वो हालात जब एक आंदोलनकर्ता सिर्फ आंदोलनकर्ता नहीं रह जाता, वो एक “बुरा आंदोलनकर्ता” बन जाता है। राह से गुजरते लोग उस पर हंसते हैं, पुलिस-मीडिया उनका मजाक बनाता है और सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जाता है। पर फिर भी इन दिनों देश के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग मुददों पर हो रहे आंदोलनों में ऐसे “बुरा आंदोलनकर्ता” दिख ही जाते हैं।










लेखक के बारे में
- जूही मिश्रा आईडीआर हिंदी में ऑपरेशन्स हेड हैं। उन्हें पत्रकारिता का 14 साल का अनुभव है और उन्होंने पत्रिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, रोर मीडिया, दूता टेक्नोलॉजी और ग्राम वाणी के साथ काम किया है। जूही ने विकास संवाद संस्था से फेलोशिप पूरी की है, जहां उन्होंने बसोर समुदाय में खाद्य प्रणालियों और कुपोषण के कारणों पर शोध किया।
- रवीना कुंवर, आईडीआर हिंदी में डिजिटल मार्केटिंग एनालिस्ट हैं। इससे पहले वे एक रिपोर्टर के तौर पर काम कर चुकी हैं जिसमें उनका काम मुख्यरूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण पर केंद्रित था। रवीना, मीडिया और कम्युनिकेशन स्टडीज़ में स्नातकोत्तर हैं।



