इंटरसेक्शनैलिटी एक ऐसा शब्द है जो हमें यह समझने में मदद करता है कि किसी व्यक्ति या समूह की पहचान एक नहीं, कई परतों से बनी होती है। लिंग, जाति, वर्ग, उम्र, भाषा, भूगोल, धर्म, विकलांगता जैसे कई पहलू मिलकर किसी भी व्यक्ति के अनुभवों को आकार देते हैं। इन परतों के आपस में मिलने से जो प्रभाव पड़ता है, उसे ही इंटरसेक्शनैलिटी कहा जाता है।
इस अवधारणा को पहली बार विचारक किम्बर्ले क्रेनशॉ ने सामने रखा था। उनका कहना था कि अक्सर लोग सिर्फ एक नहीं, बल्कि कई अन्य पहलुओं के गठजोड़ के चलते भेदभाव या चुनौतियों का सामना करते हैं। उदाहरण के लिए, एक दलित महिला, एक विकलांग किशोरी, या एक प्रवासी मजदूर महिला आदि सिर्फ “महिला” नहीं हैं। इन सभी के अनुभव उनकी पहचान से जुड़े अन्य पहलुओं से भी प्रभावित होते हैं।
बीते कुछ सालों में विकास सेक्टर में इंटरसेक्शनैलिटी का प्रयोग काफी बढ़ा है। यह अवधारणा हमें जमीनी हकीकत देखने, वंचित समूहों को बेहतर तरह से पहचानने और अधिक समावेशी कार्यक्रम बनाने में मदद करती है। यही कारण है कि इंटरसेक्शनैलिटी सिर्फ एक सिद्धांत नहीं, बल्कि लोगों की वास्तविकताओं को समझने का एक तरीका है। एक ऐसा तरीका, जो विकास कार्य को अधिक न्यायपूर्ण और प्रभावी बनाता है।
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