्य भारत में सामाजिक प्रभाव से जुड़े ज्ञान का विस्तार करना है। हम वास्तविक दुनिया की घटनाओं से हासिल विचारों, दृष्टिकोणों, विश्लेषणों और अनुभवों को प्रकाशित करते हैं।





