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विरोध के दौर में एकजुटता के क्या मायने हैं?

एक दशक के फ़ासले पर हुए दो विरोध प्रदर्शन, और दोनों को जोड़ती एक सामूहिक डोर। क्योंकि साथ खड़े होना सिर्फ़ विरोध करना नहीं, मुश्किल वक़्त में एक-दूसरे का सहारा बनना भी है।
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हाल ही में दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शन इस बात की तस्दीक करते हैं कि एकजुट होने का मतलब सिर्फ़ सड़कों पर उतरना नहीं है। इसका एक मतलब यह भी है कि जब अपनी बात कहने या हक़ मांगने की जगह ही महफूज़ न रहे, तब लोग एक-दूसरे का साथ कैसे देते हैं।

बीते कुछ हफ्तों में तमाम अनजान चेहरे एक-दूसरे के साथ खड़े नज़र आए हैं। फिर बात महिला छात्रों को पुलिस की लाठियों से बचाने के लिए उनके चारों ओर मानव-श्रृंखला बनाते युवाओं की हो, ऑनलाइन निशाना बनाई जा रही महिलाओं के समर्थन में एकजुट होने वाले लोगों की या प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस की बर्बरता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले लोगों की। कई लोग मुफ़्त कानूनी और पेशेवर मदद दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी बहुत से लोग बुनियादी अधिकारों की जानकारी साझा कर रहे हैं, बता रहे हैं कि हिरासत में लिए जाने पर क्या करना चाहिए और मदद के लिए किससे संपर्क करना चाहिए। इन सबके बीच, शांतिपूर्ण और सुरक्षित तरीके से विरोध कैसे किया जाए, इस पर भी बातचीत हो रही है।

पिछले कुछ महीनों में मैंने देखा कि एक-दूसरे की मदद करने का यह सिलसिला उन जगहों तक भी पहुंच गया, जिनका विरोध प्रदर्शनों से कोई लेना-देना नहीं था। मसलन, नौकरियों की जानकारी साझा करने वाला एक ग्रुप, जिसकी मैं सदस्य थी। आम तौर पर वहां सिर्फ़ नौकरियों के बारे में जानकारी साझा की जाती थी। लेकिन अचानक लोग उस ग्रुप में हेल्पलाइन नंबर, कानूनी जानकारी और सुरक्षा से जुड़े संसाधन साझा करने लगे। किसी ने उनसे ऐसा करने को नहीं कहा था। न कोई औपचारिक व्यवस्था थी, न कोई संगठन इस काम को दिशा दे रहा था। लोगों ने बस यह महसूस किया कि किसी को मदद की ज़रूरत हो सकती है, और वे अपने आप आगे आ गए।

मेरे लिए एक-दूसरे की इस तरह देखभाल करना ही सामूहिकता का सबसे सशक्त चेहरा है। यह कोई तय ढांचा नहीं है, जिसे किसी आंदोलन के बाद बैठकर समझाया जाए या उस पर थोप दिया जाए। यह एक सहज भावना है, जो लोगों को एक-दूसरे के लिए खड़े होने के लिए प्रेरित करती है। खासतौर से तब, जब उन्हें एहसास होता है कि सुरक्षित रहना, उम्मीद बनाए रखना और साथ बने रहना भी संघर्ष का हिस्सा है।

मुझे यह बात पहली बार तक़रीबन एक दशक पहले समझ आई थी। आज जहां लोग सड़क पर उतरकर अपने हक़ के लिए आवाज़ बुलंद कर रहे हैं, उससे चंद ही मील की दूरी पर मैंने भी अपने हिस्से का मुश्किल दौर देखा था।

दीवारों पर लिखी इबारत 

मार्च 2015 में, मैंने कॉलेज के तीन दोस्तों के साथ मिलकर अपने कैंपस में ‘पैड्स अगेंस्ट सेक्सिज़्म’ नाम से एक गुमनाम कैंपेन शुरू किया। हमने पूरे विश्वविद्यालय परिसर में सैनिटरी पैड लगाए, जिन पर पितृसत्तात्मक सोच और लैंगिक हिंसा के ख़िलाफ़ संदेश लिखे थे। कुछ ही दिनों में प्रशासन ने उन पैड्स को हटा दिया। लेकिन हमारा अभियान तेज़ी से फैलता गया। पहले दिल्ली के दूसरे विश्वविद्यालयों तक, फिर देशभर के कैंपसों तक और आख़िरकार राष्ट्रीय मीडिया ने भी इसे जगह दी।

इसके कुछ ही समय बाद, विश्वविद्यालय ने हमें कारण बताओ नोटिस थमा दिया। मैं उस वक्त के बारे में ईमानदारी से बताना चाहती हूं कि असल में वह दौर कैसा था। आज इस पूरे प्रसंग को हमारी जीत के तौर पर याद किया जाता है, लेकिन जब हम इससे गुज़र रहे थे, तब ऐसा बिल्कुल नहीं था।

जब आपकी डिग्री पूरी होने में कुछ ही समय बचा हो और यूनिवर्सिटी से नोटिस आ जाए, तो समझ नहीं आता कि आगे क्या होगा। दिमाग़ में बस यही चलता है कि बात कितनी बिगड़ सकती है। क्या मुझे कॉलेज से निकाल दिया जाएगा? क्या इसका असर मेरी आगे की पढ़ाई पर पड़ेगा? क्या मैंने माहवारी पर बात करने की कोशिश में अपनी डिग्री दांव पर लगा दी थी? मुझे आज भी उस बेचैनी का एहसास याद है। एक ऐसी घबराहट, जो संस्थान की चारदीवारी से बाहर हर वक़्त आपके अंदर गूंजती रहती है।

समुदाय अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई में चुप रहना सीख लेते हैं। यह सीख माता-पिता से बच्चों तक, दोस्तों के बीच और उन छोटी-छोटी हिदायतों के ज़रिए आगे बढ़ती है, जिन्हें कभी बाक़ायदा नियमों की शक्ल नहीं दी जाती।

और फिर कुछ ऐसा हुआ, जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी। शहर में सक्रिय कई सामाजिक आंदोलनों से जुड़े लोगों ने हमसे संपर्क किया। पत्रकारों ने स्वतंत्र रूप से हमारी कहानी कवर करने के लिए हमसे बात की। वकीलों ने बिना कोई फीस लिए हमें अपना समय दिया और कारण बताओ नोटिस का जवाब तैयार करने में हमारी मदद की। यह 2015 की बात है, जब सोशल मीडिया आज जैसा नहीं था। हमें जो मदद मिली, उसका बड़ा हिस्सा सीधे लोगों के ज़रिए आया। किसी ने कहीं हमारा नाम सुना था, तो कोई हमारे जानकारों से मिला था। इस तरह एक-दूसरे के ज़रिए लोग हम तक पहुंचते गए। कैंपस में ऐसे सीनियर भी हमसे संपर्क करने लगे, जिनसे हमारी पहले कभी बात तक नहीं हुई थी। हमारे साथ पढ़ने वाले छात्रों ने कैंपेन के ज़रिए शुरू हुई बातचीत के लिए हमें धन्यवाद दिया। यूनिवर्सिटी के अंदर बहुत से कॉलेजों में भी हमारी पहल की चर्चा होने लगी।

ज़रा सोचिए। चार बेहद जुनूनी लेकिन सहमे हुए युवाओं को रातोंरात ऐसे लोगों का साथ मिला, जो उनके साथ आ खड़े हुए। उन लोगों पर हमारा साथ देने की कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी। वे ऐसा इसलिए कर रहे थे, क्योंकि हमारी आवाज़ में उन्हें अपनी कहानी का भी कुछ हिस्सा दिख रहा था। वे अनुभवी थे और जानते थे कि आंदोलन इसी तरह ज़िंदा रहते हैं।

बीते कई सालों में मैंने यही सबक अपने साथ रखा है: प्रतिरोध को लोगों के आपसी रिश्तों से ताक़त मिलती है। इसका मतलब यह नहीं है कि लोगों के साथ आने से डर ग़ायब हो जाता है। लेकिन जब पता हो कि उसका बोझ अकेले नहीं उठाना है, तो उसे सहना ज़रूर आसान हो जाता है।

गौरतलब है कि हमारे आस-पास एकजुटता और मदद का दायरा बढ़ रहा था और नए रिश्ते भी बन रहे थे। लेकिन हमारे सबसे क़रीबी लोगों की प्रतिक्रिया इससे बिल्कुल अलग थी। हमने जो किया, क्या वह सही था? यह सवाल नज़रअंदाज़ करना मुश्किल था। बीस साल की उम्र में हमने अपने विचारों के लिए क़दम तो उठा लिया था, लेकिन तब हमें यह इल्म नहीं था कि इस तरह आवाज़ उठाने की कितनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी थी कि हमारे आसपास के हालात तेज़ी से बदल रहे थे।

घर से बाहर की दुनिया का सिमटना 

हमारे घरों के अंदर तनाव का माहौल बढ़ रहा था। ऐसा नहीं है कि हमारे परिवार और दोस्त हमारे ख़िलाफ़ थे। वे बस हैरान थे कि इतने सारे मुद्दों में से हमने यही मुद्दा क्यों चुना? और इस बारे में सबके सामने बोलने की क्या ज़रूरत है? उनकी चिंता यह नहीं थी कि ‘तुम ग़लत हो’, बल्कि यह थी कि अब ‘तुम सबकी नज़र में आ गई हो।’ मुझे पहली बार समझ आया कि एक ही दुनिया को लोग कितने अलग-अलग नज़रियों से समझ सकते हैं। और यह भी कि हमें क्या कहना चाहिए और क्या नहीं, यह तय करने के लिए हम सरकारी तंत्र या किसी आधिकारिक चिट्ठी के मोहताज़ नहीं हैं।

बीस की उम्र के दशक में मैंने राजनीतिक माहौल को बदलते देखा। मैंने देखा कि मेरे आसपास के लोग धीरे-धीरे चुप होते जा रहे थे। उनमें वैचारिक स्तर पर कोई बदलाव नहीं था, लेकिन खुलकर अपनी बात कहने का जोखिम बढ़ चुका था। हम अक्सर देखते हैं कि समुदाय अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई में चुप रहना सीख लेते हैं। यह सीख माता-पिता से बच्चों तक, दोस्तों के बीच और उन छोटी-छोटी हिदायतों के ज़रिए आगे बढ़ती है, जिन्हें कभी बाक़ायदा नियमों की शक्ल नहीं दी जाती। नाम बदल लो। कपड़े बदल लो। बोलने का लहज़ा बदल लो। उस रूप में रहो, जिसे लोग आसानी से स्वीकार कर लें—जो किसी का ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान न खींचे।

मैंने बीते कुछ सालों से मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम किया है और देशभर के संगठनों के साथ मिलकर कई कार्यक्रम तैयार किए हैं। इस अनुभव के आधार पर मुझे लगता है कि इस पहलू पर मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर बहुत कम बात होती है, जबकि यह वाक़ई मानसिक स्वास्थ्य का सवाल है। हाशिये पर रहने वाले समुदाय अक्सर अपने मानसिक स्वास्थ्य की बदतर स्थिति के बारे में बात करते रहे हैं। इस अंतर को सिर्फ़ सामाजिक-आर्थिक असमानताओं के सहारे पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।

जब आप रोज़मर्रा की ज़िंदगी में खुद को लगातार ऐसे पेश करते हैं, जिससे दूसरों को कोई परेशानी न हो, तो इसकी कीमत भी आपको चुकानी पड़ती है। इसकी वजह कोई एक घटना नहीं होती। यह रोज़मर्रा के अनुभवों के साथ धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। मिसाल के तौर पर, दिल्ली में मुस्लिम छात्रों पर हुए 2024 के एक अध्ययन में एक छात्रा ने बताया कि कैसे उसने जानबूझकर अपनी भाषा बदल ली थी। वह इस्लाम से जुड़ी उन अभिव्यक्तियों का इस्तेमाल करने से बचने लगी थी, जो उसके लिए सहज थी। इसके बजाय, उसने ऐसी शब्दावली अपनाई जिसे ज़्यादा पश्चिमी माना जाता है। ऐसा उसने इसलिए किया ताकि लोग उसके बारे में बनी-बनाई धारणाओं के आधार पर राय न बनाएं और उसके साथियों को भी उसके साथ सहज महसूस हो। मैं ऐसे न जाने कितने लोगों को जानती हूं, जो ऐसा करते हैं। मैं खुद भी उनमें से एक हूं।

शायद इसीलिए मानसिक स्वास्थ्य का सवाल राजनीतिक भी है। जब किसी को दूसरों के बीच अपनी जगह बनाने के लिए खुद को बदलना पड़े, तो यह उसकी व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक परिस्थितियों का नतीजा है।

पुलिस बैरिकेड पर बैठे कुछ लोग_प्रदर्शन
चार बेहद जुनूनी लेकिन सहमे हुए युवाओं को रातोंरात ऐसे लोगों का साथ मिला, जो उनके साथ आ खड़े हुए। | चित्र साभार: कायनात

अपनी पहचान को साथ लेकर एक-दूसरे के साथ खड़े होना

2015 के बाद मैंने आंदोलनों में आयोजक से सहभागी की भूमिका अपना ली। मैं लगातार प्रदर्शनों में शामिल होती थी, लेकिन अब मेरा नज़रिया बदल चुका था। मुझे जोखिमों का पहले से ज़्यादा एहसास था और बीस साल की उम्र में उमड़ने वाला बेपनाह, कुछ हद तक बेपरवाह आत्मविश्वास भी अब कम हो गया था।

और फिर जुलाई 2026 में, जब मैं विरोध प्रदर्शनों के बीच लोगों के हुजूम के साथ खड़ी थी, तो मैंने कई प्रदशनकारियों को वह सब करते देखा, जिसके ठीक उलट करने की हमें आदत डाल दी गई है। वहां मौजूद लोग अपनी असल पहचान को छुपा नहीं रहे थे। वे ख़ुद को दूसरों की सहूलियत के हिसाब से बदलकर पेश नहीं कर रहे थे। दिल्ली का ऐसा रूप मैंने काफ़ी समय से नहीं देखा था। मेरे आसपास युवा छात्र तनावपूर्ण माहौल को थोड़ा हल्का करने के लिए रील बना रहे थे। महिलाएं बिना किसी डर के अपनी आवाज़ उठा रही थी। लोग एक-दूसरे के लिए ऐसा माहौल बना रहे थे, जहां सुरक्षित महसूस किया जा सके। वे यह भी सुनिश्चित कर रहे थे कि मेरे जैसे अकेले आए प्रदर्शनकारियों को अकेला न रहना पड़े। लोग अनजान प्रदर्शनकारियों के लिए प्रदर्शन स्थल पर खाना भिजवा रहे थे और रेस्तरां भी प्रदर्शनकारियों के लिए अपने दरवाज़े खोल रहे थे।

जब लोग एक साथ होते हैं, तो एक-दूसरे की देखभाल करना अपने आप में सबसे सहज बात लगती है।

मिसाल के तौर पर मुझे जुनैद याद आते हैं, जो अपनी मूल पहचान के साथ पूरी सहजता से विरोध स्थल पर मौजूद रहे और प्रदर्शनकारियों को खाना बांटते रहे। मुझे यह भी याद है कि वहां शामिल होने की वजह से उन्हें किस हद तक कार्रवाई का सामना करना पड़ा। इस घटना की खबर के सामने आने पर लोगों ने ऑनलाइन एकजुट होकर उनकी आवाज़ को दूर तक पहुंचाया और उनके समर्थन में बात रखी।

लोगों का इस तरह खुलकर सामने आना महज़ संयोग नहीं था। विरोध प्रदर्शन ने ही इसके लिए जगह बनाई थी। लोग अपने पूरे व्यक्तित्व के साथ वहां मौजूद थे, क्योंकि उनके चारों ओर एकजुटता का ऐसा घेरा था, जिसमें वे ख़ुद को सुरक्षित महसूस कर सकते थे।

कुछ महीने पहले जब मैं इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने पहुंची, तब तक मैं बरसों से ख़ुद को काबू में रखना, अपनी मौजूदगी को सीमित करना और इस तरह पेश आना सीख चुकी थी कि दूसरे मुझे आसानी से समझ सकें और मुझसे ख़तरा महसूस न करें। फिर एक दिन मैं हज़ारों लोगों की भीड़ में खड़ी थी और उनके साथ नारे लगा रही थी। जब ऐसा होता है, तो आपके भीतर कुछ बदल जाता है। आप अपने असली रूप में लौटने लगते हैं। एक ऐसा एहसास, जिसे उस इंसान को समझाना बेहद मुश्किल है, जिसे कभी इसकी ज़रूरत ही महसूस न हुई हो।

देखभाल यह संभव बनाती है। वह आपको नुक़सान से बचाती है और आपको इतनी जगह देती हैं कि आप हर पल ख़ुद को दूसरों के हिसाब से ढालने की कोशिश छोड़ सकें।

इन विरोध स्थलों पर ये दोनों बातें देखने को मिली। देखभाल इस बात में दिखती थी कि किसी को सांस लेने के लिए जगह चाहिए होती, तो भीड़ ख़ुद-ब-ख़ुद उसके लिए रास्ता बना देती। लोग पानी की बोतलें, खाना और फ़ोन चार्ज करने के लिए चार्जर साझा कर रहे थे। मदद के लिए कोई न कोई हमेशा मौजूद रहता था।

मेरी एक दोस्त अकेले प्रदर्शन में गई थी। उस इलाके में इंटरनेट बंद कर दिया गया था, इसलिए मुझे उसकी चिंता हो रही थी। मैं फ़ोन पर उसके साथ बनी रही, जब तक वह विरोध स्थल तक नहीं पहुंच गई। वहां पहुंचने के बाद कुछ लड़कियों ने उसे अपने साथ ले लिया। उन्होंने एक ऐसी जगह पर सहज होने में उसकी मदद की, जहां वह किसी को नहीं जानती थी। 

जब कुछ महिलाओं ने नारेबाज़ी की अगुवाई की, तो दूसरे लोग उनके आसपास इकट्ठा हो गए। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि महिलाओं को बोलने और अपनी बात पर डटे रहने के लिए पर्याप्त जगह मिले, जबकि बाकी लोग उनकी बात सुनते रहे। और जब कुछ इलाक़ों में पुलिस के लाठीचार्ज की ख़बरें आई, तो जानकारी तेज़ी से भीड़ में फैलने लगी। लोगों को बताया जा रहा था कि लाठीचार्ज कहां हो रहा है और किन जगहों पर जाना ज़्यादा सुरक्षित होगा।

ये युवा बिना किसी फंडिंग या तय ढांचे के ज़मीन पर ऐसे सहयोग तंत्र खड़े कर रहे थे, जिनके बारे में हम आम तौर पर सालों तक प्रस्ताव लिखते रहते हैं। वे ऐसा इसलिए नहीं कर रहे थे कि उन्हें मनो-सामाजिक सहयोग देने का प्रशिक्षण मिला था। वे ऐसा इसलिए कर रहे थे क्योंकि वे एक साथ थे। और जब लोग एक साथ होते हैं, तो एक-दूसरे की देखभाल करना अपने आप में सबसे सहज बात लगती है।

यह लेखक के निजी विचार हैं।

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लेखक के बारे में

  • कायनात इंडिया मेंटल हेल्थ अलायंस में अलायंस और एंगेजमेंट लीड हैं। यहां वे अलग-अलग क्षेत्रों के बीच सहयोग बढ़ाने और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े तंत्र को मज़बूत बनाने की दिशा में काम करती हैं। उन्हें कार्यक्रमों, साझेदारियों, ग्रांट मेकिंग, फंड जुटाने, संचार और रणनीति के क्षेत्र में 11 साल से अधिक का अनुभव है। इससे पहले वे लिव लव लाफ़ फ़ाउंडेशन, द हंस फ़ाउंडेशन और क्रिया के साथ काम कर चुकी हैं। मानसिक स्वास्थ्य, जेंडर और देखभाल तक पहुंच उनके काम के प्रमुख क्षेत्र हैं। वे इस बात पर भी ध्यान देती हैं कि ये तीनों मुद्दे एक-दूसरे से किस तरह जुड़े हुए हैं।
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