ग्रामीण भारत में प्लास्टिक कचरे का हिसाब करना क्यों जरूरी है?

विवेक पीएआरसी फाउंडेशन, जो एक विकास-उन्मुख थिंक टैंक है, की टीम ने जमीनी स्तर पर कचरा प्रबंधन की प्रक्रिया समझने के लिए महाराष्ट्र की एक नगर पंचायत में तीन दिन बिताए। इस दौरे का उद्देश्य एक नई कचरा प्रबंधन पहल को समझना था, लेकिन क्षेत्र के मुख्य अधिकारी के साथ बातचीत के दौरान एक गहरी समस्या उभर कर आई: ठोस कचरे के प्रकार और प्लास्टिक कचरा, दोनों पर ही लगभग पूरी तरह आंकड़ों का अभाव है।
नगर पंचायत के एक सामुदायिक स्थल के पीछे एक शेड था, जहां महीनों से जमा पाउच, दूध के पैकेट और खाद्य पदार्थों के रैपर बिखरे हुए थे। मुख्य अधिकारी जानते थे कि इन्हें छांटना, मापना और दर्ज किया जाना चाहिए था। लेकिन वास्तव में, अधिकतर कचरे का केवल अनुमान लगाया गया था—जिससे यह स्पष्ट हो गया कि कितनी बड़ी मात्रा में कचरे को दर्ज ही नहीं किया जा रहा है।
टीम ने सड़क किनारे, नालों के पास और नगर पंचायत की सीमा के बाहरी इलाकों में भी इसी तरह कचरे के रिसाव देखे। यह कहानी देश के ग्रामीण और अर्ध-शहरी हिस्सों में बार-बार दोहराई जाती है। लेकिन यह सब उन आंकड़ों में दिखाई नहीं देता, जो राष्ट्रीय स्तर पर प्लास्टिक कचरे की समझ को आकार देते है। इससे एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है: भारत में कचरे से जुड़े आंकड़ों का कितना हिस्सा अभी भी पूरी तरह गायब है?
जो दिखता नहीं, उसे कैसे मापें?
स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) के तहत भारत ने शहरी कचरे के लिए एक प्रभावशाली डेटा प्रणाली विकसित की है। यह प्रणाली हर दिन हजारों शहरों में कचरे के पृथक्करण (सेग्रेगेशन), संग्रह और प्रसंस्करण (प्रॉसेस) को ट्रैक करती है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की वार्षिक रिपोर्ट 2022–23 के अनुसार, भारत में प्लास्टिक कचरे का वार्षिक उत्पादन लगभग 4.1 मिलियन टन है। इसके अलावा, 43,000 से अधिक उत्पादक और 2600 रीसाइक्लर, इक्स्टेंडेड प्रोड्यूसर रेस्पॉन्सिबिलिटी (ईपीआर) प्रणाली में भाग लेते हैं, जो प्लास्टिक और ई-वेस्ट मूल्य श्रृंखला में व्यापक भागीदारी को दर्शाता है। लेकिन, ये आंकड़े केवल शहरी और औपचारिक प्रणालियों को दर्शाते हैं। गांव, जहां भारत की लगभग दो-तिहाई आबादी रहती है, से उत्पन्न प्लास्टिक कचरे का आंकड़ा अब भी नदारद है।
ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2016 के तहत ग्राम पंचायतों और नगर पंचायतों को कचरे के आकलन और रिपोर्टिंग के लिए जिम्मेदार स्थानीय प्राधिकरण के रूप में मान्यता दी गई है। फिर भी रिपोर्टों के मुताबिक स्थानीय निकायों के पास अपने क्षेत्र में उत्पन्न प्लास्टिक कचरे को मापने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण और प्रणालियों की कमी है। जब तक ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के कचरे के प्रवाह को दर्ज नहीं किया जाएगा, तब तक राष्ट्रीय स्तर पर प्लास्टिक कचरे के आंकड़े अधूरे रहेंगे, जिससे योजना निर्माण और ईपीआर अनुपालन, दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
ग्रामीण उपभोग के तेजी से बढ़ने के कारण, वर्ष 2024 में गांवों में प्रति व्यक्ति व्यय लगभग 4,100 रुपये तक पहुंच गया है। पैकेज्ड सामान अब आम हो चुके हैं, लेकिन उनके पैकेजिंग कचरे की रिपोर्टिंग शायद ही कभी होती है। उपलब्ध शोध बताता है कि गांवों में कम-मूल्य वाला प्लास्टिक लगातार पहुंच रहा है, जिसे अक्सर जला दिया जाता है, दोबारा उपयोग किया जाता है या खुले में फेंक दिया जाता है। इस से जुड़े आंकड़ों को कहीं भी दर्ज नहीं किया जा रहा है।
यदि ग्रामीण भारत में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष केवल 0.5–0.8 किलोग्राम प्लास्टिक कचरा भी उत्पन्न होता है, तो भी यह लगभग 0.44–0.76 मिलियन टन अतिरिक्त कचरे के बराबर होगा, जिसका हिसाब कहीं नहीं रखा जा रहा है। अगर इसे मिलाकर घरेलू स्तर पर अनुमान लगाया जाए, तो यह कुल मिलाकर 6.5 से 10.8 मिलियन टन प्रति वर्ष तक हो सकता है, जो आधिकारिक तौर पर बताए गए 4.1 मिलियन टन से कहीं अधिक है।
हाल के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 9.3 मिलियन टन माइक्रोप्लास्टिक उत्सर्जन होता है, जो सीपीसीबी के आधिकारिक आंकड़ों से बहुत अधिक है। ये उत्सर्जन केवल बड़े शहरों से नहीं होता, बल्कि इधर-उधर की बस्तियों, खेतों और बाजारों से उत्पन्न उस कचरे से भी होता है, जिसे खुले में जलाया जाता है, फेंक दिया जाता है या ढेरों में छोड़ दिया जाता है।
इन आंकड़ों का आधिकारिक अनुमानों से इतना अधिक होना यह दर्शाता है कि भारत की राष्ट्रीय कचरा गणना प्रणाली में एक गहरी संरचनात्मक कमी मौजूद है।
गणना न करने के नुकसान
रिपोर्टिंग में यह कमी केवल एक अकादमिक समस्या नहीं है। इसके प्रभाव कई तंत्रों पर पड़ते हैं।
- इससे फंडिंग पर असर पड़ता है: यह स्थापित तथ्य है कि जब ग्रामीण स्थानीय निकाय दस्तावेजी आंकड़ों के माध्यम से परिणाम नहीं दिखा पाते, तब उनको अनुदान प्राप्त करने में कठिनाई होती है। यदि प्लास्टिक कचरे की मात्रा का आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है, तो ग्रामीण निकाय कचरा प्रबंधन अवसंरचना के लिए निवेश का साक्ष्य-आधारित प्रस्ताव नहीं बना सकते। साथ ही वह उन योजनाओं का लाभ भी नहीं ले पाते, जिनमें आधारभूत आंकड़ों की आवश्यकता होती है। जब वे आंकड़े नहीं दिखा पाते, तो उनकी जरूरत भी साबित नहीं हो पाती।
- इससे रीसाइक्लिंग बाजार के विस्तार पर असर पड़ता है: सटीक आंकड़ों के बिना रीसाइक्लिंग बाजारों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
- यह ईपीआर क्रेडिट को प्रभावित करता है: इक्स्टेंडेड प्रोड्यूसर रेस्पॉन्सिबिलिटी (ईपीआर) क्रेडिट के माध्यम से उत्पादक अपने रीसाइक्लिंग दायित्वों को पूरा करने के लिए कचरा संग्रह और प्रसंस्करण का समर्थन करते हैं। ये क्रेडिट आमतौर पर ब्रांड के वितरण नेटवर्क या राज्यों में बिक्री के आंकड़ों के आधार पर दिए जाते हैं, जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में किए गए कचरा संग्रह प्रयास न तो मान्यता पाते हैं और न ही प्रोत्साहन।
- इससे अवसंरचना योजना पर असर पड़ता है: ग्रामीण कचरा उत्पादन के सही आंकड़ों के बिना, अवसंरचना जैसे रीसाइक्लिंग सुविधाएं या कचरा संग्रह प्रणाली, वास्तविक कचरे के केवल एक बहुत ही छोटे भाग को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। व्यवहारिक तौर पर इसका अर्थ यही है कि शहरों में कचरा प्रबंधन आगे बढ़ता है, जबकि गांव पीछे रह जाते हैं।
यह समस्या अब तक क्यों नहीं सुलझी है?
इस स्थिति के पीछे कई चुनौतियां हैं, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं:
1. जमीनी स्तर पर सीमित क्षमता
अधिकांश ग्राम पंचायतों और स्थानीय निकायों के पास यह मापने की बुनियादी प्रणाली नहीं है कि उनके क्षेत्र में कितना प्लास्टिक कचरा उत्पन्न या एकत्र किया जाता है। सीपीसीबी की कई वार्षिक रिपोर्टों में भी यह उल्लेख किया गया है कि शहरी क्षेत्रों के बाहर कचरे की मात्रा अक्सर अनुमान के आधार पर दर्ज की जाती है, न कि वास्तविक मापन के आधार पर।
2. कचरे के मापन पर औपचारिक प्रशिक्षण का अभाव
ठोस कचरा प्रबंधन नियमों की आधिकारिक समीक्षाएं बताती हैं कि स्थानीय अधिकारियों और स्वच्छता कर्मियों को कचरे के पृथक्करण, वर्गीकरण और रिपोर्टिंग पर बहुत कम प्रशिक्षण मिलता है। इससे उन क्षेत्रों में भी सटीक आंकड़े तैयार करना कठिन हो जाता है, जहां कचरा संग्रह व्यवस्था मौजूद है।
3. व्यवहार परिवर्तन को नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण से डिजाइन नहीं किया गया है
जन-जागरूकता अभियान अभी भी व्यवहारिक डिजाइन पर आधारित होने की बजाय केवल संदेश देने पर निर्भर हैं। नीति आयोग और विश्व बैंक के शोध बताते हैं कि प्रोत्साहन, प्रतिक्रिया तंत्र और सामाजिक मानदंडों के बिना लोग जागरूकता के बावजूद, कचरा फेंकना और खुले में कचरा जलाना जारी रखते हैं।
4. ग्रामीण कचरा बिखरा हुआ होता है और उसे इकट्ठा करना मुश्किल होता है
स्वच्छ भारत मिशन–ग्रामीण के दिशानिर्देश स्वीकार करते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में कचरा छोटी मात्रा में और बिखरी हुई बस्तियों में उत्पन्न होता है। विभिन्न रिपोर्टें बताती हैं कि कमजोर संग्रह व्यवस्था के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में कचरे का एकत्रीकरण और उसकी रिपोर्टिंग संरचनात्मक रूप से और अधिक कठिन हो जाती है।
5. स्वच्छता कर्मियों में अभी भी कौशल का अभाव है
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) और सोशल एंड पॉलिटिकल रिसर्च फाउंडेशन के अध्ययनों से पता चलता है कि स्वच्छता कर्मी, जो स्वच्छता सेवाओं में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, बिना औपचारिक प्रशिक्षण के काम करते हैं। यदि उन्हें व्यवस्थित रूप से प्रशिक्षित किया जाए, तो वे कचरे के पृथक्करण और डेटा संग्रह में केंद्रीय भूमिका निभा सकते हैं।
भारत के पास पहले से ही एक समाधान मौजूद है: सीपीसीबी का प्लास्टिक कचरा चरित्रांकन और आकलन के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रसीजर (एसओपी)। यह दस्तावेज स्थानीय स्तर पर कचरे की मात्रा निर्धारित करने के लिए एक कठोर, लेकिन व्यावहारिक पद्धति प्रस्तुत करता है। लेकिन इस एसओपी को व्यवहार में लागू करने के लिए प्रशिक्षण, समन्वय और प्रशासनिक समर्थन आवश्यक है। विभिन्न नगर निकायों के हितधारकों से बातचीत में यह सामने आया कि कई शहरों ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के एसओपी को लागू करने की कोशिश की, लेकिन तकनीकी कमियों के कारण उनकी रिपोर्टें संशोधन के लिए वापस भेज दी गई। ऐसे में, जब शहर ही इन अपेक्षाओं को पूरा करने में संघर्ष कर रहे हैं, तो ग्रामीण निकायों से बिना समर्थन के उसी प्रारूप का पालन करने की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है।

हालांकि ग्रामीण कचरे के मापन और रिपोर्टिंग में लगातार चुनौतियां रही हैं, लेकिन इन खामियों को दूर करने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। इन सीमाओं को पहचानने के बाद अब जरूरत है कि चर्चा को केवल समस्याओं तक सीमित रखने के बजाय व्यावहारिक समाधानों की ओर मोड़ा जाए। ठोस सुधारों और समावेशी रणनीतियों के माध्यम से भारत इस आंकड़ों के अंतर को भर सकता है और ग्रामीण समुदायों को देश की चक्रीय अर्थव्यवस्था की आकांक्षाओं में पूरी तरह शामिल कर सकता है।
समावेशी चक्रीय अर्थव्यवस्था का निर्माण
1. ग्रामीण समावेशन के लिए एक रोडमैप
ग्रामीण कचरे को अनदेखा करने की लागत, उसे दर्ज करने की लागत से कहीं अधिक है। हर कचरे का ढेर जिसका मापन नहीं हुआ है, वो खुले में कचरा जलाने, अनौपचारिक रूप से कचरे का बिखराव और इनसे होने वाले संभावित आर्थिक मूल्य के नुकसान की तरफ इशारा करता है।
स्वच्छ भारत मिशन–ग्रामीण के अगले चरण में इस असंतुलन को सुधारने का अवसर है। एक सरल लेकिन प्रभावशाली सुधार यह हो सकता है कि ग्रामीण प्लास्टिक कचरे के आंकड़ों को चरणबद्ध और व्यावहारिक मापन के माध्यम से राष्ट्रीय रिपोर्टिंग प्रणाली में शामिल किया जाए।
यह प्रक्रिया ग्राम स्तर से शुरू हो सकती है, जहां पहले से ही फ्रंटलाइन कार्यकर्ता घरों के साथ संपर्क में रहते हैं। स्वच्छता कर्मी, स्वयं सहायता समूहों के सदस्य और अन्य स्थानीय कार्यकर्ता तिमाही आधार पर नमूना-आधारित सर्वेक्षणों के माध्यम से कुछ बुनियादी संकेतक दर्ज कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, किस प्रकार का प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, और उसका निपटान कैसे किया जाता है। सीमित स्तर का मापन भी एक ऐसा आधार तैयार करेगा जो वर्तमान में मौजूद नहीं है।
ग्राम पंचायत स्तर पर इस जानकारी को सरल प्लास्टिक कचरा रजिस्टर में संकलित किया जा सकता है, जो स्वच्छ भारत मिशन–ग्रामीण के मौजूदा स्वच्छता रिकॉर्ड पर आधारित हो। डिजिटल प्रविष्टि के लिए ई-ग्रामस्वराज जैसे प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जा सकता है, जिससे नई प्रणालियां विकसित करने की आवश्यकता कम होगी। ब्लॉक और जिला स्तर के कार्यालयों का ध्यान डेटा संग्रह के बजाय सत्यापन और समेकन पर केंद्रित हो सकता है। यह उसी मॉडल के अनुरूप है, जिसका उपयोग स्वच्छ भारत मिशन–ग्रामीण में पहले से किया जाता है, जहां कई स्तरों पर सत्यापन के माध्यम से आंकड़ों की विश्वसनीयता सुनिश्चित की जाती है, बिना इसे पूरी तरह केंद्रीकृत किए। राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर ग्रामीण प्लास्टिक कचरे के आंकड़ों को मौजूदा स्वच्छता और कचरा प्रबंधन डैशबोर्ड में शामिल किया जा सकता है। केरल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने पहले ही यह दिखाया है कि ग्रामीण और शहरी प्रणालियों का प्रशासनिक दृष्टि से एकीकरण संभव है।
यह श्रेणीबद्ध दृष्टिकोण जिम्मेदारियों को विभिन्न स्तरों पर बांटता है, जिससे गांवों पर अनावश्यक बोझ नहीं पड़ता। इससे समुदाय आंकड़े एकत्र कर सकते हैं, स्थानीय सरकारें अधिक प्रभावी ढंग से योजना बना सकती हैं, और राष्ट्रीय एजेंसियां निवेश तथा उत्पादक उत्तरदायित्व को जमीनी वास्तविकताओं के अनुरूप समायोजित कर सकती हैं। गांवों में कचरा इकट्ठा करने की लागत बहुत ज्यादा होती है और कचरा भी अमूमन इधर-उधर बिखरा हुआ होता है। लेकिन जब ग्रामीण आंकड़े राष्ट्रीय प्रणालियों में शामिल हो जाते हैं, तो ईपीआर ढांचे को ग्रामीण क्षेत्रों में कचरा संग्रह को समर्थन देने के लिए विकसित किया जा सकता है। ईपीआर प्रणाली रीसाइक्लिंग क्रेडिट, उत्पादक अनुपालन आवश्यकताओं और नियामकीय ढांचों के माध्यम से काम करती है, लेकिन वर्तमान में ये व्यवस्थाएं ग्रामीण परिस्थितियों को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करती। विश्वसनीय ग्रामीण आंकड़ों से पूरी कचरा उत्पादन और निपटान प्रणाली का अधिक सटीक प्रतिनिधित्व संभव होगा। इससे उत्पादक और रीसाइक्लर ऐसे कार्यक्रम विकसित कर सकेंगे, जो ग्रामीण जरूरतों को भी संबोधित करें, बजाय इसके कि उनका ध्यान मुख्य रूप से शहरों पर ही केंद्रित रहे। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अनौपचारिक कचरा संग्राहक और छोटे ऐग्रीगेटर भी औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त कर सकेंगे।
2. राष्ट्रीय लक्ष्य के अनुरूप नीति को विकसित करना
संसाधन दक्षता के क्षेत्र में भारत का नेतृत्व समावेशन और पारदर्शिता पर विशेष जोर देता है। वर्ष 2022 में अपनी जी20 अध्यक्षता के दौरान भारत ने ऐसी चक्रीयता की वकालत की थी, जो हर समुदाय को शामिल करे और व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा दे। ग्रामीण कचरे की गणना को इस सिद्धांत में शामिल करना नीतियों को इन राष्ट्रीय आकांक्षाओं के अनुरूप बनाएगा। इससे ग्रामीण कचरा प्रबंधन व्यापक अनुमानों से आगे बढ़कर मापने योग्य परिणामों की दिशा में बढ़ सकेगा, ठीक उसी तरह जैसे शहरी स्वच्छता प्रबंधन में जवाबदेही और योजना पहले से ही स्थापित है।
यह अवसर अत्यंत उपयुक्त है, खासकर एक ऐसे समय पर जब विभिन्न मंत्रालय भारत की चक्रीय अर्थव्यवस्था के अगले चरण के रोडमैप की तैयारी कर रहे हैं। इस समय ग्रामीण प्लास्टिक कचरे के आंकड़ों को स्वच्छ भारत मिशन–ग्रामीण में शामिल किया जा सकता है, ताकि यह राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बन सके। यह एकीकरण शहरी प्रणालियों को भी महत्वपूर्ण सीख दे सकता है, विशेष रूप से यह समझने में कि ग्रामीण प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों में प्राकृतिक या जैव-आधारित सामग्री को संसाधन के रूप में कैसे इस्तेमाल किया जाता है।
दशकों से जिस चीज को हमने अनदेखा किया है, उसकी गणना करना किसी कमी को स्वीकार करना नहीं है। यह एक ईमानदार कदम है और देश की वास्तविक स्थिति को समझने की दिशा में एक पहल है। यदि भारत वास्तव में एक ऐसी चक्रीय अर्थव्यवस्था बनाना चाहता है जो हर नागरिक का समावेश करे, तो उसके कचरा प्रबंधन की यात्रा को शहरों की सीमाओं से आगे बढ़ना होगा। ग्राम पंचायतों में भारत की चक्रीय अर्थव्यवस्था का भविष्य मौजूद है, जिसे पहचाने जाने, मापे जाने और नीति में शामिल किए जाने की प्रतीक्षा है। ग्रामीण क्षेत्रों की दृश्यता के बिना भारत अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल नहीं कर सकता है।
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लेखक के बारे में
- अमरजा कुलकर्णी पॉलिसी एडवोकेसी रिसर्च सेंटर में पर्यावरण और सतत विकास विभाग का नेतृत्व करती हैं। वह एक सतता (सस्टेनेबिलिटी) और नीति शोधकर्ता हैं, जिनके पास लाइफ साइंसेज उद्योग में 14 वर्षों का अनुभव है। अमरजा ने वैश्विक सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) से संबंधित मार्गदर्शक पुस्तकों का सह-लेखन किया है और नीति टूलकिट विकसित किए हैं। उनका काम जमीनी वास्तविकताओं और नीतिगत सुधारों के बीच की दूरी को कम करके चक्रीय अर्थव्यवस्था की दिशा में बदलाव को आगे बढ़ाना है।
- लक्ष्मी रघुपति ने पर्यावरण और वन मंत्रालय में 20 वर्षों तक निदेशक के रूप में कार्य किया है। उनके शैक्षणिक कार्यों में शोध, प्रस्तुति और अकादमिक तथा नीतिगत विषयों पर आधारित शोध-पत्रों का संचार शामिल है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय संगठनों तथा उद्योग संघों के साथ सलाहकार और परामर्शदाता के रूप में काम किया है। वह विभिन्न परियोजनाओं में रीसोर्स पर्सन भी रही हैं और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के संपादकीय बोर्ड का हिस्सा हैं।
