

मैं लखनऊ के डॉलीगंज मोहल्ले में रहती हूं। स्कूल की पढ़ाई पूरी होने के बाद यह मेरा कॉलेज का पहला साल है। मुझे बचपन से ही कला और डांस में बहुत रुचि थी। हालांकि इन सब चीज़ों में भी करियर होता है, इसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी।
मैं और मेरी सहेलियां अक्सर अपनी छत पर डांस किया करती थीं, लेकिन हमें हमेशा यह कह दिया जाता था कि कुछ पढ़ाई-लिखाई भी कर लो, नाच-गाने से जीवन नहीं चलने वाला है। इसलिए मैंने कभी नहीं सोचा था कि अभिनय भी एक काम होता है। मेरी सोच तब बदली जब मैं अपने ही मोहल्ले में मदर सेवा संस्थान के द्वारा संचालित चबूतरा थिएटर पाठशाला से जुड़ी।
इस पाठशाला से जुड़ने से पहले मुझे नहीं पता था कि थिएटर क्या होता है, मंच क्या होता है, एक्टिंग कैसे करते हैं। पहली बार जब मैं वहां गई, तो मैं बिल्कुल चुप थी। लेकिन वहां का माहौल बिल्कुल अलग था। शुरुआत में हमारे अभिनय प्रशिक्षक महेश सर ने हमसे अभिनय नहीं कराया। सबसे पहले उन्होंने हम बच्चों से बातचीत की। इस तरह, घर में जो जगह मुझे नहीं मिली, वह थिएटर पाठशाला में मिली।
हालांकि अभिनय सीखने की राह में मुझे अपने परिवार और रिश्तेदारों की नाराज़गी भी झेलनी पड़ी। रिश्तेदारों ने मेरे परिजनों से कहा कि मैं अच्छा काम नहीं कर रही हूं, इससे मेरी शादी में भी दिक्कत आएगी। लेकिन मैंने उन्हें मनाना और अभिनय सीखना जारी रखा।
हमारे अभिनय प्रशिक्षण लेने का भी काफी विरोध होता रहा। हमारे क्षेत्र में लोग लड़कों और लड़कियों का इस तरह साथ में प्रशिक्षण लेना पसंद नहीं करते थे। हमें कई बार अपनी क्लास के लिए जगह बदलनी पड़ी। लंबे प्रशिक्षण के बाद मुझे पहली बार मंच पर नाटक करने का मौका मिला। पहले नाटक के दौरान मुझे बहुत डर लग रहा था, पर मैंने हौसला बनाए रखा और जब सबने मेरे अभिनय पर तालियां बजाईं, तो मेरा सारा डर खत्म हो गया।
थिएटर करने से मेरे अंदर आत्मविश्वास जागा। इससे अपनी जाति, आर्थिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से मेरे भीतर जो डर था, वो धीरे-धीरे खत्म हुआ। मैंने जाना कि कला किसी एक जाति या वर्ग का अधिकार नहीं है। सबका इस पर समान अधिकार है और इससे आपको समाज में अपनी एक पहचान बनाने का अवसर भी मिल सकता है। यहां हमने नशा करने, बाल विवाह, अशिक्षा और जातिगत भेदभाव जैसी सामाजिक कुरीतियों पर नाटक लिखे और उनका मंचन किया। इस सबका असर मैंने अपने परिवार और आसपास के माहौल पर भी देखा।
मेरे अच्छे अभिनय के कारण ही मुझे आर्टिकल-15 फिल्म में काम करने का मौका मिला। इस फिल्म में मेरे काम करने के बाद अभिनय के क्षेत्र में लड़कियों के काम करने को लेकर मेरे आसपास का माहौल बदला। लोगों ने मेरी काफी सराहना की और अपने परिवार की लड़कियों को भी अभिनय सीखने का मौका देना शुरू किया।
आज मैं अपने परिवार की पहली लड़की हूं, जो कॉलेज जाती है। साथ ही, घर से दूर जाकर काम करने वाली भी पहली लड़की हूं। अब मैं मंच पर खड़ी होकर बोल सकती हूं, नाटकों के ज़रिए अधिकारों की बात कर सकती हूं और भविष्य में मुझे क्या करना है यह भी तय कर सकती हूं।
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लेखक के बारे में
- शिखा वाल्मिकी, उत्तर प्रदेश के लखनऊ की रहने वाली हैं। वह इस समय स्नातक प्रथम वर्ष की पढ़ाई कर रही हैं। वह मदर सेवा संस्थान के द्वारा संचालित चबूतरा थिएटर पाठशाला से जुड़ी हुई हैं। यह मुहिम हाशिये के समुदाय के बच्चों को थिएटर की ट्रेनिंग के ज़रिए उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने का काम करती है। शिखा का मानना है कि कला और शिक्षा के माध्यम से सामाजिक भेदभाव को खत्म किया जा सकता है।

