शिक्षा

जंगल के बीच पुस्तकालय चलाने वाले लाइब्रेरियन की कहानी

क़रीब 2,000 कालजयी साहित्यिक रचनाओं वाली इस लाइब्रेरी से ग़रीब मुतुवन आदिवासी नियमित तौर पर किताबें ले जाते हैं, पढ़ते हैं, और वापस कर जाते हैं।
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वह बुज़ुर्ग अपनी कुर्सी से उठे, तो उनकी आंखों में आंसू भर आए। तिरुवनंतपुरम के एक सभा में स्कूली बच्चों समेत सभी ने ताली बजाकर उसका स्वागत किया. अपनी पूरी ज़िंदगी में उन्होंने इतना मान-सम्मान कभी नहीं देखा था। इस साल 9 जनवरी को केरल विधानसभा अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले (केएलआईबीएफ़) के चौथे आयोजन में जुटी भीड़ उनके काम को देखकर दंग रह गई। सभी अचरज में थे कि एक आदमी अपनी जेब से पैसा लगाता है, और अपने उपेक्षित आदिवासी समाज के लिए लाइब्रेरी चलाता है और लाइब्रेरी केरल के बहुत दूर-दराज़ के इलाक़े में, इडुक्की ज़िले के इडामलकुड़ी के जंगल में है। इडामलकुड़ी राज्य का इकलौता आदिवासी पंचायत है, और शायद सबसे कम पढ़ा-लिखा इलाक़ा भी. पी.वी. चिन्नतंबी जल्द ही 87 साल के हो जाएंगे। जंगल की वह लाइब्रेरी, जिसे उन्होंने शुरू किया था, 15 साल बाद भी चल रही है। हमने 2014 में जो लाइब्रेरी देखी थी, जंगली हाथी उसके ढांचे को गिरा चुके हैं, लेकिन लाइब्रेरी आज भी है।

दो बुजुर्ग व्यक्ति_पुस्तकालय
पी.वी. चिन्नतंबी 73 साल के थे जब हम उनसे इडामलकुड़ी में पहली बार मिले थे और अब 86 साल के हो चुके हैं. वह इडुक्की के जंगलों में एक अद्भुत लाइब्रेरी चलाते हैं। | चित्र साभार: पी. सांईनाथ / पारी

“मुझे इसका अंदाज़ा था,” चिन्नतंबी ने केएलआईबीएफ़ में हमसे कहा। उनके सम्मान में आयोजित सत्र में मेरी और के.ए. शाजी (जो उनके दुभाषिए का भी काम कर रहे थे) की बातचीत हो रही थी। उन्होंने पहली मुलाक़ात में भी कहा था कि जंगल और मौसमों में बदलाव के चलते हाथियों पर असर पड़ा है। “काफ़ी दिनों से मैं इस समस्या को झेल रहा था। हाथी दिन-ब-दिन उग्र होते जा रहे थे। हमें शक था कि कहीं एक दिन वे सब हमारी लाइब्रेरी पर हमला न कर दें। आख़िर में मैंने यही सोचा कि इसे यहां से हटा दें और उसके साथ हम अपना घर भी हटा दिए। लाइब्रेरी से मिलने वाला ज्ञान बचाना सबसे ज़रूरी था।” वह कभी नहीं चाहते थे कि लाइब्रेरी से जो समझ और ज्ञान लोगों को मिलता है वह रुक जाए।

फिर वह लाइब्रेरी को यहां से कुछ किमी दूर ले गए, लेकिन तब भी वह जगह इडामलकुड़ी के जंगल के इलाक़े में पड़ती थी। वह बताते हैं, “जिस हफ़्ते हम हटे, उसी हफ़्ते लंबे दांत वाले हाथियों ने आके पुराने ढांचे को मिनटों में तहस-नहस कर दिया।” लेकिन, वह आगे गर्व से कहते हैं, “हम तो सारी किताबें पहले ही हटा चुके थे।” जंगल में रहते-रहते वह समझते थे कि बड़े जानवरों के चाल-चलन बदल गए हैं। इतना सब होने के बाद भी उनके मन में हाथियों के लिए कोई कड़वाहट नहीं है। वहां से लाइब्रेरी हटाने का उनका फ़ैसला समझदारी भरा साबित हुआ, क्योंकि हाथियों ने लाइब्रेरी के ढांचे को तोड़ दिया और चिन्नतंबी को कोई शौक़ नहीं था कि वह अपने रहते हाथियों को ऐसा करने देते। वह कहते हैं, “मैं मुलकुधारा में चला गया और नए सिरे से सब शुरू किया। वहां लाइब्रेरी चलाने के लिए ख़ुद समेत 7 लोगों की कमिटी बनाई। आख़िर मैं हमेशा तो ज़िंदा रहूंगा नहीं।” वह बड़ी गंभीरता से लाइब्रेरी शुरू करने के मक़सद के बारे में दर्शकों को बताते हैं, “ज्ञान, स्कूली शिक्षा से ज़्यादा ताक़तवर होता है, इसलिए हमने यह लाइब्रेरी बनाई।” चिन्नतंबी बहुत ग़रीब आदिवासी परिवार से आते हैं, जिनके पास दो एकड़ ज़मीन है, पर उस पर ख़ास कुछ उगता नहीं है। उनका परिवार भी काफ़ी बड़ा है। छठीं में उनकी पढ़ाई छूट गई थी और वह परिवार के लिए कमाने निकल गए थे। आज वही चिन्नतंबी मुतुवन आदिवासियों के लिए जंगल में एक शानदार लाइब्रेरी चला रहे हैं।

“इरंपुपालम में हम इडुक्की के पहले आदिवासी स्कूल में पढ़े। कुछ बच्चे चौथी तक पढ़े। हम जैसे कुछ छठीं तक पढ़ गए। लेकिन मैं तो यही मानता हूं कि लोग किसी और चीज़ की तुलना में किताब पढ़कर ज़्यादा सीखते हैं।” “अब बच्चे लाइब्रेरी में आ रहे हैं,” उन्होंने हमें 2014 में बताया था और यह बात साबित भी कर दी। उनके साफ़-सुथरे तरीक़े से रखे रजिस्टर से पता चलता है कि 160 किताबों में से चौथाई हमेशा लोगों के बीच घूमती रहती थीं। दो बड़ी लाइब्रेरियों के प्रमुखों ने मुझसे कहा था कि यह गिनती कम नहीं है।

जंगल के वीराने में फलता-फूलता एक पुस्तकालय, लेख को जब 2014 में हमने पहली बार छापा था, उनके पास 160 किताबें थीं। उनके बारे में लिखी इस कहानी का असर न सिर्फ़ केरल, बल्कि बाहर के देशों में भी हुआ। अमेरिका और ब्रिटेन की लाइब्रेरी में काम करने वाले लोग उनकी कहानी को अपने यहां छापने की अनुमति चाहते थे। वे लाइब्रेरी के लिए किताबें भी दान करना चाहते थे। लेकिन केरल के लोग इस मामले में बाज़ी मार गए। कुछ ही महीनों के भीतर, उनके पास 2,000 से ज़्यादा किताबें जमा हो गईं। चार नौजवान किताब रखने वाली अलमारी अपने कंधों पर उठाकर 18 किमी जंगल पार करके पहुंचे। उनमें से एक पत्रकार थे, स्वर्गीय आई.वी. बाबू, जो 2014 में चिन्नतंबी से पहली मुलाक़ातके वक़्त साथ थे। चिन्नतंबी यह सब देखकर ख़ुशी के मारे फूले नहीं समाए। लेकिन फिर बोले, “अब और किताबें मत भेजना, रखने की जगह नहीं बची है।”

केएलआईबीएफ़ में हमने मुरली ‘माश’ (मास्टर या शिक्षक) को मंच पर बुलाया। चिन्नतंबी के यह गुरु उनसे 31 साल छोटे हैं। ‘माश’ मलई अरायण आदिवासी समुदाय से हैं, जो पढ़ाई-लिखाई में दूसरी जनजातियों से आगे है। इडामलकुड़ी – जहां ईरुप्पुकल्लकुड़ी में लाइब्रेरी सबसे पहले शुरू हुई – की 28 बस्तियों की कुल आबादी 2,500 से भी कम है। दुनिया भर में कुल इतने ही मुतुवन आदिवासी हैं। “मुरली माश हमसे एक साल पहले इडामलकुड़ी इलाक़े में आए थे,” चिन्नतंबी बताते हैं। वह आदिवासियों के अकेले मास्टर वाले स्कूल में पढ़ाने आए थे। “मुझे पता चला कि मुझे सरकार और दूसरे लोगों से किताबें मिल रही थीं,” माश कहते हैं। उसी समय एक बड़ी लाइब्रेरी की बात दिमाग़ में आई थी। लेकिन इलाक़े के लोग इसे स्वीकार करें, इसके लिए हमें “मुतुवन आदिवासी समुदाय के एक सदस्य की ज़रूरत थी।”

उस समय चिन्नतंबी सामने आए। और जंगल में इस किताबघर का जन्म हुआ। चिन्नतंबी को बस एक ही पछतावा होता है। साल 2014 की यात्रा में, हमने वहां 161वीं किताब तैयार होते देखी थी। वह उनकी आत्मकथा थी। “वह पूरी हुई कि नहीं?” हमने उनसे पूछा। “नहीं,” उन्होंने बताया। “मैंने क़रीब एक तिहाई हिस्सा लिख लिया था, जब तिरुवनंतपुरम का एक पत्रकार आया और मेरा लिखा लेता गया। उसने किताब को पूरा करने में मदद करने और इसके लिए प्रकाशक खोजने का वादा किया था।”

“लेकिन वह दोबारा नज़र नहीं आया,” वह दर्द भरी आवाज़ में कहते हैं। आज उनको जो मान-सम्मान मिला वह केएलआईबीएफ़ की ख़ास व्यवस्था से संभव हुआ। केरल ऐसा इकलौता राज्य है, जिसकी विधानसभा साहित्यिक पुस्तक महोत्सव कराती है। सभी ज़िलों, यहां तक कि कुछ तालुकाओं में भी, इनके साहित्य उत्सव आयोजित होते हैं। सभी 140 विधायकों को अपने निर्वाचन क्षेत्र के लिए किताबें ख़रीदने के लिए 3 लाख रुपए मिलते हैं। लेकिन शर्त होती है कि उन्हें पैसा यहीं ख़र्च करना होता है। इस उत्सव में देश भर से 170 प्रकाशक आए थे और क़रीब 240 स्टॉल लगे थे। चौंकाने वाली बात है कि इस महोत्सव का कारोबार मात्र एक हफ़्ते में 10 करोड़ पार कर जाता है। और इस दौरान विधानसभा परिसर के हर दरवाज़े जनता के लिए खोल दिए जाते हैं। पूरे सात दिन चलने वाले इस महोत्सव में लोग आराम से अंदर घूम सकते हैं और सुरक्षा जांच के ज़्यादा झमेले भी नहीं होते हैं।

एक झोपड़ीनुमा जगह में किताबों के साथ बैठा एक व्यक्ति_पुस्तकालय
इस 160 किताब वाली छोटी लाइब्रेरी में कुछ महीनों में ही 2,000 से ज़्यादा किताबें हो गईं. साल 2014 में उनकी कहानी पढ़ने के बाद पूरे केरल से लोगों ने उन्हें किताबें दान कीं। | चित्र साभार: पी. सांईनाथ / पारी

सत्र के अंत में हमने वहां मौजूद दर्शकों और पत्रकारों से गुहार लगाई कि चिन्नतंबी के अधूरी पांडुलिपि को खोजकर वापस लाने में मदद करें. हमने उस अनजान रिपोर्टर से भी मदद की गुहार लगाई। चिन्नतंबी ने भी कहा कि अगर उन्हें मदद मिली, तो “यह काम फिर से ख़ुशी-ख़ुशी करेंगे।” केरल तो केरल है, इसलिए सत्र ख़त्म होते-होते मदद के लिए हाथ बढ़ाने वालों की लाइन लग गई। हमें उम्मीद है एक दिन यह कहानी पूरी होगी और छपेगी। इडामलकुड़ी की, और उसके हाथियों की कहानी. आम आदमी के भीतर पढ़ाई-लिखाई और ज्ञान की लालसा की कहानी। केरल की सबसे छोटी लाइब्रेरी की कहानी, लेकिन शायद दुनिया के सबसे महान और सज्जन लाइब्रेरियन की कहानी।

इडामलकुड़ी में 12 साल पहले चिन्नतंबी से हुई मुलाक़ात:
यह एक वीरान छोटी सी चाय की दुकान है, जिसकी दीवारें मिट्टी की बनी हुई हैं। सामने की ओर एक सफ़ेद काग़ज़ टंका है, जिस पर हाथ से लिखा हुआ है:
अक्षरा आर्ट्स एवं स्पोर्ट्स
पुस्तकालय
ईरुप्पुकल्लकुड़ी
इडामलकुड़ी

इडुक्की ज़िले के इस वीरान जंगल मेंं पुस्तकालय? भारत के सबसे शिक्षित राज्य केरल की यह अल्प शिक्षित जगह है। राज्य की सबसे पहले चुनी हुई आदिवासी ग्रामीण परिषद के इस गांव मेंं सिर्फ़ 25 परिवार ही रहते हैं। इनके अलावा यदि किसी को यहां से किताब लेनी हो, तो उन्हें इन घने जंगलों के बीच से पैदल यात्रा करनी पड़ेगी। क्या कोई सचमुच इतनी दूर आना चाहेगा? पी. वी. चिन्नतम्बी (73 वर्ष), जो कि एक चाय विक्रेता, स्पोर्ट्स क्लब आयोजक एवं पुस्तकालयाध्यक्ष हैं, कहते हैं “हां, बिल्कुल…लोग आते है।” उनकी यह छोटी सी दुकान – जहां वह चाय, नमकीन, बिस्कुट, सलाई एवं किराने का अन्य आवश्यक सामान बेचते हैं – इडामलकुड़ी के पहाड़ी रास्तों के बीच स्थित है। यह केरल की दूरस्थ पंचायतों मेंं से एक है, जिसमेंं मुतुवन नाम के सिर्फ़ एक आदिवासी समूह का निवास है। वहां जाने का मतलब मुनार के नज़दीक स्थित पेट्टीमुड़ी नामक जगह से 18 किमी. की पैदल यात्रा। चिन्नतम्बी के चाय की दुकान एवं पुस्तकालय तक पहुंचने के लिए और भी अधिक पैदल चलना पड़ता है। गिरते-पड़ते उनके घर तक पहुंचने के बाद हमने पाया कि उनकी पत्नी काम के लिए बाहर गई हुई हैं। उनका परिवार भी मुतुवन आदिवासी समुदाय से ताल्लुक़ रखता है।

एक हॉल जैसी जगह में लाठी पकड़े सोफ़े पर बैठे दो बुजुर्ग_पुस्तकालय
मुरली माश (दाएं), स्कूल के मास्टर हैं और मलई अरायण आदिवासी समुदाय से हैं. वह चिन्नतंबी के गुरु हैं, जबकि उनसे 31 साल छोटे हैं। | चित्र साभार: आर्या / पारी

मैने उलझन के साथ पूछा, “चिन्नतम्बी, मैंने चाय पी ली है। मैं किराने का सामान देख पा रहा हूं. पर आपका पुस्तकालय कहां है?” अपनी चमकती मुस्कुराहट के साथ वह मुझे उस छोटी सी संरचना के भीतर ले गए। एक घुप्प अंधेरे कोने से, वह कम से कम 25 किलो चावल रखने लायक़ दो बोरियां ले आए। इन बोरियां मेंं 160 किताबें हैं, यही उनकी पूरी सूची है। वह उनको संभालकर दरी पर बिछाते हैं, जैसा कि वह हर रोज़ पुस्तकालय के लिए तय समयावधि मेंं करते हैं। हम आठों प्राणी इन किताबों को विस्मय के साथ पलटने लगे। इनमेंं से हर एक किताब साहित्यिक थी, कोई कालजयी रचना, और राजनैतिक विचारों का संकलन थी। इनमेंं से कोई भी रोमांचक, बेस्टसेलर या लोकलुभावन साहित्य की पुस्तकें नहीं थीं। इनमेंं से एक तमिल महाकाव्य ‘सिलपट्टीकरम’ का मलयालम अनुवाद है। पुस्तकों के संकलन मेंं वैकम मुहम्मद बशीर, एम.टी.वासुदेवन नायर, कमला दास आदि भी शामिल हैं। इनमेंं एम.मुकुन्दन, ललिताम्बिका अनन्तरजनम आदि की किताबें थी। महात्मा गांधी के साहित्य के अलावा प्रसिद्ध उग्र कट्टरपंथी तोपिल बसी की ‘यू मेड मी अ कम्युनिस्ट’ जैसी किताबें भी शामिल है।

“पर चिन्नतम्बी, लोग क्या सच मेंं यह सब पढ़ते हैं?” हमने अब बाहर बैठते हुए पूछा। मुतुवन भी दूसरे आदिवासी समुदायों की तरह वंचित एवं अन्य भारतीयों के मुक़ाबले शिक्षा मेंं कहीं ज़्यादा पिछड़े रह गए हैं। इसके उत्तर मेंं वह पुस्तकालय का रजिस्टर निकालकर ले आते हैं। इसमेंं बेहतरीन ढंग से किताबों की लेन-देन का हिसाब-किताब लिखा है।
इस गांव मेंं भले ही सिर्फ़ 25 परिवार रहते हैं, लेकिन वर्ष 2013 मेंं 37 किताबें मांगकर ले जाई गई हैं। यह कम से कम 160 किताबों मेंं लगभग एक चौथाई के बराबर है – जिसे एक बेहतर अनुपात कहा जा सकता है। इस पुस्तकालय का एक बार का सदस्यता शुल्क 25 रुपए और मासिक शुल्क 2 रुपए है। किसी किताब को पढ़ने के लिए ले जाने पर कोई और शुल्क नहीं लिया जाता है। चाय निःशुल्क उपलब्ध है। काली चाय, बिना चीनी की। “लोग पहाड़ों से थककर आते हैं”। सिर्फ़ बिस्कुट, नमकीन और दूसरी चीज़ों के लिए पैसे देने पड़ते हैं. कभी-कभी किसी आगन्तुक को सादा भोजन भी निःशुल्क मिल जाता है।

किताबें ले जाने वालों के नाम, ले जाने और लौटाने की तारीख़ रजिस्टर में बहुत सफ़ाई से दर्ज की जाती है। इलांगों की ‘सिलापट्टीकारम’ को एक से अधिक बार पढ़ने के लिए लिया गया है। इस वर्ष बहुत सारी किताबों को पढ़ने के लिए पहले ही लिया जा चुका है। जंगल के बीच उच्च कोटि का साहित्य प्रसारित हो रहा है, जिसे इस वंचित आदिवासी समुदाय के लोग बहुत चाव से पढ़ते हैं। यह बात मन को बहुत शांति दे रही थी। हममें से कुछ लोग शायद शहरी परिवेश मेंं पढ़ने की आदत ख़त्म होते जाने के बारे मेंं सोचने लगे थे। हमारे इस समूह में ज़्यादातर लोगों का जीवनयापन लेखनी से चलता था, और इस पुस्तकालय ने हमारे अंहकार की भी हवा निकाल दी। केरल प्रेस अकादमी के पत्रकारिता के तीन युवा छात्रों में से एक, विष्णु एस., जो कि हमारे साथ यात्रा कर रहे थे, उन्होंने उन किताबों में से ‘सबसे अलग’ किताब ढूंढी। यह एक नोटबुक थी, जिसके बहुत से पन्नों मेंं हाथों की लिखावट थी। इसका कोई शीर्षक तो नहीं था, लेकिन यह चिन्नतंबी की आत्मकथा थी। उन्होंने खेद के साथ कहा कि वह अभी तक बहुत नहीं लिख पाए हैं। पर वह इस पर काम कर रहे हैं। “अरे, चिन्नतंबी…इसमें से कुछ पढ़कर सुनाइए।“ वह हिस्सा बहुत लंबा नहीं था और अधूरा भी था, पर इसमें जीवंतता स्पष्ट तौर पर थी। यह उनकी शुरुआती दिनों की सामाजिक और राजनीतिक चेतना का दस्तावेज़ था। इसकी शुरुआत महात्मा गांधी की हत्या के साथ होती है, जब लेखक मात्र सात साल के थे, और इस घटना के उनके ऊपर पड़े असर को उनकी लेखनी बयान कर रही थी।

प्लास्टिक के डब्बों के पीछे बैठा एक आदमी_पुस्तकालय
पी. वी. चिन्नतंबी चाय की अपनी छोटी सी दुकान में. पास में ही काग़ज़ का बोर्ड लगा है, जिससे इस जंगल में उनकी लाइब्रेरी होने के बारे में पता चलता है। | चित्र साभार: पी. सांईनाथ / पारी

चिन्नतंबी बताते हैं कि उन्हें इडामलकुड़ी वापस आने और पुस्तकालय की स्थापना करने के लिए, मुरली ‘माश’ (मास्टर या टीचर) ने प्रेरित किया। मुरली ‘माश’ इस इलाक़े में एक आदर्श व्यक्तित्व एवं शिक्षक माने जाते रहे हैं। वह भी आदिवासी ही हैं, लेकिन दूसरी जनजाति से ताल्लुक़ रखते हैं। वह मनकुलम के रहने वाले हैं, जो कि इस पंचायत के बाहर है। उन्होंने अपनी ज़िंदगी का अधिकांश समय मुतुवन समुदाय के लिए काम करने में ही गुज़ार दिया। चिन्नतंबी का मानना है कि उन्होंने कोई विशेष काम नहीं किया है। वह कहते हैं, “माश ने ही मुझे दिशा दी।” अपनी विनम्रता में वह स्वीकार भले न करें, लेकिन चिन्नतंबी बहुत बड़ा काम कर रहे हैं। इडामलकुड़ी उन 28 गांवों में से एक है जिसमें 2,500 से कम लोग रहते हैं। पूरे विश्व में मुतुवन लोगों की तक़रीबन यही जनसंख्या है। मात्र 100 लोग ही ईरुप्पुकल्लकुड़ी में रहते हैं। इडामलकुड़ी 100 वर्ग किमी वन क्षेत्र में फैला हुआ है, और इस पंचायत में राज्य के सबसे कम मतदाता (1,500) रहते हैं. लौटते वक़्त हम तय रास्ते से नहीं जा सके। जंगली हाथियों के झुंड ने तमिलनाडु के वलपरई तक जाने के इस ‘शार्ट-कट’ रास्ते पर क़ब्ज़ा कर लिया था। वहीं, दूसरी ओर, चिन्नतंबी यहीं रहकर इस वीराने में पुस्तकालय चला रहे हैं। और वह इसे सक्रिय रखते हुए वंचित समुदाय से ताल्लुक़ रखने वाले अपने ग्राहकों को पढ़ने का मौक़ा दे रहे हैं और उनकी साहित्यिक भूख मिटा रहे हैं। साथ ही, उनको चाय, नमकीन एवं दियासलाई की आपूर्ति भी करते हैं। वैसे तो हमारा समूह बहुत शोरगुल करता है, परंतु इस भेंट ने हम सभी को बहुत प्रभावित किया एवं शांत कर दिया। हमारी नज़र अब लंबे व कठिन रास्ते पर थी। और हमारा मन-मस्तिष्क पी.वी. चिन्नतंबी के इर्द-गिर्द ही घूम रहा था, जो एक असाधारण लाइब्रेरियन हैं।

यह आलेख मूल रूप से 03 मार्च 2026 को पीपल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया पर प्रकाशित हुआ था, जिसे आप यहां पढ़
सकते हैं।

लेखक के बारे में

  • पी. साईनाथ, पीपल्स ऑर्काइव ऑफ़ रूरल इंडिया के संस्थापक संपादक हैं. वह दशकों से ग्रामीण भारत की समस्याओं की रिपोर्टिंग करते रहे हैं और उन्होंने ‘एवरीबडी लव्स अ गुड ड्रॉट’ तथा 'द लास्ट हीरोज़: फ़ुट सोल्ज़र्स ऑफ़ इंडियन फ़्रीडम' नामक किताबें भी लिखी हैं.
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