लैंगिक विषय

साइबर अपराध और महिलाएं: अधूरे आंकड़े, अधूरे वादे

महिलाओं की साइबर सुरक्षा पर संसद की रिपोर्ट एक बड़ा सवाल उठाती है—कौन साइबर दुर्व्यवहार की शिकायत दर्ज करा पाता है और कौन आंकड़ों से बाहर रह जाता है?
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बजट सत्र 2026–27 में महिला सशक्तीकरण संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने साइबर अपराधों और महिलाओं की साइबर सुरक्षा पर चौथी रिपोर्ट संसद में पेश की। यह रिपोर्ट महिलाओं के खिलाफ बढ़ते साइबर अपराधों की तस्वीर सामने रखती है। साथ ही यह मौजूदा व्यवस्था की कमियों को रेखांकित करती है और उनसे निपटने के लिए कई सुझाव भी देती है।

रिपोर्ट से जुड़ी एक बड़ी चिंता यह है कि महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराधों पर भरोसेमंद सार्वजनिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। सबसे पहले, रिपोर्ट तकनीक के माध्यम से होने वाली लैंगिक हिंसा (टेक्नोलॉजी-फ़ेसिलिटेटेड जेंडर-बेस्ड वायलेंस / टीएफ-जीबीवी) को पर्याप्त अहमियत नहीं देती। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार, टीएफ-जीबीवी ऐसी लैंगिक हिंसा है, जो किसी व्यक्ति के जेंडर के आधार पर की जाती है और जिसमें डिजिटल तकनीक या मीडिया की भूमिका होती है। तकनीक इस हिंसा को अंजाम देने, उसे बढ़ाने, ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने या उसे और संगीन बनाने का माध्यम बन सकती है।

रिपोर्ट के आंकड़ों में वित्तीय साइबर अपराधों को कहीं ज़्यादा जगह मिलती है। वर्ष 2024 में दर्ज कुल 1,01,928 मामलों में से 72.6 प्रतिशत मामले बैंकिंग या निवेश धोखाधड़ी के थे। यह आंकड़ा 2023 में दर्ज 65 प्रतिशत से भी अधिक है। इसके मुकाबले, ऑनलाइन यौन शोषण के मामले सिर्फ़ 3.1 प्रतिशत थे। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि साइबर अपराधों की मौजूदा श्रेणियां आर्थिक नुकसान को सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़े नुकसान की तुलना में ज़्यादा महत्व देती हैं। टीएफ़-जीबीवी इसी समस्या का एक उदाहरण है। ऑनलाइन लैंगिक हिंसा का प्रभाव अक्सर सिर्फ़ आर्थिक नहीं होता। इसमें उत्पीड़न, अपमान और बदनाम किए जाने जैसे अनुभव भी शामिल होते हैं, जिनका असर कई बार कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकता है।

दूसरी ओर, एआई से बनाए गए डीपफेक, डॉक्सिंग (किसी की निजी जानकारी को उसकी अनुमति के बिना ऑनलाइन सार्वजनिक करना) और मिसोजिनी (किसी महिला के खिलाफ उसकी लैंगिक पहचान के आधार पर ऑनलाइन नफ़रत या अपमान) जैसी उभरती ऑनलाइन घटनाओं के लिए अभी तक कोई कानूनी या वर्गीकरण व्यवस्था मौजूद नहीं है।

किसी रिपोर्ट की तस्वीर_साइबर क्राइम
स्रोत: एनसीआरपी, 1930 हेल्पलाइन, एमएचए*

इसके अलावा, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) से भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में हुए बदलाव के बाद यह पता लगाना मुश्किल हो गया है कि वर्ष-दर-वर्ष अपराधों की रिपोर्टिंग में किस तरह बदलाव आया है। महिलाओं के ख़िलाफ होने वाले कई साइबर अपराधों के लिए पहले आईपीसी की पुरानी धाराओं के तहत मामले दर्ज किए जाते थे। लेकिन धाराओं के पुनर्गठन और कई प्रावधानों को एक साथ समेटे जाने के कारण अब उनका बीएनएस की संबंधित धाराओं से सीधा मिलान करना आसान नहीं है। इसके अलावा, प्रिंसिपल ऑफ़ेन्स रूल भी डिजिटल अपराधों की वास्तविक तस्वीर को समझना मुश्किल बना देता है। इस नियम के तहत ऐसे अपराध, जिनमें ऑनलाइन और ऑफलाइन – दोनों तरह के पहलू शामिल होते हैं, केवल एक ही श्रेणी में दर्ज किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, अगर साइबर स्टॉकिंग के बाद हत्या होती है, तो इसे केवल हत्या के रूप में दर्ज किया जा सकता है। ऐसे में साइबर स्टॉकिंग का अपराध आंकड़ों में दर्ज ही नहीं हो पाता।

ये पहलू पूरी तस्वीर पेश नहीं करते। वे सिर्फ़ इस ओर इशारा करते हैं कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों में साइबर अपराध के कई मामले दर्ज ही नहीं हो पाते। महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराधों की संख्या और प्रकृति को समझने के लिए एनसीआरबी के आंकड़ों को आधिकारिक आधार माना जाता है। लेकिन जब इन्हीं अधूरे आंकड़ों के आधार पर साइबर अपराध से निपटने की रणनीतियां बनाई जाती हैं, तो इस बात का जोखिम बना रहता है कि शायद समस्या और उसके समाधान के बीच सही तालमेल न बन पाए।

अंडर रिपोर्टिंग की हक़ीकत

समिति के सामने अपने पक्ष में दिए गए जवाब में गृह मंत्रालय (एमएचए) ने स्वीकार किया कि, “राष्ट्रीय अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (एनसीआरपी) और 1930 हेल्पलाइन उपलब्ध होने के बावजूद, महिलाओं को साइबर अपराध की शिकायत दर्ज कराने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।” इन माध्यमों की शुरुआत साइबर अपराध की शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए की गई थी। इनमें क्रमशः टीएफ़-जीबीवी और वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़ी शिकायतों पर खास ध्यान दिया गया है। पुलिस के साथ सीधे संपर्क की ज़रूरत कम करना निश्चित रूप से मददगार है, क्योंकि कई लोगों के लिए थाने जाकर शिकायत दर्ज कराना आसान नहीं होता। हालांकि, रिपोर्ट इन माध्यमों से सामने आए एक बेहद अजीब और अप्रत्याशित नतीजे का कोई ज़िक्र नहीं करती।

कुल 82 लाख पोर्टल शिकायतों में से दिसंबर 2025 तक केवल 2.2 प्रतिशत शिकायतें ही एफ़आईआर में बदली गई थी। इससे स्पष्ट है कि महिलाओं सहित अन्य नागरिक इन माध्यमों का इस्तेमाल शिकायत दर्ज कराने के लिए कर रहे हैं। लेकिन ये शिकायतें अब भी आधिकारिक रिकॉर्ड से गायब हो रही हैं, क्योंकि शिकायत दर्ज होने के बाद वे एफ़आईआर तैयार करने, आरोप-पत्र दाखिल करने और आगे की कानून-प्रवर्तन प्रक्रियाओं की जटिलताओं में उलझ जाती हैं। यही प्रक्रियाएं शिकायत दर्ज कराने को हतोत्साहित करती हैं और शुरुआत से ही मामलों के आंकड़ों की कमी का कारण बनती हैं। 

वर्ष 2025 में सरकार ने दिल्ली में ई-ज़ीरो एफ़आईआर का पायलट शुरू करने की घोषणा की थी, जिसके तहत एनसीआरपी पर दर्ज शिकायतों को स्वतः एफ़आईआर में बदलने की व्यवस्था थी। लेकिन यह व्यवस्था केवल 10 लाख रुपये से अधिक की वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों तक सीमित थी। साथ ही, पोर्टल पर दर्ज शिकायतें भी असल घटनाओं का केवल एक हिस्सा ही दर्शाती हैं, क्योंकि इनमें वे लोग शामिल नहीं हो पाते जो इस पोर्टल तक पहुंच ही नही सकते।

गृह मंत्रालय ने खासतौर पर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में पोर्टल के जरिए टीएफ़-जीबीवी के कम दर्ज होने के चार प्रमुख कारण बताए हैं: जागरूकता की कमी, मोबाइल और इंटरनेट तक सीमित पहुंच, डिजिटल साक्षरता का कम स्तर और भाषा की बाधाएं। अगर हमें भारत में महिलाओं के डिजिटल अनुभवों और वास्तविकताओं को सही मायने में समझना है, तो इन सभी पहलुओं पर गंभीरता से ध्यान देना होगा।

अच्छे आंकड़ों के बिना जागरूकता संभव नहीं है

साइबर सुरक्षा से जुड़े अभियान और जागरूकता कार्यक्रम उन क्षेत्रों और समुदायों पर केंद्रित नहीं हैं, जहां जागरूकता का स्तर सबसे कम है। सरकारी आकलनों में सफलता को इस आधार पर मापा जाता है कि कितने अभियान चलाए गए और वे कितने लोगों तक पहुंचे। इस आधार को संज्ञान में नहीं लिया जाता कि लोगों के व्यवहार में कितना बदलाव आया या साइबर अपराधों की रिपोर्टिंग में कितनी बढ़ोतरी हुई।

रिपोर्ट यह स्पष्ट नहीं करती कि कम जागरूकता वाले क्षेत्रों और समुदायों की पहचान करने और वहां अभियानों को लक्षित करने के लिए किस तरह के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जा रहा है, या ऐसे आंकड़े उपलब्ध भी हैं या नहीं। गृह मंत्रालय के अनुसार, उसका इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (आई4सी) पोर्टल से मिले आंकड़ों, सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान प्राप्त फ़ीडबैक और साइबरदोस्त के सोशल मीडिया हैंडल से मिले आंकड़ों को एक साथ देखकर चल रहे प्रयासों के असर का आकलन कर रहा है। लेकिन ये आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अभियानों के बाद उनके असर को कैसे मापा जा रहा है। अगर यूज़र की जागरूकता को साइबर अपराध की रिपोर्टिंग के आंकड़ों के आधार पर मापा जाता है, तो यह तरीका खुद उन लोगों की पहचान कैसे करेगा जिन्हें शुरुआत में इन रिपोर्टिंग व्यवस्थाओं की जानकारी ही नहीं है? इसके लिए पहले बेसलाइन सर्वेक्षणों के ज़रिए यह समझना ज़रूरी है कि अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में इन व्यवस्थाओं के बारे में लोगों की जानकारी कितनी है। इससे उन इलाकों की स्पष्ट पहचान की जा सकेगी, जहां लक्षित जागरूकता अभियानों की सबसे अधिक ज़रूरत है।

महिला के चित्र वाले एक बड़े से बिलबोर्ड के सामने से गुजरती महिलाएं_साइब्रर क्राइम
महिलाओं के विरुद्ध होने वाले कई साइबर अपराध, जिनके लिए पहले आईपीसी की पुरानी धाराओं के तहत मामले दर्ज किए जाते थे, अब बीएनएस की संबंधित धाराओं से सीधे मेल नहीं खाते। | चित्र साभार: पेक्सेल्स

आई4सी द्वारा कराए गए एक ऑनलाइन नागरिक सर्वेक्षण में केवल 3,849 लोगों ने भाग लिया था। इसमें शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों, जाति, आय या समुदाय जैसी सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर आंकड़ों को अलग-अलग नहीं देखा गया। सर्वेक्षण में पाया गया कि 83.42 प्रतिशत लोगों ने पोर्टल के बारे में सुना था, जबकि 76.1 प्रतिशत लोग हेल्पलाइन के बारे में जानते थे। लेकिन पर्याप्त प्रतिनिधित्व और अलग-अलग समूहों के आधार पर जुटाए गए आंकड़ों की कमी देखें, तो ये आंकड़े वास्तविक तस्वीर समझने में बहुत मदद नहीं करते।

साथ ही, इसके पीछे यह धारणा भी दिखाई देती है कि ग्रामीण इलाकों और ‘कम डिजिटल साक्षरता वाली आबादी’ में साइबर अपराधों को लेकर जागरूकता सबसे कम है। आई4सी की जागरूकता पहलों में अपनाए गए तरीकों से भी इसका संकेत मिलता है। इनमें क्षेत्रीय भाषाओं में कॉलर ट्यून और एसएमएस अलर्ट, सिनेमा और रेडियो अभियान, एनसीसी/एनएसएस/एनवाईकेएस के विद्यार्थियों के ज़रिए ज़मीनी स्तर पर जागरूकता फैलाना, स्कूलों में वेबिनार आयोजित करना और राहगीरी तथा कुंभ मेले जैसे आयोजनों के ज़रिए ‘कम आय वाले समूहों और डिजिटल शिक्षा तक सीमित पहुंच रखने वाली ग्रामीण आबादी’ तक पहुंचने की कोशिश शामिल है।

लेकिन एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 2024 में साइबर अपराध के करीब 1 लाख मामले दर्ज हुए, जिनमें से लगभग 35,000 मामले ही महानगरों में दर्ज हुए। यानी 65 प्रतिशत से अधिक मामले छोटे शहरों, कस्बों और गांवों से सामने आए। इससे यह सवाल उठता है कि क्या इन इलाकों में साइबर अपराध को लेकर जागरूकता अपेक्षा से अधिक है, क्या वहां साइबर अपराध के मामले अधिक हैं, या फिर दोनों ही बातें सही हैं। हालांकि, केवल मामलों की अधिक संख्या को अधिक जागरूकता का संकेत मानना भी सही नहीं होगा, क्योंकि इसकी एक वजह इन क्षेत्रों की अधिक आबादी भी हो सकती है। मौजूदा आंकड़े यह स्पष्ट नहीं करते कि इन अलग-अलग कारकों के बीच वास्तविक संबंध क्या है।

ये आंकड़े राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की आबादी के आकार या घनत्व, उनकी जनसांख्यिकीय संरचना या डिजिटल ढांचे की कमजोरियों और उनकी प्रतिरोधक क्षमता के बारे में कुछ नहीं बताते। महानगरों से आगे, राज्यों के भीतर के स्तर पर भी विस्तृत आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। न तो टीयर-2 और टीयर-3 शहरों, जिलों और गांवों के स्तर पर कोई जानकारी दी गई है, न ही अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों और सामाजिक समूहों में शिकायतों की दर को जागरूकता अभियानों से जोड़कर कोई विश्लेषण सामने आया है। ऐसे में यह तय करना मुश्किल है कि जागरूकता अभियान कहां और किस तरह चलाए जाएं, और उनका आधार भी पर्याप्त रूप से साक्ष्य-आधारित नहीं हो सकता।

इस कमी को दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर एक जैसे संदेश पहुंचाने वाले अभियानों से आगे बढ़कर, अलग-अलग क्षेत्रों की जरूरतों के मुताबिक अभियान तैयार करने होंगे। इनके लिए यह समझना जरूरी होगा कि किस इलाके में कौन-सा माध्यम सबसे प्रभावी है, संदेश किसके जरिए पहुंचाया जाए, स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ क्या हैं और वहां कौन-सी संस्थाएं लोगों तक बेहतर तरीके से पहुंच सकती हैं।

  • उत्तर प्रदेश में स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) पर आधारित पहलों से मिले साक्ष्य बताते हैं कि समुदाय-केंद्रित मॉडल प्रभावी हो सकते हैं। खासकर वंचित महिलाओं तक जानकारी और जागरूकता पहुंचाने में पीयर एजुकेटर्स यानी साथी शिक्षिकाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
  • रिपोर्ट भी सुझाव देती है कि जागरूकता कार्यक्रमों को एक-दो बार चलाए जाने वाले अभियानों तक सीमित रखने के बजाय, आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, स्वयं सहायता समूहों, शिक्षकों और युवा स्वयंसेवकों जैसे ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों के ज़रिए समुदायों के साथ लगातार और व्यवस्थित रूप से जुड़ने की जरूरत है।
  • राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) का विमेन सेफ़्टी ऑडिट प्लेटफ़ॉर्म ऐसी जानकारी जुटाने का एक उपयोगी उदाहरण है, जिसकी फिलहाल साइबर सुरक्षा अभियानों में कमी है। इसके तहत सर्वेक्षणों और केंद्रित समूह चर्चाओं के ज़रिए शहरी स्तर के स्कोरकार्ड तैयार किए जाते हैं।
  • अप्रैल 2026 में शुरू किया गया ई-सेफ़हर कार्यक्रम एनसीडब्ल्यू के इसी मॉडल को अपनाने की कोशिश कर रहा है, हालांकि फिलहाल इसका दायरा केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित है।

इंटरनेट और डिजिटल उपकरणों तक असमान पहुंच

इंटरनेट और मोबाइल तक सीमित पहुंच के कारण महिलाएं साइबर अपराधों की शिकायत पूरी तरह और आसानी से दर्ज नहीं करा पाती। हाल ही में जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफ़एचएस-6; 2023–24) के आंकड़ों से पता चलता है कि इंटरनेट का कभी ना कभी इस्तेमाल कर चुकी भारतीय महिलाओं का प्रतिशत पिछले राउंड (एनएफ़एचएस-5; 2019–21) के 33.3 प्रतिशत से लगभग दोगुना होकर 64.3 प्रतिशत हो गया है। हालांकि, व्यापक मॉड्यूलर सर्वेक्षण: दूरसंचार (सीएमएस-टी) 2025 के आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। इसके अनुसार, 15–24 वर्ष की आयु की 92.3 प्रतिशत महिलाओं ने सर्वेक्षण की तारीख से पहले के तीन महीनों में कम-से-कम एक बार इंटरनेट का इस्तेमाल किया था। हालांकि, सर्वेक्षण में शामिल महिलाओं में यह सबसे कम उम्र वाला समूह है। जब आयु की ऊपरी सीमा हटा दी जाती है और अधिक उम्र के समूहों को शामिल किया जाता है, तो यह आंकड़ा 29.2 प्रतिशत अंक घटकर 63.1 प्रतिशत रह जाता है।

भारत में महिलाओं पर जारी किसी रिपोर्ट की तस्वीर_साइबर क्राइम
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत वर्ष 2024 में पंजीकृत राज्य-वार महिला-केंद्रित साइबर अपराध।

आंकड़े यह भी बताते हैं कि केवल 56.2 प्रतिशत महिलाओं ने अपने पास मोबाइल फ़ोन होने की जानकारी दी, और यह ज़रूरी नहीं है कि उनके पास स्मार्टफ़ोन ही हो। इसके मुकाबले पुरुषों में यह आंकड़ा 84 प्रतिशत तक है।

ग्लोबल सिस्टम फॉर मोबाइल कम्युनिकेशंस एसोसिएशन (जीएसएमए) की मोबाइल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत में केवल 36 प्रतिशत महिलाओं के पास स्मार्टफ़ोन है और केवल 39 प्रतिशत महिलाओं ने मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल किया है। यह स्थिति एनएफ़एचएस-5 के निष्कर्षों से बहुत अलग नहीं है। आईएएमएआई की इंटरनेट इन इंडिया 2024 रिपोर्ट के अनुसार, साझा उपकरणों के माध्यम से इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों में 59 प्रतिशत महिलाएं थीं।

इससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि रिपोर्ट में जाति, वर्ग, जातीयता या पहचान से जुड़े ऐसे किसी अन्य आधार पर अलग-अलग आंकड़े प्रस्तुत नहीं किए गए हैं, जो भारत जैसे विविध देश में डिजिटल पहुंच और समावेशन को निर्धारित करते हैं। रिपोर्ट केवल ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच के अंतर को देखती है, जो 13.2 प्रतिशत अंकों का है और निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है।

हमारे पास व्यापक वार्षिक मॉड्यूलर सर्वेक्षण (सीएएमएस) 2022–23 से सामाजिक समूहों के आधार पर अलग-अलग आंकड़े भी उपलब्ध हैं।

इन आंकड़ों को जेंडर के आधार पर अलग-अलग नहीं देखा गया है। हालांकि, जाति, जेंडर और डिजिटल पहुंच के बीच संबंध को स्वतंत्र अध्ययनों में भी अच्छी तरह दर्ज किया गया है। इन अध्ययनों से पता चलता है कि निचली जातियों की महिलाओं को इंटरनेट और डिजिटल उपकरणों तक पहुंचने में कई स्तरों पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इसके चलते वे मौजूदा साइबर अपराध शिकायत व्यवस्था से सबसे अधिक दूर नज़र आती हैं। इसलिए, अगर प्रस्तावित सुधारों को असल में समावेशी और सार्थक बनाना है, तो सार्वजनिक आंकड़ों में भी इन अलग-अलग स्तरों के अंतर को दर्ज किया जाना चाहिए। इसके लिए जाति जनगणना एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है। हालांकि लंबे समय से टलती आ रही जनगणना भी इस दिशा में एक मजबूत शुरुआत साबित हो सकती है।

बेहतर नीतिगत प्रतिक्रिया की आवश्यकता

इंटरनेट तक पहुंच रखने वाली 15–24 वर्ष की आयु वर्ग की 78 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उनमें पोर्टल पर साइबर अपराध की शिकायत दर्ज कराने की क्षमता नहीं है। वहीं, जब आयु की ऊपरी सीमा हटा दी जाती है, तो 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की केवल 12.7 प्रतिशत महिलाएं ही ऑनलाइन साइबर अपराध की शिकायत दर्ज करा पाती हैं।

पोर्टल का मुख्य इंटरफेस फिलहाल केवल हिंदी और अंग्रेज़ी में उपलब्ध है। यहां तक कि 1930 हेल्पलाइन के लिए भी इन दोनों भाषाओं के अलावा बहुभाषी सहायता की कोई प्रकाशित व्यवस्था नहीं है। गृह मंत्रालय एक ओर ‘डिजिटल रूप से अनभिज्ञ उपयोगकर्ताओं’ तक पहुंचने के लिए आई4सी के क्षेत्रीय भाषा अभियानों का दावा करता है। वहीं, सरकार की इन्फ़ॉर्मेशन सिक्योरिटी एजुकेशन एंड अवेयरनेस परियोजना साइबर हाइजीन और साइबर सुरक्षा से जुड़े 102 विषयों पर बहुभाषी जागरूकता सामग्री भी उपलब्ध कराती है। लेकिन समस्या यह है कि अगर ओड़िया या भोजपुरी में इनमें से किसी अभियान के ज़रिए किसी महिला तक जानकारी पहुंचती भी है और वह शिकायत दर्ज कराने की कोशिश करती है, तो उसे ऐसे पोर्टल का सामना करना पड़ता है जो उसकी अपनी भाषा में शिकायत दर्ज करने की सुविधा ही नहीं देता।

रिपोर्ट आंगनवाड़ी केंद्रों, वन-स्टॉप सेंटर, 181 जैसी महिला हेल्पलाइन, महिला पुलिस स्वयंसेवकों, पंचायतों के डिजिटल कियोस्क और कॉमन सर्विस सेंटर जैसे ज़मीनी स्तर के संस्थानों के ज़रिए सहायता के साथ शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था शुरू करने का सुझाव देती है। यह इस बात को स्वीकार करता है कि समाधान इस धारणा पर आधारित नहीं हो सकते कि हर व्यक्ति के पास डिजिटल माध्यमों तक समान पहुंच या पर्याप्त डिजिटल साक्षरता है। रिपोर्ट यह भी सिफ़ारिश करती है कि एनसीआरपी और 1930 हेल्पलाइन को संविधान की अनुसूची-VII में शामिल सभी भाषाओं में उपलब्ध कराया जाए। साथ ही, पहली बार इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए सरल इंटरफ़ेस, ऑडियो के ज़रिए मार्गदर्शन और विज़ुअल संकेतों की सुविधा भी दी जाए। हालांकि, इन उपायों को स्थायी और व्यापक समावेशन की जगह एक अंतरिम व्यवस्था के रूप में देखा जाना चाहिए।

भारत की किसी रिपोर्ट का चित्र_साइबर क्राइम
स्रोत: व्यापक वार्षिक मॉड्यूलर सर्वेक्षण 2022-23

यह रिपोर्ट इस बुनियादी सवाल की पर्याप्त पड़ताल नहीं करती कि आखिर महिलाओं को ऑनलाइन निशाना क्यों बनाया जाता है। डीपफेक के जरिए होने वाले दुर्व्यवहार, रिवेंज पोर्नोग्राफ़ी (बिना सहमति किसी की निजी या अंतरंग तस्वीरें/वीडियो/अन्य सामग्री साझा करना), सेक्सटॉर्शन (निजी या अंतरंग तस्वीरें/वीडियो सार्वजनिक करने की धमकी देकर किसी को डराना या ब्लैकमेल करना) और संगठित ट्रोलिंग को बढ़ावा देने वाली सामाजिक और सांस्कृतिक संरचनाओं पर इसमें बहुत कम ध्यान दिया गया है। डिजिटल मंच स्त्री-विरोध और यौन हिंसा के असर को बढ़ाने वाले माध्यम बन गए हैं, और एआई ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। टीएफ-जीबीवी की जड़ें उस सामाजिक सोच और मान्यताओं में गहरी जमी हुई हैं, जिसमें अक्सर अपराधियों के व्यवहार पर सवाल उठाने के बजाय महिलाओं के चरित्र पर ही सवाल खड़े किए जाते हैं।

महिलाओं को शिकायत दर्ज कराने से रोकने वाली हर संरचनात्मक बाधा—चाहे वह सामाजिक कलंक हो, पुलिस पर अविश्वास या डिजिटल माध्यमों से बहिष्करण—अपराधियों का हौसला भी बढ़ाती है। इसलिए दोषियों को सज़ा न मिलना और मामलों का कम दर्ज होना, एक-दूसरे से अलग समस्याएं नहीं हैं। केवल शिकायतों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान देने वाली नीतियों को दुर्व्यवहार के लिए ज़िम्मेदार सामाजिक और संस्थागत व्यवस्थाओं को भी चुनौती देनी होगी। अगर ऐसा नहीं होता, तो ये नीतियां महज़ घटना के बाद प्रतिक्रिया देने तक सीमित रहेंगी और मूल समस्या के समाधान से दूर रह जायेंगी।

सरकार को डिजिटल पहुंच, डिजिटल उपकरणों की उपलब्धता, कनेक्टिविटी, भाषाई समावेशन और साइबर जागरूकता से जुड़ी बुनियादी असमानताओं को सीधे दूर करना होगा। इसके लिए विश्वसनीय और अलग-अलग समूहों के आधार पर जुटाए गए आंकड़ों से यह समझना जरूरी है कि मौजूदा साइबर अपराध शिकायत व्यवस्था से कौन लोग बाहर रह जाते हैं और क्यों। इसी समझ के आधार पर साक्ष्य-आधारित कदम उठाए जाने चाहिए।

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लेखक के बारे में

  • काश्वी वर्मा भारत में जेंडर और टेक्नोलॉजी नीति के क्षेत्र में काम करने वाली सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ हैं। वह 2022–23 में एलएएमपी (लेजिस्लेटिव असिस्टेंट टू मेम्बर ऑफ़ पार्लियामेंट) फ़ेलो रह चुकी हैं, जहां उन्होंने राज्यसभा के एक सांसद के विधायी कार्यों के लिए शोध और नीतिगत सुझाव उपलब्ध कराए। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से राजनीतिक सिद्धांत और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में मास्टर डिग्री हासिल की है। उनके लेख द हिंदू, द इंडियन एक्सप्रेस सहित कई प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुके हैं।
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