January 20, 2022

भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं को संचालित करने वाले क़ानून

भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं के कामकाज से जुड़ी दस ऐसी बातें जिनका संबंध वर्तमान क़ानूनी ढाँचे से है।
9 मिनट लंबा लेख

भारत में नागरिक समाज को चलाने वाला कानूनी ढाँचा लगातार विकसित हो रहा है, और भारत में क़ायदे-कानूनों की एक भूलभूलैया है जो स्वयंसेवी संस्थाओं के संचालन, उनकी फ़ंडिंग और उनके कर-संबंधी कामकाज को प्रभावित करती हैं। स्वयंसेवी कानून के अंतरराष्ट्रीय केंद्र की इंडिया फ़िलांथ्रोपी लॉ रिपोर्ट 2019 में इन कानूनों के बारे में बताया गया है, जिसमें हालिया कानूनों को हाइलाइट किया गया है तथा इस बात का विश्लेषण किया गया है कि भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं के कामकाज पर उनका क्या प्रभाव पड़ेगा। इस रपट की दस प्रमुख बातें: 

1. भारत में स्वयंसेवी संस्थाएँ आमतौर पर तीन में से एक कानूनी रूप को अपनाती हैं

स्वयंसेवी संस्थाओं का पंजीकरण या तो चैरिटेबल ट्रस्ट, सोसाइटी या सेक्शन 8 के तहत कंपनी के रूप में होता है। एक आकलन के मुताबिक फ़िलहाल भारत में 3.3 मिलियन स्वयंसेवी संस्थाएँ हैं, हालाँकि इनमें बहुत सारी ऐसी संस्थाएँ भी हो सकती हैं जो अब सक्रिय नहीं हैं।

तीनों अलग अलग प्रकार की संस्थाओं का संचालन अलग अलग क़ायदों के मुताबिक़ होता है। चैरिटेबल ट्रस्ट और सोसाइटी आमतौर पर राज्य के कानून के अंतर्गत आते हैं जो अलग अलग राज्य में अलग अलग होता है, जबकि सेक्शन 8 के तहत बनी कंपनियाँ (सार्वजनिक और निजी) केंद्र की भारतीय कम्पनी अधिनियम, 2013, के दायरे में आती हैं।

भारत में स्वयंसेवी संस्थाएँ अनौपचारिक संस्था के रूप में काम करने का चुनाव भी कर सकती हैं, लेकिन ऐसा करते हुए वे कर में छूट हासिल नहीं कर सकती हैं और न ही उनके दानकर्ताओं को कर में कटौती का लाभ मिल सकता है।   

2. स्वयंसेवी संस्था के पंजीकरण में तक़रीबन तीन से चार महीने का समय लग सकता है

इसके अलावा, आयकर विभाग को कर में छूट का दर्जा (आयकर अधिनियम 1961 का सेक्शन 12एए) देने तथा दानकर्ता के कर में कटौती (सेक्शन 80जी) की प्रक्रिया में तीन से छह महीने का समय और लग सकता है। स्वयंसेवी संस्था जब विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम (एफ़सीआरए), 2010, के तहत विदेश से फंड लेने के लिए आवेदन देते हैं तो इस प्रक्रिया में तीन से छह महीने का समय लग सकता है।

हालाँकि, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले ट्रस्ट, सोसाइटी और सेक्शन 8 कम्पनियों के पंजीकरण की प्रक्रिया अधिक तेजी से पूरी की जा सकती है (एडवोकेसी से जुड़ी संस्थाओं या ऐसी संस्थाओं के मुक़ाबले जिनको व्यावसायिक गतिविधियाँ चलाते देखा जाता हो)।

3. स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा किस तरह की गतिविधियाँ की जा सकती हैं इसको लेकर कुछ प्रतिबंध हैं

भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं के विस्तृत प्रकार की राजनीतिक गतिविधियों, जिनमें राजनीतिक प्रचार या सीधे तौर पर किसी राजनीति की हिमायत करने को लेकर रोक है। हालाँकि, वे सांसदों-विधायकों, सरकारी अधिकारियों, या मीडिया से बात कर परोक्ष रूप से राजनीति की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।

भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं के विस्तृत प्रकार की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने पर रोक है।

हालाँकि किसी स्वयंसेवी संस्था की किस प्रकार की गतिविधियों को ‘राजनीति’ कहा जाए यह स्पष्ट नहीं है, भारत की अदालतों का यह फ़ैसला है कि ऐसी कोई संस्था जिसका प्राथमिक लक्ष्य राजनीति हो, चैरिटेबल मकसद से उसकी स्थापना नहीं हो सकती।

ट्रस्ट, सोसाइटी तथा सेक्शन 8 कम्पनियों की प्रासंगिक आर्थिक गतिविधियों पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं है। किसी स्वयंसेवी संस्था को अपनी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए अलग खाता रखना चाहिए, और उससे हासिल होने वाले किसी लाभ को पूरी तरह से स्वयंसेवी संस्था के प्राथमिक चैरिटेबल उद्देश्य में लगा देना चाहिए।

हालाँकि, अगर किसी स्वयंसेवी संस्था की आय अगर दान और अनुदान से प्राप्त आय के बीस प्रतिशत से अधिक हो जाती है तो कर से छूट संबंधी उसका दर्जा समाप्त किया जा सकता है और उनके ऊपर अधिक्तम गैर मामूली कर दर 30 प्रतिशत के आधार पर लगाया जा सकता है।  

4. कंपनीज अधिनियम 2013 में सुधार किया गया ताकि कारपोरेट सामाजिक दायित्व अनुपालन को मजबूत बनाया जा सके 

2013 के कंपनी अधिनियम में यह कहा गया है कि ऐसी कंपनियाँ जिनकी शुद्ध संपत्ति पाँच बिलियन या जिनका सालाना टर्न ओवर 10 बिलियन हो उनके लिए यह आवश्यक है कि वे हर वित्तीय वर्ष के दौरान कर देने से पहले के कुल लाभ का कम से कम दो प्रतिशत सीएसआर से जुड़ी गतिविधियों के मद में खर्च करें। अगर कंपनियाँ इनका पालन नहीं कर पाती हैं तो कंपनी को अपने सालाना रपट में इसके बारे में स्पष्टीकरण देना चाहिए, और उनको बिना किसी तरह की कानूनी कार्रवाई के शेष राशि को खर्च करना चाहिए।   

हालाँकि, कंपनीज (सुधार) अधिनियम, 2019, के अनुच्छेद 21 के तहत जो कंपनी पूरी राशि को खर्च नहीं कर पाती है वह रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया अधिनियम, 1934, की दूसरी अनुसूची के तहत शेष राशि को अनुबंध के आधार पर किसी बैंक में जमा कर सकती है, और उस राशि को तीन साल के अंदर सीएसआर से जुड़ी गतिविधियों में खर्च कर सकती हैं। अगर वह अभी भी तीन साल के अंतर्गत उस राशि को खर्च नहीं कर पाती है या उसकी कोई परियोजना चल नहीं रही हो तो उसको कंपनीज अधिनियम 2013 की सातवीं अनुसूची में बताए गए फंड में राशि को डाल देना चाहिए। इनमें प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष या सामाजिक-आर्थिक विकास को लेकर, राहत या हाशिए के लोगों के कल्याण को लेकर सरकार द्वारा स्थापित कोई कोष शामिल हैं। जनवरी 2020 तक यह प्रावधान लागू नहीं हुआ है।

पुस्तकालय में क़ानून की किताबें_स्वयंसेवी संस्था
भारत में नागरिक समाज को नियंत्रित करने वाला कानूनी ढांचा तेजी से विकसित हो रहा है | चित्र साभार: फ़्लिकर

5. किसी भी स्वयंसेवी संस्था का पंजीकरण रद्द किया जा सकता है अगर वह ऐसी किसी भी गतिविधि में संलग्न पाई जाती है जो उसकी स्थापना संबंधी दस्तावेज में दर्ज नहीं हो

आयकर अधिनियम 1961 के खंड 12एए का संबंध स्वयंसेवी संस्थाओं को कर में दी जाने वाली छूट से है, जिसमें वित्त अधिनियम (संख्या 2) 2019 के तहत सुधार किया गया। इस सुधार के बाद प्रधान कमिश्नर या इनकम टैक्स कमिश्नर को इसकी अनुमति मिल गई कि वह किसी ऐसे चैरिटेबल ट्रस्ट के पंजीकरण को रद्द कर सकता है जो ऐसी गतिविधियों, कार्यक्रमों या परियोजनाओं में शामिल हो जो ट्रस्ट अनुबंध पत्र, स्मरण पत्र और संबद्ध विषयों की सूची में शामिल नहीं हो।

पंजीकरण को रद्द किए जाने से संस्था को मिलने वाले कर संबंधी लाभों पर प्रभाव पड़ सकता है। संस्था को 30 प्रतिशत की दर से सालाना आयकर देना होगा, साथ ही अतिरिक्त आय पर भी कर देना होगा; अर्थात वह राशि जिसके द्वारा कुल संपत्ति का कुल उचित बाजार मूल्य संस्था की कुल कर देयता से अधिक है। यह बाद वाला जो क़ायदा है वह ऐसी संस्थाओं के लिए बहुत महत्व रखता है जिनके पास अचल संपत्ति होती है।

किसी संस्था या सेक्शन 8 कम्पनी की स्थापना किसी लक्ष्य विशेष की पूर्ति के लिए की गई है और वे उस लक्ष्य को पूरा कर लेती है या फिर अब वह लक्ष्य प्रासंगिक नहीं रह जाता है या फिर संस्था की संचालन समिति की दिलचस्पी खत्म हो जाती है तब उस स्थिति में वे अपनी को संस्था बंद कर सकते हैं।

अगर सरकार को ऐसा लगता है कि किसी सोसाइटी या सेक्शन 8 कंपनी की गतिविधियाँ ‘राष्ट्रीय हित या देश की संप्रभुता एवं अखंडता के विरुद्ध’ है तो वह उस सोसाइटी या सेक्शन 8 कंपनी को बंद कर सकती है। 

6. स्वयंसेवी संस्थाओं के ट्रस्टियों तथा अधिकारियों के लिए यह ज़रूरी है कि वे लोकपाल या लोकायुक्त अधिनियम 2013 के तहत अपने संसाधनों को घोषित करें

लोकपाल तथा लोकायुक्त अधिनियम 2013 के खंड 44 के तहत सरकारी सेवकों के लिए यह जरूरी है कि वे गृह मंत्रालय को अपने संसाधन का ब्योरा दें। चैरिटेबल संस्थाओं के ट्रस्टियों और पदाधिकारियों को वैसी स्थिति में सरकारी सेवक माना जाता है जब उस संस्था को एक वित्तीय वर्ष के दौरान भारतीय रुपए में 10 मिलियन से अधिक या एक मिलियन रुपए से अधिक का सरकारी अनुदान मिलता हो।

इस अधिनियम के अंतर्गत विशेष क़ायदों को अभी अंतिम रूप दिया जा रहा है।   

7. भारतीय स्वयंसेवी संस्थाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने की अनुमति नहीं है और उनके फंड को भारत में ही खर्च किया जाना चाहिए

भारतीय संस्थाओं के लिए प्रतिबंध केवल उसी स्थान पर लागू नहीं रहती है जिस स्थान पर वे काम करती हैं, बल्कि वह विदेशी फंड की स्वीकृति पर भी लागू होता है।

उदाहरण के लिए, अगर किसी स्वयंसेवी संस्था के लिए कोई भारतीय नागरिक विदेश से धन जुटाता है तो एफसीआरए के अंतर्गत उसे विदेशी सहयोग माना जाएगा। इसी तरह अगर भारत के बाहर का कोई नागरिक भारतीय मुद्रा में धन जुटाता है तो उसे विदेशी योगदान माना जाएगा। इसके विपरीत, प्रवासी भारतीयों के धन को विदेशी निवेश के रूप में नहीं देखा जाएगा, बशर्ते कि वह आदमी किसी दूसरे देश का नागरिक न हो गया हो। 

8. एफसीआरए के अन्तर्गत पंजीकृत संस्थाओं के ऊपर नगदी के उपयोग तथा वे विदेशी फंड का उपयोग किन मक़सदों से कर सकते हैं इसको लेकर पाबंदी है

गृह मंत्रलाय द्वारा एफसीआरए के अनुपालन को लेकर एक दिशानिर्देश प्रकाशित किया गया था, जिसमें स्वयंसेवी संस्थाओं के एफसीआरए खाते से 2,000 से अधिक राशि के नगदी भुगतान तथा डेबिट कार्ड से निकालने को लेकर चेतावनी दी गई है। आम तौर पर विदेशी योगदान खाते के लिए डेबिट कार्ड जारी नहीं किया जाता है लेकिन जिन संस्थाओं के पास ऐसे कार्ड हों उनको नगद निकासी या ऑनलाइन भुगतान के लिए इनका उपयोग नहीं करना चाहिए। 

इस चेतावनी का सबसे बड़ा प्रभाव दूरदराज के ग्रामीण इलाक़ों में काम करने वाले नागरिक संगठनों के ऊपर पड़ने वाला है, जो नगदी अर्थव्यवस्था के आधार पर ही चलती है।

इसके अलावा, जो स्वयंसेवी संस्थाएँ विदेशी योगदान लेती हैं उनको अपने फंड का 50 प्रतिशत से अधिक प्रशासनिक मद में खर्च करने की मनाही है। इन प्रशासनिक ख़र्चों में निदेशक मंडल तथा ट्रस्टियों को दिया जाने वाला मेहनताना, दफ़्तर के खर्चे, अकाउंटिंग के खर्च आदि शामिल हैं। संस्था की मुख्य गतिविधियों से जुड़े खर्च जैसे शोधार्थियों, प्रशिक्षकों, अस्पताल के डॉक्टर या स्कूल के अध्यापकों को दिए जाने वाले वेतन को प्रशासनिक नहीं माना जाता है और उनको इस मनाही से बाहर रखा गया है।

इन अवस्थाओं का उल्लंघन होता है तो उसको क्षमायोग्य अपराध माना जाता है, जिसका मतलब यह हुआ कि संबंधित संस्थाएँ शुल्क की राशि को चुकाकर आपसी समझौते के तहत इस मामले को सलटा सकती हैं। हर अपराध के बदले में एफसीआरए न्यूनतम एक लाख रुपए की पेनाल्टी लगाती है।   

9. कुछ निश्चित संस्थाओं को दान देने से दानकर्ताओं को 100 प्रतिशत कटौती की पात्रता प्राप्त है

कुल मिलाकर, दानकर्ताओं को इसकी अनुमति है कि वे ऐसे ट्रस्ट, सोसाइटी और सेक्शन 8 कंपनी को दिए गए योगदान के आधार पर कटौती की माँग कर सकते हैं जिनको चैरिटेबल का दर्जा हासिल है। हालाँकि, ऐसी संस्थाएँ जिनको आयकर अधिनियम के 80जी के तहत सूचीबद्ध किया गया है उनको शत प्रतिशत कटौती का अधिकार प्राप्त है। इस सूची में सरकार से जुड़े अनेक फंड जैसे प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत फंड तथा साम्प्रदायिक सद्भाव संबंधी राष्ट्रीय न्यास आदि शामिल हैं।  

कर में 10 हजार रुपए से अधिक की किसी भी कटौती के लिए यह जरूरी है कि भुगतान नगद में न किया जाए।

दानकर्ताओं को यह बात दिमाग में रखनी चाहिए कि कुल कटौती उनके सकल आय के दस प्रतिशत से अधिक न हो, और कर में कटौती के योग्य होने के लिए 10 हजार रुपए से अधिक का कोई भी योगदान नगद में नहीं किया जाना चाहिए।

10. विदेशी स्रोतों से व्यावसायिक प्राप्तियों को विदेशी योगदान की तरह नहीं देखा जाता

अगर कोई घरेलू स्वयंसेवी संस्था जिसका एफसीआरए के तहत पंजीकरण नहीं किया गया है व्यावसायिक सेवा के एवज में विदेशी धन को प्राप्त करती है तो इस बारे में उसको एफसीआरए विभाग को सूचित करने की ज़रूरत नहीं है।

खंडन: यहाँ जो सूचनाएँ दी गई हैं वे इसके लेखक के भारत में वर्तमान में प्रचलित क़ायदे कानूनों की समझ पर आधारित हैं, और इसको कानूनी राय या सलाह के रूप में नहीं देखना चाहिए।

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  • इस बारे में और अधिक जानें कि भारत में क्यों स्वयंसेवी संस्था के क्षेत्र में व्यापक कानूनी सुधार की जरूरत है।
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  • एफसीआरए को लेकर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आँकड़ों को पढ़ें और उनका विश्लेषण करें।

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लेखक के बारे में
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तनाया जगतियानी

तनाया जगतियानी आईडीआर में एक संपादकीय सहयोगी हैं, जहां वह लेखन, संपादन, क्यूरेटिंग और प्रकाशन सामग्री के अलावा, फैल्यर फ़ाइल्स का प्रबंधन करती हैं। वह वेबसाइट प्रबंधन, इंटर्न की भर्ती और सलाह, और बाहरी संचार परामर्श कार्य पर भी टीम का समर्थन करती है। इससे पहले, उन्होंने कोरम बीनस्टॉक, संहिता सोशल वेंचर्स और एक्शनएड इंडिया में इंटर्नशिप किया है। तनाया ने एसओएएस, लंदन विश्वविद्यालय, से वैश्वीकरण और विकास में एमएससी और सेंट जेवियर्स कॉलेज, मुंबई, से समाजशास्त्र में बीए किया है।

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