

मेरा नाम सुमन है। मैं मूल रूप से उत्तर प्रदेश के झांसी ज़िले की रहने वाली हूं और पिछले करीब 20 साल से दिल्ली में रह रही हूं। मैं पश्चिमी दिल्ली के बक्करवाला इलाके की जेजे कॉलोनी में किराये के घर में रहती हूं। मेरे पति बेलदारी-मजदूरी का काम करते हैं। मैं मुंडका इंडस्ट्रियल एरिया में स्थित एक लोहे की फैक्ट्री में काम करती हूं। अभी मेरी तनख्वाह करीब 6-7 हज़ार रुपए है।
हमारे इलाके में रहने वाले बहुत से लोग आसपास की फैक्ट्रियों में ही काम करते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी हैं। लेकिन इस इलाके में सार्वजनिक परिवहन की सुविधा ठीक नहीं है। इसलिए लोग अक्सर पैदल, ई-रिक्शा या अपने निजी वाहनों से ही आते-जाते हैं।
मैं जिस फैक्ट्री में काम करती हूं, वहां बस का कोई रूट नहीं है। मेरे घर से फैक्ट्री की दूरी एक तरफ से लगभग तीन किलोमीटर है। रोज़ आने-जाने में मुझे डेढ़ घंटे तक लग जाते हैं। पूरे दिन फैक्ट्री में काम करने के बाद पैदल घर लौटना बहुत मुश्किल होता है। सुबह तो किसी तरह चली जाती हूं, लेकिन शाम को पैरों में दर्द होने लगता है। ऐसे में कई बार दवा लेकर काम करना पड़ता है। काम के बाद घर भी संभालना होता है।
अगर मैं रोज़ रिक्शे से आने-जाने लगूं, तो करीब 40 रुपए रोज़ खर्च होंगे। मेरी तनख्वाह इतनी नहीं है कि हर दिन आने-जाने का किराया दे सकूं। घर का किराया, बाकी घरेलू खर्च और बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी उठाना होता है। मेरे दो बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। यहां बस सुबह करीब आठ बजे आती है, जबकि स्कूल 7:30 बजे ही शुरू हो जाता है। इसलिए बच्चों को रिक्शे से स्कूल भेजना पड़ता है। एक बच्चे का आने-जाने का रोज़ का किराया करीब 20 रुपए है। बच्चों को पैदल नहीं भेज सकते और बस के भरोसे भी नहीं छोड़ सकते।
बसों की समस्या सिर्फ उनकी कमी तक सीमित नहीं है। हमारे इलाके में बस स्टैंड के लिए जगह तय हुए एक साल से ज़्यादा हो गया है, लेकिन वहां अब तक कोई बस आती हुई नहीं दिखी। न कोई बोर्ड लगा है, न बसों का कोई तय समय है। हमारा नज़दीकी बस स्टैंड मुंडका इंडस्ट्रियल एरिया में है। दिल्ली के दूसरे इलाकों में जाने के लिए हमें पहले बक्करवाला मोड़ तक रिक्शा करना पड़ता है। वहां से नांगलोई या नजफगढ़ की बस मिलती है। यानी दिल्ली में रहते हुए भी कहीं आने-जाने के लिए हमें पहले अपने इलाके से बाहर निकलने का खर्च उठाना पड़ता है।
कई बार बसें खाली खड़ी रहती हैं, लेकिन चलती नहीं हैं। लोग उनके चलने का इंतज़ार करते रहते हैं और जब काम पर जाने में देरी होने लगती है, तो मजबूरी में उन्हें ऑटो या रिक्शा करना पड़ता है। अगर बस लोगों की सुविधा के लिए लगाई गई है, तो उसका समय भी लोगों की ज़रूरत के हिसाब से होना चाहिए। ऐसी बस सेवा का क्या फायदा, जो ज़रूरत के समय मिले ही नहीं?
महिलाओं के लिए यह समस्या और भी बड़ी है। कई बार ड्राइवर महिलाओं को देखकर बस नहीं रोकते। ऐसे में अगर किसी दूर की जगह पर बेहतर काम का विकल्प मिले भी, तो आने-जाने की सुविधा न होने के कारण हम वह काम नहीं कर पाते। हम यही सोचते हैं कि वहां काम करने के लिए घर से और जल्दी निकलना पड़ेगा और लौटने में भी देर होगी। अगर हमारे रूट पर नियमित बस चलने लगे, तो हमारा आने-जाने का पैसा और समय दोनों बचेगा। बस से सफर रिक्शे के मुकाबले सस्ता और जल्दी होगा। बचा हुआ पैसा हम बच्चों की पढ़ाई या घर के दूसरे खर्चों में लगा सकते हैं।
इसलिए अगर हमारे इलाके में यातायात सेवा ठीक होगी, तो हमारे लिए काम पर जाना, बच्चों को स्कूल भेजना और दिल्ली के दूसरे हिस्सों तक पहुंचना भी आसान हो जाएगा। फिलहाल तो बस की सुविधा सिर्फ नाम की है, काम की नहीं।
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लेखक के बारे में
- सुमन पश्चिमी दिल्ली के बक्करवाला इलाके में रहने वाली एक प्रवासी महिला हैं। वह पब्लिक ट्रांसपोर्ट फोरम के कैंपेन ‘बस कहां है?’ से जुड़ी हैं।
