विकास सेक्टर
‘जब सड़कें सूनी हों, तो संसद आवारा हो जाती है’
आंदोलन सिर्फ विरोध नहीं, लोकतंत्र में अपने हक़ की लड़ाई लड़ने, दबाई गई आवाज़ों को बुलंद करने, सत्ता से जवाब मांगने और समाज को बदलने की ताकत हैं।प्यारे आंदोलन, …..
वह कभी किसान बनकर लौटता है, कभी छात्र, कभी जंगल, कभी पहाड़। उसका आना सड़क और संसद, दोनों के लिए ज़रूरी है। इसलिए आज एक खुला ख़त, आंदोलन के नाम।