
मेरा नाम कृष्णा है। मैं गुजरात के अहमदाबाद स्थित ‘प्रभात एजुकेशन फाउंडेशन’ में रिसर्च एसोसिएट के तौर पर काम करती हूं। यहां हम विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों के साथ काम करते हैं। यहाँ काम करते हुए पिछले कुछ समय से हमने महसूस किया कि बच्चों की देखभाल और परवरिश में अब उनके पिताओं की भागीदारी पहले के मुकाबले बढ़ी है। यह बदलाव कैसे हुआ और इससे बच्चों के विकास पर क्या फर्क पड़ता है, इसे समझने के लिए हमने एक गुणात्मक अध्ययन किया।
शुरुआत में यह अध्ययन मुझे एक चुनौती की तरह लगा। इसकी वजह यह थी कि इससे पहले मैंने कई वर्षों तक महिला अधिकारों के क्षेत्र में काम किया था। अपने अनुभवों के आधार पर मेरी यह धारणा लगभग पुख्ता हो चुकी थी कि विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारी मुख्य तौर पर माएं ही निभाती हैं। हमने अपने सेंटर पर भी देखा था कि बच्चों के साथ ज़्यादातर उनकी माएं ही आती थीं। ऐसे में अपने पूर्वाग्रहों से बाहर निकलकर पिताओं की भूमिका को एक नए नज़रिए से देख पाना मेरे लिए आसान नहीं था।
अपने पूर्वाग्रहों की चुनौती देने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ते हुए हमने 18 पिताओं के घर जाकर उनसे घंटों बातचीत की। हमने उनके पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक हालात को समझने की कोशिश की। इन बातचीतों से सामने आया कि बच्चे की परवरिश में पिता का योगदान मां से अलग भले ही हो, लेकिन कम नहीं होता।
अध्ययन में शामिल एक पिता कम पढ़े-लिखे थे और दिहाड़ी मज़दूरी करते थे। उन्होंने अपने विकलांग बेटे की सर्जरी के लिए 15 साल पहले अपना घर बेच दिया था। तब से वे किराए के मकान में रह रहे हैं और दोबारा अपना घर नहीं बना पाए हैं। उनके लिए बेटे का इलाज करवाना और उसकी ज़िंदगी को बेहतर बनाना उनकी निजी संपत्ति से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण था।
अध्ययन के दौरान हमने यह भी देखा कि परिवारों में बच्चों के देखभाल की ज़िम्मेदारियां अलग-अलग तरह से बंटी हुई थीं। जहां कुछ माएं घर पर रहकर बच्चों की रोज़मर्रा की देखभाल की ज़िम्मेदारी संभालती थीं, वहीं कुछ पिता दिनभर मज़दूरी करके थके होने के बावजूद उन्हें साइकिल पर बैठाकर या पैदल आसपास के बाज़ारों और सामाजिक कार्यक्रमों में ले जाते थे।
यह भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों को कई बार सार्वजनिक स्थानों पर जाने और दूसरे लोगों से मिलने-जुलने के पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाते। ऐसे में पिता का उन्हें घर से बाहर ले जाना उनके सामाजिक मेल-जोल को बढ़ाता है। इससे उन्हेंअपने आसपास की दुनिया को जानने, लोगों के साथ घुलने-मिलने और आत्मविश्वास विकसित करने में मदद मिल सकती है।
इस अध्ययन के दौरान हमने यह भी देखा कि पिता अपने बच्चों की देखभाल में कितनी सक्रिय भूमिका निभाते हैं इसे सिर्फ उनकी शिक्षा या परिवार की आर्थिक स्थिति के आधार पर तय कर पाना मुश्किल था। बच्चे को उसकी ज़रूरतों, क्षमताओं और पूरी पहचान के साथ स्वीकार करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। शहर की झुग्गी-बस्तियों में और सीमित संसाधनों के बीच रहने वाले ये पिता जब अपने बच्चों को अपनाते हैं, तो ऐसा करके ये उनके विकास में सक्रिय भूमिका भी निभा रहे होते हैं।
पर इन नतीजों से परे, मेरे लिए इस अध्ययन की सबसे बड़ी सीख यह रही कि किसी व्यक्ति या समूह को लेकर अपनी धारणाओं और अनुभवों को ही सच नहीं मान लेना चाहिए। कई बार ये धारणाएं अधूरी और रूढ़िबद्ध हो सकती हैं। इन्हें तब तक सच नहीं माना जाना चाहिए जब तक कि ज़मीनी अध्ययन के ज़रिए इन्हें जांच-परख न लिया जाए।
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लेखक के बारे में
- कृष्णा केशवानी पिछले 20 वर्षों से विकास सेक्टर में सक्रिय हैं। उन्होंने महिला अधिकारों, दलित एवं अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों, पंचायती राज और जल प्रबंधन जैसे विषयों पर ज़मीनी स्तर पर काम किया है। वर्तमान में वे अहमदाबाद स्थित प्रभात एजुकेशन फाउंडेशन में रिसर्च एसोसिएट के रूप में कार्यरत हैं। वे अध्ययन और दस्तावेज़ीकरण के ज़रिए समुदायों के अनुभवों को व्यापक स्तर तक पहुंचाने का प्रयास करती हैं। साथ ही, दिव्यांगता और समावेशन के संदर्भ में वे शोध, कार्यक्रमों के क्रियान्वयन और प्रभावी मॉडल विकसित करने की दिशा में भी काम कर रही हैं। समुदाय-आधारित दृष्टिकोण के ज़रिए सतत और समावेशी विकास को बढ़ावा देना उनके काम का प्रमुख उद्देश्य है।