क्या शहरों की यातायात से जुड़ी समस्याओं का समाधान सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहन हैं?
भारत के शहरों में काम पर जाना, सामान की ढुलाई करना और रोज़मर्रा की आवाजाही की ज़रूरतों को पूरा करना मुख्य रूप से पेट्रोल, डीज़ल और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर है। नतीजन, भारत में ऊर्जा से संबंधित कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन का लगभग 14 प्रतिशत परिवहन क्षेत्र से आता है, जिससे यह देश में उत्सर्जन के सबसे तेज़ी से बढ़ते स्रोतों में शामिल हो गया है।
जीआईजेड (जर्मन कॉर्पोरेशन फॉर इन्टरनेशनल कॉपरेशन) और नीति आयोग की एक संयुक्त रिपोर्ट बताती है कि बीते तीन दशकों में परिवहन क्षेत्र से होने वाला उत्सर्जन तेज़ी से बढ़ा है और आने वाले वर्षों में इसके और बढ़ने की आशंका है। स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि परिवहन में इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा का 95 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अब भी तेल पर आधारित है। ऐसे में, इस क्षेत्र से उत्सर्जन को कम करना भारत के लिए नेट-ज़ीरो का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में सबसे कठिन चुनौतियों में से एक बना हुआ है।
इसके जवाब में शहरों और परिवहन से जुड़ी नीतियों में अक्सर वाहनों के विद्युतीकरण और बिजली से चलने वाले सार्वजनिक परिवहन के विस्तार जैसे तकनीकी समाधानों पर ज़ोर दिया गया है। यह माना जा रहा है कि इलेक्ट्रिक वाहन न सिर्फ कार्बन का उत्सर्जन कम करेंगे, बल्कि शहरों में लोगों की आवाजाही के तरीके को भी बदल देंगे।
लेकिन इस सोच में एक बड़ी कमी भी है। इसके तहत कई बार विद्युतीकरण को एक ऐसे समाधान की तरह देखा जाता है जो हर शहर में समान रूप से काम करेगा। यह मान लिया जाता है कि सभी शहर लगभग एक जैसे ढंग से चलते हैं और वहां रहने वाले लोगों के पास पहले से ही भरोसेमंद, सुरक्षित और किफायती परिवहन की व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं। जबकि हकीकत इससे अलग है। हर शहर की ज़रूरतें, परिवहन का ढांचा और लोगों की आवाजाही से जुड़ी चुनौतियां अलग-अलग होती हैं।
इसी फर्क को समझने के लिए 2025 में द क्लाइमेट एजेंडा ने पटना और लखनऊ में लोगों की आवाजाही के पैटर्न और व्यवहार को समझने की कोशिश की। ये दोनों टियर-2 शहर हैं, जहां आवाजाही से जुड़े हुए भरोसेमंद आंकड़ों की अब भी कमी है।
इसके लिए एक सहभागी प्रक्रिया के माध्यम से हमने यहां रहने वालों से उनकी रोज़मर्रा की यात्राओं का नक्शा तैयार करने, रास्ते में आने वाली भीड़-भाड़ वाली जगहों या रुकावटों (चोकपॉइंट्स) की पहचान करने और यह बताने के लिए कहा कि उनके रहने की जगह से सुरक्षित या असुरक्षित आवाजाही का अनुभव उन्हें कैसा महसूस होता है।


इसके साथ-साथ हमने फील्ड सर्वे और उपलब्ध द्वितीयक आंकड़ों (सेकेंडरी डेटा) के आधार पर दो अध्ययन भी किए, जिनके निष्कर्षों के आधार पर पटना और लखनऊ में आवाजाही की व्यवस्था से जुड़ी रिपोर्टें प्रकाशित की गईं।
इन अध्ययनों में अलग-अलग आयु वर्ग, लैंगिक पहचानों और पेशों से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया। इसमें औपचारिक (फॉर्मल) और अनौपचारिक (इनफॉर्मल) क्षेत्रों में काम करने वाले लोग भी शामिल थे। हालांकि, प्रतिभागियों में पुरुषों की संख्या अधिक रही। यह स्थिति अपने आप में इस ओर इशारा करती है कि शहरों में आवाजाही, सार्वजनिक जगहों तक पहुंच और सार्वजनिक जगहों पर मौजूदगी में अब भी व्यापक असमानताएं मौजूद हैं।
इन अध्ययनों में एक ओर तो रोज़ाना यात्रा करने वाले लोगों के अनुभवों को समझा गया, तो दूसरी ओर यातायात, वायु की गुणवत्ता और वाहनों की बढ़ती संख्या जैसे व्यापक रुझानों का भी अध्ययन किया गया।
बिहार और उत्तर प्रदेश में नागरिक समाज के नेतृत्व में किया गया यह अपनी तरह का पहला अध्ययन था, जिसमें शहरों में लोगों की आवाजाही को स्थानीय स्तर पर समझने की कोशिश की गई।
इन अध्ययनों से कुछ अहम बातें सामने आईं:
1. शहर रोज़मर्रा की आवाजाही को ध्यान में रखकर नहीं बनाए गए हैं
अध्ययन से पता चला कि लखनऊ में 63 प्रतिशत लोगों को अपनी यात्रा के पहले साधन तक पहुंचने के लिए लगभग एक किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। यानी सार्वजनिक या साझा परिवहन तक पहुंचना ही कई लोगों के लिए एक लंबी और थकाऊ प्रक्रिया बन जाता है।
उदाहरण के तौर पर, 34 साल की निर्माण श्रमिक रज़िया हर दिन सुबह सूरज निकलने से पहले अपने घर से निकलती हैं। उनका घर लखनऊ के मवैया क्षेत्र की एक अनौपचारिक बस्ती में है। ऑटो पकड़ने से पहले वे 2–3 किलोमीटर पैदल चलती हैं, ताकि कुछ पैसे बचा सकें। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उन अनगिनत लोगों की हकीकत है जिनके लिए शहर में रोज़मर्रा की आवाजाही समय, दूरी और खर्च के बीच लगातार समझौते का मामला बन जाती है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि कई लोगों के लिए ट्रैफिक जाम, यात्रा का बढ़ता खर्च और बुनियादी ढांचे में मौजूद कमियां बड़ी चिंताएं हैं। लखनऊ के कुछ प्रमुख रास्तों पर वाहनों की रफ्तार घटकर सिर्फ 11–14 किलोमीटर प्रति घंटा रह जाती है, जो लगभग पैदल चलने की गति के बराबर है।
लखनऊ में केवल 8 प्रतिशत लोगों ने माना कि पैदल चलने और साइकिल चलाने के लिए बुनियादी ढांचा पर्याप्त रूप से विकसित है और सार्वजनिक परिवहन की सीमित उपलब्धता इस समस्या को और बढ़ा देती है। साल 2023–24 में शहर में केवल 254 पंजीकृत बसें थीं, जो लगभग 40 लाख की आबादी वाले शहर की ज़रूरतों की तुलना में बहुत कम हैं।
ऐसी ही तस्वीर पटना में भी दिखाई देती है, जहां सिर्फ 13 प्रतिशत लोगों का मानना है कि पैदल चलने और साइकिल जैसे गैर-मोटर चालित साधनों के लिए बुनियादी सुविधाएं पर्याप्त हैं।
इसका नतीजा यह है कि बड़ी संख्या में लोग रोज़मर्रा की यात्रा बिना सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्पों के करने को मजबूर हैं। मोबिलिटी मैपिंग अभ्यास के दौरान, 45 साल की सुनीता देवी, जो चार बच्चों की मां हैं, विधवा हैं और शारीरिक दिव्यांगता के साथ जीवन जी रही हैं, ने बताया कि उन्हें घरेलू कामगार के रूप में काम करने के लिए हर दिन राजेंद्र नगर, मोतीनगर और ऐशबाग जैसे इलाकों में स्थित घरों तक पहुंचने के लिए 3-4 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। रास्ते में उन्हें तेज़ रफ्तार वाहनों, टूटी सड़कों और रैंप जैसी सुविधाओं से रहित सार्वजनिक स्थानों से होते हुए सफर करना पड़ता है।
यह अनुभव दिखाता है कि शहरों में आवाजाही की समस्या केवल दूरी तय करने का सवाल नहीं है, बल्कि यह सुरक्षा, पहुंच और गरिमा से भी जुड़ी हुई है।
2. जो लोग सार्वजनिक परिवहन पर सबसे अधिक निर्भर हैं, वही सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं
पटना में अध्ययन से पता चला कि हाशिए पर मौजूद जातीय समूहों के पास अपने खुद के वाहन बेहद कम हैं। यहां प्रति 1,000 लोगों पर केवल एक कार दर्ज की गई। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) समुदाय, जो शहर की आबादी का 21 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं, के लोगों के पास चारपहिया वाहनों का केवल 6 प्रतिशत और दोपहिया वाहनों का केवल 11 प्रतिशत हिस्सा है।
वहीं लखनऊ में 43 प्रतिशत लोगों के पास अपना कोई वाहन नहीं है, जिसके कारण वे सार्वजनिक और अनौपचारिक परिवहन के ऐसे साधनों पर निर्भर हैं, जो अक्सर अनियमित और अविश्वसनीय होते हैं।
कई लोगों के लिए इसका मतलब यह है कि उन्हें हर दिन भीड़-भाड़, अनिश्चितता और देरी जैसी मुश्किलों से जूझते हुए सफर करना पड़ता है। लेकिन यह समस्या केवल असुविधा तक सीमित नहीं है। यह लोगों की गरिमा, सुरक्षा और रोज़मर्रा के अनुभवों को भी प्रभावित करती है।
कानपुर की एक ट्रांसफेमिनिन प्रतिभागी निर्मला ने बताया कि यात्रा के दौरान उन्हें कई बार सामने की सीट पर “सामान की तरह” बैठने को कहा जाता है, उनसे अधिक किराया वसूला जाता है या दूसरे यात्री उनके साथ बैठने से बचते हैं। उनका अनुभव दिखाता है कि शहरों में आवाजाही केवल दूरी तय करने का मामला नहीं है, बल्कि इसमें भेदभाव, सामाजिक नज़रिया और सम्मानजनक व्यवहार पाने के लिए रोज़ाना का संघर्ष भी शामिल होता है।
3. आवाजाही की सीमाएं शहरों में बढ़ते उत्सर्जन की वजह बन रही हैं
जब शहरों में परिवहन व्यवस्थाएं भरोसेमंद, सुलभ और सुविधाजनक नहीं होतीं, तो जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम होते हैं, वे निजी वाहनों की ओर रुख करने लगते हैं। इसका सीधा असर ईंधन की खपत, वाहनों की संख्या और प्रदूषण पर पड़ता है।
पटना में साल 2010 से 2023 के बीच पेट्रोल की खपत में 177 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि इसी अवधि में डीज़ल की खपत 34 प्रतिशत बढ़ी। यही नहीं हर साल पंजीकृत होने वाले वाहनों की संख्या भी लगभग दोगुनी हो गई। 2010–11 में जहां यह संख्या करीब 79 हज़ार थी, वहीं 2023–24 में यह बढ़कर 1.58 लाख तक पहुंच गई। इनमें 82 प्रतिशत निजी दोपहिया वाहन और कारें शामिल थीं।
कुछ ऐसी ही तस्वीर लखनऊ में भी दिखाई देती है। यहां साल 2010 से 2024 के बीच पेट्रोल की खपत लगभग 224 प्रतिशत बढ़ी, जबकि डीज़ल के उपयोग में 54 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
इन बदलावों का असर हवा की गुणवत्ता में भी साफ दिखाई देता है। पटना में पीएम (हवा में मौजूद प्रदूषण के कण) 2.5 का स्तर राष्ट्रीय मानकों से लगभग दोगुना और विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों से 15 गुना से अधिक बना हुआ है। वहीं लखनऊ में समय के साथ प्रदूषण के स्तर में कुछ कमी ज़रूर दर्ज हुई है, लेकिन यह अब भी राष्ट्रीय मानकों से काफी ऊपर और डब्ल्यू एच ओ के तय मानकों से लगभग 12 गुना अधिक है।
यह स्थिति दिखाती है कि परिवहन व्यवस्था की खामियां केवल यात्रा को मुश्किल नहीं बनातीं, बल्कि वे शहरों में प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन के बढ़ने की वजह भी बनती हैं।


आवाजाही के सवाल को नए तरीके से समझना
यही वजह है कि परिवहन से होने वाले उत्सर्जन को कम करने की चर्चा केवल वाहनों के विद्युतीकरण तक सीमित नहीं रह सकती। इसके लिए यह समझना भी ज़रूरी है कि शहरों में कौन सुरक्षित रूप से और आसानी से यात्रा कर पा रहा है, और कौन अब भी परिवहन की इन व्यवस्थाओं से बाहर छूट रहा है।
दरअसल, लोगों की आवाजाही की ज़रूरतें और उन्हें सहारा देने वाली व्यवस्थाएं न सिर्फ हर शहर में, बल्कि एक ही शहर के अलग-अलग हिस्सों में भी अलग होती हैं। एक ही सड़क दिनभर में कई अलग-अलग तरह के कामों के लिए इस्तेमाल की जाती है।
सुबह के समय वही सड़क सफाईकर्मियों की आवाजाही का रास्ता होती है, ऐसे कामगारों के लिए सड़क केवल गुज़रने की जगह नहीं, बल्कि काम की जगह भी होती है। इसी समय ठेले और दुकानें लगाने वाले विक्रेता अपनी दुकान/ठेला लगाने की तैयारी में जुटते हैं और बच्चे स्कूल जाने के लिए पैदल निकलते हैं। दोपहर तक वही सड़क फुटपाथ पर या सड़क किनारे सामान बेचनेवालों की रोज़ी-रोटी का स्थान बन जाती है, जबकि कई महिलाओं के लिए यह बाज़ार, स्वास्थ्य केंद्रों और आंगनवाड़ी तक पहुंचने का रास्ता होती है, जहां वे देखभाल और घरेलू ज़िम्मेदारियों से जुड़े कामों के लिए आती-जाती हैं।
ट्रांसजेंडर लोगों के लिए यही सड़कें रोज़मर्रा के संघर्ष का हिस्सा भी होती हैं, जहां उनका सफर केवल दूरी तय करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसमें लोगों की नज़रें, सुरक्षा की चिंता और उत्पीड़न के लगातार बने रहने वाले जोखिम भी शामिल होते हैं। शाम होते-होते, यही सड़कें काम से लौटते लोगों, छोटे व्यापार और अनौपचारिक गतिविधियों का बोझ संभालती हैं।
लेकिन शहरों की योजना बनाने के मौजूदा तरीके अक्सर तयशुदा और एक जैसे मॉडलों पर आधारित होते हैं, जो शहरों के आकार, जनसंख्या घनत्व और इस फर्क को नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि लोग अलग-अलग तरीकों से यात्रा करते हैं। यह समस्या खासकर लखनऊ और पटना जैसे छोटे या उभरते शहरी केंद्रों में अधिक दिखाई देती है, जहां परिवहन की व्यवस्थाएं अब भी विकसित हो रही हैं। कई बार बड़े महानगरों के लिए तैयार किए गए समाधान स्थानीय ज़रूरतों को समझे बिना यहां भी लागू कर दिए जाते हैं।
इसका एक स्पष्ट उदाहरण मेट्रो रेल है। मेट्रो परियोजनाओं में बहुत बड़े स्तर पर निवेश की ज़रूरत होती है और बेशक घनी आबादी वाले बड़े शहरों में यह आवाजाही को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। लेकिन छोटे शहरों या उभरते शहरी केंद्रों में अक्सर इससे अधिक फायदा उन उपायों से हो सकता है जो रोज़मर्रा की यात्रा को आसान बनाते हैं। जैसे यात्रा के अंतिम छोर तक बेहतर कनेक्टिविटी (लास्ट-माइल कनेक्टिविटी), पैदल चलने के लिए सुरक्षित और सुगम सड़कें, बस सेवाओं का विस्तार, और सामाजिक रूप से हाशिए पर मौजूद समुदायों के लिए मुफ्त या रियायती यात्रा की सुविधा।
इसके बावजूद अलग-अलग आकार और ज़रूरतों वाले शहरों में मेट्रो परियोजनाओं को एक समान समाधान की तरह अपनाने का चलन जारी है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या शहरों की परिवहन योजनाएं लोगों की वास्तविक ज़रूरतों के आधार पर बन रही हैं, या फिर एक तयशुदा मॉडल को हर जगह लागू किया जा रहा है।
इसका असर लखनऊ और कानपुर जैसे शहरों में साफ दिखाई देता है, जहां मेट्रो सेवाएं फिलहाल शहर के केवल कुछ सीमित हिस्सों तक ही पहुंचती हैं। नतीजतन, शहर के अधिकतर हिस्से अब भी परिवहन के पारंपरिक साधनों पर ही निर्भर हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में लोग बसों और दूसरे रोज़मर्रा के यातायात के साधनों का इस्तेमाल करते हैं, जो छोटी दूरी की यात्रा के लिए और अलग-अलग इलाकों तक पहुंचने के लिए अपेक्षाकृत अधिक सुलभ साबित होते हैं।
वाराणसी का एक उदाहरण इस चुनौती को और स्पष्ट करता है। यहां वाराणसी शहर को कैथी से जोड़ने के लिए एक इलेक्ट्रिक बस सेवा शुरू की गई थी, जिसे लेकर काफी प्रचार किया गया और लोगों के बीच उम्मीद भी बनी। हालांकि यात्रियों की संख्या लगातार अच्छी रहने के बावजूद यह सेवा एक साल के भीतर अचानक बंद कर दी गई, जिससे रोज़ाना आने-जाने वाले लोग मुश्किल में पड़ गए।
केवल नई तकनीक या नई सेवा शुरू कर देना पर्याप्त नहीं है, यहां उतना ही ज़रूरी है कि परिवहन की सेवाएं लोगों की रोज़मर्रा की ज़रूरतों के हिसाब से भरोसेमंद, लगातार उपलब्ध और टिकाऊ हों।
कैथी केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि गंगा किनारे बसी घनी आबादी वाली बस्ती भी है, जहां रहने वाले लोग काम, पढ़ाई और दूसरी ज़रूरतों के लिए वाराणसी शहर पर निर्भर हैं। बस सेवा बंद होने के बाद लोगों को महंगे और अनौपचारिक परिवहन के साधनों का सहारा लेना पड़ा। बाद में स्थानीय समूहों द्वारा ज़िला प्रशासन के साथ लगातार बातचीत और प्रयासों के बाद इस सेवा को फिर से शुरू किया गया।
यह उदाहरण दिखाता है कि केवल नई तकनीक या नई सेवा शुरू कर देना पर्याप्त नहीं है। उतना ही ज़रूरी यह भी है कि परिवहन की सेवाएं लोगों की रोज़मर्रा की ज़रूरतों के हिसाब से भरोसेमंद, लगातार उपलब्ध और टिकाऊ हों।
आवाजाही की योजना और निवेश को किस दिशा में बदलने की ज़रूरत है
असल चुनौती यह नहीं है कि समाधान मौजूद नहीं हैं। बस सेवाओं का विस्तार करना, पैदल चलने के लिए बेहतर फुटपाथ बनाना, यात्रा की आखिरी मंज़िल तक पहुंचने के लिए परिवहन के साधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना, और उन लोगों के लिए यात्रा को सस्ता बनाना जो इसका खर्च उठाने में सबसे अधिक मुश्किल झेलते हैं, ये ऐसे कदम हैं जिन्हें लागू करना असंभव नहीं है।
फिर भी, शहरों में परिवहन से जुड़ी योजना और निवेश अक्सर बड़े बुनियादी ढांचों और विशाल परियोजनाओं पर केंद्रित रहते हैं, जबकि लोगों का रोज़मर्रा का सफर उन साधारण लेकिन ज़रूरी व्यवस्थाओं से तय होता है जिन पर वे हर दिन निर्भर रहते हैं। किसी व्यक्ति के लिए यात्रा आसान होगी या मुश्किल, यह कई बार बस की उपलब्धता, सुरक्षित रास्तों, यात्रा के किराए और घर से परिवहन के साधन तक पहुंच जैसी बुनियादी चीज़ों से तय होता है, न कि केवल किसी बड़ी परियोजना से।
इस अंतर को दूर करने के लिए शहरी योजना को पूरी तरह बदलने या नए सिरे से गढ़ने की ज़रूरत नहीं है। ज़रूरत इस बात की है कि स्थानीय अनुभवों, आंकड़ों और लोगों की वास्तविक ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए फैसले लिए जाएं।
इस अध्ययन के नतीजों से कुछ ऐसी प्राथमिकताएं सामने आती हैं, जिन पर ध्यान देकर शहरों में आवाजाही की एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जो अधिक समावेशी और लोगों की ज़रूरतों के अनुरूप हो।
1. आवाजाही की एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिस पर लोग भरोसा कर सकें
परिवहन की योजना बनाते समय सस्ती, भरोसेमंद और सुरक्षित यात्रा को अतिरिक्त लाभ नहीं, बल्कि मुख्य लक्ष्य माना जाना चाहिए। इसका मतलब यह है कि किसी योजना की सफलता को केवल इस आधार पर नहीं परखा जाना चाहिए कि उससे कितने लोग यात्रा कर रहे हैं या कितना प्रदूषण कम हुआ, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या उससे लोगों की मज़दूरी का नुकसान कम हुआ, बिना भुगतान वाले सफर (जैसे घरेलू ज़िम्मेदारियों के लिए की जाने वाली यात्राएं) में लगने वाला समय घटा, और क्या महिलाओं, बुजुर्गों, दिव्यांग लोगों तथा अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों की परिवहन के साधनों तक पहुंच आसान हुई।
उदाहरण के लिए, अगर सेवाएं समय पर उपलब्ध न हों और भरोसेमंद न हों या लोगों को अपने घर या मोहल्ले से बस स्टॉप तक पहुंचने के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध न हों, तो केवल बसों की संख्या बढ़ा देना या नए रूट जोड़ देना पर्याप्त नहीं है।
इसी वजह से सार्वजनिक परिवहन का विस्तार और उसके विद्युतीकरण के साथ-साथ किराए में कमी और यात्रा के आखिरी छोर तक परिवहन के साधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में भी काम किया जाना चाहिए। साथ ही, छोटी दूरी की यात्राओं के लिए पैदल चलने और साइकिल चलाने की सुरक्षित व्यवस्था भी उतनी ही ज़रूरी है, खासकर उन लोगों के लिए जो रोज़मर्रा की आवाजाही के लिए इन्हीं पर सबसे अधिक निर्भर हैं। अगर सुरक्षित और लगातार जुड़े रास्तों का अभाव होगा, तो छोटी-सी दूरी तय करना भी समय लेने वाला, महंगा या असुरक्षित अनुभव बन सकता है।
2. आवाजाही के बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता देनी होगी
सड़कें और फुटपाथ केवल एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचने का माध्यम नहीं होते। ये काम, देखभाल, छोटे कारोबार और लोगों के आपसी मेलजोल की भी जगहें होती हैं। लेकिन अक्सर यह देखा जाता है कि फुटपाथ बनाए तो जाते हैं, पर कुछ समय बाद उन्हें तोड़ दिया जाता है, उन पर अतिक्रमण हो जाता है या फिर उन्हें गाड़ियों की आवाजाही और पार्किंग के लिए इस्तेमाल किया जाने लगता है। इसका सबसे ज़्यादा असर उन लोगों पर पड़ता है जो रोज़मर्रा की यात्रा के लिए पैदल चलने पर निर्भर हैं।
इसलिए शहरों की योजना और निवेश में केवल नई परियोजनाएं बनाकर दिखाने पर नहीं, बल्कि ऐसी सड़कें बनाने पर ध्यान देने की ज़रूरत है जो लंबे समय तक सुरक्षित, उपयोगी और सभी के लिए सुलभ बनी रहें। इसके लिए ज़रूरी है कि सड़कों को लोगों के असल इस्तेमाल के हिसाब से बनाया जाए और ऐसी व्यवस्थाएं हो जिससे उनका रखरखाव साझा सार्वजनिक जगहों की तरह लगातार किया जा सके।
3. पहले से मौजूद पहलों का बेहतर इस्तेमाल करना होगा
अच्छी बात यह है कि इस दिशा में काम करने के लिए नीतिगत और वित्तीय ढांचा पहले से मौजूद है। ज़रूरत इन्हें लोगों की वास्तविक आवाजाही की ज़रूरतों से जोड़कर प्रभावी ढंग से लागू करने की है।
उत्तर प्रदेश में पीएम ई-बस सेवा योजना के तहत साल 2030 तक करीब 8,000 इलेक्ट्रिक बसों को परिवहन व्यवस्था में शामिल करने की दिशा में काम हो रहा है। वहीं बिहार को छह शहरों में 400 इलेक्ट्रिक बसों के संचालन की मंज़ूरी मिल चुकी है।
मुद्दा यह नहीं है कि नई योजनाएं शुरू की जाएं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि जो योजनाएं पहले से चल रही हैं, उन्हें इस तरह लागू किया जाए ताकि रोज़ाना यात्रा करने वाले लोगों खासकर महिलाओं, बुज़ुर्गों, दिव्यांग लोगों और कम आय वाले समुदायों की ज़रूरतें पूरी हो सकें।
इसके अलावा, उत्तर प्रदेश की सीएम-ग्रिडस जैसी पहलें भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। साल 2024–25 के बजट में सड़क के बुनियादी ढांचे को बेहतर करने और बस सेवाओं को मज़बूत करने के लिए इस पहल के तहत 1,300 करोड़ रुपये का संयुक्त आवंटन किया गया था।
इसी तरह, बिहार की पिंक बस योजना भी एक उदाहरण है, जिसके पहले चरण में छह शहरों में महिलाओं के लिए विशेष सीएनजी बस सेवाएं शुरू की गईं। इससे पता चलता है कि समावेशिता को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाने की सोच पहले से मौजूद है।
मुद्दा यह नहीं है कि नई योजनाएं शुरू की जाएं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि जो योजनाएं पहले से चल रही हैं, उन्हें इस तरह लागू किया जाए ताकि रोज़ाना यात्रा करने वाले लोगों खासकर महिलाओं, बुज़ुर्गों, दिव्यांग लोगों और कम आय वाले समुदायों की ज़रूरतें पूरी हो सकें।
4. निजी वाहनों को केंद्र में रखकर बनने वाली योजना से आगे बढ़ना होगा
फिलहाल शहरों की परिवहन व्यवस्था काफी हद तक निजी वाहनों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि साझा परिवहन और पैदल या साइकिल जैसे गैर-मोटर चालित साधनों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। इस स्थिति को बदलने के लिए ज़रूरी है कि निजी वाहनों पर निर्भरता कम की जाए। इसके लिए पार्किंग व्यवस्था का बेहतर प्रबंधन, ज़रूरत के हिसाब से निजी वाहनों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाली नीतियां और सार्वजनिक परिवहन व पैदल या साइकिल जैसे साधनों का इस्तेमाल करने के लिए लोगों को प्रोत्साहन देने के प्रयास अहम साबित हो सकते हैं।
दुनिया के कई शहर दिखा चुके हैं कि इस विचार को अमल में लाना मुमकिन है। लंदन में निजी वाहनों को शहर के केंद्रीय हिस्से में दाखिल होने के लिए रोज़ाना शुल्क देना पड़ता है। इससे ट्रैफिक कम करने में मदद मिली है और जो राजस्व मिलता है, उसे सार्वजनिक परिवहन सुधारने में लगाया जाता है। वहीं स्टॉकहोम में दिन के समय के हिसाब से बदलने वाला ‘कंजेशन टैक्स’ लागू है, जिसके तहत व्यस्त समय में निजी वाहन से यात्रा करना महंगा पड़ता है, जबकि सार्वजनिक परिवहन को अपेक्षाकृत सुलभ रखा गया है।
इसी तरह, सिंगापुर ने लंबे समय से निजी वाहनों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए बहुत अधिक पंजीकरण शुल्क और कोटा प्रणाली अपनाई हुई है, ताकि सड़कों पर वाहनों की संख्या सीमित रखी जा सके। ये कोई छोटे स्तर के प्रयोग नहीं हैं, बल्कि लंबे समय से अपनाई गई ऐसी नीतियां हैं जिन्होंने लोगों के आने-जाने के तरीके को बदल दिया है। साधन और तरीके मौजूद हैं, सवाल यह है कि क्या शहर उन्हें अपनाने के लिए तैयार हैं।
आखिरकार, भारत के टियर-2 शहरों में कम-कार्बन वाली आवाजाही का भविष्य केवल साफ तकनीकों या इलेक्ट्रिक वाहनों पर निर्भर नहीं करेगा। यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि परिवहन व्यवस्थाएं लोगों के रोज़मर्रा के वास्तविक सफर और ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं या नहीं। उत्सर्जन कम करना और लोगों के लिए परिवहन के साधनों तक पहुंच को आसान बनाना दो अलग लक्ष्य नहीं माने जा सकते। दूसरे शब्दों में कहें, तो समावेशन कोई अतिरिक्त चिंता नहीं, बल्कि जलवायु से जुड़े लक्ष्यों को हासिल करने की बुनियादी शर्त है।
–
अधिक जानें
- जानें, भारत के इलेक्ट्रिक वाहनों से भरे कल में मैकेनिक कहां दिखते हैं?
- जानें, क्या बिहार की इलेक्ट्रिक वाहन नीति इसे ईवी राज्य बनाने के लिए पर्याप्त है?
- जानें, सार्वजनिक परिवहन के कारण शहरी यातायात की भीड़ पर पड़ने वाला प्रभाव
अधिक करें
- अगर आप परिवहन के सार्वजनिक साधनों का इस्तेमाल करते हैं, तो यह देखने की कोशिश करें कि उसमें कौन लोग नज़र नहीं आते, कौन-से रास्ते अब भी लोगों की पहुंच से बाहर हैं, और कौन लोग मजबूरी में पैदल चल रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। इन सवालों को स्थानीय निकायों और चुने हुए जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाएं और मांग करें कि परिवहन तथा जलवायु से जुड़ी योजनाओं में सुरक्षित, सस्ती और सभी के लिए सुलभ आवाजाही के साधनों को प्राथमिकता दी जाए।
- अगर आप शहरों की योजनाएं बनाने या नीतियां बनाने के काम से जुड़े हैं, तो ऐसे आंकड़े जुटाने की दिशा में काम करें जो यह समझने में मदद करें कि लोग वास्तव में शहरों में कैसे आवाजाही करते हैं। इसमें खास तौर पर महिलाओं, अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों, कम आय वाले यात्रियों और दिव्यांग लोगों के अनुभव शामिल होने चाहिए, सिर्फ वाहनों की संख्या और सड़क के बुनियादी ढांचे पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा।
- अगर आप किसी नागरिक समाज संगठन का हिस्सा हैं, तो ऐसे स्थानीय समूहों या गठबंधनों से जुड़ने या उन्हें बनाने पर विचार करें जो परिवहन, जलवायु, स्वास्थ्य, सुरक्षा और समानता के सवालों को साथ लेकर काम करते हों। उत्तर प्रदेश में कुछ संगठन इसी तरह की साझेदारी के तहत टिकाऊ शहरी आवाजाही (सस्टेनेबल अर्बन मोबिलिटी) से जुड़े प्रयासों में मिलकर काम कर रहे हैं।
लेखक के बारे में
- सानिया अनवर जलवायु और नीतिगत मामलों की विशेषज्ञ हैं। वर्तमान में वे द क्लाइमेट एजेंडा में ‘हरित सफर’ नामक पहल की परियोजना प्रमुख के तौर पर काम कर रही हैं। उनका काम शहरों में आवाजाही, जलवायु परिवर्तन को न्याय और समानता के मुद्दे के तौर पर देखने, लैंगिक रूप से समावेशी जलवायु शासन और समुदाय आधारित सहभागी शोध पर केंद्रित है। सानिया के पास उत्तर प्रदेश और बिहार में गठबंधन निर्माण, नीतिगत पैरवी और समुदायों की अगुवाई वाले जलवायु परिवर्तन से जुड़े अभियानों के क्षेत्र में एक दशक से भी अधिक का अनुभव है। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र (स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़), नई दिल्ली से एमफिल की डिग्री प्राप्त की है।
- एकता सिंह, द क्लाइमेट एजेंडा की सह-संस्थापक हैं। यहां वे जलवायु शासन (क्लाइमेट गवर्नेंस) और समतामूलक ऊर्जा परिवर्तन (इक्विटेबल एनर्जी ट्रांज़ीशन) की प्रक्रियाओं में स्थानीय समुदायों की भागीदारी और उनकी ज़रूरतों को केंद्र में रखने पर काम करती हैं। विकास क्षेत्र में 15 वर्षों से अधिक अनुभव रखने वाली एकता जलवायु और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को लेकर सक्रिय रही हैं। उन्होंने रचनात्मक मीडिया और राजनीतिक भागीदारी की रणनीतियों के ज़रिए उत्तर प्रदेश के 40 शहरों में स्वच्छ हवा के लिए काम करने वाले 300 से अधिक नागरिक समाज संगठनों का नेटवर्क खड़ा करने में भूमिका निभाई है। इनमें 16 ऐसे शहर भी शामिल हैं जो वायु-गुणवत्ता के मानकों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। उनका काम महिलाओं के स्वास्थ्य, प्रजनन संबंधी अधिकारों और मानवाधिकारों से जुड़े सवालों पर आधारित रहा है।




