सामाजिक न्याय

डॉ. राम पुनियानी | आईडीआर इंटरव्यूज

देश में धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के सवालों पर मुखर हस्तक्षेप करने वाले वरिष्ठ चिंतक डॉ. राम पुनियानी आईडीआर से बातचीत में भारत में सांप्रदायिकता, लोकतांत्रिक मूल्यों, बहुलतावाद और सामाजिक सद्भाव के सामने खड़ी चुनौतियों पर अपने अनुभव और विचार साझा कर रहे हैं।
24 फ़रवरी 2026 को प्रकाशित

डॉ. राम पुनियानी एक प्रख्यात सामाजिक चिंतक, लेखक हैं। वे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के मुखर समर्थक हैं। वे लंबे समय तक वरिष्ठ विचारक असगर अली इंजीनियर के साथ जुड़े रहे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज़्म में सक्रिय भूमिका निभाई और आज वे इसके अध्यक्ष है। उनका जन्म अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के जहंग (अब पाकिस्तान) में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार नागपुर आकर बस गया, जहां उनका समाज के विविध धार्मिक-सांस्कृतिक स्वरूप में बचपन बीता। परिवार में पढ़ने-लिखने का माहौल और सामाजिक सरोकारों की प्रेरणा ने ही उनके भीतर समाज के लिए काम करने की भावना पैदा की।

उन्होंने नागपुर मेडिकल कॉलेज से एमडी की डिग्री हासिल की। बाद में वे मुंबई आ गए और आईआईटी मुंबई के अस्पताल में मेडिकल ऑफिसर तथा फिर बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। नौकरी के साथ-साथ वे सामाजिक अध्ययन, लेखन और जनसंपर्क का काम निरंतर करते रहे।

बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना के बाद उन्होंने समझा कि सांप्रदायिकता कोई सतही समस्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की जड़ों को कमजोर करने वाली गंभीर चुनौती है। इसके बाद उन्होंने सांप्रदायिक राजनीति, इतिहास के मिथकों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ फैलाए जा रहे पूर्वाग्रहों का गहन अध्ययन शुरू किया। उन्होंने इतिहासकारों और सामाजिक वैज्ञानिकों के शोध का व्यवस्थित अध्ययन किया और सरल भाषा में उसके आधार पर लेखन व जनशिक्षा का कार्य प्रारंभ किया।

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देशभर में कार्यशालाएं, व्याख्यान और अध्ययन सत्र आयोजित करते हुए उन्होंने लोकतंत्र, संविधान, मानवाधिकार और सांप्रदायिकता के सवालों पर जनजागरूकता फैलाने का प्रयास किया।

डॉ. पुनियानी ने सांप्रदायिकता, आतंकवाद, सामाजिक न्याय और राष्ट्रवाद जैसे विषयों पर कई पुस्तकें लिखीं और लेखों की श्रृंखला के माध्यम से वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने पारंपरिक मीडिया के साथ-साथ ईमेल नेटवर्क, वेबसाइट और यूट्यूब जैसे डिजिटल माध्यमों का भी सक्रिय उपयोग किया ताकि तथ्य-आधारित सामग्री अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सके।

आईआईटी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद उन्होंने पूर्णकालिक रूप से अध्ययन, लेखन और जनसंवाद को अपना समय दिया। वे मानते हैं कि सामाजिक संगठनों की सबसे बड़ी चुनौती बिखराव है, और सांप्रदायिकता के खिलाफ साझा, संगठित और बहु-स्तरीय प्रयास की जरूरत है। उनके अनुसार, नफरत और गलत धारणाओं के इस दौर में सामाजिक चेतना को बदलने के लिए नियमित संवाद, तथ्य-जांच, सांस्कृतिक मेलजोल और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित राजनीतिक एकजुटता आवश्यक है। आईडीआर को दिए अपने इस साक्षात्कार में डॉ. पुनियानी सांप्रदायिकता के बढ़ते प्रभाव, सामाजिक आंदोलनों की सीमाओं, मीडिया और प्रोपेगैंडा की भूमिका, और संस्थाओं की जिम्मेदारी पर विस्तार से बात करते हैं। उनका मानना है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संस्थागत व्यवस्था से नहीं, बल्कि नागरिकों की सक्रिय भागीदारी, आपसी संवाद और संवैधानिक नैतिकता के प्रति प्रतिबद्धता से संभव है। वे एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहां विविधता, समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित हो, और जहां युवा बिना भय के संविधान की मूल भावना के साथ आगे बढ़ सकें।

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