असमानता

अपनों के बीच जब मैं ‘बाहरी’ हो गया

जयपुर ज़िला, राजस्थान
अलग अलग समुदाय के लोगों का समूह_असमानता
मैं जिन लोगों के साथ सबसे अधिक जुड़ा हुआ पाता हूं, आज उन्हीं के बीच बाहरी व्यक्ति-सा महसूस कर रहा था। | इलस्ट्रेशन साभार: सुगम

कुछ महीने पहले मुझे राजस्थान के जयपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने का मौका मिला। इस कार्यक्रम में विकास सेक्टर से जुड़ी कई संस्थाओं के कार्यकर्ता और  उनकी अलग-अलग टीमों के सदस्य शामिल हुए। कार्यक्रम में चर्चा के मुख्य विषय बीज संरक्षण, खेती और ग्रामीण आजीविका थे। संपादकीय कार्यों से जुड़े होने की वजह से ऐसे कार्यक्रम हमारे लिए केवल उपस्थिति दर्ज कराने की जगह नहीं होते, बल्कि इनसे यह समझ बनती है कि ज़मीन पर वास्तव में क्या हो रहा है, लोग किन चुनौतियों से जूझ रहे हैं और किन मुद्दों पर अभी बातचीत की ज़रूरत है।

कार्यक्रम में पूरे दिन कई सत्र हुए। वक्ताओं ने बीजों की विविधता, जलवायु परिवर्तन, कार्बन क्रेडिट और कृषि के बदलते स्वरूप पर विस्तार से बात की। मुझे भी कई नई जानकारियां मिलीं। फिर दोपहर बाद की चाय का समय हुआ। इस दौरान मेरे साथ एक अनोखी घटना घटी। 

दोपहर बाद की चाय के समय लगभग हम सात-आठ लोग एक समूह में खड़े थे, जिसमें  कुछ सत्रों के वक्ता भी शामिल थे। बातचीत लगभग अंग्रेज़ी में चल रही थी और मैं भी इस चर्चा में सक्रिय रूप से शामिल था।

कुछ देर बाद सब लोग चर्चा के लिए अन्य समूहों की तरफ़ जाने लगे। मैं भी पास खड़े एक दूसरे समूह की ओर बढ़ा। लेकिन मुझे अपने समूह में देखते ही उनकी बातचीत अचानक थम गई और कुछ क्षणों के लिए एक चुप्पी छा गई। ऐसा लगा जैसे वे यह तय नहीं कर पा रहे हों कि बातचीत जारी रखें या नहीं।

मैंने उन्हें सहज करने के लिए उस समूह के साथियों से पूछा, “आपके यहां खेती में सबसे बड़ा बदलाव क्या दिख रहा है?”

शुरुआत में उनके जवाबों में थोड़ी झिझक थी। मुझे ऐसा लगा कि पिछले समूह में अंग्रेज़ी में चल रही चर्चाओं के बीच मेरी मौजूदगी की वजह से वे मुझे एक बाहरी व्यक्ति के तौर पर देख रहे थे और इसी वजह से वे मुझसे सहज नहीं महसूस कर पा रहे थे। तब माहौल को सहज बनाने के लिए मैंने उनसे बताया कि मैं भी उनकी तरह स्थानीय हूं और पास के ही चूरू ज़िले का रहने वाला हूं। इसके बाद परिचय का छोटा-सा दौर चला और फिर बातचीत खुलने लगी। मैं भी उनकी बातें ध्यान से सुन रहा था।

उस दौरान एक विचार बार-बार मेरे मन में आ रहा था कि जिन ज़मीनी समूहों के साथ मैं खुद को सबसे अधिक जुड़ा हुआ महसूस करता हूं, आज उन्हीं के बीच मैं एक बाहरी व्यक्ति-सा महसूस कर रहा था।

यह घटना भले ही छोटी लगे, लेकिन इसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि भाषा और भौगोलिक पहचान कितनी सहजता से यह तय कर देते हैं कि हम किसी समूह के ‘अपने’ हैं या ‘बाहरी’।

बेशक निरन्तर सीखते रहने और आगे बढ़ते रहने के जज़्बे ने मेरे लिए कई नए रास्ते खोले हैं। लेकिन इस अनुभव ने मुझे यह भी एहसास कराया कि इस सफर में अपनी जड़ों की चुनौतियों को समझना और उनसे जुड़ाव बनाए रखना भी उतना ही ज़रूरी है।

राकेश, आईडीआर हिंदी में एडिटोरियल एसोसिएट के तौर पर काम करते है।

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लेखक के बारे में

  • राकेश स्वामी आईडीआर में सह-संपादकीय भूमिका मे हैं। वह राजस्थान से जुड़े लेखन सामग्री पर जोर देते हैं। राकेश के पास राजस्थान सरकार के नेतृत्व मे समुदाय के साथ कार्य करने का एवं अकाउंटेबलिटी इनिशिएटिव, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च मे लेखन एवं क्षमता निर्माण का भी अनुभव है। राकेश ने आरटीयू यूनिवर्सिटी, कोटा से सिविल अभियांत्रिकी में स्नातक किया है।