10,000 किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के लिए मौजूद केंद्रीय योजना भारत के लंबे सहकारी आंदोलन पर आधारित है। 2003 में कंपनी अधिनियम, 1965 में बदलाव किए गए ताकि पारंपरिक सहकारी समितियों की कमियों को दूर किया जा सके। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में लचीली और बाजार-केंद्रित संस्थाएं बनाना था। साथ ही लघु और सीमांत किसान सदस्यों के स्वामित्व के अधिकार को बनाए रखना भी इसका एक लक्ष्य था। इसलिए किसान उत्पादक संगठनों को पिछली सहकारी समितियों की सफलताओं और चुनौतियों से सीखना चाहिए।
20वीं सदी की शुरुआत से ही सहकारी समितियों ने कृषि, ऋण, डेयरी और हस्तशिल्प जैसे सेक्टरों के विकास में प्रमुख भूमिका निभायी है। डेयरी और चीनी उद्योग जैसी सफल सहकारी समितियों में अनुसंधान, प्रशीतन और भंडारण सुविधाओं तथा परिवहन जैसे सहायक बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश हुए हैं। 1979 में सहकारी समितियों की प्रबंधकीय क्षमता विकसित करने के लिए ग्रामीण प्रबंधन संस्थान आनंद (आईआरएमए) की स्थापना की गई थी। ये सभी सफलताएं संस्थाओं को धैर्य-पूर्ण सहयोग प्रदान कर, सदस्यों की क्षमता बढ़ाकर, और लगातार बाजार से जुड़कर धीरे-धीरे हासिल हुई थी।
लेकिन कई सहकारी संस्थाएं केवल ऊपरी स्तर पर काम करती थी और सिर्फ लक्ष्य पूरे करने पर केंद्रित थी। इसका परिणाम यह हुआ कि कागजों पर तो इनकी संख्या बड़ी दिखती थी, लेकिन जमीनी स्तर पर लोगों की भागीदारी बहुत कम थी। धीरे-धीरे इनमें नौकरशाही हावी होने लगी, नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करने का दबाव बढ़ा और राज्य की निगरानी में इजाफा हुआ। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी होने के साथ-साथ किसानों की जरूरतों के प्रति उनकी संवेदनशीलता कम हो गई। कई मामलों में बोर्ड और नेतृत्व में संपन्न किसानों का दबदबा साफ दिखता था, जिन्होंने इन संस्थाओं का इस्तेमाल सब्सिडी, ऋण और इनपुट हासिल करने के लिए किया। उनके द्वारा सीमांत और भूमिहीन किसानों को बाहर रखा जाता था और कई बार उन्हें शोषण का सामना भी करना पड़ता था।
इसके अलावा, सहकारी समितियां अक्सर पूंजी के लिए सरकार पर निर्भर रहती थी। इसके बदले में सहकारी समितियों को अपने बोर्ड में सरकारी अधिकारियों को शामिल करना पड़ता था। इससे समितियों में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ता गया और सामुदायिक विश्वास कम होता गया। किसान मुख्य रूप से सरकारी सब्सिडी और इनपुट प्राप्त करने के लिए सहकारी समितियों से जुड़े थे। जैसे-जैसे ये प्रोत्साहन कम होते गए, समितियों में उनकी रुचि और भागीदारी भी कम होती गई।
इन चुनौतियों से स्पष्ट होता है कि एफपीओ योजना को लागू करने के मौजूदा तरीकों पर फिर से विचार करने की जरूरत है। यह भी आवश्यक है कि एफपीओ समुदायों में अपनी जड़ें जमा सकें और स्थिर व टिकाऊ विकास को सुनिश्चित करें। सहकारी समितियों के अनुभव से यह सीख भी मिलती है कि सदस्यों के स्वामित्व, सुशासन और मजबूत संस्थागत ढांचे की जगह प्रगति और बढ़त को तरजीह देना नुकसानदेह हो सकता है।
टिकाऊ सामूहिक संगठनों के लिए सीख
फरवरी 2025 में यह सरकारी घोषणा हुई कि 10,000 एफपीओ का लक्ष्य हासिल कर लिया गया है। जून 2025 तक, इन संगठनों ने 5,035.50 करोड़ रुपये से अधिक का सामूहिक कारोबार किया था। हालांकि, योजना के दृष्टिकोण में कुछ खामियां हैं। इसलिए सहकारी समितियां पहले जो समस्याएं झेलती थी, उनका जोखिम अभी भी बरकरार है। ये चुनौतियां मुख्यतः सामुदायिक स्वामित्व और एफपीओ की संस्थागत क्षमता से जुड़ी हुई हैं।
सामुदायिक स्वामित्व
जमीनी स्तर पर यह बात मायने रखती है कि क्या उत्पादक संस्था को अपना मानते हैं? स्वामित्व और सामुदायिक विश्वास की यह भावना पैदा करना एक जटिल और धीमी प्रक्रिया है।
1. धीमी शुरुआत
प्रदान की कार्यकारी निदेशक सरोज महापात्रा कहती हैं, “स्वामित्व की भावना तभी पनपेगी जब समुदाय के साथ मिलकर बॉटम-अप (नीचे से ऊपर की ओर) दृष्टिकोण को अपनाकर गहन योजना बनाई जाए। समुदाय को केवल योजना का लाभार्थी बनने के बजाय प्राथमिकताओं और समाधानों की पहचान करने में भागीदार होना चाहिए।” प्रदान जमीनी स्तर से सामूहिक संगठनों का निर्माण करता है। इसके तहत पहले स्वयं सहायता समूह का निर्माण होता है, और फिर धीरे-धीरे उन्हें उत्पादक समूहों और आगे चलकर एफपीओ के रूप में विकसित किया जाता है।
पैन हिमालयन ग्रासरूट्स डेवलपमेंट फाउंडेशन में सामुदायिक पहल की पूर्व निदेशक अनीता पॉल, जो समग्र पर्वतीय विकास पहल पर काम करती हैं, कहती हैं कि एफपीओ की स्थापना की प्रक्रिया 1990 के दशक में पानी की कमी के मुद्दों को दूर करने के साथ शुरू हुई थी। इससे महिला समूहों का गठन हुआ, जो बाद में बचत और ऋण पर केंद्रित एसएचजी के रूप में विकसित हुए। समय के साथ, महिलाओं ने महसूस किया कि इन समूहों ने उन्हें सामूहिक पहचान दी, जिससे उनकी आवाज (एजेंसी) मजबूत हुई। वर्ष 2000 के दशक के प्रारंभ में, एसएचजी ने आजीविका गतिविधियां शुरू की। साथ ही उन्होंने कृषि उपज और लघु-स्तरीय शिल्पों का मूल्यवर्धन (वैल्यू ऐडिशन) भी किया। लगभग एक दशक के सहयोग के बाद, महिलाओं ने बाजार-उन्मुख काम का प्रबंधन करने की इच्छा व्यक्त की। वर्ष 2009 में, उन्होंने अपने सामूहिक प्रयास को औपचारिक रूप देने का निर्णय लिया और महिला उमंग प्रोड्यूसर कंपनी का पंजीकरण कराया, जो क्षेत्र के शुरुआती महिला-नेतृत्व वाले उत्पादक समूहों में से एक बनी।

2. सदस्यों में जागरूकता और आम सहमति सुनिश्चित करना
संस्थापक के नेतृत्व वाले स्टार्ट-अप आमतौर पर एक या संस्थापकों के एक छोटे समूह के स्वामित्व वाले होते हैं। इनमें निर्णय लेना अपेक्षाकृत सरल होता है। इसके विपरीत, एफपीओ की सदस्यता 50 से 1,000 लोगों तक अलग-अलग हो सकती है। निजी क्षेत्र की कंपनियों के विपरीत, जहां वोट का अधिकार शेयरों की संख्या पर निर्भर करता है, एफपीओ में ‘एक सदस्य, एक वोट’ का सिद्धांत लागू होता है। इससे छोटे उत्पादकों को भी बराबरी का अधिकार और निर्णय लेने में समान भागीदारी मिलती है। इसके अलावा, 10-15 सदस्यों वाले निदेशक मंडल के सभी निर्णय सर्वसम्मति से होते हैं। इसलिए, सुशासन के लिए सदस्यों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों की जानकारी होना बहुत महत्वपूर्ण है। अगर सदस्य सक्रिय और जागरूक नहीं रहेंगे, तो एफपीओ के निर्णय से केवल ताकतवर लोगों को लाभ होगा और किसानों के हित को नुकसान पहुंचेगा। इसलिए, निदेशक मंडल को अपनी टीम और सभी सदस्यों के साथ नियमित बैठकें करनी चाहिए ताकि उद्देश्य स्पष्ट रहे और किसी भी विवाद का समाधान हो पाए।
कभी-कभी उत्पादकों और संस्था के हित आपस में टकरा सकते हैं। उदाहरण के लिए, किसान अलग-अलग किस्म के बीज चाहते हैं, लेकिन एफपीओ के लिए एक ही किस्म की बड़ी मात्रा में खरीद आर्थिक रूप से सही हो सकती है। ऐसे मामलों में, आम सहमति बनाने में जल्दबाजी नहीं की जा सकती। उत्पादकों को यह विश्वास होना चाहिए कि सामूहिक निर्णयों से उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा। साथ ही, निर्णयकर्ता को दक्षता और निष्पक्षता के बीच संतुलन बनाना चाहिए। इससे किसानों के बीच विश्वास बढ़ता है। जब निर्णय ऊपर से थोपे जाने के बजाय साझा विचार-विमर्श से लिए जाते हैं, तो यह सदस्यों में स्वामित्व की भावना और संस्था की सामाजिक एकता को मजबूत बनाता है। अनीता कहती हैं कि उमंग को एक सामुदायिक स्वामित्व वाले सामाजिक उद्यम के रूप में सफल बनाने के लिए सभी सदस्यों के साथ सहभागिता की शर्तों पर पर कई बार बातचीत करनी पड़ी थी।
3. सामाजिक-आर्थिक असमानताओं और पूर्वाग्रहों से निपटना
मजबूत सामुदायिक स्वामित्व की अपनी चुनौतियां हैं। समाज में मौजूद राजनीतिक और सामाजिक ढांचे, जैसे लिंग और जाति से जुड़ी असमानताएं, एफपीओ के संचालन को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, अक्सर बाजार के विक्रेता मौजूदा पूर्वाग्रहों के कारण बोर्ड की महिला सदस्यों को नजरअंदाज कर सकते हैं। एक एफपीओ में, एक उपेक्षित जाति की बोर्ड सदस्य के पास वित्तीय कौशल और रुचि थी, लेकिन अन्य सदस्यों ने उसे नजरअंदाज कर बाहर कर दिया। वे उसके घर और गांव में किसी भी कार्यक्रम में जाने से भी कतराते थे। सामूहिक उद्यमों को विकसित करने और गति देने के लिए सेवा भारत और सेवा सहकारी संघ द्वारा विकसित महिला उद्यम सहायता प्रणाली और प्रबंधन टीम को इस मुद्दे को सुलझाने के लिए मध्यस्थता करनी पड़ी। इस सदस्य द्वारा प्रस्तुत वित्तीय और सामुदायिक-नेतृत्व कौशल को स्वीकार करने और उसकी सराहना करने में सभी हितधारकों को वर्षों लग गए।
एक और चुनौती तब सामने आती है जब सदस्यों की भागीदारी स्थिर हो जाती है। अनीता कहती हैं, “किसी संगठन को जीवंत रखने के लिए एसएचजी, निदेशक मंडल और स्थानीय नेतृत्व वाली पेशेवरों की टीम में बदलाव जरूरी है। लेकिन सवाल है कि यह क्षमता निर्माण कौन करेगा?”
संस्थागत क्षमता
10,000 एफपीओ योजना में केवल पंजीकरण संख्या और लक्ष्यों पर ध्यान देने के कारण कई संस्थाओं के निर्माण में नियमों की अनदेखी की गयी। वर्तमान में एफपीओ के पास रिकॉर्ड रखने, रिटर्न फाइल करने और व्यावसायिक योजना बनाने की व्यवस्थित क्षमता नहीं है। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि अगर एफपीओ समय पर करों का भुगतान करने या बोर्ड बैठकों के विवरण प्रस्तुत करने में विफल रहते हैं, तो उन्हें जुर्माना और भारी दंड का सामना करना पड़ सकता है।
जब निर्णय ऊपर से थोपे जाने के बजाय साझा विचार-विमर्श से लिए जाते हैं, तो यह स्वामित्व की भावना और संस्था की सामाजिक एकता को मजबूत बनाता है।
योजना के मुख्य बजट में बुनियादी ढांचे और सेवाओं, जैसे गोदाम, लॉजिस्टिक, ऋण, बाजार तक पहुंच या विपणन के लिए निवेश भी शामिल नहीं है, जिनकी एफपीओ को व्यवसाय करने के लिए आवश्यकता होती है। इसके बजाय यह योजना बाजार की शक्तियों और अन्य सरकारी योजनाओं के साथ तालमेल पर बहुत अधिक निर्भर करती है।
एफपीओ अपनी क्षमता निर्माण, नियम अनुपालन और बाजार से जुड़ाव के लिए बाहरी क्लस्टर-आधारित व्यावसायिक संगठनों (सीबीबीओ) पर निर्भर हैं। इनमें गैर-लाभकारी संस्थाएं और नागरिक समाज संगठन (सीएसओ) शामिल हैं। तकनीकी एजेंसियां, गैर-लाभकारी संस्थाएं और सीएसओ, बोर्ड तथा कार्यकारी टीम को सदस्यता बढ़ाने, शासन, निर्णय लेने, कानूनी और वित्तीय अनुपालन, तथा व्यावसायिक रणनीति और संचालन में सहायता प्रदान करते हैं।
हालांकि ये लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं, लेकिन तीन से पांच साल की समय-सीमा के भीतर इन्हें पूरा करने का दबाव व्यावहारिक नहीं है। तीन साल में लागत की भरपाई हो सकती है, लेकिन जागरूकता बढ़ाने, क्षमता निर्माण और स्वायत्त शासन को सक्षम बनाने में अधिक समय लगता है।
अधिकांश क्षमता निर्माण काम करते हुए ही होता है। इसमें समुदाय को सुरक्षित रूप से जोखिम उठाने और उनसे सीखने का अवसर देना शामिल है। छोटे उत्पादक सीमित सामाजिक और वित्तीय संसाधनों के कारण जोखिम उठाने से कतराते हैं। जब सेवा ने बिहार स्थित एक किसान उत्पादक संगठन के लिए धान की खरीद 6 मीट्रिक टन से बढ़ाकर 60 मीट्रिक टन करने की योजना प्रस्तावित की, तो उसे बोर्ड से विरोध का सामना करना पड़ा। 770 महिला किसानों वाले एफपीओ को विश्वास नहीं था कि यह संभव है, और वे इसके लिए ऋण लेने से हिचकिचा रहे थे। उन्हें मनाने में महीनों लग गए। 65 मीट्रिक टन धान की खरीद पूरी करने के बाद ही बोर्ड और सदस्य बड़े पैमाने पर खरीद के लिए सहमत हुए।

सरोज कहती हैं, “समुदाय में शासन और सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को स्थापित करने के लिए दीर्घकालिक, व्यावहारिक सुविधा की आवश्यकता है।” डब्ल्यूईएसएस मॉडल दर्शाता है कि तकनीकी और संस्थागत समर्थन, अक्सर पांच से आठ वर्षों के लिए आवश्यक है।
नीति पर पुनर्विचार
अनीता कहती हैं, “बैकवर्ड और फॉरवर्ड लिंकेज को मजबूत करने के लिए सहायक बाजारों और बुनियादी ढांचे के अनुकूल माहौल के बिना, एफपीओ अपनी पूरी क्षमता हासिल नहीं कर पाएंगे।” यहां तक कि स्वतंत्र उद्यमों को भी बाद में तकनीकी विकास, उत्पाद के बाजार में अप्रचलित होने या प्राकृतिक आपदाओं के कारण संकटों का सामना करना पड़ सकता है।
1. स्थिर और चरणबद्ध विकास
एफपीओ की स्थिरता के लिए नीतियों में चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाना होगा। जैसे, इनक्यूबेशन, पंजीकरण, बुनियादी प्रशिक्षण और व्यवस्था का विकास, वृद्धि, परिपक्वता, अधिक बाजार संपर्क और काम का बड़े पैमाने पर विस्तार। प्रत्येक चरण में अनुकूल सहायता प्रणालियां, स्पष्ट लक्ष्य और उपयुक्त वित्तीय साधन शामिल होने चाहिए। एक चरण से दूसरे चरण में जाना प्रशासनिक परिपक्वता और सदस्यों की सहभागिता पर निर्भर हो सकता है। चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ने से सदस्यों में स्वामित्व की भावना और जोखिम लेने की क्षमता बढ़ती है।
2. ढांचागत (इन्फ्रास्ट्रक्चर) सहयोग
सहकारी समितियों के मामले में, मजबूत ढांचागत (इन्फ्रास्ट्रक्चर) सहयोग ने डेयरी और चीनी उद्योगों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मौजूदा बजट एफपीओ के लिए ऐसे ढांचे विकसित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। जैसे स्टार्ट-अप्स को बढ़ने के लिए इनक्यूबेटर और एक्सेलेरेटर का सहयोग मिलता है, वैसे ही सामूहिक संगठनों को भी उनकी विशिष्ट जरूरतों के अनुरूप एक सहयोगी व्यवस्था मिलनी चाहिए। सभी के लिए एक समान मॉडल लागू किया जाना उपयुक्त नहीं है। इसी तरह, जैसे सहकारी क्षेत्र को मजबूती और पेशेवर रूप देने के लिए आईआरएमए की स्थापना की गई थी, वैसे ही क्षेत्रीय या राष्ट्रीय संस्थाएं एफपीओ को भी सपोर्ट दे सकती हैं। नीतियां ऐसे इनक्यूबेटर और सहायक सिस्टम का निर्माण भी कर सकती हैं, जो छोटे किसानों और उत्पादकों को निरंतर सहायता प्रदान करे। जैसे, नियम-पालन में सहायता, बाजार की जानकारी, नेतृत्व के लिए प्रशिक्षण और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए सपोर्ट। इससे अस्थायी क्लस्टर-आधारित व्यावसायिक संगठनों पर निर्भरता कम होगी।
3. विविध और मजबूत संस्थाएं
सफल सहकारी समितियां अक्सर एकल वस्तुओं पर केंद्रित रही हैं। हालांकि, घटती भूमि जोत और इस क्षेत्र में जलवायु संबंधी अस्थिरता को देखते हुए, कृषि आधारित सामूहिक संगठनों में विविधता लाने की आवश्यकता है। सरोज कहती हैं, “300 सदस्यों के साथ (जो पॉलिसी में न्यूनतम आवश्यकता है), बड़े पैमाने पर काम करने का लाभ पाना (इकोनॉमीज ऑफ स्केल) मुश्किल है। एफपीओ को वित्तीय रूप से टिकाऊ बनाने के लिए पर्याप्त संख्या में सदस्य चाहिए, और यह संख्या हर राज्य या क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार तय होनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र जैसे राज्यों में एक टिकाऊ एफपीओ के लिए 2500–3000 सदस्यों की जरूरत हो सकती है। वहीं पूर्वोत्तर राज्यों में आबादी कम होने के कारण छोटी संख्या भी व्यावहारिक मानी जाएगी।
संघीय (फेडरेटेड) संरचनाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। संघीय एफपीओ मॉडल (उत्पादक समूह–एफपीओ–जिला–राज्य) छोटे उत्पादकों को अपना उत्पादन और बाजार से जुड़ाव बढ़ाने, संयुक्त बुनियादी ढांचे के स्वामित्व को सक्षम बनाने और लॉजिस्टिक्स व ऑडिट जैसी सेवाओं का साझा उपयोग करने में मदद कर सकता है। इससे अलग-अलग एफपीओ पर नियमों और अनुपालन का बोझ कम हो सकता है।
अंत में, एक मजबूत एफपीओ व्यवस्था के लिए आवश्यक है कि कृषि, ग्रामीण विकास, सहकारिता, खाद्य प्रसंस्करण जैसे मंत्रालय और विभाग मिलकर काम करें, ताकि नीतियों, बजट और योजनाओं में आपसी तालमेल सुनिश्चित हो सके। इस दृष्टिकोण से संगठित मूल्य शृंखलाएं मजबूत होंगी। साथ ही, इससे वित्तीय और तकनीकी सहायता आसान बनती है, और नीतियों में आपसी तालमेल की कमी को दूर करने में मदद मिलती है जो वर्तमान में एफपीओ की वृद्धि को रोकती है। इससे यह भी सुनिश्चित हो सकता है कि बुनियादी ढांचा, ऋण और क्षमता निर्माण में निवेश अलग-अलग न होकर एक साथ हों। एक सशक्त और सक्रिय एफपीओ समुदाय के लिए यह आवश्यक है कि सरकार, नागरिक समाज, तकनीकी साझेदार और बाजार मिलकर काम करें। यदि सामुदायिक स्वामित्व और सुशासन को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो सहकारी आंदोलन की पुरानी गलतियां दोहराने का खतरा बना रहेगा।
इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें।
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