युवा

बिटिया, आज लक्ष्मी बनो… सवाल कल पूछना!

दिवाली पर महिलाओं को लक्ष्मी मानकर पूजा जाता है, लेकिन जब वही महिलाएं अपने हक़ की बात करती हैं, तो क्या होता है? जानते हैं आज के व्यंग्य में!
पूजा-पाठ और प्रदर्शन में महिलाओं का रेखाचित्र_महिला अधिकार
चित्र साभार: चैटजीपीटी

अरे आओ-आओ बिटिया! तुम्हारा ही तो इंतज़ार था। 

क्या हुआ, इस बार फिर सड़क पर अपना हक़ मांगने निकल गई थी? कितनी बार समझाया है कि ये सब तुम्हारे काम नहीं हैं। कभी लाठियां खा लेती हो, कभी पुलिस से उलझती हो, कभी कैमरे के सामने सवाल पूछने लगती हो। फिर हमें तुम्हारी आवाज़ पर नज़र रखनी पड़ती है। 

और आजकल तो सोशल मीडिया पर भी कितना काम बढ़ गया है! तुम्हारी ट्रोलिंग, फर्ज़ी अकाउंट, डीपफेक वीडियो सबका ध्यान हमें ही रखना पड़ता है। इतना सब करने के बाद भी तुम मानती नहीं हो। 

लेकिन चलो छोड़ो, आज दिवाली है। आज तुम लक्ष्मी हो। आओ, तुम्हारी आरती उतारें! 

ये सब सवाल-जवाब कल कर लेना। 

अब हर दिन थोड़ी न दिवाली होती है, बिटिया! बाकी 364 दिन तुम जो चाहो करो! 

लेखक के बारे में

  • रवीना कुंवर, आईडीआर हिंदी में डिजिटल मार्केटिंग एनालिस्ट हैं। इससे पहले वे एक रिपोर्टर के तौर पर काम कर चुकी हैं जिसमें उनका काम मुख्यरूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण पर केंद्रित था। रवीना, मीडिया और कम्युनिकेशन स्टडीज़ में स्नातकोत्तर हैं।
  • शोभा शमी आईडीआर में सीनियर एसोसिएट- डिजिटल हैं। पिछले 14 वर्षों से वे हिंदी डिजिटल मीडिया की दुनिया में ऐसी कहानियों को आवाज़ देने की कोशिश कर रही हैं, जो अक्सर किनारे पर ही छूट जाती हैं। आईडीआर में आने से पहले शोभा दैनिक भास्कर, अमर उजाला, नेटवर्क-18, डॉयचे वेले (डीडब्ल्यू), स्कूपव्हूप और एशियाविले न्यूज़ जैसे मीडिया संस्थानों में भी काम कर चुकी हैं। उन्होंने पीपुल्स आर्काइव ऑफ़ रूरल इंडिया (पारी) के लिए अनुवाद का काम भी किया। हाशिए पर खड़े लोगों की कहानियां शोभा के दिल के सबसे करीब हैं। वे उन सवालों की तरफ़ बार-बार लौटती हैं, जो जाति, जेंडर, सेक्सुअलिटी और समाज की परतों में छिपे होते हैं।