मौलिक सुविधाओं से मीलों दूर
Location Iconचमोली जिला, उत्तराखंड

20 साल पहले एक राज्य के रूप में स्थापित उत्तराखंड के निवासी आज भी बुनियादी परिवहन ढांचे की कमी के कारण संघर्ष कर रहे हैं। दुमक, कलगोथ, किमाना, पल्ला, जखोला, लंजी पोखनी, द्विजिंग और ऐसे ही विभिन्न तमाम गांवों में परिवहन की सुविधा की कमी है। इन गांवों में लगभग 500 परिवार रहते हैं जिन्हें अपनी आजीविका के लिए मीलों की दूरी तय करनी पड़ती है। बारिश और बर्फ के मौसम में सड़कों पर चलना भी असंभव हो जाता है। इससे आगे, 2013 में आई बाढ़ों के कारण इन गांवों को जोड़ने वाली पगडंडियाँ और पल टूट गए थे और इनकी मरम्मत अब भी नहीं हुई है। 

इन क्षेत्रों में राजमा, रामदाना और आलू जैसे फसलों की खेती होती है। लेकिन परिवहन के उचित साधन के बिना ये चीजें बाजार तक नहीं पहुँच पाती हैं। देहरादून जैसी मंडियों तक समान पहुँचाने का खर्च कई गुना बढ़ गया है। 

दुमक गाँव में सड़क अभियान के अग्रणी और एक समाज सेवक के रूप में काम करने वाले प्रेम सिंह संवाल कहते हैं कि “आज भी इन गांवों के लोग अपने फसल को मंडी तक ले जाने और बेचने के लिए घोड़ों और खच्चरों का उपयोग करते हैं। इसके कारण किसानों को बहुत अधिक नुकसान उठाना पड़ता है क्योंकि सामानों की ढुलाई में बहुत अधिक पैसे लगते हैं।” गाँव के एक किसान का कहना है कि “गोपेश्वर या जोशी मठ शहर तक जाने के लिए किराए पर एक घोड़ा या खच्चर लेने पर पाँच क्विंटल राजमा देना पड़ता है और मुझे एक पैसे का फायदा नहीं होता है।”

दुमक गाँव के जीत सिंह संवाल और पूरन सिंह का कहना है कि “सीमावर्ती गांवों में से एक गाँव होने के बावजूद मौलिक समस्याएँ यूं ही बनी हुई हैं। सड़क तक पहुँचने के लिए गाँव वालों को 18 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।” आगे वे कहते हैं कि “यह समस्या तब और ज्यादा गंभीर हो जाती है जब गाँव में कोई बीमार हो जाता है।” ऐसी स्थिति में लोग डोली की मदद से बीमार आदमी को लेकर जाते हैं। कभी-कभी वह बीमार आदमी रास्ते में ही मर जाता है। बारिश और बर्फ पड़ने के दौरान रोगी को अस्पताल तक ले जाना भी संभव नहीं होता है।”

गाँव वालों द्वारा लगातार किए गए दोषारोपण के बाद सरकार ने प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत धिंघारण-स्युन-वेमरु-दुमक कलगोथ सड़कों के साथ ही विभिन्न अन्य इलाकों में भी सड़कों के निर्माण की अनुमति की घोषणा की है। लेकिन निर्माण कंपनियों की मनमानी के कारण पिछले 17 सालों से काम या तो रुका हुआ है या अब भी पूरा नहीं हुआ है। 

महानन्द सिंह बिष्ट एक पत्रकार हैं और इन्हें समाज सेवा के कामों में 20 वर्षों का अनुभव है। मूल लेख चरखा फीचर्स द्वारा प्रकाशित की गई थी। 

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अधिक जानें: पढ़ें कि भारत को लिंग-संवेदनशील परिवहन व्यवस्था की ज़रूरत क्यों है।


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