
मार्टिन मकवान गुजरात, भारत के मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। वे नवसर्जन ट्रस्ट, दलित शक्ति केंद्र और दलित फाउंडेशन के संस्थापक हैं।
मार्टिन को वर्ष 2000 में रॉबर्ट एफ. कैनेडी ह्यूमन राइट्स अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। उन्होंने कई दशकों तक हाशिये के समुदायों को संगठित करके और देशभर में अभियान चलाकर छुआछूत को चुनौती दी। उनके मार्गदर्शन और ज़मीनी स्तर पर किए गए काम से भारत के हाशिये के समुदायों से आने वाले युवा नेताओं की कई पीढ़ियों को प्रेरणा मिली है।
आईडीआर के साथ इस बातचीत में मार्टिन बताते हैं कि उनके अपने जीवन के अनुभवों और दूसरों के साथ उनके संवादों ने उनके एक्टिविज़्म को किस तरह आकार दिया। वे अपने काम को दिशा देने वाले साहस और रचनात्मकता के बारे में बात करते हैं और यह भी बताते हैं कि मुश्किल दौर में उन्हें उम्मीद कहां से मिलती है।
अपने शुरुआती जीवन के बारे में बताइए? आपको एक्टिविज़्म की प्रेरणा कैसे मिली?
जब मैं सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज, अहमदाबाद से बीए कर रहा था, तब मेरे प्रोफेसर फादर हेरेडेरो और फेरोज कॉन्ट्रैक्टर अक्सर मुझसे कहते थे कि डिग्री के पीछे भागने के बजाय सामाजिक कार्य करना चाहिए। तब मैं उनसे कहता था, “मैं बहुत गरीब परिवार से हूं। मेरी मां तंबाकू के खेत में काम करती हैं। उन्हें एक दिन के काम के 65 पैसे मिलते हैं। मैं खुद बाल मजदूर हूं और हमारे परिवार में 11 लोग हैं। अपने इलाके से कॉलेज जाने वाला मैं पहला व्यक्ति हूं।”
आत्मचिंतन बहुत ज़रूरी है। लेकिन आज स्वैच्छिक क्षेत्र में यह पूरी तरह गायब होता दिखता है। आप कार्यक्रम करते हैं, बैठकें होती हैं, फिर दोपहर का खाना होता है और इन सबके बारे में इंटरनेट पर पोस्ट भी की जाती हैं।
लेकिन प्रोफेसर अपनी बात पर अड़े रहते थे। वे कहते थे, “शैक्षणिक संस्थान तुम्हें डिग्री तो दे देंगे, लेकिन तुम्हारे पास ज्ञान नहीं होगा। इसके बजाय अगर तुम किसी गांव में जाकर वहां के लोगों के साथ बातचीत करोगे, उनके घरों में रहोगे, तो तुम्हें ऐसा ज्ञान मिलेगा जो किसी डिग्री से कहीं ज़्यादा अहमियत रखता है।”
मैं उस समय सिर्फ 20 वर्ष का था और मेरे जैसी पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति के लिए यह आसान फैसला नहीं था। फिर भी मैंने अपने प्रोफेसरों के साथ गुजरात के खंभात तालुका के गांवों में एक सर्वे के लिए जाने का फैसला किया। मुझे एक सीधी-सी बात कही गई थी, “जब तुम गांवों में रहोगे, तो अपनी आंखें और कान खुले रखना, लेकिन अपना मुंह बंद रखना।” मुझे जल्द ही एहसास हो गया कि इस बात पर अमल करना आसान नहीं था।
जिस गांव में मैं रह रहा था, वहां अपनी खिड़की से बाहर देखने पर मुझे एक तालाब, एक बरगद का पेड़ और उस पेड़ के नीचे बैठा एक ऊंची जाति का व्यक्ति दिखाई देता था। पेड़ के ठीक दूसरी तरफ दलितों की बस्ती थी। रोज़ वह आदमी पूरे दिन वहां बैठा रहता था और पानी भरने जाती दलित बस्ती की महिलाओं को घूरता रहता था। मैं खासकर दलित महिलाओं के खिलाफ जातिवाद के कई रूप लगातार देख रहा था। मैंने अपने प्रोफेसर से कहा, “मैं चुप नहीं रह सकता, क्योंकि यह सब देखकर मुझे बहुत गुस्सा आता है।” उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं जो देखता हूं और जो महसूस करता हूं, उसे एक डायरी में लिखूं।
मेरे प्रोफेसर मुझे यही समझाने की कोशिश कर रहे थे कि “जब तुम बोलते हो, तब तुम न तो सुन रहे होते हो और न ही देख-समझ रहे होते हो।” तब से मैंने लिखना जारी रखा। मेरी डायरियों का ढेर बहुत जल्दी फर्श से छत तक पहुंच गया। एक समय ऐसा आया जब मेरे पास उन्हें रखने की अपनी कोई जगह नहीं थी, इसलिए मैंने उन्हें एक दोस्त के यहां रखना शुरू कर दिया। कुछ वर्ष पहले एक दिन किसी ने इन डायरियों को रद्दी समझकर मेरी 25 सालों की लिखी हुई सामग्री बेच दी।
मैंने सीखा कि आत्मचिंतन बहुत ज़रूरी है। लेकिन आज स्वैच्छिक क्षेत्र में यह पूरी तरह गायब होता दिखता है। आप कार्यक्रम करते हैं, बैठकें होती हैं, फिर दोपहर का खाना होता है और इन सबके बारे में इंटरनेट पर पोस्ट भी की जाती हैं। लेकिन मैं लोगों को दो घंटे से ज़्यादा समय तक बैठकर इस बात पर विचार करते नहीं देखता कि वे जो कर रहे हैं या जो देख रहे हैं, उसका क्या मतलब है।
आप जिस तरह का सामाजिक काम करते हैं, उसमें बहुत साहस की ज़रूरत होती है। क्या यह साहस आपके भीतर स्वाभाविक रूप से था या आपने इसे दूसरों से सीखा?
आज मेरे पास ऑफिस की गाड़ी है, एक अच्छा घर है और खाने-पीने की सुविधा है। लेकिन ऐसे लाखों-करोड़ों लोग हैं, जिनके पास ये सुविधाएं नहीं हैं। उनकी ज़िंदगी एक ऐसी लड़ाई है, जिसे वे हर दिन लड़ते हैं। मुझे अपना साहस इन्हीं लोगों से मिलता है।
मैं आपको एक उदाहरण देता हूं। 90 के दशक की शुरुआत में गुजरात के एक गांव में दलित लोगों पर इतना अत्याचार हो रहा था कि उन्हें अपने घर छोड़कर कैंपों में जाकर रहना पड़ा। इन लोगों में एक युवा फैक्ट्री मज़दूर भी था, जिसे रोज़ी-रोटी के लिए कई घंटे का सफर तय करना पड़ता था। सफर जल्दी तय करने के लिए उसने 200 रुपए में एक साइकिल खरीदी। उसे पता नहीं था कि उसने चोरी की हुई साइकिल खरीद ली है। जब पुलिस ने उसे पकड़ा तो उसने कहा, “देखिए, मैंने यह साइकिल खरीदी है। मुझे नहीं पता था कि यह चोरी की हुई है।”
कानून के मुताबिक पुलिस को सिर्फ साइकिल ज़ब्त करके उस आदमी को छोड़ देना चाहिए था। इसके बजाय वे उसे थाने ले गए, उसे बर्फ की सिल्ली पर सुलाया और बेरहमी से पीटा।
आखिरकार, उन्हें ज़मानत के लिए उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना था, लेकिन वह इतना घायल था कि खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। इसलिए पुलिस ने उसकी जगह उसके छोटे भाई को पेश कर दिया। घर पहुंचने के बाद वह न तो उठ-बैठ पा रहा था और न ही पीठ के बल सो पा रहा था। लोग उसे अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टर ने इलाज शुरू करने से पहले यह पूछा कि उसके साथ क्या हुआ था। उसकी हालत के बारे में जानने के बाद डॉक्टर ने पुलिस विभाग को फोन किया और कहा कि उनके खिलाफ शिकायत है।
बाद में वह आदमी अपने ही घर में फांसी पर लटका हुआ मिला। किसी ने उसके ही घर में उसे फांसी पर लटका दिया था।
एक प्रशिक्षित वकील और सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर मैंने यह मामला अपने हाथ में लिया। उस व्यक्ति के पीछे उसकी विधवा मां और उसका भाई रह गए थे। पुलिस हर दिन उनके घर आती और मामला वापस लेने के लिए 5 लाख रुपए नकद देने की पेशकश करती। लेकिन उसकी मां पीछे नहीं हटी। उसकी सुरक्षा के लिए मैं उसे 15 दिनों के लिए अपने घर ले आया।
साल 1989 में नवसर्जन की स्थापना की, ताकि खासकर गुजरात में छुआछूत की प्रथा के खिलाफ लड़ सकूं।
उस समय हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। हम मिट्टी के एक छोटे-से घर में रहते थे। मेरी पत्नी और हमारे दो बच्चे घर के पीछे वाले कमरे में सोते थे। वह महिला अक्सर हमारे दरवाज़े के बाहर बैठी या खड़ी रहती थी। वह बार-बार कहती, “मार्टिन भाई, चाहे जो हो जाए, हम यह केस हारें या जीतें, लेकिन हमें लड़ना है।”
एक दिन मैं खुद को रोक नहीं पाया और फूट-फूटकर रोने लगा। मैंने कहा, “मेरे पास सब कुछ है और फिर भी मुझे शिकायतें हैं। इस महिला के पास कुछ भी नहीं है, लेकिन न्याय के प्रति उसका जज़्बा देखिए। वह लड़ना चाहती है।”
मैंने बार-बार देखा है कि जो लोग अत्याचार झेलते हैं, वे निडर होते हैं। इसके उलट, उनके लिए काम करने का दावा करने वाले स्वैच्छिक संगठन और फंडर साहस दिखाने के बजाय सुरक्षित और रणनीतिक तरीके अपनाते हैं।
आपको बार-बार अपनी इस बहादुरी की कीमत चुकानी पड़ी है। इन मुश्किलों ने आपके काम करने के तरीके को किस तरह बदला?
पिछले कई दशकों में मैंने बहुत कुछ खोया है। 1986 में, अपने काम के शुरुआती वर्षों के दौरान, मुझे अपने चार साथियों की हत्या का सामना करना पड़ा। हम सभी एक दलित आंदोलन में शामिल थे और इसी दौरान सामंती ज़मींदारों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।
मैंने साल 1989 में नवसर्जन की स्थापना की, ताकि खासकर गुजरात में छुआछूत की प्रथा के खिलाफ लड़ सकूं। हमारा लगातार उस समय की सत्ता और ताकतवर लोगों से टकराव होता रहा। साल 2016 में हमें कमज़ोर करने की कोशिश में सरकार ने हमारा एफसीआरए लाइसेंस रद्द कर दिया। इसके बाद हमारा 80जी भी रद्द कर दिया गया, जिससे हमारे फंडिंग के स्रोत प्रभावित हुए। अब वे हमारा 12ए लाइसेंस भी रद्द करने की कोशिश कर रहे हैं।
जो लोग अत्याचार झेलते हैं, वे निडर होते हैं। इसके उलट, उनके लिए काम करने का दावा करने वाले स्वैच्छिक संगठन और फंडर साहस दिखाने के बजाय सुरक्षित और रणनीतिक तरीके अपनाते हैं।
यह हमारे लिए एक बहुत बड़ा झटका था और हमें अपने काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव करना पड़ा। मैंने साल 2002 में ही संगठन की ज़िम्मेदारी छोड़ दी थी। इससे पहले मैंने गुजरात में छुआछूत के खिलाफ एक बड़ी पदयात्रा की थी। मैं चाहता था कि नेताओं की नई पीढ़ी संगठन की ज़िम्मेदारी संभाले। मैंने बोर्ड से कहा कि मैं युवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए तैयार हूं, लेकिन अब मुझे नेता बने रहने की ज़रूरत नहीं है। इसलिए मैंने ट्रस्टी बोर्ड और संगठन के निदेशक, दोनों पदों से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने मुझसे हमारे द्वारा चलाए जा रहे व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र दलित शक्ति केंद्र की ज़िम्मेदारी संभालने के लिए कहा। मैंने कहा कि मैं यह काम स्वेच्छा से करूंगा।
लेकिन वर्ष 2016 में जब संगठन पर यह संकट आया, तो नवसर्जन के बोर्ड ने कहा, “देखिए, अब हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा है। या तो आप वापस आइए, या फिर हमें पूरा संगठन बंद करना पड़ेगा।” इसलिए मैंने अपनी तय की हुई योजना के बिल्कुल उलट जाकर दोबारा संगठन की ज़िम्मेदारी संभाल ली।
वापस आने के बाद, जब मैंने समस्या को समझने की कोशिश की, तो मुझे एहसास हुआ कि हमारी समस्या पैसों की कमी नहीं थी। समस्या यह थी कि हमारे कार्यक्रम अच्छे नहीं थे।
स्वैच्छिक क्षेत्र में पैसों से ज़्यादा रचनात्मकता की ज़रूरत होती है। जब हमने सब कुछ खो दिया, तो अपने कार्यक्रम चलाने के लिए हम पहले से कहीं ज़्यादा रचनात्मक हो गए।
साल 2017 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कुशीनगर ज़िले के एक दलित गांव का दौरा करने वाले थे। सरकारी अधिकारियों ने वहां जाकर लोगों के बीच साबुन की टिकिया और शैंपू के पाउच बांटे। उनका कहना था कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है, ताकि दलितों के शरीर से आने वाली गंध मुख्यमंत्री की नाक तक न पहुंचे।
लोग बहुत नाराज़ थे। इसलिए हमने कहा, “कुछ करते हैं। एक साबुन बनाते हैं, लेकिन इतना बड़ा कि पूरी दुनिया का ध्यान उस पर जाए।” हमने एक साबुन बनाया, जो 4 फीट ऊंचा, 2 फीट चौड़ा और 1 फीट गहरा था। उसका वज़न करीब 125 किलोग्राम था। ऐसा इसलिए क्योंकि वह बी. आर. आंबेडकर की 125वीं जयंती थी।
हमने इसके लिए प्रति व्यक्ति एक से पांच रुपए तक चंदा जुटाने पर भी सहमति जताई। साबुन बनाने में हमें 2500 रुपए का खर्च आया और लोगों ने खुशी-खुशी पैसे दिए। हमने साबुन पर भगवान बुद्ध की एक सुंदर आकृति बनाई, क्योंकि कुशीनगर वही जगह है जहां बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ था।
फिर हमने मुख्यमंत्री को एक चिट्ठी लिखी। उसमें लिखा, “बुद्ध ने 2500 साल पहले कुशीनगर में जाति व्यवस्था को खत्म किया था। आप सरकारी पैसे और सत्ता की ताकत से इसे दोबारा खड़ा कर रहे हैं। आपके इस पाप को सिर्फ बुद्ध ही धो सकते हैं, कोई और नहीं। इसलिए आप भले ही पवित्र कपड़े पहन लें, लेकिन इतना काफी नहीं है। आपके मन की गंदगी भी दूर होनी चाहिए। यह साबुन आपके लिए है।”
उस साबुन को एक बड़े ट्रक में पूरे गुजरात में घुमाया गया, ताकि राज्यभर के लोग उसे देख सकें। इसके बाद हमारे साथी मुख्यमंत्री को साबुन सौंपने के लिए साबरमती एक्सप्रेस से लखनऊ के लिए रवाना हुए। झांसी में करीब 700 राइफलों से लैस पुलिसवालों ने ट्रेन को रोक लिया। उन्होंने पूछा, “डिब्बे में क्या है?” जब उन्होंने डिब्बा खोला और उसमें भगवान बुद्ध को देखा, तो पुलिसवालों ने अपनी टोपियां उतारकर उन्हें सलाम किया। कुछ ही पलों में वह सेल्फी पूरे भारत में लोकप्रिय हो गई।
इसके तुरंत बाद पुलिस का व्यवहार बदल गया। उन्होंने कहा, “हमें कोई दिक्कत नहीं है। हम आपकी सुरक्षा के लिए यहां हैं और हमने आपके ठहरने और खाने का इंतज़ाम कर दिया है।” मेरे साथियों ने उनसे कहा, “देखिए, हम इस बात पर ज़ोर नहीं दे रहे कि हम मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत रूप से मिलें और उन्हें साबुन दें। क्या आप राज्य सरकार की ओर से इसकी रसीद जारी करके खुद यह साबुन ले सकते हैं?” आखिरकार, काफी बातचीत के बाद उन्होंने रसीद जारी कर दी।
साबुन आज भी अधिकारियों के पास सुरक्षित है। हमने आरटीआई के ज़रिए इसकी पुष्टि की है।
यह मेरे जीवन का सबसे सस्ता अभियान था। मैंने सैकड़ों अभियान किए हैं, लेकिन 2500 रुपए में किए गए इस अभियान ने पूरे देश का ध्यान खींचा। इससे मुझे यह सीख मिली कि सरकार हमारे और हमारे संगठनों के साथ क्या कर सकती है, इस डर से हमें बाहर निकलना होगा। हमें जागरूकता फैलाने और अपना विरोध दर्ज कराने के लिए नए और रचनात्मक तरीके खोजते रहना होगा।
आपने करीब पांच दशकों तक सामाजिक क्षेत्र में काम किया है। आज भी आपको काम करते रहने की ताकत कहां से मिलती है?
युवाओं के साथ काम करने से मुझे उम्मीद और ऊर्जा, दोनों मिलती हैं।
दलित शक्ति केंद्र में हमने 11,000 युवा लड़के-लड़कियों को प्रशिक्षण दिया है। हमारा ध्यान सिर्फ उन्हें शर्ट सिलना या कोई चीज़ बनाना सिखाने पर नहीं होता, बल्कि हम उन्हें जीवन से जुड़ी ज़रूरी बातें भी सिखाते हैं। उदाहरण के लिए, यह हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा है कि चाहे आप औरत हों या आदमी, आपको रोटी बनानी सीखनी होगी। कई लड़के 25 साल की उम्र में पहली बार रसोई में आते हैं। हम उन्हें यह भी सिखाते हैं कि पुलिस थाने जाकर एफआईआर कैसे दर्ज कराई जाती है, ज़मीन के दस्तावेज़ कैसे पढ़े जाते हैं आदि। यह सिर्फ शिक्षा के लिए शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण नहीं है।
युवाओं से बस बात कीजिए, उनके साथ संवाद कीजिए, उनके घर जाइए, उनके साथ खाना खाइए और उनकी कही हर बात को सुनिए। आखिरकार, वही हमारा भविष्य हैं।
झारखंड के एक आदिवासी समुदाय की एक लड़की हमारे साथ दो महीने रही। वह बिल्कुल बात नहीं करती थी। अपना नाम तक नहीं बताती थी। मैंने उससे कई बार बात करने की कोशिश की। लोग कहते थे, “मार्टिन भाई, पता नहीं इस लड़की को यहां कौन लेकर आया है। यह हमारे संसाधनों की बर्बादी है।” मैंने कहा, “देखिए, हमें धैर्य रखना होगा। हम यहां टाइम बम तैयार करते हैं। कुछ बम यहीं फट जाते हैं और कुछ 10 साल बाद फटते हैं। इसलिए हमें अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए।”
दो महीने बाद जब वह अपने घर वापस गई, तो एक विवाद को लेकर हुई ग्राम सभा की बैठक में अपनी मां के साथ गई। कुर्सी पर बैठे ठाकुर अपनी मूंछों पर ताव देते हुए बैठक शुरू करने का आदेश दे रहे थे। तभी वह लड़की खड़ी हुई और बोली, “माफ कीजिए, लेकिन आप प्रधान नहीं हैं। आपकी पत्नी प्रधान हैं।”
उस आदमी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। इतने सालों में किसी ने उससे सवाल करने की हिम्मत नहीं की थी। उसने चिल्लाकर पूछा, “यह किसकी बेटी है?” उस लड़की के हैरत की सीमा नहीं रही, जब आठ-नौ महिलाएं खड़ी होकर बोलीं, “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह किसकी बेटी है। ज़रूरी यह है कि इसने जो कहा है, वह सही है या नहीं।” बैठक हंगामे के बीच खत्म हुई। लेकिन अगली बैठक में उसकी पत्नी, जो असली प्रधान थीं, आईं और जाकर कुर्सी पर बैठीं।
दलित फाउंडेशन ने इस युवा महिला और समाज में बदलाव लाने वाले दूसरे लोगों की ऐसी कहानियों को *स्टोरी ऑफ चेंज* नाम की किताब में दर्ज किया है।
आज मैं बहुत खुश हूं। यही मेरी जिंदगी का मकसद था। 47 साल तक बार-बार सैकड़ों युवाओं को प्रशिक्षित करना। युवाओं से बस बात कीजिए, उनके साथ संवाद कीजिए, उनके घर जाइए, उनके साथ खाना खाइए और उनकी कही हर बात को सुनिए। आखिरकार, वही हमारा भविष्य हैं।
हाल के जेन जी विरोध प्रदर्शनों में इतने सारे लोगों को आंबेडकर के पोस्टर हाथों में लिए देखना मेरे लिए बहुत खुशी की बात थी। वे एक बराबरी वाले भारत के प्रतीक के तौर पर आंबेडकर की तस्वीरें लेकर चल रहे थे। वे अपने अधिकारों की मांग करने के लिए संविधान की प्रतियां भी साथ लेकर चल रहे थे और खुले तौर पर जाति-विरोधी नारे लगा रहे थे। साहस और एकजुटता का यह बेझिझक प्रदर्शन मुझे उम्मीद देता है। मुझे बदलाव आता हुआ दिख रहा है और यही मुझे काम करते रहने की ताकत देता है।
इस लेख को तैयार करने में स्मरिणीता शेट्टी का योगदान रहा है।
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लेखक के बारे में
- देबोजीत दत्ता आईडीआर में संपादकीय सहायक हैं और लेखों के लिखने, संपादन, सोर्सिंग और प्रकाशन के जिम्मेदार हैं। इसके पहले उन्होने सहपीडिया, द क्विंट और द संडे गार्जियन के साथ संपादकीय भूमिकाओं में काम किया है, और एक साहित्यिक वेबज़ीन, एंटीसेरियस, के संस्थापक संपादक हैं। देबोजीत के लेख हिमल साउथेशियन, स्क्रॉल और वायर जैसे प्रकाशनों से प्रकाशित हैं।
- जूही मिश्रा आईडीआर में एडिटोरिएल एसोसिएट हैं। उन्हें पत्रकारिता का 14 साल का अनुभव है और उन्होंने पत्रिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, रोर मीडिया, दूता टेक्नोलॉजी और ग्राम वाणी के साथ काम किया है। जूही ने विकास संवाद संस्था से फेलोशिप पूरी की है, जहाँ उन्होंने बसोर समुदाय में खाद्य प्रणालियों और कुपोषण के कारणों पर शोध किया।




