लोगों की सामूहिक स्मृति से राजस्थान में जंगलों की सुरक्षा हो रही है

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अलवाव के एक पवित्र वन के एक जलाशय में भैंसें_राजस्थान के ओरण
जब से ओरान का निर्माण हुआ है, तब से ही समुदाय के लोग पूरी ताकत से इसकी रक्षा कर रहे हैं। | चित्र साभार: इंडिया डेवलपमेंट रिव्यू

राजस्थान के अलवर जिले का पशुपालक गुज्जर समुदाय अपने मवेशियों को चराने के लिए और शहद, जड़ी-बूटियां, फल और जंगल से मिलने वाले अन्य छोटे-मोटे वन उत्पादों के लिए ओरणों (पवित्र वन) का उपयोग करता है।

गुज्जरवास गांव में देवबानी (स्थानीय देवता देवनारायण के नाम पर) नाम का एक ऐसा ही ओरण है जिसमें पीलू, जंगली तुलसी, नीम और गिलोय जैसे देशी पेड़ और जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं। इन पौधों और जड़ी-बूटियों का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में ल्यूकोरिया और मलेरिया जैसी बीमारियों के इलाज के लिए शरीर की प्रतिरक्षा को बढ़ाने के लिए किया जाता है।

किसान अपनी भैंसों को सुबह-सुबह ओरण में लेकर जाते हैं और सूर्यास्त तक वहीं रहते हैं। दिन भर उनकी भैसें वहां चरती हैं। खेती और पशुपालन का काम करने वाले जसराम गुज्जर ने हमें वह जगह दिखाई जहां उनकी पत्नी हर दिन उनके लिए दोपहर का खाना लेकर आती हैं। वह अपनी पत्नी को उस जगह का स्थानीय नाम बताते हैं ताकि उन्हें ढूंढ़ने में आसानी हो, और वह हमेशा ही सही जगह पर पहुंच जाती हैं। ओरण के भीतर ही जगहों के कई प्रकार के विभाजन हैं जिनके बारे में केवल स्थानीय लोगों को ही याद है। यह बात अलग है कि किसी बाहर के व्यक्ति को पूरा ओरण एक जैसा ही दिखाई पड़ता है।

अलवर स्थित समाजसेवी संस्था क्रपाविस के संस्थापक अमन सिंह का कहना है कि समुदाय के लोग देवबानी को अपने देवता देवनारायण की पूजा का ही विस्तृत रूप मानते हैं, और यही कारण है कि वे इस ओरण को अपनी आजीविका के स्रोत से कहीं अधिक महत्व देते हैं। ‘स्थानीय लोग बताते हैं कि ओरण के निर्माण के समय विस्तृत अनुष्ठान हुआ था, गांव का प्रत्येक चरवाहा मिट्टी के बर्तन में गर्म दूध लाता था और उस बर्तन को अपने सिर पर रखकर उस भूमि की परिक्रमा करता था; बर्तनों से टपकने वाले दूध से ही देवबानी की सीमाओं को चिन्हित किया गया था।’

इस मानसिक मानचित्र से अतीत में समुदाय के लोगों को काफ़ी मदद मिली। एक बुजुर्ग पशुपालक चैतराम गुज्जर ने कई ऐसे उदाहरण दिये जिनमें उनकी स्मृति के कारण उन्हें वन विभाग और समुदाय के व्यक्तियों के अतिक्रमण का विरोध करने में मदद मिली। उन्होंने बताया कि, ‘कुछ साल पहले, वन विभाग के लोग ओरण में नर्सरी बनाना चाहते थे। उन्होंने हमारे समुदाय की जमीन पर नर्सरी बेड्स बनाने शुरू किए लेकिन गांव के लोगों ने एकजुट होकर उन्हें उखाड़ फेंका। हम जानते हैं कि कौन सा हिस्सा ओरण का है और कौन सा नहीं।’ आगे उन्होंने कहा कि, ‘हमारे समुदाय के लोगों ने भी इस ज़मीन पर खेती करने और घर बनाने की कोशिश की। लेकिन हर बार हम एकजुट होकर ओरण को नुक़सान से बचाने में कामयाब हुए हैं।’

अमन आगे कहते हैं कि, ‘समुदाय के सदस्यों ने अपनी ज़मीन को पहचाना और इस मामले को लेकर सरपंच और पटवारी के पास गये। उन्होंने रेवेन्यू के काग़ज़ात देखे और पाया कि समुदाय की सामूहिक स्मृति क़ानूनी दस्तावेज में दर्ज चिन्हों से मेल खाते हैं।’

जब से ओरान का निर्माण हुआ है, तब से समुदाय के लोगों ने पूरी ताक़त के साथ इसकी सुरक्षा की है। पिछले कुछ वर्षों में, ग्राम सभा ने यहां पेड़ों को नष्ट करने की कोशिश करने वाले लोगों के लिए कड़े जुर्माने का प्रावधान किया है। अब लकड़ी के एक टुकड़े को काटने वाले पर 101 रुपये और एक पेड़ को काटने पर 2,100 का जुर्माना है। इस तरह की घटनाओं की जानकारी देने वालों के लिए 501 रुपये के इनाम का भी प्रावधान है।

ओरणों की सुरक्षा में समुदाय की शक्ति पर जोर देते हुए, चैतराम कहते हैं, “पूरी बस्ती एक हो जाए तो क्या चले एक की?” (पूरे गांव की इच्छा के सामने एक व्यक्ति के लालच की क्या बिसात?)

जैसा कि आईडीआर को बताया गया।

जसराम गुज्जर ने इस लेख में अपना योगदान दिया है।

अमन सिंह कृषि एवं परिप्रेक्ष्य विकास संस्थान (क्रपाविस) के संस्थापक हैं। चैतराम गुज्जर राजस्थान में एक कृषि-पशुपालक हैं।

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अधिक जानें: जानें कि कैसे ओडिशा के कई गांव एक जंगल की रक्षा के लिए एक साथ आए।

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