पंचायत

सरपंच और पंचायत: सिर्फ कप्तान नहीं, पूरी टीम को तैयार करना होगा

पंचायती राज संस्थाओं को मज़बूत करने का मतलब सिर्फ ग्राम पंचायतों को बेहतर करना नहीं है। इसके लिए उनके साथ जुड़े पूरे तंत्र को मज़बूत करना होगा।
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“मैं अपने गांव के बारे में जानती हूं। लेकिन जब भी बात बजट, नियमों या सरकारी प्रक्रियाओं की आती है, मुझे [गांव के] सचिव पर निर्भर रहना पड़ता है।” यह सीहोर ज़िले की एक महिला सरपंच के शब्द हैं, जो पंचायती राज की एक बड़ी चुनौती को उजागर करते हैं।

यह सरपंच अनुभवहीन नहीं हैं। वह अपने समुदाय में इकलौती महिला हैं, जिन्होंने 12वीं तक पढ़ाई की है। उन्होंने एक दशक से भी ज़्यादा समय तक अपने स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) के ज़रिए मिड-डे मील कार्यक्रम संभाला है। उनके पास समुदाय का मज़बूत समर्थन है और सरपंच के चुनाव में उन्होंने छह पुरुष उम्मीदवारों को हराया था। फिर भी, चुनाव जीतने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि सिर्फ आत्मविश्वास और समुदाय से रिश्ते के भरोसे नेतृत्व नहीं किया जा सकता। इसके लिए उन्हें बजट, सरकारी दिशानिर्देश, डिजिटल पोर्टल, योजना बनाने की प्रक्रिया, खरीद से जुड़े नियम और विभागीय प्रक्रियाओं को भी समझना ज़रूरी है।

यह सिर्फ एक सरपंच का अनुभव नहीं है। पूरे देश में ग्राम पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधियों से स्थानीय सरकार की तरह काम करने की उम्मीद की जाती है, लेकिन उनके लिए बने सहयोगी तंत्र अब भी क्षमता निर्माण, यानी कैपेसिटी बिल्डिंग को एक बार होने वाली ट्रेनिंग के तौर पर देखते हैं।

पंचायती राज के 73वें संविधान संशोधन के तीन दशक बाद भारत ने विश्व में ज़मीनी स्तर पर लोकतंत्र की सबसे बड़ी व्यवस्थाओं में से एक तैयार की है। पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) में 30 लाख से ज़्यादा निर्वाचित प्रतिनिधि काम कर रहे हैं, जिनमें करीब आधी महिलाएं हैं। लेकिन सिर्फ प्रतिनिधित्व मिल जाने से ग्राम पंचायत को बेहतर ढंग से चलाने के लिए ज़रूरी प्रबंधन और नेतृत्व क्षमता अपने आप विकसित नहीं हो जाती।

यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि आज ग्राम पंचायतों की ज़िम्मेदारियां पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई हैं। 16वें वित्त आयोग ने 2026–31 के लिए ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए 4.35 लाख करोड़ रुपये की सिफारिश की है। इसका एक बड़ा हिस्सा सीधे ग्राम पंचायतों को मिलेगा। ख़ास बात यह है कि इस अनुदान का एक हिस्सा पंचायतों के प्रदर्शन से जुड़ा होगा। पंचायतों से अपने स्तर पर राजस्व बढ़ाने, खातों का सही रखरखाव करने, ऑडिट से जुड़ी ज़रूरतों को पूरा करने और संस्थागत प्रदर्शन बेहतर करने की उम्मीद की जाएगी। यानी अब उनसे जवाबदेह स्थानीय सरकारों की तरह काम करने की अपेक्षा की जा रही है।

ऐसे में कैपेसिटी बिल्डिंग का मौजूदा ढांचा विकेंद्रीकरण के इस नए दौर के लिए पर्याप्त नहीं है। निर्वाचित प्रतिनिधि आमतौर पर ब्लॉक या ज़िला स्तर पर होने वाले कुछ प्रशिक्षण सत्रों में हिस्सा लेते हैं। इन प्रशिक्षण सत्रों में आमतौर पर सरकारी योजनाओं, आधिकारिक निर्देशों, रिपोर्ट के फॉर्मेट और लक्ष्यों पर ही ज़्यादा जोर रहता है। वहीं, लोगों की भागीदारी से योजना बनाना, ग्राम सभा को प्रभावी ढंग से चलाना, वित्तीय फैसले लेना, जेंडर को ध्यान में रखकर शासन करना, समुदाय को साथ जोड़ना और स्थानीय समस्याओं का समाधान करना जैसे ज़रूरी पहलुओं पर कम ध्यान दिया जाता है।

जब तक निर्वाचित प्रतिनिधि संस्थाओं के बीच के संबंधों और सरकारी प्रक्रियाओं को समझना शुरू करते हैं, तब तक उनके पांच साल के कार्यकाल का एक बड़ा हिस्सा बीत चुका होता है। नतीजतन, कई प्रतिनिधि फंड हासिल करने, लोगों तक सरकारी लाभ पहुंचाने और ऐसे ही दूसरे कामों के लिए पंचायत सचिवों और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों पर निर्भर हो जाते हैं। मध्य प्रदेश में हमारे ज़मीनी अनुभव बताते हैं कि कैपेसिटी बिल्डिंग तभी सार्थक होती है, जब वह सिर्फ प्रशिक्षण तक सीमित न रहे, बल्कि पंचायतों के रोज़मर्रा के कामकाज का हिस्सा बने।

कैपेसिटी बिल्डिंग से संस्थाओं को सशक्त बनाएं

सीहोर में महिलाओं और निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ योजना बनाने की सहभागी प्रक्रिया के दौरान कई ऐसे मुद्दे सामने आए, जिनका संबंध सिर्फ बुनियादी ढांचे से नहीं था। उदाहरण के लिए, अगर लड़कियों की पढ़ाई जारी रखनी है, तो इसके लिए माता-पिता से बातचीत, सुरक्षित आवाजाही की व्यवस्था, स्कूल के शिक्षकों के साथ मिलकर काम करना और महिला समूहों का सहयोग ज़रूरी होता है। शौचालय बनाना आसान है, लेकिन उसका इस्तेमाल और रखरखाव सुनिश्चित करने के लिए लोगों की आदतों, सोच और जवाबदेही में बदलाव ज़रूरी है। इसी तरह, पीने के पानी की व्यवस्था बनायी जा सकती है, लेकिन उसकी नियमित आपूर्ति के लिए स्थानीय स्तर पर निगरानी, मरम्मत की व्यवस्था, शुल्क वसूली और समुदाय की भागीदारी ज़रूरी होती है। ये सब शासन से जुड़े सवाल हैं। इन्हें सिर्फ तकनीकी प्रशिक्षण के ज़रिए हल नहीं किया जा सकता।

“मैं अपने गांव के बारे में जानती हूं। लेकिन जब भी बात बजट, नियमों या सरकारी प्रक्रियाओं की आती है, मुझे [गांव के] सचिव पर निर्भर रहना पड़ता है।”

बड़वानी ज़िले में समर्थन ने महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के साथ मिलकर शिक्षा, स्वास्थ्य और शासन से जुड़े मुद्दों पर काम करने के लिए महिला नेतृत्व का एक समूह तैयार किया। इन्हें बदलाव की अगुआई करने वाली महिलाओं के तौर पर प्रशिक्षित किया गया। दूसरे जिलों में लड़के-लड़कियों को जल मित्र या पंचायत मित्र के रूप में तैयार किया गया, ताकि वे ग्राम पंचायतों को ज़रूरी सहयोग दे सकें। इन सामुदायिक नेताओं को ग्राम सभा की शक्तियों, पंचायत के कामकाज, स्कूल प्रबंधन, आंगनवाड़ी सेवाओं, पेयजल व्यवस्था और सरकारी योजनाओं के हक़ जैसे विषयों की जानकारी दी गई। इसके लिए एक-दो बार प्रशिक्षण आयोजित करने के बजाय, हर महीने होने वाली एसएचजी बैठकों को ऐसा मंच बनाया गया जहां हर बार एक मुद्दे पर चर्चा होती, आगे की कार्रवाई की योजना बनती और पिछले काम की समीक्षा की जाती।

कई महिला पंच (वार्ड सदस्य) और अलग-अलग स्थायी समितियों की सदस्य भी एसएचजी से जुड़ी थी। इससे निर्वाचित प्रतिनिधियों और समुदाय में सक्रिय महिला नेतृत्व के बीच बेहतर जुड़ाव बना। एक ऐसी स्थानीय प्रक्रिया तैयार हुई, जिसमें महिलाएं सवाल पूछ सकती थी, अपनी समस्याएं पंचायत के सामने रख सकती थी और उन्हें हल करने की प्रक्रिया में हिस्सा ले सकती थी।

छतरपुर ज़िले में महिलाओं ने घरेलू हिंसा और जेंडर आधारित भेदभाव जैसे मुद्दों पर एसएचजी की बैठकों में चर्चा की। ऐसे मुद्दों को अक्सर निजी मामला मानकर ग्राम पंचायतों की औपचारिक भूमिका से बाहर रखा जाता है। लेकिन संविधान के मुताबिक पंचायतों की ज़िम्मेदारियों में आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय भी शामिल हैं।

ग्रामीण लोगों का एक समूह पंचायत में जुटा है_ग्राम पंचायत
ग्रामीण परिवेश में नेतृत्व करने के लिए लोगों को साथ लेकर चलने, बातचीत करने, विवाद सुलझाने और समुदाय को एकजुट करने जैसे कौशल सीखने की ज़रूरत है। | चित्र साभार: पेक्सेल्स

इन अनुभवों से पता चलता है कि कैपसिटी बिल्डिंग को सिर्फ प्रशिक्षण के बजाय संस्थाओं को मज़बूत करने की प्रक्रिया के तौर पर समझना जरूरी है। सिर्फ सरपंच को प्रशिक्षित करना काफी नहीं है। ग्राम पंचायत के आसपास मौजूद पूरे तंत्र को सशक्त बनाना होगा। इसके लिए पंचायती राज संस्थाओं के प्रशिक्षण से जुड़े अलग-अलग हितधारक कुछ कदम उठा सकते हैं:

1. उपयोगी प्रशिक्षण सामग्री तैयार करें

सरकार की प्रशिक्षण व्यवस्था को मज़बूत करने के लिए कुछ नागरिक समाज संगठन (सीएसओ) और शैक्षणिक संस्थानों को पंचायत ज्ञान केंद्र (नॉलेज सेंटर) के रूप में चुना जा सकता है। राज्य स्तर पर ऐसे केंद्र स्थानीय भाषाओं और संदर्भों को ध्यान में रखते हुए अच्छी गुणवत्ता वाली प्रशिक्षण सामग्री तैयार कर सकते हैं। ज़मीन से जुड़ी सफल पहलों, चुनौतियों और असफलताओं के आधार पर इन सामग्रियों को लगातार अपडेट किया जाना चाहिए।

इसके लिए सरकार, विश्वविद्यालयों और नागरिक समाज संगठनों से ऐसे संस्थानों की पहचान करनी होगी, जो इन केंद्रों की मेजबानी कर सकें। उन्हें संसाधन और काम करने की स्वायत्तता देते हुए एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) किया जा सकता है, जिसमें जवाबदेही और पारदर्शिता के स्पष्ट प्रावधान भी हों। ऐसे केंद्रों के लिए सीएसआर फंड देने वाली कंपनियों और दूसरे डोनर से भी मदद ली जा सकती है।

2. स्थानीय संदर्भ के मुताबिक मेंटरिंग करें

ज़िला स्तर की संसाधन टीमें स्थानीय परिस्थितियों की अच्छी समझ के साथ निर्वाचित प्रतिनिधियों को मार्गदर्शन और लगातार सहयोग दे सकती हैं। इन टीमों में अनुभवी सामाजिक कार्यकर्ता, पूर्व सरपंच, महिला महासंघों की नेता, सेवानिवृत्त अधिकारी, नागरिक समाज संगठनों के सदस्य, शिक्षाविद और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं। जिन संगठनों की जिलों में मज़बूत मौजूदगी है, उन्हें ज़िला स्तर पर इस काम की जिम्मेदारी दी जा सकती है। ज़िला स्तर के डिग्री कॉलेजों और कृषि महाविद्यालयों को भी इस भूमिका में जोड़ा जा सकता है।

ग्राम पंचायत तभी प्रभावी ढंग से काम कर सकती है, जब सभी लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करना और सीखना शुरू करें।

राज्य स्तरीय ज्ञान केंद्र ऐसे लोगों और संस्थानों की सूची तैयार कर सकते हैं और ज़िला स्तर के सहयोगी संस्थानों के साथ मिलकर धीरे-धीरे इन लोगों को मेंटर के तौर पर प्रशिक्षित कर सकते हैं।

इसके अलावा, क्लस्टर स्तर पर भी ऐसे मेंटर उपलब्ध होने चाहिए, खासकर महिला प्रतिनिधियों, एससी/एसटी प्रतिनिधियों और पहली बार सरपंच बने लोगों के लिए। कई महिलाओं के लिए घरेलू ज़िम्मेदारियों, आने-जाने की दिक्कतों या मजदूरी के नुकसान के कारण आवासीय प्रशिक्षण में जाना आसान नहीं होता। क्लस्टर स्तर पर मिलने वाला सहयोग उनके लिए ज़्यादा सुलभ होगा और इसे पंचायतों के सामने मौजूद वास्तविक समस्याओं से सीधे जोड़ा जा सकता है।

3. एआई की समझ बढ़ाने में निवेश करें

पंचायतों को डिजिटल और एआई आधारित सलाह और सहायता व्यवस्था की ज़रूरत है। बहुभाषी एआई सहायता वाली हेल्पलाइन, जैसे चैटबॉट (इंसानी वेरिफिकेशन के साथ) सरकारी दिशा-निर्देशों को समझना और उन तक पहुंचना आसान बना सकते हैं। ऐसे सहायता तंत्र तैयार करने के लिए राज्य स्तरीय ज्ञान केंद्रों की तकनीकी क्षमता को आईटी विशेषज्ञों के साथ मिलकर मज़बूत किया जा सकता है।

सरकारी एजेंसियां और नागरिक समाज संगठन पहले से कई ऐसे प्रयोग कर रहे हैं। इन पहलों को एक जगह लाकर, स्थानीय ज़रूरतों के मुताबिक उनमें बदलाव किए जा सकते हैं और ग्राम पंचायतों के लिए उपयोगी बनाया जा सकता है। साथ ही, पंचायत प्रतिनिधियों को ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की सीमित पहुंच और एआई से मिलने वाली जानकारी की विश्वसनीयता को लेकर भी सतर्क रहना चाहिए।

4. अलग-अलग हितधारकों के बीच सहयोग बढ़ाएं

कैपेसिटी बिल्डिंग सिर्फ निर्वाचित प्रतिनिधियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसमें पंचायत सचिव, रोजगार सहायक, फ्रंटलाइन वर्कर, गांव की जल एवं स्वच्छता समितियां, स्वयं सहायता समूह, युवा स्वयंसेवक और स्थानीय तकनीकी सेवा देने वाले लोग भी शामिल होने चाहिए। ग्राम पंचायत तभी प्रभावी ढंग से काम कर सकती है, जब ये सभी लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करना और सीखना शुरू करें।

यह इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि पंचायतों की ज़िम्मेदारी अब सार्वजनिक परिसंपत्तियों और सेवाओं के प्रबंधन की ओर भी बढ़ रही है। उदाहरण के लिए, जून 2026 में मध्य प्रदेश के ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभाग की ओर से जारी नए प्रावधानों के तहत ग्राम पंचायतों को पाइप से होने वाली पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था के संचालन और रखरखाव पर हर महीने 10,000 रुपये तक खर्च करने की अनुमति दी गई। लेकिन ऐसी ज़िम्मेदारियां निभाने के लिए तकनीकी जानकारी, खरीद प्रक्रिया की समझ, पानी के शुल्क की वसूली, मरम्मत की व्यवस्था, खर्च में पारदर्शिता और प्रशिक्षित स्थानीय कर्मचारियों की ज़रूरत होगी। ये व्यवस्थाएं न हों तो बुनियादी ढांचा भले ही तैयार हो जाए, लेकिन लोगों को मिलने वाली सेवाएं भरोसेमंद और नियमित नहीं रह पाएंगी।

5. सीएसआर के संसाधनों का सोच-समझकर इस्तेमाल करें

पिछले दो दशकों में सीएसआर के ज़रिए स्कूलों, पेयजल व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाओं, आजीविका, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और सामुदायिक बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में काम किया गया है। इनमें से कई पहलों ने अच्छी गुणवत्ता वाले मॉडल भी तैयार किए हैं। एसबीआई फाउंडेशन के सहयोग से समर्थान ने छत्तीसगढ़ के कांकेर ज़िले के खामधोडागी गांव में आदिवासी स्थानीय शासन और ग्राम सभा को मज़बूत किया। इस परियोजना में समुदाय के नेतृत्व को केंद्र में रखा गया, जिससे वन संरक्षण, जल सुरक्षा और आजीविका के अवसरों को एक साथ जोड़ने में मदद मिली।

हालांकि, सीएसआर के तहत सिर्फ नए बुनियादी ढांचे के लिए पैसा देने के बजाय पंचायतों के लिए सीखने के केंद्र, युवाओं के डिजिटल समूह, तकनीकी सेवा नेटवर्क, आपसी सीख के मंच, ज़िला स्तर की मेंटरिंग व्यवस्था और डिजिटल ज्ञान के साधनों को भी सहयोग दिया जा सकता है। इस तरह का निवेश ग्राम पंचायतों तक पहले से पहुंच रहे बड़े पैमाने के सार्वजनिक धन के बेहतर इस्तेमाल और उसे लंबे समय तक बनाए रखने में मदद कर सकता है।

कैपेसिटी बिल्डिंग कार्यक्रमों को कुछ चीज़ों से बचने की भी ज़रूरत है:

1. सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को एक जैसा न समझें

पंचायत प्रतिनिधि अलग-अलग शैक्षिक और सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं। प्रशासनिक कामकाज का उनका अनुभव, आत्मविश्वास और सरकारी अधिकारियों से रिश्ते भी अलग-अलग होते हैं। कुछ प्रतिनिधि पहले से ही सरकारी प्रक्रियाओं से परिचित हो सकते हैं और उन्हें योजना बनाने, वित्त और शासन से जुड़े जटिल मुद्दों पर मदद की ज़रूरत हो सकती है। लेकिन सरकारी प्रक्रियाओं की जानकारी होना अपने आप में समावेशी नेतृत्व सुनिश्चित नहीं करता।

महिलाओं और सामाजिक रूप से वंचित समुदायों से आने वाले प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने और अपने अधिकार का इस्तेमाल करने में अलग तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए कैपेसिटी बिल्डिंग के कार्यक्रमों में अलग-अलग ज़रूरतों के मुताबिक सीखने के अवसर होने चाहिए। खासकर महिलाओं और वंचित समुदायों के प्रतिनिधियों को ऐसा सुरक्षित और सहज माहौल मिलना चाहिए, जहां वे प्रभावशाली लोगों के दबाव में आए बिना अपना आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता विकसित कर सकें।

2. पूर्व प्रतिनिधियों के अनुभव को नजरअंदाज न करें

हर पंचायत चुनाव के बाद नए प्रतिनिधि चुने जाते हैं। ऐसे में अपना कार्यकाल पूरा कर चुके प्रतिनिधि आमतौर पर प्रशिक्षण व्यवस्था से बाहर हो जाते हैं। इनमें से कई लोगों ने सालों तक सरकारी विभागों के साथ काम करना, ग्राम सभाओं को सक्रिय करना, सरकारी योजनाओं का लाभ हासिल करना, विवाद सुलझाना और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सीखा होता है। उनका यह व्यावहारिक अनुभव उन्हें स्थानीय स्तर पर एक अच्छा मेंटर बना सकता है। कैपेसिटी बिल्डिंग कार्यक्रमों को ऐसे अनुभवी पूर्व प्रतिनिधियों की पहचान करनी चाहिए और उनके व्यावहारिक अनुभव को फिर से सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा बनाना चाहिए।

कैपेसिटी बिल्डिंग की असली कसौटी यह होनी चाहिए कि क्या निर्वाचित प्रतिनिधि समय के साथ अपनी संवैधानिक और प्रशासनिक ज़िम्मेदारियां स्वतंत्र और प्रभावी ढंग से निभाने में सक्षम हो रहे हैं।

3. व्यावहारिक सीख की जगह सिर्फ भाषणबाज़ी पर निर्भर न रहें

निर्वाचित प्रतिनिधियों को कई ज़िम्मेदारियों के लिए व्यावहारिक कौशल की ज़रूरत होती है—जैसे प्रस्ताव और बैठक की कार्यवाही लिखना, ग्राम सभा को लोगों की भागीदारी के साथ चलाना, सालाना योजनाएं तैयार करना, बजट और रिकॉर्ड समझना, विकास कार्यों की निगरानी करना या सरकारी विभागों के साथ संवाद करना। ये बातें सिर्फ भाषण या प्रेज़ेंटेशन सुनकर ठीक से नहीं सीखी जा सकती।

प्रशिक्षण में प्रतिनिधियों को पंचायत की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर इन कामों को ख़ुद करके सीखने का मौका मिलना चाहिए। यह ख़ास तौर पर इसलिए ज़रूरी है ताकि निर्वाचित प्रतिनिधि पंचायत के रोज़मर्रा के कामकाज के लिए पंचायत सचिवों और दूसरे अधिकारियों पर निर्भर रहने के बजाय सोच-समझकर ख़ुद फैसले ले सकें।

4. प्रशिक्षण को प्रशिक्षकों की सुविधा के हिसाब से तय न करें

प्रशिक्षण कहां आयोजित होता है, प्रतिभागियों को कितनी दूर जाना पड़ता है, इसकी अवधि क्या है और रात रुकना ज़रूरी है या नहीं—इन सबका सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि वास्तव में कौन प्रशिक्षण में शामिल हो पाता है और कौन नहीं। महिलाओं के लिए ये दिक्कतें और बड़ी हो सकती हैं, क्योंकि उन्हें आने-जाने की पाबंदियों, घर की ज़िम्मेदारियों और सामाजिक रूढ़ियों का सामना भी करना पड़ता है।

इसलिए प्रशिक्षण को ज़्यादा दूर न रखते हुए आस-पास ही रखा जाना चाहिए और रात रुकने की ज़रूरत कम से कम रखनी चाहिए। अगर यह योजना संस्थागत सुविधा के बजाय लोगों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाई जाए, तो इसमें शामिल होने वाले लोगों की संख्या और विविधता दोनों बढ़ सकती हैं।

5. कैपेसिटी बिल्डिंग को सिर्फ प्रशिक्षित लोगों की संख्या से न मापें

किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम को पूरा कर लेना यह नहीं बताता कि उसके बाद कोई निर्वाचित प्रतिनिधि प्रभावी ग्राम सभा बुला सकता है या नहीं, खर्च पर सवाल उठा सकता है या नहीं, अधिकारियों के साथ बातचीत कर सकता है या पंचायत के फैसलों को प्रभावित कर सकता है या नहीं। कैपेसिटी बिल्डिंग की असली कसौटी यह होनी चाहिए कि क्या निर्वाचित प्रतिनिधि समय के साथ अपनी संवैधानिक और प्रशासनिक ज़िम्मेदारियां स्वतंत्र और प्रभावी ढंग से निभाने में सक्षम हो रहे हैं।

भारत ने पंचायतों को सशक्त बनाने के लिए विकेंद्रीकरण, संवैधानिक सुधार, नियमित चुनाव, वित्तीय मदद और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसी व्यवस्थाओं पर काफी काम किया है। अब सुधार के अगले दौर में पंचायत प्रतिनिधियों की क्षमता बढ़ाने के लिए बेहतर व्यवस्था बनाने पर भी उतना ही ध्यान देने की ज़रूरत है।

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लेखक के बारे में

  • योगेश कुमार समर्थन के कार्यकारी निदेशक हैं। सहभागी विकास, विकेंद्रीकृत शासन और वंचित समुदायों के सशक्तीकरण के क्षेत्र में काम करते हुए उन्हें विकास क्षेत्र में 35 वर्षों से अधिक का अनुभव है। उनकी विशेषज्ञता जल, स्वच्छता, स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण, संस्थागत विकास और सामाजिक जवाबदेही जैसे क्षेत्रों में है। योगेश ने सरकारी समितियों में नागरिक समाज का प्रतिनिधित्व किया है और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में बड़े पैमाने पर लेख प्रकाशित किए हैं। उन्होंने विकास अर्थशास्त्र में पीएचडी की है।
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