जलवायु परिवर्तन से लेकर सरकारी विभागों तक से जूझता थारू समुदाय

Location Iconलखीमपुर खीरी जिला, उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में थारू आदिवासी समुदाय के लोग सदियों से जंगल के आसपास बसे हुए हैं। हमने इन जंगलों की वनस्पतियों और जीवों की रक्षा की और बदले में जंगल ने हमें बहुत कुछ दिया। जैसे लकड़ियां, जिसका उपयोग हमने खाना पकाने और घर बनाने में किया। लेकिन साल 1977 में जब से दुधवा नेशनल पार्क का निर्माण हुआ, तब से हमारा समुदाय विस्थापन के साथ-साथ वनोपज तक पहुंच को लेकर कई तरह के प्रतिबंधों का सामना कर रहा है।

वन विभाग हमें अतिक्रमणकारियों के रूप में देखता है। हम यहां 300 सालों से बसे हुए हैं लेकिन इसके बावजूद विभाग हमें हमारी ही ज़मीन पर खेती करने से रोकता है। ऐसा तब है जब हमारे तीन गांवों में लोगों को व्यक्तिगत वन अधिकार प्राप्त हो चुके हैं, और 20 सामुदायिक वन अधिकार के दावे हैं जो आज भी मंजूरी का इंतज़ार कर रहे हैं।

पहले हम अपनी सीमित ज़मीन पर गन्ना और चावल उगाते थे। लेकिन जो चीनी मिलें हमसे गन्ना खरीदती थीं, वे महीनों तक हमें पैसा नहीं देती थीं। इसलिए अब हम ज्यादातर समय अपना मुख्य भोजन गेहूं और चावल ही उगाते हैं।

लेकिन इसमें भी हमें चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पिछले तीन-चार सालों से बारिश का समय आगे-पीछे हो गया है। मॉनसून से पहले की बारिश जो जून की शुरुआत में आती थी और बीज के अंकुरण में मदद करती थी, अब गायब हो गई है। इन दिनों, जुलाई में जब बारिश होती भी है, तो मूसलाधार बारिश होती है। यदि कोई किसान इस दौरान बीज बोता है तो भारी बारिश से पौधे बह जाते हैं। फसल के मौसम के दौरान फिर से बारिश होने लगती है इसलिए हमारे लिए फसल का भंडारण कर पाना मुश्किल हो जाता है।

सरकार द्वारा संचालित बाजार शहर में बहुत दूर हैं। अगर कोई किसान अपनी उपज के साथ वहां पहुंचने में कामयाब भी हो जाता है, तो उसे इसे बेचने से के लिए कई दिनों तक लाइन में लगकर इंतजार करना पड़ता है। इससे फसल खराब होने का खतरा रहता है। हमारे लोग अब बिचौलियों को बेचना पसंद करते हैं, भले ही वे इसकी कम कीमत ही क्यों न दे रहे हों।

बाजार तक हमारी पहुंच को सुविधाजनक बनाने या हमें अपनी ज़मीन के दावे देने की जगह, सरकार हमें कह रही है कि कि हम सार्वजनिक वितरण प्रणाली से दिये चावल खाएं। वह चावल निम्न गुणवत्ता का होता है और हम लोग उसे नहीं खाना चाहते हैं। हम अक्सर इसे राशन की दुकानों को बेच देते हैं और बदले में पैसे ले लेते हैं।

निबादा राना थारू आदिवासी महिला मजदूर किसान मंच की उपाध्यक्ष हैं। सहबिनया राना थारू आदिवासी महिला मजदूर किसान मंच की महासचिव हैं। 

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