जच्चा-बच्चा ​​अधिकारों​​ के लिए ​​एक महिला ​​मजदूर संगठन ​​की लड़ाई

Location Icon दावणगेरे जिला, कर्नाटक
मजदूर यूनियन की महिलाएं अधिकारियों से बात करते हुए _ यूनियन
संगठित प्रयास प्रशासन को जवाबदेह बनाने का माद्दा रखते हैं। | चित्र साभार: जबीना

पिछले एक दशक से कर्नाटक के दावणगेरे जिले में नेरालु बीड़ी मजदूर यूनियन ने हजार से अधिक महिला बीड़ी मजदूरों को संगठित किया है। मैं शुरुआत से ही इस यूनियन से जुड़ी रही हूं और तीन अन्य साथियों के साथ मिलकर हमारे समुदाय में स्वास्थ्य सेवाओं को सुगम बनाने के मुद्दे पर काम करती हूं। यूनियन का काम सिर्फ मजदूरी या काम के अधिकारों तक सीमित नहीं है। यह महिलाओं के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े छोटे-बड़े हर मुद्दे पर साथ खड़ा रहने वाला एक सामुदायिक मंच है।

हम अक्सर महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े कई पहलुओं पर काम करते हैं, जिसमें नियमित स्वास्थ्य जांच, गर्भावस्था के दौरान मिलने वाली सेवाओं का अधिकार, प्रसव संबंधी समस्याएं और सरकारी अस्पतालों में होने वाली अनियमितताओं की निगरानी जैसे गंभीर मुद्दे भी शामिल होते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर यह महिलाएं अक्सर अस्पतालों में भेदभाव, अनदेखी और अस्पष्ट प्रक्रियाओं का सामना करती हैं। ऐसे समय में संगठन (यूनियन) ही वह जगह है जहां वे खुलकर अपनी परेशानी बता पाती हैं।

वर्ष 2021 में, मैंने अपने भाई और भाभी को हरपनहल्‍ली से दावणगेरे बुलाया क्योंकि उनके गांव के अस्पताल में सुरक्षित प्रसव के लिए आवश्यक स्कैनिंग सुविधाएं उपलब्ध नहीं थी। बच्चे के जन्म के बाद, अस्पताल के कर्मचारियों ने हमें शिशु को दिखाया और बताया कि सांस लेने में कठिनाई के कारण उसे आईसीयू में ले जाया जा रहा है।

कुछ देर बाद कर्मचारियों ने हमसे थायी कार्ड (मातृ स्वास्थ्य पहचान पत्र) लाने के लिए कहा। जब तक हम कार्ड लेकर लौटे, नर्स ने बिना उचित जांच और परिवार को सूचित किए बगैर बच्चे को किसी अनजान व्यक्ति को थमा दिया था। मैंने तुरंत यूनियन से संपर्क किया, और उन्होंने स्थानीय मीडिया को सूचित किया ताकि मामले को गंभीरता से उठाया जा सके।

हमने देखा कि अस्पताल में जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया नदारद थी, और ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए बुनियादी व्यवस्थाओं की कमी भी साफ नजर आ रही थी। पूरी इमारत में केवल एक ही सीसीटीवी कैमरा था जिसका रूख किसी और दिशा में था। यूनियन ने तुरंत ही सदस्यों को संगठित किया और हमने अस्पताल के बाहर शांतिपूर्ण धरना शुरू किया। हम लोग एक महीने तक अस्पताल के बाहर ही डटे रहे। इस दौरान हमारे गैस के दो सिलेंडर तक खत्म हुए। हमने अधिकारियों से कहा कि जब तक बच्चा वापस नहीं मिलता, हम वापस नहीं जायेंगे। यूनियन के साथी हर दिन हमारे साथ समय बिताते, हमें हिम्मत देते रहते और यह सुनिश्चित करते कि हमारी आवाज लगातार सार्वजनिक रूप से सुनी जाए।

कई हफ्तों की निरंतर सामूहिक कोशिशों और संगठित दबाव के बाद, अधिकारियों को एक धुंधली सीसीटीवी फुटेज के रूप में एक सुराग मिला। यूनियन ने तुरंत ही इसे व्हाट्सऐप पर साझा करना शुरू किया और स्थानीय लोगों तथा आशा कार्यकर्ताओं की मदद से हमने आसपास के इलाकों में खुद छानबीन शुरू की। एक शाम पुलिस से फोन आया कि पास ही एक बस स्टॉप पर किसी बच्चे को देखा गया है। इसके तीन दिन बाद आखिरकार बच्चे को महिला एवं बाल विकास विभाग और दावणगेरे एसपी द्वारा परिवार को सौंप दिया गया।

इस घटना के बाद अस्पताल में तमाम जरूरी जगहों पर सीसीटीवी कैमरा और एलसीडी डिस्प्ले लगाए गए हैं। जिस तरह यूनियन ने महिलाओं के स्वास्थ्य अधिकारों पर अपने लंबे अनुभव, स्थानीय प्रशासन पर सामूहिक दबाव और सदस्यों के बीच आपसी भरोसे के आधार पर इस मामले को आगे बढ़ाया, वह यह दर्शाता है कि संगठित प्रयास प्रशासन को जवाबदेह बनाने का माद्दा रखते हैं।

अधिक जानें: जानिए, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ कैसे लामबंद हो रही हैं घरेलू कामगार महिलायें।

अधिक करें: लेखक से जुड़ने और उन्हें सहयोग देने के लिए उनसे ​[email protected] पर संपर्क करें।


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