ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक को क्यों निरस्त किया जाना चाहिए

हम ट्रांसजेंडर, इंटरसेक्स, जेंडर-विविध तथा एलजीबीक्यूए+ समुदायों के व्यक्तियों का एक कलेक्टिव (समूह) हैं। हमारे कलेक्टिव में विकलांग ट्रांसजेंडर व्यक्ति और साथ ही मुंबई, नवी मुंबई और ठाणे के कई अभिभावक, स्वास्थ्यकर्मी, महिला अधिकार समूह, विकलांगता अधिकार कार्यकर्ता और मानवाधिकार संगठन भी शामिल हैं। हम ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 की कड़ी निंदा करते हैं, क्योंकि यह हमारे समुदायों के अधिकारों और गरिमा के लिए एक गंभीर खतरा है। हम आम जनता तथा नीति-निर्माताओं से अपील करते हैं कि वे इसके विरोध में हमारे साथ लामबंद हों।
यह विधेयक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की सुरक्षा नहीं करता। इसके विपरीत, यह उनकी निगरानी करने, उनके सहयोगियों को अपराधी ठहराने, और बहुत से समुदायों के संपूर्ण कानूनी अस्तित्व को नकारने की पैरवी करता है। यह सर्वोच्च न्यायालय के नालसा (2014) और पुट्टस्वामी (2017) जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों का खुला उल्लंघन करता है और हमारे संवैधानिक अधिकारों और विधि के शासन को भी कमजोर बनाता है।
इस विधेयक का मसौदा बिना पर्याप्त सामुदायिक परामर्श और बिना किसी विश्वसनीय शोध-आधार के तैयार किया गया है। इसमें निहित नौकरशाही और मेडिकल नियंत्रण की प्रक्रियाएं विशेष रूप से उन जेंडर-विविध व्यक्तियों पर सबसे अधिक बोझ डालती हैं, जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे समुदायों—दलित, बहुजन, आदिवासी और श्रमिक वर्ग— से आते हैं। यह स्पष्ट है कि उनकी परस्पर जुड़ी हुई पहचानें उन्हें पहले से ही राज्य की निगरानी और संस्थागत बहिष्करण के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती हैं।
यह विधेयक इंटरसेक्स व्यक्तियों के विशिष्ट संघर्षों को भी नजरअंदाज करता है, जिनमें से कई अपनेआप को ट्रांसजेंडर के रूप में नहीं देखते, और जो भेदभाव तथा हिंसा के खिलाफ एक अलग लड़ाई लड़ रहे हैं। इसके साथ ही, यह धारा 7(3) के उस प्रावधान को भी निरस्त करता है, जिसने 2019 के अधिनियम के तहत अपने दस्तावेजों में बदलाव कर चुके ट्रांस व्यक्तियों को संरक्षण प्रदान किया था। जिन लोगों ने अपनी जिंदगी एक कानूनी पहचान के आधार पर बनायी थी, वे अब ऐसी किसी कानूनी श्रेणी से वंचित हो जाते हैं जो उन्हें संरक्षण दे सके। यानी वे कानून की दृष्टि में अस्तित्वहीन हो जाते हैं।
यह विधेयक अलग से नहीं लाया गया है। बल्कि इसे ऐसे स्वास्थ्य-तंत्र में प्रस्तुत किया गया है, जिसने वर्षों से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को संदेह की नजर से देखा है। वर्ष 2017 से ही राष्ट्रीय रक्त आधान परिषद (एनबीटीसी) ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के रक्तदान पर स्थायी प्रतिबंध लगा रखा है। यह एक ऐसी नीति है, जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह विधेयक उसी संस्थागत सोच को आगे बढ़ाता है, जिसके तहत ट्रांसजेंडर स्वास्थ्य-सेवा के इर्द-गिर्द राज्य-नियंत्रित निगरानी की एक व्यवस्था बनायी जा रही है, जिसका सामना भारत में किसी अन्य रोगी समूह को नहीं करना पड़ता है।
रोगी की सहमति के बिना जिला मजिस्ट्रेट को जेंडर-अफर्मिंग प्रक्रियाओं की अनिवार्य रिपोर्टिंग करना, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 की धारा 23 का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। यह धारा प्रत्येक व्यक्ति के लिए उनकी स्वास्थ्य-संबंधी जानकारी की गोपनीयता का अधिकार सुनिश्चित करती है। इसी अधिनियम की धारा 21 स्पष्ट रूप से यह भी निर्धारित करती है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में जेंडर या सेक्शुअल ओरिएंटेशन के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव निषिद्ध है। इस प्रकार, यह विधेयक स्वयं उसी कानून के अंतर्गत भेदभावपूर्ण है, जो भारत में मानसिक स्वास्थ्य प्रथाओं को संचालित करता है।
भारत सरकार से हमारी विशिष्ट मांगें
1. विधेयक को तत्काल वापस लिया जाए
हम ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को तत्काल वापस लेने की मांग करते हैं। यह विधेयक असंवैधानिक है, पर्याप्त साक्ष्य-आधार से रहित है, और हमारे समुदाय की सुरक्षा तथा गरिमा के लिए सीधा खतरा पैदा करता है।
2. स्थायी समिति (स्टैंडिंग कमिटी) को संदर्भित किया जाए
यदि सरकार इस विधेयक को वापस नहीं लेती, तो हम इसे तत्काल ही संसदीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता संबंधी स्थायी समिति को संदर्भित करने की मांग करते हैं, जहां इसका गहन, पारदर्शी और साक्ष्य-आधारित परीक्षण हो सके। इस परीक्षण में उन समुदायों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित की जाए, जिनसे यह विधेयक संबंधित है।
3. “हमारे बारे में, हमारे बिना कुछ नहीं”—अनिवार्य सामुदायिक परामर्श
इस विधेयक की भाषा और संरचना से यह स्पष्ट है कि इसे समुदाय को केंद्र में रखकर तैयार नहीं किया गया है। हम यह मांग करते हैं कि आगे की किसी भी विधायी प्रक्रिया से पहले एक औपचारिक, देशव्यापी परामर्श किया जाए। इस परामर्श में ट्रांसजेंडर, नॉन-बाइनरी, इंटरसेक्स, जेंडर-विविध व्यक्तियों और विकलांग ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को केंद्र में रखा जाए। इन सभी को एक स्वतंत्र और विशिष्ट आवाज के रूप में मान्यता दी जाए, न कि केवल एक हाशिये के उल्लेख के रूप में। साथ ही उनके परिवारों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाए। यह समावेशन भरोसा बनाने और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
सरकार को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस संशोधन के मसौदे के दौरान किन मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, चिकित्सा विशेषज्ञों, विकलांगता अधिकार कार्यकर्ताओं और ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों से परामर्श किया गया। जो विधेयक प्रासंगिक पेशेवरों से परामर्श किए बिना नैदानिक और मनोवैज्ञानिक दावे करता है, उसके पास किसी हाशिए पर स्थित समुदाय पर शासन करने के लिए आवश्यक साक्ष्य-आधार नहीं होता है।
भारत ने वर्ष 2019 में आईसीडी-11 का अनुमोदन किया था, जिसमें जेंडर असंगति को मानसिक विकारों की श्रेणी से स्पष्ट रूप से हटा दिया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का तर्क स्पष्ट था: जेंडर-विविध पहचानों को मानसिक अस्वस्थता के रूप में वर्गीकृत करना गहरे स्तर पर सामाजिक रूढ़ियों को जन्म देता है। यह विधेयक उन्ही रूढ़ियों को कानून के रूप में पुनर्स्थापित करता है, जबकि भारत स्वयं सात वर्ष पहले उस ढांचे का समर्थन कर चुका है, जिसने इसे अस्वीकार किया था।
4. स्व-पहचान की पुनर्स्थापना और चिकित्सकीय बोर्डों का उन्मूलन
यह विधेयक स्व-निर्धारण के अधिकार को छीनता है और जेंडर पहचान के निर्धारण को चिकित्सकीय बोर्डों तथा नौकरशाही जांच-परख के अधीन कर देता है। यह सीधे तौर पर नालसा (2014) के निर्णय और पुट्टस्वामी (2017) में निहित निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है। जेंडर पहचान व्यक्ति के निजी मनोवैज्ञानिक अनुभव के दायरे में आती है। इसे किसी राज्य-नियुक्त निकाय द्वारा मान्य या अमान्य नहीं ठहराया जा सकता है। चिकित्सा पेशेवरों की भूमिका देखभाल प्रदान करने की होती है, न कि व्यक्तिगत पहचान तय करने की।
निजता का यह उल्लंघन केवल पहचान प्रमाणपत्रों तक सीमित नहीं है। संशोधित धारा 7(1A) के तहत अस्पतालों को हर जेंडर-अफर्मिंग सर्जरी का विवरण जिला मजिस्ट्रेट और एक चिकित्सकीय बोर्ड को रिपोर्ट करना अनिवार्य किया गया है। वह भी रोगी की सहमति और किसी नैदानिक औचित्य के बिना। इस जानकारी को आगे किस प्रकार उपयोग किया जाएगा, इस पर भी किसी प्रकार की स्पष्ट सीमा निर्धारित नहीं की गयी है। भारत में किसी अन्य शल्य-चिकित्सा (सर्जिकल) प्रक्रिया के लिए इस प्रकार की राज्य-रिपोर्टिंग अनिवार्य नहीं है। केवल जेंडर-अफर्मिंग सर्जरी को सरकारी निगरानी के लिए चिन्हित करना अपने आप में भेदभावपूर्ण है।
5. धारा 18 में दंडात्मक संशोधनों को समाप्त किया जाए
धारा 18 में प्रस्तावित संशोधनों के तहत किसी व्यक्ति को ‘ट्रांसजेंडर बनने’ के लिए ‘लुभाने’ या ‘मजबूर करने’ पर पांच वर्ष तक के कारावास का प्रावधान किया गया है। भारत में ऐसी किसी घटना के होने का कोई अनुभवजन्य प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इस प्रकार की अस्पष्ट भाषा ट्रांसजेंडर पहचान को अपराध से जोड़ती है और औपनिवेशिक काल के आपराधिक जनजाति अधिनियम (क्रिमिनल ट्राइबल एक्ट), 1871 की उस सोच को दोहराती है, जिसमें पूरे समुदायों को केवल उनकी पहचान के आधार पर जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया जाता था।
मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों ने इसे एक ‘कन्वर्जन थैरेपी’ की दिशा में ले जाने वाले कदम के रूप में चिन्हित किया है। इसके तहत एक ऐसा नियंत्रणकारी ढांचा स्थापित किया जाता है, जिसमें ट्रांस-अनुकूल चिकित्सकों की अनिवार्यता नहीं है और न ही जबरन ‘वॉचफुल वेटिंग’ जैसी पद्धतियों पर कोई प्रतिबंध है।
इस प्रावधान के तहत आपराधिक दायित्व केवल चिकित्सा पेशेवरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सभी पर लागू होता है जो किसी ट्रांस व्यक्ति की पहचान की पुष्टि करते हैं। जैसे एक अभिभावक, जो अपने बच्चे के चुने हुए नाम का उपयोग करता है; एक मित्र, जो उसे अस्पताल ले जाता है; एक शिक्षक, जो उसे सहयोग प्रदान करता है; या चुने हुए परिवार का कोई सदस्य, जो उनका समर्थन करता है।
विकलांग ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए देखभालकर्ता (केयरगिवर) कोई वैकल्पिक सहयोग नहीं हैं। वे विकलांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत एक अनिवार्य और विधिक रूप से मान्यता प्राप्त आधारभूत संरचना का हिस्सा हैं। ऐसे देखभाल संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखना केवल ट्रांसजेंडर अधिकारों का ही उल्लंघन नहीं, बल्कि विकलांगता अधिकारों का भी हनन है।
भारत में अनेक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए चुने हुए परिवार और देखभालकर्ता कोई सामाजिक विकल्प नहीं, बल्कि जीवन जीने की आवश्यक शर्त हैं। उन्हें अपराधी ठहराना संरक्षण नहीं, बल्कि क्रूरता है।
6. समावेशी कानूनी मान्यता
यह विधेयक इंटरसेक्स और ट्रांसजेंडर पहचानों को एक ही परिभाषा में समेट देता है। यानी यह दो अलग-अलग अनुभवों को समान मान लेता है। इसके बाद यह कानूनी मान्यता को केवल चार विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों तक सीमित करता है: हिजड़ा, किन्नर, अरावणी और जोगती। ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिलाएंड, जेंडरक्वियर और नॉन-बाइनरी व्यक्तियों को इससे पूरी तरह बाहर कर दिया गया है, जो नालसा (2014) द्वारा सुनिश्चित स्व-निर्धारण के अधिकार का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
यह समझना आवश्यक है कि इस सीमित दायरे के क्या मायने हैं। ये चार श्रेणियां प्रमुख रूप से सवर्ण-प्रभुत्व वाले हिंदू पौराणिक और सांस्कृतिक ढांचों से ली गई हैं। यह कोई तटस्थ प्रशासनिक निर्णय नहीं है। मुस्लिम, ईसाई, सिख, दलित, बहुजन और आदिवासी समुदायों से आने वाले ट्रांसजेंडर व्यक्ति—जिनकी जेंडर पहचानें पूरी तरह भिन्न सांस्कृतिक शब्दावलियों में अभिव्यक्त होती हैं—इस विधेयक की परिभाषात्मक संरचना में गायब कर दिए गए हैं। कानूनी मान्यता किसी व्यक्ति पर ऐसी सांस्कृतिक रूपरेखा अपनाने की शर्त नहीं थोप सकती, जो उसकी अपनी न हो।

उद्देश्य और कारण कथन में निहित यह धारणा—कि जेंडर-विविध पहचान एक ‘पश्चिमी इंपोर्ट’ है, जिसे विधायी हस्तक्षेप के माध्यम से सुधार की आवश्यकता है—भारतीय अभिलेखों और समुदायों के साथ काम करने वाले इतिहासकारों और मानवशास्त्रियों द्वारा खंडित की जा चुकी है। हिंची (2019) औपनिवेशिक अभिलेखों के आधार पर यह दर्शाते हैं कि जेंडर-विविध समुदायों के सांस्कृतिक स्वरूप और सार्वजनिक भूमिकाएं ब्रिटिश संपर्क से बहुत पहले स्थापित हो चुकी थी। इन्हें अपराध की श्रेणी में रखने का काम स्वदेशी समाज ने नहीं, बल्कि औपनिवेशिक कानून ने किया था। दत्ता और रॉय (2014) यह स्पष्ट करते हैं कि “ट्रांसजेंडर” एक अंतरराष्ट्रीय शब्दावली के रूप में स्वयं एक ‘इंपोर्ट’ है—जबकि उससे जुड़ा अनुभव और सामुदायिक निर्माण कई पीढ़ियों पहले से मौजूद था।
द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित शंकर, राजारामन [कोंडैया] आदि (2022) की टिप्पणी स्पष्ट रूप से यह बताती है कि कठोर जेंडर बाइनरी की अवधारणा ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान लागू की गई थी। इसमें भारत से अपनी ऐतिहासिक जेंडर-विविधता को फिर से अपनाने का आह्वान भी किया गया है। ‘पश्चिमी इंपोर्ट’ की यह दलील केवल ट्रांसमैस्कुलिन पहचानों पर लागू की जाती है, जबकि ट्रांसफेमिनिन पहचानों को इससे बाहर रखा जाता है। यह न केवल मनमानी है, बल्कि बुनियादी रूप से असंगत भी है: यदि हिजड़ा और कोठी समुदायों को स्वदेशी माना जाता है, तो ट्रांसमैस्कुलिन पहचान को ‘विदेशी’ नहीं ठहराया जा सकता।
भारत के 22 राज्यों में 377 ट्रांसमैस्कुलिन प्रतिभागियों के साथ किए गए समुदाय-आधारित अनुभवजन्य अध्ययन (चक्रपाणि आदि, 2024), जिसमें साक्षात्कार हिंदी और मराठी में किए गए, इस तथ्य की पुष्टि करता है कि ये पहचानें भारतीय भाषाओं में, भारतीय सामाजिक संरचनाओं के भीतर अभिव्यक्त होती हैं। यह उस समय से अस्तित्व में हैं, जब इनके लिए कोई बाहरी शब्दावली भी उपलब्ध नहीं थी।
सरकार किसी परिभाषा को सुधार नहीं रही है। वह यह तय कर रही है कि जो लोग आज हमारे बीच हैं, काम करते हैं, परिवारों का पालन-पोषण कर रहे हैं और हमारे समुदायों का हिस्सा हैं, उन्हें हर कानूनी श्रेणी से बाहर कर दिया जाए।
7. वर्तमान चिकित्सा देखभाल का संरक्षण
इस विधेयक की निगरानी-आधारित संरचना और अनिवार्य रिपोर्टिंग की शर्तें ऐसे व्यक्तियों की हार्मोन थेरेपी को बाधित करेंगी, जो पहले से उपचार के मध्य चरण में हैं। हार्मोन उपचार में अचानक व्यवधान से स्पष्ट रूप से प्रमाणित शारीरिक और मानसिक हानि होती है (बेकर एवं अन्य, 2021; गार्सिया गुटिएरेज एवं अन्य, 2024)—जैसे मनोदशा में अस्थिरता, मनोवैज्ञानिक अवसाद (एक्स्ट्रैंड एवं अन्य, 2025), जेंडर डिस्फोरिया की पुनरावृत्ति, तथा हड्डियों के घनत्व पर दीर्घकालिक प्रभाव (जियाकोमेल्ली और मेरिज्जिओला, 2022)।
मदुरै के सरकारी राजाजी अस्पताल में किए गए एक भारतीय सरकारी अध्ययन— जिसमें 3.5 वर्षों तक 842 ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ट्रैक किया गया— में यह पाया गया कि जेंडर-अफर्मिंग हार्मोन थेरेपी अवसाद को मापनीय रूप से कम करती है। ऐसी स्थिति में, कोई भी विधेयक जो इस उपचार को बाधित करता है, उसके विपरीत प्रभाव डालेगा। हम यह मांग करते हैं कि कोई भी विधायी ढांचा किसी भी व्यक्ति के मौजूदा चिकित्सा उपचार को जोखिम में न डाले।
यहां मानवीय लागत केवल काल्पनिक नहीं है। भारत में लगभग 31% ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की मृत्यु आत्महत्या से होती है, जिनमें से लगभग आधे 20 वर्ष की आयु से पहले आत्महत्या का प्रयास कर चुके होते हैं। वे यह कदम अपनी जेंडर पहचान के कारण नहीं, बल्कि कानूनी बहिष्करण, दस्तावेजी बाधाओं और देखभाल से वंचित किए जाने के कारण उठाते हैं। 2789 प्रतिभागियों को शामिल करने वाले 29 सहकर्मी-समीक्षित अध्ययनों (पीयर-रिव्यूड स्टडी) में यह पाया गया है कि जेंडर-अफर्मिंग देखभाल अवसाद और आत्महत्या के जोखिम को उल्लेखनीय रूप से कम करती है। इस विधेयक द्वारा हटाई जा रही प्रत्येक सुरक्षा-व्यवस्था, आत्महत्या-निवारण के एक सशक्त तंत्र को कमजोर करती है।
8. विधायी प्रक्रिया (लेजिस्लेशन) से पहले साक्ष्य (एविडेंस)
सरकार तर्क के रूप में ‘कल्याणकारी योजनाओं के दुरुपयोग’ का हवाला दे रही है। लेकिन उनके अपने आंकड़े ही इस दावे का खंडन करते हैं।
ये हमारे नहीं, बल्कि स्वयं सरकार के आंकड़े हैं:
- वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 4,90,000 की आबादी वाले समुदाय के लिए केवल लगभग 30,000 पहचान प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं — जो अनुमानित जनसंख्या का 10% से भी कम है।
- कई राज्यों और विभिन्न वित्तीय वर्षों में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत केवल 800 ट्रांसजेंडर लाभार्थियों का ही रिकॉर्ड दर्ज किया गया, जबकि ट्रांस व्यक्तियों को प्राथमिकता समूह में शामिल किया गया है।
- वर्ष 2021 से वर्ष 2026 के बीच ‘स्माइल’ योजना के अंतर्गत आवंटित 365 करोड़ रुपये में से अप्रैल 2025 तक 7 करोड़ रुपये से भी कम का उपयोग किया गया है (डिजिटल संसद, 2025)।
इन आंकड़ों से कहीं भी ऐसा नजर नहीं आता कि एक समुदाय लाभों का संचय कर रहा हो। बल्कि ये एक ऐसे समुदाय की वास्तविकता सामने रखते हैं, जिसे उन योजनाओं तक व्यवस्थित रूप से पहुंच से वंचित रखा गया है, जो केवल कागजों पर मौजूद हैं। असल समस्या कल्याणकारी योजनाओं तक अत्यधिक पहुंच की नहीं, बल्कि उस पहुंच के लगभग पूर्ण अभाव की है, जिसका वादा किया गया था। यदि सरकार के पास बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी के कोई प्रमाण हैं, तो हम यह मांग करते हैं कि आगे की किसी भी विधायी कार्रवाई से पहले वह डेटा सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया जाए।
9. आवास और परिवार के अधिकार का संरक्षण
वर्ष 2019 के अधिनियम ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपने परिवार के साथ रहने का अधिकार प्रदान किया था और जहां यह सुरक्षित या संभव न हो, वहां न्यायालय के आदेश से पुनर्वास केंद्र में जगह दिए जाने का अधिकार भी सुनिश्चित किया था। यह विधेयक ‘ट्रांसजेंडर’ की परिभाषा को पुनर्परिभाषित करते हुए उन व्यक्तियों से यह संरक्षण छीन लेता है, जिन्हें अब इसकी परिधि में नहीं माना जाएगा। ऐसे व्यक्तियों के पास अब अपने घर में बने रहने का कोई कानूनी अधिकार, बेदखली के विरुद्ध कोई उपाय, या कोई संस्थागत विकल्प उपलब्ध नहीं होंगे।
हम यह मांग करते हैं कि किसी भी संशोधित ढांचे में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के सुरक्षित आवास के अधिकार को समाप्त करने के बजाय उसे संरक्षित और सुदृढ़ किया जाए।
10. विकलांग ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का संरक्षण
विकलांगजन अधिकार अधिनियम, 2016, संयुक्त राष्ट्र के विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर अभिसमय के अनुरूप, सभी विकलांग व्यक्तियों के लिए सुलभ सेवाओं और व्यक्तिगत स्वायत्तता, जिसमें अपने निर्णय स्वयं लेने की स्वतंत्रता शामिल है, की गारंटी देता है। यह विधेयक इन संरक्षणों का प्रत्यक्ष विरोध करता है।
विधेयक के तहत एक बहु-स्तरीय प्रमाणन प्रक्रिया—जिसमें चिकित्सकों, जिला मजिस्ट्रेट और एक चिकित्सकीय बोर्ड से मान्यता लेना आवश्यक है— साथ मिलकर ऐसी बाधा बनती है, जिसका सबसे अधिक प्रभाव विकलांग ट्रांसजेंडर व्यक्तियों पर पड़ता है। कई लोग शारीरिक रूप से विभिन्न प्राधिकरणों के समक्ष उपस्थित होने में सक्षम नहीं होते हैं। कई ऐसे भी हैं, जो इस विधेयक के तहत कानूनी मान्यता से जुड़ी चिकित्सा प्रक्रियाओं तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। जहां विकलांगजन अधिकार अधिनियम पहुंच को सरल बनाने की अपेक्षा करता है, वहीं यह विधेयक उन बाधाओं की संख्या बढ़ा देता है, जिन्हें पार किए बिना कोई विकलांग व्यक्ति कानून की दृष्टि में मान्यता प्राप्त नहीं कर सकता।
इस विधेयक में ट्रांसजेंडर की संकीर्ण और चिकित्सकीय परिभाषा उन व्यक्तियों को भी बहिष्कृत कर देती है, जिनकी विकलांगता उन्हें उन प्रक्रियाओं तक पहुंचने या उन्हें पूरा करने से रोकती है, जिन्हें यह विधेयक पहचान का प्रमाण मानता है। यह कोई गैर-इरादतन परिणाम नहीं है। बल्कि यह उस संरचनात्मक सोच का नतीजा है, जिसमें एक कानूनी श्रेणी को जैव-चिकित्सकीय मानदंडों की सूची, यानी एक बायोमेडिकल चेकलिस्ट तक सीमित कर दिया गया है।
हम यह मांग करते हैं कि कोई भी संशोधित ढांचा विकलांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 का पूर्णत पालन सुनिश्चित करे, प्रमाणन प्रक्रियाओं को शारीरिक और प्रक्रियात्मक रूप से सुलभ बनाए, और यह गारंटी दे कि किसी भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को उसकी विकलांगता के आधार पर कानूनी मान्यता से वंचित नहीं किया जाएगा।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति पहले से ही बुनियादी अधिकारों तक अत्यंत सीमित सुलभता के साथ जीने के लिए विवश हैं। यह विधेयक उस स्थिति को और चिंताजनक बनाता है। जब तक हम लोगों को अपने शरीर और पहचान पर स्वायत्तता से वंचित रखते हैं, तब तक न्याय का दावा नहीं किया जा सकता।
“ट्रांस अधिकार आत्महत्या की रोकथाम हैं। इस विधेयक द्वारा समाप्त की जा रही हर कानूनी सुरक्षा, एक जीवन को जोखिम में डाल सकती है।”
हम अपनी संवैधानिक गरिमा, निजता के अधिकार और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपने वैध समावेशन के संरक्षण की मांग बुलंद करते हैं। हम हर उस ट्रांसजेंडर, इंटरसेक्स और जेंडर-विविध व्यक्ति के साथ खड़े हैं, जिसकी पहचान को इस विधेयक से खतरा है।
हम सड़कों पर हैं, क्योंकि कानून का इस्तेमाल उन लोगों के खिलाफ हथियार के रूप में नहीं होना चाहिए, जिनकी रक्षा का वह दावा करता है। जो अधिकार एक बार हासिल किए गए हैं, उन्हें बिना संघर्ष के छीना नहीं जा सकता।
#NoGoingBack
इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें।
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लेखक के बारे में
- मुंबई एक्शंस कलेक्टिव, मुंबई, नवी मुंबई और ठाणे से जुड़े एलजीबीटीक्यूआईए+ तथा जेंडर-विविध व्यक्तियों, सहयोगी संगठनों और स्वास्थ्य पेशेवरों का एक सामूहिक संगठन है।
