हल्का-फुल्का

एक सालाना रिपोर्ट की बनने से पहले ही थक जाने की दास्तान

भारत की हजारों जमीनी संस्थाओं में हर साल एक रस्म दोहराई जाती है—वार्षिक रिपोर्ट बनाना। शुरुआत संस्थापक के जोशीले भाषण से होती है, अफरातफरी से गुजरती है और आखिर में एक ऐसी चमचमाती रिपोर्ट सामने आती है, जिसे पता नहीं कितने ही लोग पढ़ते हैं!
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भारत की सामाजिक संस्थाओं में हर साल एक रस्म दोहराई जाती है – सालाना रिपोर्ट बनाना।

मैं भी एक ऐसी ही एक रिपोर्ट हूं।

नमस्ते।

फ़िलहाल, आप मुझे Annual Report_Final_3 _asli_FINAL_ver. 5_Last.doc कह सकते हैं।

आज मैं आपको अपनी कहानी सुनाने जा रही हूं।

मेरा जन्म

मेरा जन्म नौ महीने पहले हमारे लीडर के दिमाग में हुआ था, वह भी हमारी एक टीम मीटिंग के दौरान। अरे! वही जगह, जहां अक्सर अच्छी नीयतें, फैसले और काम किसी और के सिर मढ़ दिए जाते हैं।

वहां मुझे टीम के सबसे नए और सबसे कम उम्र के सदस्य के हवाले कर दिया गया। उसकी सबसे बड़ी योग्यता थी कि उसे अंग्रेज़ी और कैनवा चलाना आता है। उसमें ऐसा पेज लेआउट बनाने की क्षमता थी जिसमें तस्वीर 17 डिग्री के कोण पर टेढ़ी न लटकी हो और उसके नीचे तीन अलग-अलग फॉन्ट में टेक्स्ट न हो। बस।

पहली तिमाही

हमारे नए कर्मचारी कुछ समय तक इस बात से उत्साहित रहे कि उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी मिली है। फिर उन्हें समझ आया कि रिपोर्ट तैयार करने का मतलब है ढेर सारे लोगों से बात करना।

अगले तीन महीने तक मैं उसके दिमाग में डेरा डाले रही. मुझे क्या दिखा? बेतरतीब विचार, बेवजह की चिंता और हर तरफ़ भागता दिमाग। बिल्कुल रिकमेंड नहीं करूंगी।

इस बीच दो मीटिंग और हुई, लेकिन किसी ने मेरा नाम तक नहीं लिया। आखिर काम भी तो बहुत थे – क्वालिटी सुधारना, नए प्रोग्राम शुरू करना, पार्टनरशिप बनाना और फंडिंग जुटाना। यानी मैं इंतजार करती रही, और बाकी सब काम करते रहे।

दूसरी तिमाही

नए कर्मचारी की प्रोबेशन खत्म होने वाली है, रिव्यू सिर पर है और छह महीने पूरे होते ही अचानक सबको मेरी याद आ गई है। अब वक्त है मुझे ज़िंदा करने का – वह भी कल नहीं, अभी।

सहकर्मियों को मैसेज, साझा ड्राइव की खुदाई, पुराने ईमेल-न्यूज़लेटर्स और फंडिंग ब्रीफ से आंकड़ों की बरामदगी शुरू हुई। सब कुछ जल्दबाजी में एक एआई सॉफ्टवेयर में डाला गया, इस उम्मीद में कि वह इनमें कोई मतलब ढूंढ निकाले।

मज़ेदार बात यह है कि अब तक किए गए काम को किसी ने जांचा तक नहीं। हालांकि मैं महीनों से सबकी टू-डू लिस्ट में बाकायदा मौजूद हूं।

तीसरी तिमाही

अब हमारे कर्मचारी को बॉस से चेतावनी मिल चुकी थी। बॉस भी नहीं चाहते थे कि संस्थापक के सामने उनकी खिंचाई हो, इसलिए रिपोर्ट में क्या-क्या होना चाहिए और पिछले वर्षों के दो लेआउट—दोनों ‘रेफरेंस’ के नाम पर – कर्मचारी के हवाले कर दिए गए।

दोनों लेआउट उसे बेहद बोरिंग लगे। उसने तय किया कि इस बार मुझे रंगीन और इंटरैक्टिव बनाया जाएगा। इसमें तीन हफ्ते लग गए।

इन तीन हफ्तों में ज्यादातर वक्त ऐसी तस्वीरें खोजने में गया जिनमें चेहरे आधे कटे न हों, समुदाय के लोग तकलीफ़ में भी सम्मानजनक दिखें, और कम से कम एक तस्वीर में कोई कर्मचारी खुश हो।

आखिरकार दो तस्वीरें मिलीं। एक थोड़ी धुंधली थी। वही इस्तेमाल हुई। समय और विकल्प, दोनों का यही फरमान था।

आखिरी दौर

मेरा पहला ड्राफ्ट करीब सात-आठ लोगों को भेजा जाता है। चौथे ड्राफ्ट तक ईमेल थ्रेड में 11 लोग हो चुके हैं। एक ट्रस्टी भी शामिल हैं, जो पिछले 21 साल से भारत नहीं आए हैं, लेकिन उन्हें फिर भी लगता है कि मेरे शुरुआती अध्याय की संरचना बदलनी चाहिए।

मेरे लिए बनाई गई समिति 40 मिनट सिर्फ फॉन्ट के आकार पर चर्चा कर चुकी है और अब सहमति के करीब है। यानी सबने परवाह करना बंद कर दिया है।

डिजाइनर मिट्टी जैसे रंगों की वकालत कर रहा है। हमारे नए कर्मचारी चमकीला पीला और मैजेंटा चुनते हैं। किसी ने इसे बहुत चुभने वाला कह दिया है। फिर ‘वाइब्रेंट’ शब्द की एंट्री होती है।

मेरे तेईसवें ड्राफ्ट पर ईमेल थ्रेड पर यह कहा गया “क्या हम कवर को थोड़ा और वाइब्रेंट बना सकते हैं?” हालांकि कवर पहले से ही नारंगी है।

अब मैं छबीसवें ड्राफ्ट पर हूं, और उसी व्यक्ति का ‘लुक्स गुड’ आ गया है, बिना किसी स्पष्टीकरण के।

आखिरकार मुझे Annual Report_Final_new final Version 37.doc घोषित कर दिया जाता है, सिर्फ इसलिए क्योंकि सब लोग मेरे बारे में बात करते-करते थक चुके हैं। अकाउंटेंट को मुझे सैंपल प्रिंट के लिए भेजने की जिम्मेदारी दी जाती है। प्रिंट आने के बाद सब मिलकर 42 गलतियां खोज निकालते हैं।

जल्दी-जल्दी सुधार किए जाते हैं, लेआउट बदले जाते हैं और आखिरकार मेरा फाइनल प्रिंट निकल ही आता है।

इसके बाद क्या होता है?

मुझे संस्थापक, उनके तीन दोस्त और वह नया कर्मचारी पढ़ता है, जिसने फाइनल प्रिंट से एक रात पहले 2 बजे मुझे प्रूफरीड किया था।

मुझे फंडर्स को भी दिया जाता है, पार्टनर संस्थाओं को भी भेजा जाता है, कॉन्फ्रेंस में ले जाया जाता है और नई भर्ती की प्रक्रिया का हिस्सा भी बनाया जाता है।

लेकिन ये लोग मुझे घर ले जाने के बाद करते क्या हैं?

खैर, इतना ही कह सकती हूं कि हर किसी के पास ऐसी किताबें होती हैं जिन्हें वह किसी दिन पढ़ने की उम्मीद करता है, लेकिन वह दिन कभी आता नहीं।

लेखक के बारे में

  • स्वाति सक्सेना युवाओं के साथ नेतृत्व, व्यक्तिगत विकास और सामाजिक बदलाव जैसे विषयों पर काम करती हैं। इससे पहले वह बिना किसी शर्त के नकद हस्तांतरण के माध्यम से गरीबी के बोझ को कम करने, प्रभावी संचार के जरिए सामाजिक क्षेत्र की संस्थाओं को मजबूत करने और वित्तीय सेवाओं तक पहुंच के माध्यम से लैंगिक समानता को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों का नेतृत्व कर चुकी हैं। वह सिस्टम्स थिंकिंग के जरिए लोगों को जलवायु संकट को समझने में मदद करने वाले एक ऑनलाइन पाठ्यक्रम का संचालन भी करती हैं।